Tuesday, February 28, 2012

मुनाफ़े की होड़ से प्रकृति को ख़तरा

भूपेन सिंह
पर्यावरण, पारिस्थिकी और संतुलित जलवायु को बचाने की बात करना एक फ़ैशन बन गया है. जिस वजह से कई बार इन मुद्दों की गंभीरता ख़त्म-सी होती नज़र आती है. दुनियाभर के अमीर देश और लोग ऐसे बात करते हैं जैसे इन मुद्दों पर उनसे ज़्यादा परेशान कोई नहीं. जबकि वर्तमान स्थितियों के लिए वही सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार हैं. प्राकृतिक संसाधनों का मनमाना दोहन करने की वजह से जो ख़तरे पैदा हुए हैं उनसे बचने के लिए दुनिया को विनाश की तरफ़ ले जा रही ताक़तों की शिनाख़्त ज़रूरी है. इस काम को दुनिया की आर्थिक-राजनीतिक स्थितियों को समझे बिना अंजाम नहीं दिया जा सकता है.
यह बात सच है कि कुदरत और इंसानी रिश्तों के बीच के संतुलन का औद्योगीकरण और शहरीकरण की प्रक्रिया में ध्यान नहीं रखा गया. कुछ विद्वान औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को पर्याय के तौर पर इस्तेमाल करने लगते हैं जबकि औद्योगीकरण की तुलना में आधुनिकता काफ़ी विवादास्पद मुद्दा है. इसको हम विज्ञान और तर्क के विकास के युग के तौर पर समझ सकते हैं. एक काल के तौर पर देखें तो आधुनिकता पुरानी सामंती व्यवस्था से बाहर निकलने का नाम है. लेकिन ये पूंजीवाद का पर्याय नहीं है. पूंजीवादी व्यवस्था का विकल्प समाजवाद भी इस युग की देन है. आधुनिकीकरण नाम के शब्द से दिक्कत तब शुरू होती है जब यूरोप और अमेरिका की पूंजीवादी सरकारों ने इसे पूंजीवाद के पर्याय के तौर पर पेश करना शुरू किया और दुनिया के ग़रीब देशों में इसके नाम पर अपना मुनाफ़े का कारोबार फ़ैलाया. हाल के दौर में जिस तरह पूंजीवाद ने वैश्वीकरण जैसे ख़ूबसूरत शब्द का इस्तेमाल कर दुनियाभर में अपनी नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए किया है वैसे ही पहले वो आधुनिकता नाम से करने की कोशिश कर चुका है.
वैज्ञानिक धरती के संकट को अपनी-अपनी तरह परिभाषित करते हैं. वे पिघलते ग्लेशिरों, बढ़ती समुद्री सतह, जलवायु परिवर्तन, ओजोन की परत के क्षय जैसे कई गूढ़ मुद्दों पर बात करते हैं लेकिन एक आम इंसान इन सबके बारे में बहुत ज़्यादा नहीं जानता है. उसके लिए धरती के सुरक्षित होने का मतलब सिर्फ़ इतना ही है कि उसे पीने के लिए साफ़ पानी, सांस लेने के लिए शुद्ध हवा और जीवन जीने के लिए अनुकूल स्थितियां मिलें. कोई जबरन उसके जंगल और ज़मीन से उसे बेदखल करने पर उतारू न हो. लेकिन मुनाफ़े पर टिका जिस तरह का विकास का मॉडल आज अपनाया जा रहा है उसमें धीरे-धीरे आम इंसान के हाशिए पर जाना तय है. कुदरत का अंधाधुंध दोहन इसी मॉडल का परिणाम है. इसलिए इस विषय पर आर्थिक-राजनीतिक समझदारी के बिना नए विकल्प नहीं तलाशे जा सकते हैं.
कुदरत और इंसानी समाज के बीच एक किस्म का संतुलन बेहद ज़रूरी है. इसका मतलब यह भी नही है कि सारी वैज्ञानिक और आधुनिक चेतना का बहिष्कार किया जाए. जैसा कई बार गांधीवादी मित्र करने लगते हैं. वे गांधी का एक उद्वरण बार-बार सुनाते हैं कि कुदरत लोगों की ज़रूरत को पूरा करने के लिए है, ना कि उनके लालच को. इस वाक्य को नैतिक बयान की तरह पेश किया जाता है जिसमें अक्सर ठोस भौतिक परिस्थितियों की अनदेखी कर दी जाती है, जैसे कुदरत के विनाश के लिए सभी इंसान बराबर के ज़िम्मेदार हैं. यहां विकास के अलग-अलग मॉडलों और उनकी राजनीति का अंतर भुला दिया जाता है. इस संदर्भ में कहा जा सकता है कि कुदरत मुनाफ़ा कमाने की होड़ के लिए नहीं है. ये शब्द ज़्यादा राजनीतिक और स्पष्ट मायने देता है. गांधी के इस कथन के आधार पर कुछ कट्टर गांधीवादी औद्योगीकरण की प्रक्रिया और तकनीकी उन्नति की इकतरफ़ा आलोचना करने लगते हैं. वे पिछड़ी हुई ग्रामीण और आदिवासी जीवन पद्धति का अंध समर्थन करते हैं. वे यह तर्क देते नहीं थकते कि ग्रामीण/आदिवासी जीवन पद्धति अपने आप में महान है. ऐसे लोगों को आदिवासियों की कबीलाई सोच और पिछड़े उत्पादन संबंधों पर टिका जीवन नज़र नहीं आता है. इस अति में जाने के बजाय एक संतुलित नज़रिया अपनाना ज़्यादा बेहतर हो सकता है. आख़िर आधुनिक ज्ञान-विज्ञान ने कुदरत को ज़्यादा सुरक्षति रखने के तरीक़े भी तो बताए हैं. सही राजनीति हो तो विज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल सुविचारित तरीक़े से कुदरत और इंसान को बचाने में भी तो किया जा सकता है! कुदरत का मनमाना दोहन विज्ञान या तकनीक नहीं बल्कि मुनाफ़े के लिए काम करने वाली इंसानी शक्तियां करती हैं. ऐसे में ज़रूरी है कि ऐसी शक्तियों की पहचान की जाए और उनके ख़िलाफ़ बोला जाए.
आज लोगों में जागरूकता बढ़ रही है और अलग-अलग जगहों पर वे मुनाफ़े की इस होड़ के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर रहे हैं. सारी बातों को ध्यान में रखकर कहा जा सकता है कि न तो मुनाफ़ाखोरी के लिए धरती के अंधाधुंध दोहन की इजाजत दी जा सकती है और न ही उसे पवित्र गाय मानकर पूजने की ज़रूरत है. असली ख़तरा प्राकृतिक संसाधानों के व्यावसायीकरण से है. पूंजीवादी विकास के मॉडल से प्रकृति के विनाश को नहीं रोका जा सकता. इसलिए अगर इंसान और पृथ्वी को बचाना है तो दुनियाभर में चल रहे उन आंदोलनों का समर्थन करना होगा जो वैकल्पिक आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था के नारों के साथ सामने आ रहे हैं.
नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के प्रभाव में आने के बाद दुनियाभर में वित्तीय आवारा पूंजी का चलन बढ़ा है. जिसने समाज, राजनीति और धरती के संबंध बदल कर रख दिए. उदारवादी आर्थिक नीतियों में कुछ हद तक राज्य की कल्याणकारी भूमिका बची हुई थी लेकिन विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) और विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की अगुवाई में वैश्वीकरण की जो प्रक्रिया शुरू हुई उसने पूंजीवाद के भीतर कल्याणकारी राज्य के छद्म को भी पूरी तरह बेनकाब कर दिया. उन्नीस सौ इक्यानबे में भारत सरकार ने भी नई आर्थिक नीतियों के नाम पर उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (एलपीजी) की नीतियां अपनाई तो इसके असर से भारतीय जीवन का कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं बचा है. आज बड़ी पूंजी और बहुराष्ट्रीय निगम मुनाफ़े के लिए हमारे प्राकृतिक संसाधनों का मनमाना दोहन करने मे जुटे हैं. देश का कोई ऐसा भूभाग नहीं बचा है जहां पर्यावरण और पारिस्थिकी, कॉरपोरेट लूट का शिकार न हो रहे हों. जो इलाक़े अब तक किसी वजह से बचे हुए हैं वहां भी उनकी गिद्ध दृष्टि लगी हुई है. इन नीतियों ने व्यक्ति, समाज और प्रकृति के संबंध बदल कर रख दिए हैं. इस कॉरपोरेट लूट के ख़िलाफ़ दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के अलावा भारत में भी लोग लगातार संघर्षों को आगे बढ़ा रहे हैं.
यह ऐतिहासक तथ्य जग जाहिर है कि एक दौर में उपनिवेशवादियों ने प्राकृतिक संसाधनों को लूटने के लिए पूरी दुनिया में अपने उपनिवेश स्थापित कर दिए थे. भारत भी उससे अछूता नहीं रहा. उन्नीस सौ सैंतालीस में देश को जब तथाकथित आज़ादी मिली तो लोगों से सोचा था कि उपनिवेशवाद की प्रक्रिया ख़त्म हो जाएगी. लेकिन ऐसा कभी संभव नहीं हो पाया उल्टा उन्नीस सौ नब्बे के दशक में फिर से पुनर्उपनिवेशीकरण प्रक्रिया शुरू हो गई. फर्क सिर्फ़ इतना था कि तब एक देश के हम गुलाम बने थे आज उनके बदले बड़े-बड़े बहुराष्ट्रीय निगम हमारे संसाधनों को लूट रहे हैं. देश के कई हिस्सों में आज बहुराष्ट्रीय कंपनियां साम, दाम, दंड, भेद अपनाकर हमारे प्राकृतिक संसाधनों को लूटने के लिए निकल पड़ी हैं. हमारी सरकारें एक तरह से बड़े-बड़े निगमों के हाथ की कठपुतलियां बन कर रह गई हैं. यही वजह है कि जनता के लाख विरोध के बाद भी लोगों को उनकी उपजाऊ ज़मीन से बेदखल किया जा रहा है. इसके ख़िलाफ़ जब लोग एकजुट हो रहे हैं तो उन्हें माओवादी का ठप्पा लगाकर जेलों के अंदर ठूंसा जा रहा है. हाल के दौर में उड़ीसा, झारखंड और छत्तीसगढ़ में खनन कंपनियों की लूट और उनके ख़िलाफ़ संघर्ष इसके उदाहरण हैं.
उड़ीसा के जगतसिंह पुर में आम जनता की अनदेखी कर सरकार कोरियाई कंपनी पोस्को को स्टील प्लांट लगाने की इजाज़त दी है. पोस्को खुलेआम वहां पर न सिर्फ़ जनता के अधिकारों को कुचल रही है बल्कि पर्यावरण से भी मनमाना खिलवाड़ कर रही है. राज्य सरकार विकास के नाम पर इस प्लांट को ज़रूरी बताती है. जबकि इससे सबसे ज़्यादा मुनाफ़ा पोस्को और उसको पोसने वाले नेताओं का ही होना है. यही वजह है कि पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति (पीपीएसएस) के नेतृत्व में वहां पर लगातार संघर्ष जारी है. फिलहाल वहां पर समिति के नेता अभय साहू को पुलिस ने फर्जी मामलों में जेल में डाला हुआ है. समिति के लिए लोगों का विस्थापन भी एक बड़ा मुद्दा है. उड़ीसा में ही दुनिया की बड़ी स्टील कंपनी वेदांता नियामगिरी की पहाड़ियों में खनन कर रही है. इसने भी सारे नियम कायदों को ताक पर रखा हुआ है. कुछ ऐसा ही आतंक जिंदल स्टील एंड पावर और एस्सार जैसी कंपनियों ने छत्तीसगढ़ में मचा रखा है. ऐसी ही कोशिश टाटा स्टील नंदीग्राम और सिंगूर में कर चुकी है वहां जन प्रतिरोध के सामने उसकी दाल नहीं गली. लेकिन उड़ीसा के कलिंगानगर में वो जनविरोध के बावजूद अब तक जमी हुई है. हमारी सरकारें रोजगार और विकास के नाम पर इन योजनाओं के समर्थन में जुटी रहती है. स्थानीय और ग़रीब लोगों की शिकायतों से उसे कुछ लेना-देना नहीं है. पर्यावरण से खिलवाड़ को रोकने के लिए जो सरकारी मापदंड हैं ये कंपनियां उन मापदंडों तक को पूरा नहीं करती लेकिन सरकारें कॉरपोरेट हित में सबकुछ अनदेखा करती हैं. ये कॉरपोरेट लूट जनता और प्रकृति के संबंधों को पूरी तरह छिन्न-भिन्न कर रही है. इन योजनाओं का देश की बहुसंख्यक जनता के विकास से कोई लेना-देना नहीं है.
