Sunday, February 17, 2008

मैं मुसलमान होता तो इस देश में कैसे जीता?

आफताब आलम अंसारी को गोरखपुर धमाकों के आरोप में जिस तरह फंसाने की कोशिश की गई उसके ख़िलाफ़ कई लोगों ने अपनी आवाज़ बुलंद की है. अल्पसंख्यकों के साथ पुलिसिया व्यवहार पर नदीम ने कुछ अहम सवाल उठाए हैं तो आशीष ने देश के माहौल पर एक भावुक-सी टिप्पणी की है.

संजय बेंगाणी :
मजे की बात है दोषियों को बचाया जाता है और बेगुनाहों को सजा दे दी जाती है. बहुत से बेगुनाह जो मुसलमान नहीं होंगे, पकड़ा जाता रहा है. धर्म के आधार पर न पकड़ा जाना चाहिए, न छोड़ा जाना चाहिए.
नदीम:
इस विषय पर साथियों की राय जानकार अच्छा लगा. चलो कोई तो है जो इस तरह सोचता है. वैसे एक मुसलमान होकर किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है क मुसलमान के आलावा कौन बेहतर जान सकता है.में पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मी नगर में रहता हूँ पिछली घटनाओ और आतंकियों की पकड़ के बाद से ये इलाका +काफी बदनाम या कहें की मशहूर हो चूका है. आप यकीन मानेंगे की में पिछले ४ सालों से लगातार अपना वोटर आई कार्ड साथ लेकर चलता हूँ.कारन ये की कोई भी समस्या या पूछताछ के समय अन्य किसी वर्ग से अगर ४ सवाल किये जाते हैं तो एक मुस्लिम से ६, वहीं यदि अन्य वर्ग २ सवालों के जवाब गलत देगा तो उसे थोडी ढिलाई से छोड़ दिया जाता है लेकिन हम लोग ६ में से यदि एक सवाल का जवाब भी गलत दे दें सो समझ जाइये शाम को थाने में हाजरी पक्की है.कब तक लोग हमारी देश भक्ति पर शक करते रहेंगे? हम भी ये सोचकर चुप हो जाए हैं की हमीं में से कुछ लोगों ने हमें बदनाम कर रखा है.
आशीष:
कभी कभी सोचता हूं कि यदि मैं मुस्लिम होता है तो इस देश में कैसे जीता?
घुघूती बासूती:

नदीम जी, आपकी बात को कुछ कछ समझ सकती हूँ । आशीष जी की तरह बहुत बार अपने आप को आपकी जगह रख कर सोचा है । स्थिति ऐसी हो गई है कि प्रकाश की किरण को हम सबको मिलकर ढूँढना होगा । हमें अपनी व आपकी व हम सबके धर्मों के लोगों की मानसिकता को भी समझना होगा । अन्य देशों के मुसलमानों के बारे में तो नहीं कह सकती, परन्तु अपने देश के लोगों के लिए जो समझ आता है वह कुछ वैसा लगता है जैसा मुझे पहाड़, उत्तराखंड को लेकर लगता है । यदि मैं उत्तराखंड में रह रही होती या मेरे आसपास के सब लोग उत्तराखंडी होते या मैं यहाँ एक अकेली उत्तराखंडी ना होती या मेरे घर में मेरी मातृभाषा कुमाऊँनी बोली जाती तो शायद मुझे वहाँ की इतनी याद, इतनी नॉराई नहीं लगती । बहुसंख्यक को ना अपनी भाषा , न अपनी संस्कृति को बचाए रखने का उतना उत्साह होता है, ना उसके खोने का उतना भय होता है जितना अल्पसंख्यक को । जहाँ तक पुलिस का प्रश्न है तो जैसा वेतन हम उन्हें देते हैं उसके अनुकूल ही उनका व्यवहार व निष्ठा हम पाते हैं । यदि हम सोचें कि मूँगफली देकर महामानव पुलिस वाले पाएँगें तो हम मूर्ख हैं।
नदीम:
घुघूती जी आपके विचारों के लिए तथा सहानभूति के लिए धन्यवाद. अब अगर ये समाज बदलेगा तो केवल पढ़ लिखे तथा खुले विचारों के लोग ही सुधरेंगे. मुझे उम्मीद है आप लोगों जैसे साथियों का साथ बना रहेगा.