खनन के अलावा विकास के नाम पर कई जगहों पर अमीरों के हित साधने के लिए बड़े-बड़े बांध बनाए जा रहे हैं. अकेले उत्तराखंड में पांच सौ से ज़्यादा बांध प्रस्तावित हैं. इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि अगर पारिस्थितिकीय तौर पर संवेदनशील उत्तराखंड में इतने बांध बन गए तो वहां रहने वाले लोग कहा जाएंगे. उत्तराखंड का पहाड़ दुनिया के सबसे नए और कच्चे पहाड़ों में से एक है मुनाफ़े लिए चल रही निजी कंपनियों की गतिविधियां किसी दिन पूरे देश के लिए बड़े हादसे का सबब बन सकती हैं लेकिन तात्कालिक मुनाफ़ा देख रहे हुक्मरानों को इस बात की कोई फ़िक्र नहीं है. जेपी जैसी बड़ी कंपनी वहां तबाही में जुटी हुई हैं. पहाड़ों में सुंरंग खोदने की वजह से वहां कई जगहों पर भूस्खलनों की संख्या बढ़ गई है. हर साल वहां बारिश के मौसम में हादसों की संख्या भी बढ़ती जा रही है.
पर्यावरण की अनदेखी करने वाली सरकारी नीतियों की वजह से देश के कई हिस्सों में न्यूक्लियर प्लांट लगाने की प्रक्रिया भी जोर-शोर से जारी है. तमिलनाड़ु के कूडनकुलम पावर प्रोजेक्ट के ख़िलाफ़ जनता एकजुट है लेकिन कॉरपोरेट की पिछलग्गू सरकार उसकी एक नहीं सुन रही. रूस की मदद से बन रहे इस प्रोजेक्ट के ख़िलाफ़ पर्यावरणवादियों ने गहरी चिंताए जताई हैं. देश के पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल मैन अब्दुल कलाम इस प्रोजेक्ट के पक्ष में जी-जान एक किए हुए हैं. न्यूक्लियर एनर्जी के विरुद्ध लड़ाई लड़ रहे लोगों का कहना है कि इस तरह के प्रोजक्ट सिर्फ़ अमीरों के हित में हैं ग़रीब लोगों को इसमें अपनी ज़मीन समेत सबकुछ खोना है. इन तरह के प्लांट में जनता के स्वास्थ्य का भी ध्यान नहीं रखा जा रहा है. ये सबकुछ पब्लिक सेक्टर की कंपनी न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड अंजाम दे रही है. इस काम में निजी कंपनियां उसकी मददगार हैं. इससे ज़ाहिर होता है कि पब्लिक सेक्टर की कंपनियां भी इस दौर में जनहित और मानव विकास की बजाय मुनाफ़ाखोरी और बृद्धि दर बढ़ाने में जुटी हुई हैं. महाराष्ट्र के रतनगिरी जिले के जैंतापुर में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की मदद से न्यूक्लियर पावर प्लांट लगाया जा रहा है. स्थानीय जनता और पर्वावरणवादी कार्यकर्ताओं का आंदोलन वहां भी जारी है. फ्रांसीसी बहुराष्ट्रीय कंपनी अरेवा इसके निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. इसके लिए खुद फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी और प्रधानमंत्री मनमोहन के बीच सहमति हुई थी. हरियाणा के फतेहाबाद ज़िले में गोरखपुर अटोमिक पावर प्लांट के ख़िलाफ़ भी किसान एकजुट हैं. सरकार इसके अलावा भी कॉरपोरेट दबाव में बड़े पैमाने पर न्यूक्लियर पावर प्लांट लगाने की योजना बना रही है. पिछले साल जापान के फुकुशिमा पावर प्लांट में हुए हादसे के बाद भी सरकार इस बारे में कुछ सोचने के लिए तैयार नहीं है.
पर्यावरण को तबाह करने वाली इन सभी परियोजनाओं में भ्रष्टाचार की गंगा बह रही है. राजनीतिज्ञों से लेकर कॉरपोरेट इसमें अपना मुनाफ़ा देख रहे हैं. जनमत बनाने में अहम भूमिका निभाने वाला मीडिया भी कॉरपोरेट के हाथों में ही खेल रहा है इसलिए सही तस्वीर जनता तक पहुंच नहीं पा रही है. लेकिन सरकार कॉरपोरेट की सेवा में कितना ही क्यों न जुटी रहे, देशभर में इस कॉरपोरेट लूट के ख़िलाफ़ जनता एकजुट हो रही है. इस बीच जनता के असली आंदोलनों से ध्यान हटाने वीले कई नकली आंदोलन भी सामने आ रह हैं. असली-नकली की पहचान के बिना बदलाव की कोई लड़ाई संभव नहीं है. हाल के दौर में देश ने अन्ना हजारे के नेतृत्व में चले एक बड़े भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को भी देखा. पूरी दुनिया में इसकी चर्चा रही. बड़ी संख्या में शहरी मध्यवर्ग के लोग इससे जुड़े. लेकिन हैरत की बात है कि अन्ना और उनके सिपहसालारों को देशभर में चल रही सरकारी और कॉरपोरेट मिलीभगत से हो रही ऐसी लूट बिल्कुल नहीं दिखाई देती. संस्थागत भ्रष्टाचार पर चुप्पी उन्हें बेनकाब कर देती है. इस आंदोलन में बड़ी संख्या में तथाकथित सिविल सोसायटी संगठनों यानी गैर सरकारी संस्थाओं ने बड़ी संख्या में हिस्सेदारी की. जो दर्शाते हैं कि विदेशी और कॉरपोरेट पूंजी से चलने वाले छद्म आंदोलन आज जनता को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं.
दुनिया के स्तर पर भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त आंदोलन चल रहे हैं. भारतीय सेठ अब देश को ही नहीं बल्कि दुनिया को भी लूटने में जुटे हुए हैं. वैश्वीकरण की वजह से देश की गरीबी कम हुई हो या नही यह अलग बात है, लेकिन इन कंपनियों को पूरी दुनिया में लूट मचाने के लिए छूट मिल गई है. हैरान करने की बात ये है कि टाटा, वेदांता जैसी विशालकाय कंपनियां ही नहीं बल्कि ओएनजीसी जैसी हमारी पब्लिक सेक्टर की कंपनियां भी अफ्रीका के कई देशों में मुनाफ़े के लिए प्रकृति से खिलवाड़ करने में जुटी हैं. वहां भी इन कंपनियों के ख़िलाफ़ प्रतिरोध जारी है. लेकिन इस दौर में प्रतिरोध के असली आंदोलनों की शिनाख्त करना भी एक महत्वपूर्ण बात हो गई है. क्योंकि जो व्यवस्था प्रकृति के इस विनाश के लिए सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार हैं वे ही इसके ख़िलाफ़ पैसा ख़र्च कर छद्म आंदोलन खड़े कर रही है. स्वंसेवी संस्थाओं के बैनर तले चलने वाले इस तरह के आंदोलन अब तक दुनियाभर में कई सक्रिय आंदोलनकारियों को निष्किय करने का काम कर चुके हैं. मसलन, विकास के मुनाफ़ाखोर मॉडल को दुनियाभर में फैला रही वर्ल्ड बैंक जैसी संस्था भी पर्यावरण की सुरक्षा के लिए पैसा ख़र्च करती है. ठीक इसी तरह से बड़े-बड़े कॉरपोरेट हाउस अपनी छवि सुधारने के लिए या तो ख़ुद एनजीओ बनाते हैं या फिर एनजीओज को पैसा देते हैं. ऐसे एनजीओज आज हर जगह जन आंदोलनों को कमजोर करने के काम में जुटे हैं. पर्यावरण और ऊर्जा पर काम करने वाली टाटा की संस्था टाटा एनर्जी रिसर्च इंस्टीट्यूट (टेरी) जैसी कई संस्थाएं इस बात का पुख्ता उदाहरण हैं. अब अगर ऐसी संस्था कभी नंदीग्राम, सिंगूर या कलिंगानगर के आंदोलनों पर अध्ययन करे और अपना निष्कर्ष निकाले तो उनका अनुमान पहले से ही आसानी से लगाया जा सकता है. इसलिए आज के दौर में इस तरह के छद्म और कॉरपोरेट प्रायोजित आंदोलनों से भी सचेत रहने की ज़रूरत है.
लेटिन अमेरिका के कई देशों का उदाहरण हमारे सामने है. जब अस्सी और नब्बे के दशकों में वहां के शासकों ने नव उदारवादी नीतियों को लागू करने में कोई कसर नहीं छोड़ी तो वहां जनता का असंतोष सामने आने लगा तब उसे मिटाने के लिए दुनियाभर की पूंजीवादी संस्थाओं ने एनजीओज के माध्यम से हस्तक्षेप शुरू किया. वहां पर बड़ी मात्रा में तरह-तरह के एनजीओवादी आंदोलनों पर पैसा ख़र्च किया गया. साम्राज्यवाद के मशहूर आलोचक जेम्स पेट्रास अपने लेख लेटिन अमेरिका: सोशल मूवमेंट्स इन द टाइम्स ऑफ़ इकोनोमिक क्राइसिस में इसका जिक्र करते हैं. लेकिन आख़िरकार बहुसंख्यक किसानों की ज़मीन हथियाने और पर्यावरण का मनमाना दोहन करने वाली कंपनियों और उन्हें संरक्षण देने वाले शासकों के ख़िलाफ़ जनता ने एकजुट होना शुरू कर दिया. नब्बे का अंत आते-आते और इस सदी के पहले दशक में ब्राजील, इक्वाडोर, वेनेजुएला, बोलिविया और अर्जेंटिना में हालात बदले और जनता ने नवउदारवादी विध्वंशक नीतियों को अस्वीकार कर नया राजनीतिक विकल्प पेश किया. आज भी अपनी ‘तमाम सीमाओं के बावजूद’ ये देश पूंजीवादी विकास के मॉडल को चुनौती दे रहे हैं. इनके अलावा पेरू, परागुवे, कोलंबिया, चिली, उरुग्वे और मक्सिको में भी नवउदारवादी विकास के मॉडल के खिलाफ़ किसी न किसी रूप में संघर्ष जारी है.
वैश्विक अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि भारत में चल रहे जन आंदोलनों की एकजुटता ही पूंजीवादी विकास के मॉडल को चुनौती दे सकती है. लेकिन इस प्रक्रिया में सबसे ज़्यादा सावधान प्रायोजित आंदोलनों से रहने की ज़रूरत है. देसी-विदेशी पैसे से प्रायोजित आंदोलन किसी भी आंदोलन की अकाल मौत का कारण बन सकते हैं. आज भी देश में सिर्फ़ पर्यावरण की फिक्र करने वाले या जाति, लिंग आधारित आंदोलनों को उनके व्यापक आर्थिक संदर्भों से काटकर हवा देने वाली हज़ारों सस्थाएं देश में सक्रिय हैं.
पूंजीवाद विकास के सबसे बडे मॉडल अमेरिका में ही आज इसके ख़िलाफ़ विरोध के स्वर तेज़ हो रहे हैं. हाल के दौर में आक्यूपाइ वॉल स्ट्रीट आंदोलन ने अमेरिका विकास की पोल खोल दी. अमेरिका के न्यूयॉर्क में वाल स्ट्रीट वित्तीय पूंजी का प्रतीक है. जनता ने जिस पर कब्ज़ा करने के लिए आंदोलन शुरू किया. देखते ही देखते ये आंदोलन पूरे अमेरिका और दुनिया के कई देशों में फैल गया. लोगों ने बड़े पैमाने पर पूंजीवादी विकास के मॉडल पर सवाल खड़े किए. कुछ लोगों के मुनाफ़ा कमाने की ख़्वाहिश के आगे दुनिया के ग़रीबों के विनाश की बात जोर-शोर से उठायी गई. मिस्र, ट्यूनिशा और लीबिया में भी जनउभार के पीछे कहीं न कहीं पूंजीवादी आर्थिक मॉडल और उसके पैरोकार शासकों के अधीन जनता की दुर्दशा का मामला ही प्रमुख था. अफ़गानिस्तान और इराक़ में अमेरिका और यूरोपीय देशों ने जिस तरह तबाही मचाई है. उसके पीछे मुनाफ़ाखोरी की इच्छा के अलावा और कुछ नही है. इसे इस्लाम के ख़िलाफ़ ज़ेहाद समझने वाले कट्टरपंथी कभी असली कारणों पर बात नहीं करते. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि अगर धरती और धरतीवासियों को बचाना है तो किसी धर्म, जाति या लिंग के विमर्श में इसका हल नहीं है बल्कि पूंजीवादी विकास के मॉडल का ख़ात्मा कर ही इस दुनिया को ज़्यादा मानवीय बनाया जा सकता है. इस धरती को बचाने की बात करना इंसानियत को बचाने की बात करना है.
(समयांतर के फरवरी अंक में प्रकाशित)

Thursday, February 9, 2012

कॉरपोरेट पत्रकारिता के पुरस्कार

भूपेन सिंह
साहस की पत्रकारिता (जर्नलिज्म ऑफ़ करेज) का नारा देने वाले इंडियन एक्स्रप्रेस ग्रुप की पोल इस बार पूरी तरह खुल गई है. ग्रुप के दिवंगत मालिक रामनाथ गोयनका के नाम पर हर साल दिए जाने वाले पत्रकारिता के पुरस्कारों में जिस तरह कॉरपोरेट लूट में शामिल व्यावसायिक घरानों को प्रायोजक बनाया गया, उससे साफ़ हो गया है कि ऐक्सप्रेस सालभर उनके पक्ष में माहौल बनाने का काम यों ही नहीं कर रहा था. अब उनके बीच लेन-देन का मामला बिल्कुल साफ़ हो गया है. वैसे तो मुनाफ़ा कमाने की होड़ में शामिल ऐक्सप्रेस के अनैतिक कारनामे नए नही हैं लेकिन आम पाठकों को कई बार ऐक्सप्रेस के बारे में भी लगता है कि यह एक जन पक्षधर अख़बारी घराना है. ख़ास तौर पर हिंदी में एक्सप्रेस ग्रुप के हिंदी अख़बार जनसत्ता को पढ़ने वाले ज़्यादातर पाठकों के भीतर यह भ्रम कुछ ज़्यादा ही गहरा है.

इसी सोलह तारीख़ को देश के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने तीस पत्रकारों को पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ठ योगदान के लिए पांचवे रामनाथ गोयनका एक्सिलेंस इन जर्नलिज्म अवॉर्ड दिया. ये कोई ऐसा-वैसा पुरस्कार नहीं है जिसे किसी ज़िले की नगर पालिका हॉल या दिल्ली में जन आंदोलनों के ठिकाने, गांधी पीस फ़ाउंडेशन जैसी जगहों में दिया जाता हो. दिल्ली के फ़ाइव स्टार होटल ताज पैलेस में दिए गए इस पुरस्कार की हर बात से अभिजात झलकता है. पुरस्कार पाने वाले सभी पत्रकार कॉरपोरेट मीडिया से ताल्लुक रखते हैं और उन्हें चुनने वालों में भी कॉरपोरेट जगत की ही महानतम हस्तियां शामिल हैं. पत्रकारीय मूल्यों की रक्षा करने वाली इन दस विभूतियों में एचडीएफ़सी बैंक के चेयरमैन दीपक पारेख, महिंद्रा एंड महिंद्रा कंपनी के केशुब महिंद्रा, मार्केटिंग कंसल्टेंट रमा बीजापुरकर, बिड़ला घराने से ताल्लुक रखने वाली हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप की मालकिन शोभना भरतिया, इन्फोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति, भारत में तथाकथित हरित क्रांति के नायक एमएस स्वामीनाथन, अदानी ग्रुप ऑफ़ इंडस्ट्रीज के वित्तीय सलाहकार बकुल ढोलकिया, पूर्व एडिशनल सॉलिसीटर जनरल ऑफ़ इंडिया यानी सरकारी वकील, फाली एस नरीमन और किसी जमाने में सार्थक राजनीतिक सिनेमा बनाकर नाम कमाने वाले और अब अमीरों की महफिलों की शान समझे जाने वाले श्याम बेनेगल शामिल हैं.

पुरस्कारों के प्रायोजकों में बड़े बांध बनाकर पर्यावरण के खिलवाड़ करने के लिए कुख्यात कंपनी जेपी ग्रुप और भारत में जेनेटिकली मोडीफाइड बीजों की कंपनी मोहयो मॉनसेंटो भी शामिल हैं. पहले से ही मीडिया नेट, प्राइवेट ट्रीटी, क्रॉस मीडिया होल्डिंग और पेड न्यूज़ जैसी बीमारियों से ग्रस्त कॉरपोरेट मीडिया में लेन-देन का ये एक और बड़ा उदाहरण हैं. इंडियन ऐक्सप्रेस ग्रुप बड़े बांधों की लगातार वकालत करता रहा है. ख़ास तौर पर इसने नर्मदा आंदोलन का खुलकर विरोध किया है. साथ ही इसने उत्तर पूर्व में बन रहे हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स का भी खुलकर समर्थन किया है. जेपी ग्रुप नर्मदा नदी पर बन रहे सरदार सरोवर बांध का एक ठेकेदार रहा है और उत्तर पूर्व में भी उसके प्रोजेक्ट चल रहे हैं. फिलहाल यह अरुणाचल प्रदेश के हिरोंग पावर प्रोजेक्ट की योजना बना रहा है. इसका समाज, पर्यावरण और मानवाधिकार अधिकारों के उल्लंघन के मामले में बहुत ही बुरा रिकॉर्ड रहा है. भारतीय बाज़ार नियामक सेबी ने इसे छह सौ मिलयन रुपयों के अवैध कारोबार में लिप्त पाया है.

मोहयो मॉनसेंटो दुनिया की सबसे बड़ी जीएम बीज कंपनियों में से एक मॉन्सेंटो की भारतीय शाखा है. देशभर में जीएम बीजों को लेकर लगातार जन आंदोलन चल रहे हैं. इन सब को ठेंगा दिखाकर इंडियन ऐक्सप्रेस ग्रुप जीएम फूड का समर्थन करता रहा है. पिछले साल जब जयराम रमेश वन और पर्यावरण मंत्री थे उन्होंने बीटी ब्रिंजल को इजाजत देने या न देने के संबंध में कई जन सुनवाइयां आयोजित की थीं. तब ऐक्सप्रेस ग्रुप ने जेनेटिकली मोडिफ़ाइड फ़सलों के पक्ष में एक अभियान चलाया था. अब उसी कंपनी को ऐक्सप्रेस ग्रुप पुरस्कार वितरण में अपना साझीदार बनाता है. इन उदाहरणों से साफ़ हो जाता है कि आख़िर कैसे इन तरह के पुरस्कारों की बड़ी राशि जुटाई जाती है और उसके समारोह को पांच सितारा होटलों में आयोजित किया जाता है. पत्रकारिता और कॉरपोरेट की इस मिलीभगत पर सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण और उनके साथियों ने कई सवाल उठाए हैं.

यह पुरस्कार इस बात की तरफ़ भी इशारा करते हैं कि किस तरह देश के उपराष्ट्रपति भी कॉरपोरेट की दुनिया का हिस्सेदार बनने में कोई शर्म नहीं महसूस करते हैं. कभी पेड न्यूज पर राज्यसभा में चल रही चर्चा के दौरान उन्होंने कहा था कि उदारीकरण की नीतियां अपनाने के बाद भारतीय मीडिया के गुणसूत्र बदल गए हैं. ऐसे पुरस्कार समारोहों में उनकी मौज़ूदगी दर्शाती है कि भले ही देश की जनता कॉरपोरेट मीडिया के प्रभाव में अपने गुणसूत्र बदलने के लिए तैयार न हो वे अपना सरकारी धर्म निभाते रहेंगे. कॉरपोरेट समेत सारे भारतीय मीडिया को एक ही तराजू पर तोलने वाले प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू को इस गोरखधंधे में कुछ भी ग़लत नज़र नहीं आता है और वे ऐसे समारोहों की शोभा बढ़ाते नज़र आते हैं.

इंडियन ऐक्सप्रेस ग्रुप पैसे के बल पर धीरे-धीरे रामनाथ गोयनका पुरस्कारों को भारत के सबसे बड़े पत्रकारिता पुरस्कार बनाने की कोशिश कर रहा है. बहुत हद तक उसे इसमें कामयाबी भी मिल रही है. लेकिन इन पुरस्कारों का खोखलापन अगर देखना हो तो इसके लिए एक और मिसाल दी जा सकती है. जो ग्रुप पत्रकारिता के इन पुरस्कारों की घोषणा करता है उसी के अख़बार के पत्रकारों को पुरस्कार कैसे दिए जा सकते हैं? माना कि जेपी और मॉनसेंटो को पार्टनर बनाने में उन्हें कोई शर्म नहीं आती लेकिन अपने ही मीडिया हाउस के पत्रकारों को पुरस्कार करने में भी क्या कोई हितों का टकराव नही है? इस बात की अनदेखी करते हुए इस बार भी ऐक्सप्रेस के तीन पत्रकारों को पुरस्कार दिया गया है. इसमें मनीष छिब्बर, शुभ्रा गुप्ता, मुजम्मिरल जलील समेत एक टीम पुरस्कार शामिल है. इसी तरह हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप की शोभना भरतिया चयन कमेटी में थी और हिंदुस्तान ग्रुप की सोना कालरा को भी पुरस्कार दिया गया है.

हैरान करने वाली बात तो यह भी है कि इन पुरस्कारों का प्रायोजक एनडीटीवी ग्रुप भी है. ये ग्रुप पत्रकारिता में भ्रष्ट आचरण की वजह से पहले ही काफ़ी कुख्यात हो चुका है. इस बार आयोजक एनडीटीवी के पांच पत्रकारों को भी पुरस्कार दिया गया है. इनमें शिखा त्रिवेदी, ह्रदयेश जोशी, माया मीरचंदानी, अंजली दोषी और रजत केन शामिल हैं. यहां भी आत्मनियमन की माला जपने वाले कॉरपोरेट मीडिया के दिग्गजों को कोई हितों का टकराव नज़र नहीं आता है. गौरतलब है कि एनडीटीवी की दुलारी और राडिया टेप्स में मौजूद बरखा दत्त के साथ राजदीप सरदेसाई को भी ये पुरस्कार पहले ही मिल चुका है. टाइम्स नाव के अर्नब गोस्वामी को ये पुरस्कार न मिले ऐसा कैसे हो सकता है, इसलिए वो भी पुरस्कृत और महान पत्रकारों की श्रेणी में पहले से मौजूद हैं. चिंता की बात यह है कि कॉरपोरेट मीडिया में काम करने वाले वामपंथी रुझान के कई हिंदी के पत्रकारों के लिए भी यह पुरस्कार एक प्रलोभन बन गया है. इनमें से पुण्य प्रसून वाजपेई जैसे पत्रकार तो इसको अलग-अलग श्रेणियों में दो बार झटक चुके हैं.

देश की जनता चाहे कितना ही बोले कि कॉरपोरेट मीडिया जन हितों की अनदेखी कर रहा है लेकिन ऐक्सप्रेस ग्रुप वहां से ऐसे तथाकथित पत्रकारों को हाज़िर कर देता है जो जन हितों की रक्षा करते हैं. ऐसे में आम पत्रकारों को समझना पड़ेगा कि ये पुरस्कार उनके लिए नहीं है. अगर वे इन्हें पाना चाहते हैं उनके लिए ये मृग मरिचिका से ज़्यादा कुछ नही हैं. इसके लिए उन्हें अपनी रीढ़ की हड्डी हर हाल में झुकानी पड़ेगी. वरना अपने अधिकारों के लिए एकजुट होने के अलावा कोई रास्ता नहीं है. आज भी कई ऐसे प्रतिभाशाली पत्रकार कॉरपोरेट मीडिया में काम करने को मजबूर हैं जो सामाजिक सरोकारों से गहरा रिश्ता रखते हैं लेकिन किसी ट्रेड यूनियन के न होने के अभाव में कॉरपोरेट के चाटुकार पत्रकार उन्हें कभी आगे नहीं बढ़ने देते. इन पुरस्कारों को पाने वालों में ज़्यादातर पत्रकार उस हाई-फाई दुनिया से नाता रखते हैं जिसका इस देश की आम जनता से कोई नाता नहीं है. कई पत्रकार तो सीधे-सीधे आर्थिक जगत या कॉरपोरेट की गतिविधियों को कवर करते हैं. क्या ऐसे पत्रकारों से हम अपेक्षा कर सकते है कि वे कभी कॉरपोरेट लूट के ख़िलाफ़ बोल पाएंगे?