Saturday, February 16, 2008

मुसलमान होने की सज़ा

नाम में क्या रखा है, ये कहने के बाद शेक्सपीयर सदियों पहले मर गया. लेकिन नाम से निकलने वाली प्रतिध्वनियां आधुनिक मनुष्य का पीछा नहीं छोड़ रही हैं. जटिलता भरे समाज में नाम का मसला इंसान की एक ख़ास तरह की पहचान से जुड़ जाता है. इसके आधार पर जहां बहुसंख्यक-ताक़तवर लोग फायदे में रहते हैं तो अल्पसंख्यक-कमजोर लोगों को कई तरह की मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं.
हमारे धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र की पोल खोलने के लिए एक घटना काफी है. पिछले साल गोरखपुर में बम धमाकों के लिए एक शख्स को सिर्फ इसलिए ज़िम्मेदार ठहरा दिया गया कि उसके नाम में एक मुसलमान की पहचान छिपी थी.
आफ़ताब आलम अंसारी पश्चिम बंगाल इलेक्ट्रीसिटी बोर्ड का कर्मचारी है. बारह दिसम्बर को उसे पश्चिम बंगाल सीआईडी ने कोलकाता से पकड़कर यूपी एसटीफ़ को सौंप दिया. फिर शुरू हुआ शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना का दौर. पुलिस ने उसे गोरखपुर बम धमाकों का मुख्य आरोपी बनाया और बांग्लादेशी आतंकवादी संगठन हूजी का एक बहुत ही ख़तरनाक आतंवादी बना डाला. हर वक़्त सनसनी खोजने की फिराक में रहने वाले मीडिया ने भी पुलिस की कहानी को हक़ीक़त की तरह देश के सामने पेश किया. सीधे-सादे आफ़ताब को पूरे देश में आतंकवादी मान लिया गया. बाद में जब आफताब की मां और एक मानवाधिकार संस्था ने आफ़ताब का पक्ष सामने रखा तो पुलिस का सारा फर्जीबाड़ा सामने आ गया. अदालत को मजबूर होकर आफ़ताब को रिहा करना पड़ा.
कल आफ़ताब दिल्ली में था. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (जेएनयूएसयू) और फोरम फॉर डेमोक्रेटिक इनिशिएटिव (एफडीआई) के साथियों ने आफ़ताब को मीडिया के सामने पेश किया तो वो आपबीती सुनाते हुए फफक-फफककर रो पड़ा. आफ़ताब ने बताया कि किस तरह पुलिस उसे मुख्तार बनाने और उसके बैंक अकाउंट में छै करोड़ रुपए होने की बात क़ुबूल करवाने पर तुली थी.
आफताब की जान तो बच गई लेकिन उसे बेवजह दी गई तकलीफ़ पर क्या ये सरकार मांफी मांगेगी? क्या आफ़ताब को मिली प्रताड़ना का मुआवजा उसे दिया जा सकता है?

Friday, February 15, 2008

फैज़ अहमद फैज़ को याद करते हुए

हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लौह-ए-अजल में लिखा है
जब जुल्म ए सितम के कोह-ए-गरां
रुई की तरह उड़ जाएँगे
दम महकूमों के पाँव तले
जब धरती धड़ धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हिकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी
हम अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख्त गिराए जाएंगे
और राज करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो


कई साल पहले मुंबई के अगस्त क्रांति मैदान में शुभा मुद्गल की आवाज़ में इसे सुनकर हम दोस्त लोग झूम रहे थे. कुछ तो स्लो मोशन में डांस भी कर रहे थे. हम ढेर सारे लड़के-लड़कियां नए दुनिया के सपनों को साथ लिए वहां जुटे थे. जब भी फैज़ का नाम आता है. मुंबई का वो नज़ारा आंखों के सामने ताज़ा हो जाता है. कल स्टेन ऑडिटोरियम में फैज़ की नज़्मों को फिर से सुनने का मौक़ा मिला. रिमेम्बरिंग फैज़ प्रोग्राम के तहत राधिका चोपड़ा फैज़ की नज्में सुना रही थीं. फैज़ के नाम पर मैं यूं ही ऑडिटोरियम के भीतर पहुंच गया. ये भी नहीं पता था कि स्टेज पर कौन गा रहा है. बहुत देर तक मैं इस भ्रम में रहा कि शायद पाकिस्तानी गायिका ताहिरा सैय्यद गा रही हैं. ऐसा सोचने की वजह सिर्फ इतनी सी थी ताहिरा की तरह ही राधिका भी काफी ख़ूबसूरत है. कुछ महीने पहले ही मैंने ताहिरा को मंच पर गाते हुए सुना था. मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि फैज़ की इतनी नज़्मों को इतनी ख़ूबसूरती से इतनी अदाओं में गाया भी जा सकता है. सामने से राधिका सुना रही थी-

मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब ना मांग

मैंने समझा था कि तू है तो दरख़्शा है हयात
तेरा ग़म है तो ग़मे-दहरका झ़गडा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है

तू जो मिल जाये तो तकदीर निगूं हो जाए
यूं न था, मैंने फकत चाहा था यूं हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशमों- अतलसो- कमख्वाब में बुनवाये हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
खाक में लिथडे हुए, ख़ून में नहलाए हुए

जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना मांग


छात्र राजनीति के दौरान जब भी प्रेम और क्रांति के बारे में हम लोग बात करते थे तो इस नज़्म का ज़िक्र बार-बार आता था. ये बात और है कि आज ना तो क्रांति को लेकर उस तरह का उत्साह बचा है और ना ही वो प्रेम. मुझे पुराने दिन याद आ रहे थे और राधिका सुना रही थीं-

शाम ए फिराक अब ना पूछ आई और आ के टल गई
दिल था कि फिर बहल गया, जां थी कि फिर संभल गई

जब तुझे याद कर लिया, सुबह महक महक उठी
जब तेरा गम जगा लिया, रात मचल मचल गई

दिल से तो हर मुआमलात करके चले थे साफ हम
कहने में उनके सामने बात बदल बदल गई


राधिका जितनी सुरीली आवाज़ में गा रही थीं वो अपने शागिर्दों को भी उतना ही मौक़ा दे रही थी. शागिर्द जब तबले पर अपना हुनर दिखा रहा था तो वो मंच से ही उसे बार-बार दाद भी दे रही थीं. राधिका ने फिर सुनाया -

दोनों जहान मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई सब-ए-ग़म गुज़ार के.


आज पढ़ना-लिखना लगातार छूटता जा रहा है. पढ़ते भी हैं तो नई-नई चींज़ें सामने होती हैं. पुराने पढ़े हुए को फिर से पढ़ने का मौक़ा कम ही मिलता है. ऐसे में फैज़ को सुनना ख़ुद को ही रिविजिट करने की तरह लगा.