लोगों के बीच लगातार अपनी साख खो रहा कॉरपोरेट मीडिया ऐसे कार्यक्रम कर फिर से विश्वसनीयता हासिल करने की कोशिश कर रहा है. लेकिन जितना ही वो सही दिखने की कोशिश कर रहा है उतना ही उसकी हकीकत और सामने आती जा रही है. इस तरह की हरकत करने वाला ऐक्सप्रेस ग्रुप अकेला नहीं है. ब्रांड बिल्डिंग के लिए इस तरह के मीडिया हाउस बड़े-बड़े मीडिया कॉन्कलेव आयोजित करते हैं. जिसमें देश और दुनिया के कई नामधारी लोगों को बुलाया जाता है. फिल्मी दुनिया के नकली नायकों के अलावा इनमें भ्रष्टाचार शिरोमणि राजनेता भी बड़ी संख्या में शिरकत करते हैं. कुल मिलाकर देखा जाए तो ऐसे कार्यक्रम मुनाफ़ाखोरों के जलसे के अलावा और कुछ नहीं होते. तमाम अन्य कॉरपोरेट मीडिया घरानों की तरह इंडियन ऐक्सप्रेस के लिए भी पत्रकारिता एक धंधे के अलावा और कुछ नहीं है. दिल्ली और मुंबई के पत्रकार इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि साहस की पत्रकारिता करने वाले इस अख़बार ने मुनाफ़े के लिए कितने समझौते किए हैं. दिल्ली के बहादुर शाह जफ़र मार्ग में अख़बार के नाम पर सरकारी जम़ीन भीख में लेकर इसने वहां जो ऐक्सप्रेस बिल्डिंग बनाई है वहां आज कई निजी कंपनियों के ऑफिस किराये पर चलते हैं. ठीक इसी तरह का किस्सा मुंबई नैरीमन प्वाइंट पर बने ऐक्सप्रेस टावर का भी है. इस तरह देश के अलग-अलग हिस्सों में भी इसने पत्रकारिता के नाम पर सरकारी ज़मीन हथियाने के बाद आदर्शों को ऊंचा उठाकर साहस की पत्रकारिता जारी रखी है.

जनपक्षीय पत्रकारों और लोगों को मिलकर यह घोषणा करनी पड़ेगी कि पत्रकारिता में मुनाफ़ाखोर मालिकों के नाम पर दिए जाने वाले पुरस्कारों को ठुकराने का वक़्त आ गया है. लेकिन जनता के बीच जागरूकता न होने की वजह से ही कॉरपोरेट की ऐसी एकजुटता पर कोई सवाल नहीं उठते. इस तरह के अश्लील कार्यक्रमों में मीडिया, कॉरपोरेट और नेताओं का जमघट बताता है तमाम दावों के बावजूद उन्हें देश की जनता से कुछ लेना-देना नहीं है. ऐसे समारोह गांवों, जंगलों और हाशिए पर रहने वाली देश की बहुसंख्यक जनता के साथ मज़ाक के अलावा और कुछ नहीं हैं.

इस बीच वामपंथी रुझान के पत्रकार माने जाने वाले सिद्धार्थ वर्दराजन, द हिंदू के नए संपादक बनाए गए हैं. द हिंदू में इससे पहले लगातार मालिकों के परिवार से ही कोई संपादक बनता था. पहली बार परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति को संपादक बनाया गया है. इसके पीछे भी पारिवारिक कलह की एक लंबी कहानी है. सिद्धार्थ भी कुछ साल पहले ऊपर वर्णित रामनाथ गोयनका पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं.
(समयांतर पत्रिका के फरवरी अंक में प्रकाशित)

Wednesday, December 14, 2011

मीडिया की आज़ादी की आड़ में कॉरपोरेट लूट

भूपेन सिंह

काटजू से कौन डरता है?
भारतीय प्रेस परिषद के नए अध्यक्ष मार्कन्डेय काटजू ने कॉरपोरेट समाचार मीडिया की अराजकता और समाज विरोधी गतिविधियों पर दो-चार टिप्पणियां क्या कर दीं, मीडिया मालिकों और उनके सहयोगियों ने उन पर चौतरफ़ा हमला बोल दिया. पत्रकारिता को मुनाफ़ाखोरी का धंधा समझने वाली न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए), एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) और इंडियन न्यूज पेपर्स सोसायटी (आईएनएस) जैसी मालिकों के प्रभाव वाली संस्थाएं काटजू को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करती रहीं. ये संगठन मीडिया मालिकों की मुनाफ़ा कमाने की स्वतंत्रता को मीडिया की स्वतंत्रता की तरह पेश करते रहे और काटजू पर मीडिया को सरकारी नियंत्रण में लाने का आरोप लगाते रहे. बहस, प्रेस की आज़ादी बनाम सरकारी नियंत्रण के आसपास केंद्रित कर दी गई. इस तरह की छद्म बहस में मीडिया स्वामित्व और उसके परिणामों से जुड़े राजनीतिक-आर्थिक मुद्दों से जानबूझ कर कन्नी काटी गई.
उदारीकरण के दौर में भारतीय समाचार मीडिया एक किस्म की अराजकता से गुजर रहा है. बड़ी और विदेशी पूंजी के सहारे चल रहीं मीडिया कंपनियां सामाजिक सरोकारों की अनदेखी कर पत्रकारिता को धंधेबाज़ी और मुनाफ़ाखोरी का पर्याय बनाने पर तुली हुई हैं. अख़बार के पन्नों और टेलीविजन चैनलों की विषयवस्तु पर इसका असर साफ़ देखा जा सकता है. सारे हालात के लिए ज़िम्मेदार सरकार इस अराजकता को कुछ इस तरह से परिभाषित कर रही है जैसे वो भी सबकुछ देखकर हैरान-परेशान हो. जबकि हक़ीक़त सिर्फ़ इतनी है कि सरकार की आर्थक नीतियों का यह स्वाभाविक परिणाम है. ऐसे हालात में काटजू ने अपनी सीमाओं के बावजूद समाचार मीडिया पर कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठाये हैं.
सितम्बर महीने में सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए जस्टिस काटजू हमेशा अपनी ख़ास तरह की शैली के लिए चर्चित रहे हैं. नेहरू के गुलाबी समाजवाद का असर उन पर अब तक देखा जा सकता है. वे भारत के महान अतीत (भौतिकवादी और तार्किक) का ज़िक्र करते हैं और आधुनिक मूल्यों को अपनाने पर भी बल देते हैं. वे प्रेस परिषद के नए अध्यक्ष किस की मर्जी से और क्यों बने हैं ये या तो वे जानें या उन्हें बनाने वाले. लेकिन अक्टूबर महीने में भारतीय प्रेस परिषद का काम संभालने के बाद उन्होंने सबसे पहले दिल्ली के सभी स्वनामधन्य संपादकों को अपने पास बुलाया और उन्हें मीडिया की नैतिकता पर एक लंबा भाषण पिलाया. संपादकों/मालिकों के बीच उनके कथन को लेकर काफ़ी चर्चाएं रहीं. कुछ संपादकों ने उनकी बातों को लेकर लिखित प्रतिवाद भी दर्ज किया. लेकिन यह सारी हलचल सतह पर तब आई जब तीस-इकत्तीस अक्टूबर को करन थापर ने सीएनएन आईबीएन पर अपने कार्यक्रम, डेविल्स एडवोकेट में काटजू का इंटरव्यू प्रसारित किया. इस कार्यक्रम में काटजू ने भारतीय मीडिया की अराजकता पर कई सवाल उठाए और सख्त नियमन की ज़रूरत पर बल दिया. इस इंटरव्यू के बाद मीडिया मालिकों की तरफ़ से हमला शुरू हो गया. जब बहस आगे बढ़ी तो इंडियन एक्सप्रेस ने इस विषय पर काटजू का लेख छाप दिया और द हिंदू ने भी संपादकों को पिलाए गए उनके भाषण के अंश प्रकाशित कर दिए.
अपने भाषण, इंटरव्यू और लेख में प्रेस काउंसिल के नए अध्यक्ष जस्टिस काटजू कॉरपोरेट समाचार मीडिया को आड़े हाथों लेते हुए कहते हैं कि वो हमेशा वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाकर बेमतलब के मुद्दों को ज़्यादा अहमितयत देता है. इस बात के लिए वे मीडिया को ध्यान दिलाते हैं कि भारतीय समाज आज सामंतवाद से आधुनिकता में संक्रमण कर रहा है इसलिए मीडिया को एक ज़िम्मेदार भूमिका निभानी चाहिए, यानी मीडिया को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे मुद्दों पर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए. दूसरी महत्वपूर्ण बात काटजू ने मीडिया में व्याप्त पूर्वाग्रहों के बारे में कही. वे इस बात पर ऐतराज करते हैं कि कहीं भी कोई बम धमाका होता है तो मीडिया उसके लिए मुस्लिम समुदाय को बिना सबूतों के ही ज़िम्मेदार ठहराना शुरू कर देता है. उन्होंने इसके लिए बम धमाकों की जिम्मेदारी लेने वाले फ़र्जी ईमेल का ज़िक्र किया, जिसमें कोई अपराधी प्रवृत्ति का व्यक्ति मुसलमान नाम के साथ घटना की जिम्मेदारी लेता है और मीडिया बिना जांच किए ही उसे प्रसारित कर देता है. मीडिया ट्रायल के साथ ही काटजू समाचार मीडिया में अंध विश्वासों और ज्योतिष के प्रचार-प्रसार की भी आलोचना करते हैं.
किसी भी समझदार व्यक्ति या संस्था के लिए काटजू द्वारा उठाए गए ज़्यादातर मुद्दों से असहमत होना आसान नहीं है. लेकिन काटजू ने अपने बयानों से बेलगाम कॉरपोरेट मीडिया पर सवाल क्या खड़े किए, उसके सिपहसालार संवाद के न्यूनतम शिष्टाचार को भूलकर बेवजह की आक्रामकता दिखाने लगे हैं. पत्रकारिता को विशेषाधिकार का लाइसेंस समझने वाले मालिकों के पिछलग्गू कई संपादक इससे तिलमिला उठे हैं. जस्टिस काटजू के बयान के बाद टीवी न्यूज़ चैनलों ने जिस तरह उन्हें विलेन बनाकर पेश करने की कोशिश की उसे सारी देश की जनता ने देखा. लेकिन अच्छी बात ये है कि अक्खड़ मिजाज़ के काटजू अपनी बात पर अड़े रहे. टेलीविजन चैनलों की बहसों में ज़्यादातर कॉरपोरेट मीडिया के पक्षधरों को ही बुलाया गया. पूरी बहस को मीडिया नियंत्रण बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की तरह पेश किया गया. आईबीएन सेवन के संपादक (प्रबंध!) आशुतोष जैसे कुछ लोग जिन कुतर्को के साथ मालिकों के पक्ष में कदमताल करते दिखे वो वास्तव में बहुत ख़तरनाक है. इस सिलसिले में जनता को तो छोड़ दीजिए अगर मालिकों के गुलाम पत्रकारों के अलावा बाक़ी श्रमजीवी पत्रकारों की भी राय ली जाए तो पता चल जाएगा कि सब मुनाफ़ा कमाने की कॉरपोरेट होड़ से परेशान हैं.
काटजू ने ये सच्चाई भी बयान कर दी कि आज के ज़्यादातर पत्रकार समझदार नहीं होते, उन्हें देश-दुनिया की राजनीति, साहित्य, दर्शन और अर्थनीति की ज़्यादा जानकारी नहीं होती. इससे कॉरपोरेट मीडिया के सेलिब्रिटी पत्रकार और ज़्यादा बौखलाए हुए हैं. जबकि सच्चाई यही है कि आज के भारतीय न्यूज रूप का माहौल निहायत ही विवेक/ज्ञान विरोधी है. ख़ास तौर पर हिंदी मीडिया के न्यूज़ रूम का हाल तो यह है कि वहां समझदार लोगों को ज्ञान बांटने वाला बुलाकर मज़ाक बनाया जाता है. ख़बरों को सनसनीखेज बनाकार बेचने में माहिर पत्रकारों को ही वहां अहमियत और पुरस्कार दिया जाता है. पढ़े-लिखे और समझदार पत्रकारों को संस्थानों में बोझ समझा जाता है. टेलीविजन चैनलों में संपादक के नाम पर बैठे जोकरों और विदूषकों के अलावा प्रिंट मीडिया में भी हाल अच्छा नहीं है. वहां संपादकों को किनारे लगातर ख़बरों का चयन करने के लिए ब्रांड मैनेजर बिठाए जा रहे हैं. जो ख़बर के चटपटेपन और बिकने का हिसाब लगाकर उसका चयन करता है. सामाजिक सरोकारो वाले पत्रकारों के लिए ऐसे मीडिया में गुजारा करना मुश्किल है. इस सच्चाई को ध्यान में रखकर काटजू बिल्कुल सही बात कह रहे हैं. वे बेलगाम मीडिया को कायदे-कानून के दायरे में रखने के लिए प्रेस काउंसिल को और ज़्यादा अधिकार दिए जाने की वकालत करते हुए कहते हैं कि इसके दायरे में अब प्रिंट के अलावा टेलीविजन को भी लाया जाना चाहिए. काटजू ने यह भी कहा है कि अगर कोई मीडिया संगठन पत्रकारिता के मूल्यों और नैतिकता का उल्लंघन करता है तो उसके लिए दंड का प्रावधान होना चाहिए. फिलहाल प्रेस काउंसिल के पास ऐसे कोई अधिकार नहीं है. वह ज़्यादा से ज़्यादा किसी मीडिया संगठन की आलोचना कर सकता है. इसलिए एक अधिकार संपन्न मीडिया काउंसिल की ज़रूरत को नकारा नही जा सकता है. इन सारे ज़रूरी मुद्दों से किनाराकशी कर काटजू को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुश्मन ठहराने वाले लोग दरअसल मीडिया में कॉरपोरेट नियंत्रण को बरकरार रखना चाहते हैं.

पत्रकारिता के रंगे सियार
काटजू की बातों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने में ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए), एडिटर्स गिल्ड न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एऩबीए) और इंडियन न्यूज़पेपर सोसायटी (आईएऩएस) सबसे आगे रहे हैं. ध्यान देने वाली बात यह है कि ये तीनों ही संगठन या तो सीधे-सीधे मीडिया मालिकों के हैं या उनके पिछलग्गुओं के. सबसे पहले एनबीए की बात, जब न्यूज़ चैनलों ने नाग-नागिन, भूत-प्रेत, क्रिकेट, सिनेमा, अपराध, झूठ और सनससनी परोसते हुए सारी सीमाए लांघ दी तो जनता के जागरूक तबके की तरफ़ से इसका विरोध होना शुरू हो गया. मजबूरन सरकार को भी मीडिया के नियमन के लिए कुछ दिखावा करना पड़ा. जैसे ही नियमन की बात सामने आई कॉरपोरेट मीडिया के सिपहसालार घबरा उठे. उन्होंने हड़बड़ी में एनबीए बनाया और स्वनियमन की माला जपने लगे. सेल्फ़ रेग्युलेशन के लिए बनी एऩबीए की कमेटी में समाचार चैनलों के प्रतिनिधि शामिल है. स्वनियमन का दिखावा करने के लिए इन्होंने एक कमेटी बनाई हुई हैं. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जेएस वर्मा को उन्होंने अपना अध्यक्ष बनाया हुआ है. जो खुलेआम काटजू की आलोचना कर चुके हैं और न्यूज़ चैनलों का पक्ष ले चुके हैं. स्वाभाविक तौर पर एनबीए में कॉरपोरेट विचारों का ही दबदबा है. तथाकथित सिविल सोसायटी के बाक़ी बुद्धिजीवी/सदस्य तो सिर्फ़ दिखावे के लिए है. उन लोगों के लिए भी चमक-दमक वाले कॉरपोरेट मीडिया के क़रीब रहने का यह एक अच्छा बहाना है. इस संस्था की निरर्थकता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसने एक बार सबसे बेहूदा चैनलों में से एक, इंडिया टीवी पर ख़बर से छेड़छाड़ करने पर एक लाख रुपए का जुर्माना कर दिया था. बदले में इंडिया टीवी एनबीए की सदस्यता से ही अलग हो गया. बाद में मान मनोव्वल कर उसे दोबारा इस संस्था से जोड़ा गया.
काटजू के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने वाली दूसरी संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया है. इस संस्था में संपादक मालिकों के अलावा और कोई नहीं है. बहुसंख्यक श्रमजीवी पत्रकारों का इससे कुछ लेना-देना नहीं है. कॉरपोरेट मीडिया के संपादक मालिक इसके मुख्य कर्ता-धर्ता हैं. फिलहाल बिजनेस स्टैंडर्ड के पूर्व संपादक और मालिक टीएन नैनन इसके अध्यक्ष हैं. वे प्रिंट मीडिया में विदेशी निवेश लाने वाले पहले भारतीय मालिक/संपादक हैं. नैनन साहब मशहूर मीडिया क्रिटिक सेवंती नैनन के पति भी हैं. जिन्होंने हिंदी मीडिया पर हैडलाइंस फ्रॉम द हार्टलैंड: रीइंवेंटिंग हिंदी पब्लिक स्फ़ीयर जैसी चर्चित किताब लिखी है. जिसमें वे हिंदी समचार पत्रों के बहुसंस्करणों से बेहद उत्साहित नज़र आती हैं. उन्हें इसमें बड़ी पूंजी पर टिके मीडिया घरानों का साम्राज्य विस्तार नज़र नहीं आता है. कुल मिलाकर अपनी स्थापनाओं में वे कभी कॉरपोरेट मीडिया के पार नहीं सोच पाती हैं. विदेशी निवेश उन्हें भी ज़रूरी लगता है. इस तरह यहां मीडिया स्वामित्व, पत्रकारिता और उसकी आलोचना में भी एक अजीब सा घालमेल दिखाई देता है. टी एन नैनन से पहले सीएनएन आईबीएन के मालिक/पत्रकार राजदीप सरदेसाई एडिटर्स गिल्ड के अध्यक्ष थे. जिनकी पत्रकारिता की महान आवाज़ राडिया के टेपों में भी सुनी जा सकती है. कुल मिलाकर यह संगठन भारतीय मीडिया के मालिकों और उनके सिपहसालारों के हितों को सुरक्षित रखने के लिए बना हुआ है. अगर ऐसे संगठन मीडिया की स्वतंत्रता के नाम पर विलाप करते हैं तो उसकी हक़ीक़त को आसानी से समझा जा सकता है.
तीसरी संस्था इंडियन न्यूज़ पेपर सोसायटी (आईएऩएस) है जिसे काटजू का बयान आपत्तिजनक लगा है. यह संस्था घोषित तौर मीडिया मालिकों की संस्था है. पिछले दिनों जब अख़बारों में काम करने वाले श्रमजीवी पत्रकारों और गैर पत्रकारों के लिए न्यूनतम तनख़्वाह निर्धारित करने के लिए वेज बोर्ड लागू करने की प्रक्रिया चल रही थी तो इसने पत्रकारों के लिए ख़िलाफ़ जिस तरह अभियान चलाया उसे कभी भूला नही जा सकता. इसने पत्रकारों को अपने मुनाफ़े में से अधिकार देने से साफ़ मना कर दिया और ये आरोप लगाया कि इससे भी मीडिया की स्वतंत्रता ख़त्म हो जाएगी, क्योंकि पत्रकारों की तनख़्वाह के लिए क़ानून बनाकर सरकार मालिकों के अधिकार छीनना चाहती है. गौरतलब है कि श्रमजीवी पत्रकारों की मांग से मजबूर होकर सरकार को इस सिलसिले में पहलकदमी लेने पर मजबूर होना पड़ा था. भारतीय मीडिया में यह बात भी छिपी नहीं है कि मालिकों के कुछ पिछलग्गू और दलाल पत्रकारों को जहां हर महीने लाखों की तनख़्वाह मिलती है वहीं अपना श्रम बेचने वाले आम पत्रकारों को मजबूरी में न्यूनतम तीन हज़ार रुपए तक का वेतन स्वीकार करना पड़ता है. कुल मिलाकर यह संस्था जन विरोधी होने के साथ बहुसंख्यक पत्रकार विरोधी भी है.
एनबीए की तर्ज पर ही टीवी न्यूज़ चैनलों के संपादकों/ मालिकों ने मिलकर ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन बनाया है. इस दौर में ज़्यादातर टीवी संपादक या तो ख़ुद मालिक बन बैठे हैं या फिर मालिक के बेहद क़रीबी हैं. प्रणय रॉय, राजदीप सरदेसाई और जहांगीर पोचा जैसे कई लोग आज मालिक/पत्रकार दोनों ही बने हुए हैं. उन्हें पत्रकारितीय नैतिकता से ज़्यादा कुछ लेना देना नहीं है. इसलिए बीईए श्रमजीवी पत्रकारों का संगठन नहीं बल्कि सीधे-सीधे मीडिया मालिकों का ही मुखौटा है. फिलहाल स्टार न्यूज़ के साज़ी ज़मा इसके अध्यक्ष हैं और साधना चैनल के एनके सिंह इसके महासचिव हैं. स्टार न्यूज़ के एक बड़े हिस्से का मालिक दुनिया का भ्रष्टतम न्यूज मीडिया मालिक रुपर्ट मुर्डॉक भी है वहीं साधना न्यूज़, मूल रूप से साधना टीवी का हिस्सा है जो मुनाफ़े के लिए धार्मिक चैनल से देश की ‘वैज्ञानिक चेतना’ का विकास करने में जुटा है. इन दोनों के अलावा अर्णब गोस्वामी, पंकज पचौरी, आशुतोष और सतीश कुमार सिंह जैसे कई ‘महान पत्रकार’ इस एसोसिएशन की कार्यकारिणी में हैं. इऩ्हीं की संस्थाओं में काम करने वाले आम पत्रकार मालिकों के इन पिट्टुओं से परेशान रहते हैं. इसलिए ऐसी संरचना वाला संगठन अगर अभिव्यक्ति और मीडिया की स्वतंत्रता की बात करे तो उसकी हक़ीक़त आसानी से समझी जा सकती है.
आम पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करने वाले सारे पत्रकार संगठन मीडिया नियमन के पक्ष में हैं. वे चाहते हैं कि प्रेस काउंसिल जैसी संस्था को और ज़िम्मेदार और अधिकार संपन्न होना चाहिए. वे चाहते हैं कि मीडिया से ठेकेदारी प्रथा ख़त्म हो और वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट लागू हो, जिसके तहत आम पत्रकारो को उनके अधिकार मिल पाएं. लेकिन उनकी आवाज़ को कभी को अहमियत नहीं दी जाती. उनकी न्यायसंगत आवाज़ को दबाना मीडिया मालिक अपना हक़ और आज़ादी समझते हैं. मीडिया के लोकतांत्रिक विकास के लिए मालिकों के चाटुकार पत्रकारों को आम पत्रकारों का ठेका लेने से रोकना भी ज़रूरी है.

कागजी शेर से काम नहीं चलेगा
जस्टिस काटजू जिस भारतीय प्रेस परिषद में सुधार की बात कर रहे हैं. अगर उसकी संरचना को देखा जाए तो उसमें आज भी मालिकों के पक्षधर सदस्यों का पलड़ा ही भारी रहता है. उसमें श्रमजीवी पत्रकारों का उचित प्रतिनिधित्व नहीं है. काउंसिल के पास कानूनी कार्रवाई के अधिकार भी नहीं हैं. यही वजह है कि जब पेड न्यूज़ पर परंजॉय गुहा ठकुराता और श्रीनिवास रेड्डी की बहत्तर पृष्ठों की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की बात सामने आई तो काउंसिल में मौजूद मालिकों के प्रतिनिधियों ने उसे सार्वजनिक नहीं होने दिया. इस रिपोर्ट में पेड न्यूज़ छापने वाले अख़बारों के नाम का भी जिक्र किया गया था. जब ये रिपोर्ट आउटलुक पत्रिका ने सार्वजनिक कर दी और कई छोटी पत्रिकाओं ने इसे छाप लिया तो मजबूरन प्रेस परिषद को भी इसे अपनी वेबसाइट पर डालना पड़ा. ये एक चौंकाने वाली बात है कि हाल ही में चुनाव आयोग ने पेड न्यूज़ छपवाने की वजह से उत्तर प्रदेश की एक विधायक उमलेश यादव की सदस्यता रद्द की है. लेकिन यह उतनी ही हैरान करने वाली बात है कि अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे जिन अख़बारों ने चुनाव के दौरान उमलेश के पक्ष में पेड न्यूज़ छापी उन पर किसी ने कोई कार्रवाई नहीं की. यह एक तरह से ठीक वैसा ही है जैसे घूस देने वाले सज़ा दी जाए और लेने वाले को खुला छोड़ दिया जाए.
जस्टिस काटजू अगर टेलीविजन चैनलों को भी प्रेस परिषद में लाकर उसका नाम मीडिया काउंसिल करने की बात कर रहे हैं तो यह बात पहली बार सामने नहीं आ रही है. जनता के जागरूक तबकों से लगातार इस बात को उठाया जाता रहा है. भारत में नई आर्थिक नीतियों को लागू करने के बाद मीडिया का असीम विस्तार हुआ है. विदेशी पूंजी ने इसका मिजाज बदल दिया है. ख़ास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का विस्फोट हुआ है. इसलिए पुरानी संस्थाएं अब मीडिया को सही तरह से समझ पाने और उन्हें सही रास्ता दिखा पाने में सक्षम नहीं रह गई है. इसलिए पहले और दूसरे प्रेस आयोग की तर्ज पर तीसरा प्रेस आयोग बनाने की बात उठने लगी है. ऐसे हालत में प्रेस परिषद की जगह अधिकार संपन्न मीडिया परिषद बनाने की बात अपनी ज़गह पूरी तरह तर्कसंगत है. फिलहाल तो प्रेस काउंसिल को सिर्फ़ कागजी शेर ही माना जाता है. कही ऐसा न हो कि जस्टिस काटजू की दहाड़ भी ऐसे ही ग़ायब हो जाए.
तीसरा प्रेस आयोग वर्तमान मीडिया का गहराई से अध्ययन पर आगे का रास्ता सुझाकर इसे कॉरपोरेट अराजकता से छुटकारा दिलाने में कुछ हद तक मददगार हो सकता है. इस आयोग में देशभर के मीडिया बुद्धिजीवी, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता और मीडियाकर्मी अपने सुझाव दे सकते हैं. लेकिन इस बात की बहुत आशंका है कि जैसे मोंटेक सिंह अहलुवालिया जैसे लोग देश के प्लानिंग कमिशन के महान भविष्य दृष्टा हो सकते हैं वैसे ही कोई मीडिया का उद्धारक भी सरकार न खोज लाए. माना किसी तरह ये आयोग नव उदारवादी उद्धारकों से बच भी गया तो उसकी सिफ़ारिशें आसानी से मान ली जाएं ऐसा नहीं लगता. अगर जन दबाव की वजह से एक बार सही रिपोर्ट आ गई तो उससे भविष्य का एक सही रास्ता चुनने में ज़रूर मदद मिलेगी. जैसे तीसरी दुनिया के देशों की मांग पर यूनेस्को को मैकब्राइट कमीशन बनाने पर मजबूर होना पड़ा था और उसने दुनिया के लिए अमेरिका और विकसित देशों के सूचना के मुक्त प्रवाह की नीति को बदल कर रखा दिया. तब तीसरी दुनिया की पहलकदमी की वजह से सूचना के संतुलित प्रवाह की बात सामने आई थी. विकसित देशों की तरफ़ से प्रचारित सूचना का मुक्त प्रवाह दरअसल सूचना का इकरफ़ा प्रवाह था. जो सूचना के संसाधनों पर विकसित देशों के क़ब्ज़े की वजह से ग़रीब देशों की तरफ़ होता है. यूनेस्को की तरफ़ से संतुलित प्रवाह की बात मानने के बाद भी आज वैश्वीकरण और नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद सूचना का इकतरफ़ा प्रवाह ज़्यादा मजबूत हुआ है.
अगर प्रेस परिषद की जगह नया मीडिया आयोग बनता है तो इसमें जब तक बहुसंख्यक श्रमजीवी पत्रकारों और वैकल्पिक मीडिया के वकालत करने वालों को प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाएगा तब तक इसका कोई मतलब नहीं निकलेगा. जस्टिस काटजू की स्थापनाएं यहीं पर कुछ अधूरी लगती है. वे वर्तमान मीडिया में विषय वस्तु की अराजकता पर तो ढेर सारी बातें कहते हैं लेकिन इसके लिए ज़िम्मेदारी आर्थिक-राजनीतिक कारणों पर एक भी बात नहीं करते. जबकि असली बात भारतीय मीडिया के स्वामित्व को लेकर है. असली अराजकता की जड़ वहीं छिपी हुई है. पेड न्यूज, राडिया कांड या फिर अऩ्ना आंदोलन, जेसिका लाल जैसी चुनी हुई इंसाफ़ की लड़ाइयां कॉरपोरेट मीडिया की स्वाभाविक अभिव्यक्तियां हैं. जब तक मीडिया पर गिने चुने मीडिया घरानों के एकाधिकार, क्रॉस मीडिया होल्डिंग (एक ही मीडिया घराने का हर तरह के मीडिया में स्वामित्व) और मुनाफ़ाखोरी पर लगाम नहीं लगेगी तब तक बड़े पैमाने पर अच्छे मीडिया की कल्पना कर पाना संभव नहीं है. इसलिए आज सिर्फ़ मीडिया के विषयवस्तु को ही नहीं बल्कि मीडिया के स्वामित्व और उसकी संरचना को लेकर भी ठोस कानून बनाना ज़रूरी है. इतना ज़रूर ध्यान रखा जाना चाहिए कि ऐसा सरकार और कॉरपोरेट हितों से अलग किसी स्वायत्त संस्था के नेतृत्व में होना चाहिए. ताकि सरकारी और कॉरपोरेट नियंत्रण को कम से कम किया जा सके. अगर मीडिया काउंसिल को इस तर्ज पर बनाया गया तो इससे ज़रूर कुछ फ़र्क पड़ेगा.
प्रेस परिषद के एक पूर्व अध्यक्ष जस्टिव पीवी सावंत ने अपने कार्यकाल में कॉरपोरेट मीडिया के ख़िलाफ़ को-ऑपरेटिव मीडिया की स्थापना पर ज़ोर दिया था. लेकिन उनकी आवाज़, नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बनकर रह गई. उदारीकरण की नीतियों के तहत आगे बढ़कर सरकार के लिए ऐसी बातों को स्वीकार कर पाना मुश्किल है लेकिन जन दबाव हो तो उसे झुकने पर मजबूर होना पड़ सकता है. यहां पर यह याद रखना ज़रूरी है कि नव उदारवादी सरकारें और कॉरपोरेट भले ही कितने ही एक-दूसरे के ख़िलाफ़ तलवार खींचे क्यों न दिखें, वे एक दूसरे के स्वाभाविक सहयोगी हैं. समाज में अगर जनता के अधिकारों के लिए आंदोलन तेज़ होंगे तो इससे हमारे मीडिया में भी बदलाव आएगा. इस लिहाज़ से मीडिया के बदलाव की लड़ाई व्यापक राजनीतिक-आर्थिक बदलावों की लड़ाई से भी जुड़ती है. इसका मतलब ये नहीं कि क्रांति होने तक इंतजार ही करते रहा जाए. बदलाव एक दिन में नही होगा. आंदोलनों के दवाब में ज़रूर कुछ लगातार बदलता रहेगा. जस्टिस काटजू हों या जस्टिस सावंत उनकी बातें मीडिया और समाज में बदलाव चाहने वालों के लिए एक समर्थन की तरह हैं. जिनकी सीमाएं भी हैं और संभावनाएं भी.
(समकालीन तीसरी दुनिया के दिसंबर अंक में प्रकाशित)

Tuesday, December 13, 2011

काटजू को सागरिका और राजदीप क्यों नहीं दिखते?

भूपेन सिंह
भारतीय प्रेस परिषद का नया अध्यक्ष बनते ही जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने जिस तरह की सक्रियता दिखाई थी, अब धीरे-धीरे उसकी हक़ीक़त सामने आने लगी है. काटजू ने बेलगाम कॉरपोरेट मीडिया को कटघरे में खड़ा कर उसके सख़्त नियमन के लिए कई सुझाव दिए थे. इससे नाराज़ देशभर के बड़े मीडिया घरानों ने उनके ख़िलाफ़ चौतरफ़ा मोर्चा खोल लिया. आख़िरकार काटजू को आत्मरक्षा की मुद्रा में आना पड़ा और वे जल्दबाज़ी में कॉरपोरेट मीडिया को क्लीन चिट देते नज़र आने लगे हैं. इस बीच कॉरपोरेट मीडिया के आत्मनियमन के लिए हाय-तौबा मचाने वालों में अव्वल रहने वाले न्यूज़ चैनल सीएनएन-आईबीएन की सीनियर एंकर सागरिका घोष ने पत्रकारीय नैतिकता को ठेंगा दिखाकर पूर्व रिकॉर्डेड दृश्यों को एक बहस के दौरान लाइव बताकर प्रसारित कर डाला. पहले भी चैनल के मालिक और मुख्य संपादक राजदीप सरदेसाई चैनल की रेंटिग बढ़ाने और अपना एजेंडा सेट करने के लिए दर्शकों की तरफ़ से नकली मतदान करवा चुके हैं. सागरिका और राजदीप आज की भारतीय पत्रकारिता में कॉरपोरेट बेईमानी के बड़े प्रतीक बन चुके हैं, फिर क्या बात हैं कि काटजू को उनकी हरकतें दिखाई नहीं देतीं?
काटजू के करतब
सितंबर महीने में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर होने के बाद अक्टूबर महीने में ही काटजू की नियुक्ति भारतीय प्रेस परिषद के नए अध्यक्ष के तौर पर हो गई थी. काटजू ने कुछ ही दिन बाद सीएनएन-आईबीएन में करन थापर के प्रोग्राम डेविल्स एडवोकेट में इंटरव्यू देकर कॉरपोरेट किरदारों की नींद उड़ा दी. इंडियन एक्सप्रेस और द हिंदू ने भी काटजू के विचारों को प्रकाशित कर इस मुद्दे को और हवा दी. काटजू का कहना था कि आज का मीडिया ज़रूरी मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए फालतू किस्म के विषयों को ज़्यादा अहमियत दे रहा है. उन्होंने मीडिया मालिकों की तरफ़ से प्रचारित किए जा रहे स्वनियमन की अवधारणा को पूरी तरह से नकार दिया था. काटजू ने अपने विचारों में मीडिया के नियमन की वकालत की थी. इसके अलावा काटजू ने अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति मीडिया के पूर्वाग्रह को उठाकर एक तरह से मीडिया में न्यूज़रूप डायवर्सिटी न होने का मुद्दा भी उठाया था. उन्होंने ये हक़ीक़त भी बयान कर डाली कि आज के ज़्यादातर पत्रकार कम समझदार हैं. नए दौर में मीडिया सही काम करे इसके लिए उन्होंने प्रेष परिषद के दायरे में प्रिंट के साथ ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी लाने की वकालत कर डाली.
काटजू की बातें मीडिया मालिकों और उनके मुखौटाधारी पत्रकारों को नागवार गुज़री और उन्होंने काटजू के बयानों को इस तरह पेश किया जैसे वे मीडिया के सरकारी नियंत्रण की बात कर रहे हों. मीडिया के नियमन की बात को सरकारी नियंत्रण बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बहस के तौर पर पेश किया गया. कई टेलीवीजन चैनलों और अख़बारों ने इस विषय पर प्रायोजित बहस चलाई. जिसमें ज़्यादातर कॉरपोरेट मीडिया के एजेंडा के हिसाब से बात करने वाले चुने हुए बुद्धिजीवियों को ही बुलाया गया. आख़िरकार काटजू पर बनाया गया दबाव काम आया और काटजू बचाव की मुद्रा में नज़र आने लगे. उन्हें द हिंदू में एक लेख लिखकर सफ़ाई देनी पड़ी कि वे मीडिया के ख़िलाफ़ नहीं है (जैसे कॉरपोरेट मीडिया और जन पक्षीय मीडिया में कोई फ़र्क ही न हो). उनके बयानों को तोड-मरोड़ कर पेश किया गया वगैरह-बगैरह. हद तो तब हो गई जब कॉरपोरेट मीडिया के पक्ष में कदमताल करते हुए उन्होंने देश में मीडिया नैतिकता को ठेंगा दिखाने वाले टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप और ब्रिटिश उपनिशवाद के प्रतीक रॉयटर्स के साझा चैनल पर कोर्ट की तरफ़ से लगाए गए सौ करोड़ के जुर्माने को ग़लत करार दे दिया. प्रेस परिषद के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस पीबी सावंत ने टाइम्स नाव पर मानहानि का मुकदमा किया था. चैनल ने बिना जांच-पड़ताल किए गाजियाबाद पीएफ़ स्कैम में आरोपी जज सामंत के बदले पीबी सावंत का फोटो प्रसारित करता रहा. उनके शिकायत करने पर भी चैनल ने उनकी फ़ोटो नहीं हटाई. लिखित शिकायत करने पर भी चैनल ने पांच दिन तक माफ़ी नहीं मांगी आख़िरकार सावंत को कानूनी कार्रवाई का फ़ैसला लेना पड़ा. आख़िरकार मुंबई हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी जस्टिस सावंत के हक़ में फ़ैसला दिया.
काटजू की डैमेज कंट्रोल की कोशिशों के बावजूद भी मीडिया मालिकों के संगठन उन्हें सबक सिखाना चाहते हैं. फिलहाल मीडिया मालिकों और काटजू के बीच चुहे-बिल्ली का खेल जारी है. प्रेस काउसिंल की पहली बैठक में इंडियन न्यूज़पेरस सोसायटी (आईएनएस) के चार प्रतिनिधियों ने काटजू के बयान से नाराज़ बैठक का बहिष्कार किया. बड़े अख़बार मालिकों के प्रभाव वाली संस्था आईएनएस ने बड़ी चालाकी से काटजू के बाक़ी मुद्दों को किनारे करते हुए उनसे इस बात पर माफ़ी मांगने के लिए जोर दिया है कि वो अपनी इस बात के लिए माफ़ी मांगें कि भारतीय मीडिया में ज़्यादातर पत्रकार कम समझदार हैं. आईएनएस चाहता है कि काटजू इस मुद्दे पर माफ़ी मांग लें तो उनकी बाक़ी सभी स्थापनाओं पर भी अपने आप प्रश्न चिन्ह लग जाएगा. काटजू पर दबाव का ही नतीज़ा है कि पहले उन्होंने प्रेस परिषद के कागजी शेर वाली भूमिका पर भी सवाल उठाए थे. उन्होंने घोषणा की थी कि वे प्रधानमंत्री से इस मामले में हस्तक्षेप कर काउंसिल को दंडात्मक अधिकार दिए जाने की बात करेंगे. लेकिन काटजू अब अपनी इस बात से भी पीछे हट गए हैं.
काटजू ने जो भी बातें कही हैं उनको नकारा नहीं जा सकता, लेकिन वे सिर्फ़ मीडिया की सामग्री के नियमन पर ही ज़्यादा ज़ोर देते हैं. वे सिर्फ़ बुरे परिणामों की तरफ़ इशारा कर रहे हैं. उनकी वजहों पर बात करने से साफ़-साफ़ बच रहे हैं. जिस प्रेस परिषद के वे फिलहाल अध्यक्ष हैं, उसकी संरचना पर ही नज़र डाली जाए तो वो प्रकाशकों और सरकार के पक्ष में ज़्यादा झुकी हुई हैं. प्रेस परिषद के अध्यक्ष का चयन भी सरकार की मर्जी के ख़िलाफ़ नहीं हो सकता. इसलिए काटजू भी सरकार की उन नीतियों पर बिल्कुल भी बात नहीं करते जिस वजह से हमारे मीडिया की आज ये हालत है. वे मीडिया में उदारीकरण की नीतियों से पैदा हुई एकाधिकार, मीडियानेट और प्राइवेटी ट्रीटी जैसी बीमारियों पर भी बात नहीं करते. ऐसा होने पर स्वाभाविक तौर सरकार के राजनीतिक-आर्थिक फ़ैसलों पर भी सवाल उठेंगे. इसलिए काटजू मीडिया मालिकों की मुनाफ़ा कमाने की होड़ पर भी सवाल नहीं उठाते. इस तरह देखा जाए तो सरकार और मीडिया मालिकों के बीच मीडिया नियमन के नाम पर जिस तरह नकली युद्ध चल रहा है. काटजू भी उसी की पैदावार हैं. सरकारी नीतियों के वजह से ही विशालकाय कॉरपोरेट मीडिया का उदय हुआ है. मीडिया और राजनीतिज्ञों के रिश्ते भी जग ज़ाहिर हो चुके हैं. राडिया टेप कांड और पेड न्यूज़ जैसे मामले इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण हैं. टेलीकम्युनिकेशन से संबंधित टूजी स्पेक्ट्रम की नीलामी को अगर देखें तो इससे पता चलता है कि उदारवादी आर्थिक नीतियों के तार किस तरह मीडिया, कॉरपोरेट और राजनीति से जुड़े हैं. काटजू से ज़्यादा समझदार तो प्रेस परिषद के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस सावंत थे जिन्होंने कॉरपोरेट मीडिया के बजाय को-ऑपरेटिव मीडिया स्थापित करने पर ज़ोर दिया था.
नव उदारवादी आर्थिक नीतियों ने हमारे मीडिया का चरित्र बदलकर रख दिया है. आम पत्रकारों को इसमें कोई अधिकार नहीं हैं. पत्रकार संगठनों को गैरजरूरी बना दिया गया है. इसलिए संपूर्ण पत्रकार विरादरी की तरफ़ से कुछ सेलिब्रिटी किस्म के मालिकों के एजेंट पत्रकार जगह-जगह बोलते दिखाई देते हैं. ठेके पर काम करने की वजह से आम पत्रकारों के ऊपर हर वक़्त नौकरी जाने के ख़तरा बना रहता है, तो वे कैसे पत्रकारिता के आदर्शों को सुरक्षित रख पाएंगे. मजबूरी में उन्हें वो सबकुछ करना पड़ता है जो मालिक, प्रबंधन और उनका पिछलग्गू संपादक चाहता है. आज ज़रूरत इस बात की है कि कूड़ेदान में पड़े वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट को मजबूती से लागू करवाया जाए. काटजू बहुसंख्यक पत्रकारों की इस हालत की तरफ़ बिल्कुल भी ध्यान नहीं देते.
सागरिका घोष और राजदीप सरदेसाई होने का मतलब
सीएनएन-आईबीएन ने चैनल पर फेस द नेशन कार्यक्रम के तहत उत्तर प्रदेश प्रदेश की राजनीति को लेकर एक बहस आयोजित की थी. बहस के दौरान बाक़ी वक़्ता आपस में सीधे बातचीत रहे थे लेकिन धार्मिक नेता श्रीश्री रविशंकर वहां मौज़ूद नहीं थे. सागरिका घोष दर्शकों को ऐसे दिखाती रही कि जैसे रविशंकर चैनल से लाइव बात कर रहे हों, जबकि उनकी रिकॉर्डिंग काफ़ी पहले की जा चुकी थी. इस तरह कार्यक्रम देख रहे दर्शकों के साथ यह सीधे-सीधे छल था. मीडिया में स्वनियमन की माला जपने वाले संस्थान में इस तरह का फ़रेब स्वनियमन के सारे दावों की पोल खोल देता है. इससे पहले इसी चैनल के मालिक-संपादक और सागरिका घोष के पति राजदीप सरदेसाई भी इसी से मिलती-जुलती एक हरकत को अंजाम दे चुके हैं.
राडिया टेप सामने आ चुके थे. बरखा दत्त, वीर सांघवी, प्रभु चावला समेत राजदीप सरदेसाई की आवाज़ भी उन टेप में मौज़ूद थी. सेलिब्रिटी पत्रकारों का दलाल और लिजलिजा चेहरा पहली बार जनता के सामने आ रहा था. राजदीप सरदेसाई उस दौरान मालिकों की मुखौटा संस्था एडिटर्स गिल्ड के अध्यक्ष भी हुआ करते थे. जब देश में कॉरपोरेट लॉबीइस्ट नीरा राडिया के ऊपर चारों तरफ़ थू-थू हो रही थी. तभी राजदीप अपने चैनल में इंडिया एट नाइन कार्यक्रम के तहत ये बहस आयोजित करवाई कि भारत में लॉबीइंग को कानूनी क्यों नहीं किया जाना चाहिए? एजेंडा को सेट करते हुए राजदीप ने अपने पसंद के वक़्ताओं को शो में बुलाया और यह स्टैंड लेते रहे कि लॉबीइंग यानी दलाली के धंधे में कुछ बुराई नहीं है. इसी बीच चैनल ने कुछ दर्शकों की तरफ़ से लॉबीइंग को कानूनी करने के संबंध में ट्वीटर के संदेशों को प्रसारित किया. एक सचेत दर्शक की कोशिशों की वजह से बाद में पता चला कि ये सारे मैसेज फ़र्जी थे और उन्हें चैनल वालों ने ही खुद डाला था. इस बात का पर्दाफ़ाश होने के बाद चैनल की काफ़ी फ़जीहत हुई थी और राजदीप को माफ़ी भी मांगनी पड़ी.
सीएऩएन-आईबीएन, सागरिका घोष और राजदीप सरदेसाई की उपरोक्त करतूतों को जानने बाद यह जानना भी ज़रूरी है कि ये भारतीय पत्रकारिता के चरित्र को किस तरह प्रदूषित कर रहे हैं. सागरिका और राजदीप आपस में पति-पत्नी भी हैं. सागरिका दूरदर्शन के पूर्व निदेशक भास्कर घोष की बेटी हैं तो राजदीप पूर्व क्रिकेटर दिलीप सरदेसाई के बेटे हैं. वे पत्रकार ही नही बल्कि अपने चैनल के मालिक भी हैं. इस लिहाज़ से देखा जाए तो उनके चैनल में मालिक के व्यवसायिक हितों और पत्रकारीय हितों में सीधा टकराव है. (यह बात कम पूंजी से निकलने वाले नो प्रोफिट-नो लॉस वाले माध्यमों पर लागू नहीं होती) लेकिन फिर भी वे दोनों पद संभाले हुए हैं. सागरिका भी कमोबेश इसी भूमिका मे चैनल के साथ जुड़ी हैं. चैनल का मुख्य मकसद भारतीय बाज़ार में मुनाफ़ा कमाना है. जन सरोकार उनके लिए बहुत बाद की चीज़ है. हां, सरोकारों का दिखावा करना उनके लिए ज़रूरी है. जिसके लिए सरकार की तरफ़ से उन्हें पद्मश्री मिल चुका है. इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि आख़िर एक पत्रकार, मालिक बनने की होड़ में कैसे शामिल हो जाता है.
सीएऩएऩ-आईबीएऩ, दुनिया की सबसे बड़ी मीडिया कंपनियों में से एक टाइम एंड वॉर्नर की सहयोगी कंपनी है. इसका मुख्य चैनल सीएऩएऩ अमेरिका से प्रसारित होता है. इसकी मुख्य कंपनी ने दुनियाभर के मीडिया बाज़ार पर कब्ज़ा कर उन देशों की संस्कृति और वहां की स्वतंत्र संस्थाओं को बर्बाद कर दिया है. अब यही काम सीएनएन-आईबीएन के माध्यम से भारत में भी हो रहा है. नब्बे के बाद जिस तरह से सरकार ने बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए भारतीय बाज़ार खोल दिया गया. हर संस्था की तरह मीडिया में भी उनका हस्तक्षेप उसी अनुपात में बढ़ा है. मीडिया के माध्यम से मुनाफ़ा कमाने की होड़ को भी इसी संदर्भ में समझा जा सकता है.
सागरिका घोष और राजदीप सरदेसाई होने का मतलब कॉरपोरेट मीडिया की लूट में शामिल होना है.
न्यायविद जस्टिस काटजू कॉरपोरेट लूट की इस होड़ पर क्यों चुप हैं ?
(यह लेख समयांतर पत्रिका के दिसंबर अंक में प्रकाशित हो चुका है)

Saturday, November 26, 2011

Mediatization of Politics and Paid News

Bhupen Singh
Journalism is often placed at a high pedestal as a profession guided by ethics, as if the profession brims with greatness. There are many myths related to this profession. It is said to be the fourth pillar of democracy. It is believed that the journalists bring out truth even at cost of their lives, that media has idealists who fight for a better society and so on. While doing this it is often overlooked that our news media is a product and reflection of the economic and political structure of society. The exposure of many corporate media houses and celebrity journalists have cracked this glorified image somewhat, however the whole truth is still elusive to us.
The phenomenon of paid news has put the relations between news media, political actors and democracy behind the dock. The relation of paid news with the state policies can be better understood with the concept of Mediatization. Mediatization, as a product of the liberal democracy has many complexities and layers. It can not be explained by only economic neo liberalism and corporatization. It is shaped by these, but to understand Mediatization, it needs further conceptualization. In Mediatization, not only the structural issues of media are raised, but an attempt is made to understand the effects as well. Mediatization is neither purely a politico-economic process of media, nor a cultural study of its impacts (Schulz, 2004). The process of mediatization enables us to fully understand the state of media in liberal democracy.

Mediation and Mediatization
Mediation and Mediatization are processes that are not only related to politics, but include different kinds of social experiences. Many a times, Mediation and Mediatization are used inter-changeably. But they are in fact different (Mazzolini and Schulz, 1999). The events propagated and highlighted by media shape the thoughts and behavior of society. This is in a way the process of mediation. Mediated politics is that situation in which media becomes the prime medium between the public and government. The people remain dependent on media for the political and social information. Also the politicians and rulers make use of media to get the people’s opinions. These kind of mediated relations have cut short the direct relationship between the political actors and the society. The political communication instead of being direct as in case of public meetings, rallies etc. has become completely mediated.
‘Mediatization’ was first used to understand the impact of media on the political communication. Kent Asp, a Swedish media researcher brought forward the concept of mediated politics. He developed this concept with the help of the term introduced by the Swedish Sociologist Gudmund Hernes- that is, media twisted society. Hernes used the term for the society as shaped by the relations between politics and media (Stomback, 2008).

Media logic versus Political logic
In order to understand the concept of Mediatization, it is essential to understand ‘media logic’. In Capitalist democracies when media actors become very influential they mostly think about their business interests, ignoring the social concerns. Media indulges in irrational activities to increase its ratings. This has brought many changes in the methods of news gathering and presentation (Althied and Snow, 1979). Using the media logic, media consistently experiments with its format to attract more attention. The frequent changes in formats of the Indian news channels and papers can be understood in this context.
Media logic tries to dominate all other democratic institutions. In this way, it gets in conflict with the political logic. The chief actors of political logic are the leaders, ministers and bureaucrats. They claim publically to be responsible towards the party, government and people. They do not give free reign to media, but use it for their own benefits. Thus, the capitalist media logic and political logic remain in a conflicting relationship. (Mayor 2002) The difference between these two logics is made evident by the recent competitive attempts of media owners and politicians to regulate the media.
On the basis of media logic and political logic, Stromback (2008) has proposed four phases of mediatized politics. These phases are in accordance with the western democracies. Still while comparing with the India democracy, the situation is by and large similar.

Four phases of Mediatized Politics
In the first stage, media is the most important source of information and communication. This communication takes place between the citizens, political parties and political institutions. In this situation, the politics is mediated. Mediation is important for the later process of Mediatization as it influences greatly the expressions, opinions and perception of the audience. In this very first step of Mediatization of politics, the perception of people starts getting shaped by the reality as projected by media. To understand whether politics has reached this first step of Mediatization, it is important to know whether media is the prime source of information and communication between the media-rulers and media-ruled. In this stage, the media, other than political media, is less regulated by political logic. But the political logic on the other meida is not so less, that they get regulated by media logic as well. Thus, in this phase, the profit centered media logic remains limited.
The second phase is marked by a media, freer from the political and government institutions. Now the media logic becomes operational. The capitalist profits become more dominating. A demand of professionalism from journalists is made. They are expected to be more realists rather than being loyalists to the politics. Attempts are made to innovate the news formats in order to appease and attract the audiences and readers. Still the media logic does not rule completely in this phase. The state laws and regulations create obstacles in its way. Media remains midway in terms of freedom. Although the political and institutional actors are strong in this phase, they do not rule the media and are not able to force their interests on it.
In the third phase, media is the most important source of information and communication for the various classes of society. The media becomes more independent than the second phase. This forces the political and societal actors to mould themselves according to media. The media logic starts dominating the political logic. The political actors start using news management and spin doctoring to meet their ends. This further pushes the acceptance of media in politics and society. The media logic becomes all powerful. Its role in the policy making increases and it becomes near impossible to overlook the media. The process of agenda setting and framing also starts. All these are initiated by media owners for their own benefits. Althied and Snow (1991) describe this situation as one in which all institutions appear to be media institutions. The institutional journalism appears to be disappearing. News becomes products. Rather than the news itself, their presentation becomes primary. In these circumstances, the political actors have to use news events to put forward their views. Sensations and celebrities assume prime importance in media.
By this phase, reality starts getting presented on the basis of media logic. Thus, a mediated reality is constructed, in which reality itself disappears. The mediated reality becomes more important than reality. As only mediated reality reaches people, they respond to that only. Lippon (1997) describes the mediated reality as an environment of façade and Nimmo and Comb (1983) describe it as a world of fantasy. In this phase the political and societal actors remain frustrated with the role of media. The conflict between media and political logic intensifies. The political actors treat media as an external element; still they remain dependent on the news. While the election campaign, formulating policies and in governance, they remain more concerned about the media rather than about their people.
By the fourth phase, media logic becomes so powerful that media starts breaking all boundaries of moralities for its benefits. In such a situation, often the political-societal actors forget the differences between media logic and political logic. Politics gets colonized by media. Political actors surrender before the media logic. The media is used to mould politics as desired.

Mediatization and Paid News
It is time for the people who believe media as fourth pillar of democracy to realize that this watchdog has instead become a corporate-lapdog. The process of Mediatization is at its peak. Media logic is operating at full steam to achieve its purpose of profit earning, even at cost of people’s concerns and democratic values. We cannot neglect the fact that media has the extreme power to influence people’s opinion. It can guide the opinions in the direction it desires. Thus, the danger behind the attempts of media to shape opinions in favour of an idea or person in order to further its’ own interests, is great.
After the advent of neoliberal policies, many media houses have been trading news, sidelining and molding the rules-regulations. Biggest example of this is the Times of India Group, which initiated the medianet and private treaty. In 2003 medianet was started, many supplements with the main newspaper were introduced. With this paper, a daily paper named ‘Delhi Times’ is supplied free of cost. This supplement prints only such news for which the newspaper gets money. The common reader has no idea that the Times of India and the Delhi Times are two separate newspapers. Both have separate RNI registration numbers as well as editors.
The news is manipulated through the private treaties as well. The corporate media houses buy partnership in other corporate companies in lieu of advertisements and promises of popularizing their brand name. For instance, the Times of India Group is in partnership with more than 125 companies through their company Brand Capital. It looks after the advertisement and promotion of these companies. At first the group did this in name of private treaties. Private treaty has become common for most of the newspapers and private television channels.
The year of 2009 saw the Parliament elections as well as Haryana and Maharashtra state assembly elections. These elections made evident how the media houses influences politics for their benefits, once the corporate media logic becomes powerful. The newspapers openly demanded money for including news favoring particular leaders. They had their rates for different candidates. Many political leaders and parties registered complaints of demands of money for favorable news on the newspapers. This phenomenon was earlier observed during the Uttarakhand Assembly elections of 2007, when media houses had started the practice of selling space in their publications. Some politicians paid money for getting publicity in news-form. This phenomenon is known as ‘Paid News’. A powerful BJP leader, Lalji Tandon, was surprised when Dainik Jagran, a paper that is considered pro-BJP, asked him for money during his campaign in the Lucknow Parliamentary elections. Press Council of India (PCI) prepared an inquiry report, under Srinivas Reddy and Paranjoy Guha Thakruta (Thakurta and Reddy, 2010) on this issue of ‘paid news’. They defined paid news as “Any news or analysis appearing in any media (Print & Electronic) for a price in cash or kind as consideration”
Paid news is the biggest challenge for Indian media in today’s scenario. Its roots are in the neo-liberal policies that created the space for media to be so unregulated. The political parties which overlook the media regulations should also realize that the mainstream media is now capable enough to overlook them. The politicians who are responsible to formulate legislations and regulations for the whole country are forced by the media to trade for space in news media. If this process of Mediatization continues like this, it will become more and more difficult for the common person to protect their already diminishing democratic rights.

Diminishing Public Sphere and a Search for Alternatives
The process of Mediatization is molding the society and politics as per its own interests. Even in the capitalist democracy, it is imperative that the flow of information between the ruler and the ruled remains intact. It is important that there remains a space for discussion amongst the people, and media plays role of a watchdog. In other words, we can say that the freedom of press is not for press, but also is needed to strengthen democracy (Baker, 2007). Public Sphere is that platform, which provides space for collective discussions about social problems. It impacts the political initiatives. Public sphere is the space other than market and state, for voicing of people’s concerns. The discussions in public sphere, at one hand, opine people and at the other hand, pressurize the state to take notice. Habermas (1989), the German sociologist, studied the European public sphere of 18th-19th century. In those times, coffee houses and salons used to be main centers for discussions. The growth of print media added new meaning to public sphere. Newspapers also discussed problems and concerns of people. In this way, the changes in media also brought changes in the public sphere.
In the last two decades Indian media has undergone historical changes. In the era of economic liberalization, media has propagated at unprecedented scale. Mediums like Newspaper, radio, TV, internet have become important sources of information. We have already discussed how the information through media that remains a toy in the hands of corporate, remain a facade. If we do not realize and oppose this situation, it will become more dangerous in coming days. Whatever public sphere is left with us, will also disappear. The mediated and mediatized information is capable to create people completely dysfunctional for the society and politics.
It is not that before the onset of this for of Mediatization, the politics in capitalist democracy was without problems. But now, the mainstream media plays an important role as an institution, for furthering corruption in politics. The civil society, responsible to check the capitalist democracy, is itself lacking in accountability now. An important element of civil society, the NGOs, is facing questions about their credibility, in view of the huge funding. The NGOs either receive funding from the Government or from the corporate houses.
The people’s movements for the rights of people on the resources and the extreme left movement are truly challenging the mediated reality. They are creating an alternative communication structure, however small. In these terms they are creating a counter-public sphere. There is sufficient proof that if a group of people are guided by a strong political ideology, they remain less influenced by the media (MacComb, 2004). These kinds of counter public sphere come forward with new agendas of social transformations. In these spheres, discussions are not one dimensional, but multi-dimensional. These spheres, unlike the bourgeoisie public sphere, are not regulated by a single class base. The counter public sphere keeps alive the alternative to the mediatized politics.

Refrences:
Altheide , D. L. & Snow, R.P. (1979). Media Logic. Beverly Hills, CA: Sage.
Altheide , D. L. & Snow, R.P. (1991) Media world in post journalism era. New York . Eldain da Gruetar.
Altheide , D. L. & Snow, R.P. (1988). Towards a theory of mediation. In communication year book, Editor: J A Anderson. 11 edition. Newbery Park C A: Sage
Baker, C.A. (2007). Media Concentration and Democracy: Why Ownership Matters. New York: Cambridge University Press.
Hjarvard, S. (2008). The Mediatization of Society: A Theory of Media as Agents of Social and Cultural Change. Nordicom Review. 29 (2), 105-134.
Hjarvard, S. (2004). “From bricks to bytes: mediatization of global toy industry” European culture and media.
Hebaemas, J. (1989) The Structural Transformation of the Public Sphere: an Inquiry into a Category of Bourgeois Society, Polity Press
Lipmann, W. (1997). Public Opinion. New York: Free Press (First edition published in 1922).
Mccombs, M. (2004). Setting the Agenda: The mass media and public opinion. Malden, MA, Blackwell Publishing Inc.
Mazzoleni, G., & Schulz, W. (1999). "Mediatization" of Politics: A Challenge for Democracy?Political Communication, 16(3), 247-261.
Meyer, T, 2002 Media democracy: How the media colonize politics, Cambridge: Polity.
Nimmo, D and James E Coms. 1983. Mediated Political Reality. New York. Longman.
Pandey, S.K. & Madhok, S. (2010). “From watch dog to lap dog?” Press for sale: watch dog unmasked. DMCT and Delhi Union of Journalists
Schulz,W. (2004). Reconstructing Mediatization as an Analytical Concept. European Journal of Communication. 19(1), 87-101.
Stromback, J. (2008). Four Phases of Mediatization: An Analysis of the Mediatization of Politics.The International Journal of Press/politics, 13 (3), 228-246.
Thakurata P R and Reddy, 2010. “Paid News”: How corruption in the Indian media undermines democracy. Unpublished report of Press Council of India (PCI)

जन लोकपाल का पाखंड

भूपेन सिंह
जब से उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी ने राज्य में लोकपाल विधेयक पास किया है वे अऩ्ना हज़ारे और उनके समर्थकों के दुलारे बने हुए हैं. इससे राज्य में भ्रष्टाचार के आरोपों से गले-गले तक डूबी भारतीय जनता पार्टी अन्ना के सहारे आगामी विधानसभा चुनाव में फिर से जीतने का सपना देखने लगी है. खंडूरी का कहना है कि वे जल्द ही राज्य में एक बड़ी रैली करने जा रहे हैं जिसमें अन्ना ने भी शिरकत करने की सहमति दी है. लेकिन जिस लोकपाल के लिए अन्ना के सिपहसालार फूले नहीं समा रहे हैं शायद उसकी स्थापनाओं को उन्होंने अभी अच्छी तरह पढ़ा नहीं है या वे जानबूझकर बीजेपी के पक्ष में माहौल बना रहे हैं.
अन्ना हज़ारे और इंडिया अगेंस्ट करप्शन को इस बात का श्रेय ज़रूर दिया जाना चाहिए कि उन्होंने पूरे देश में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक माहौल बनाया है लेकिन उनकी ज़िद और एकांगी सोच की वजह से वे इस मर्ज की असली वजह पर कुछ भी सोचने के लिए तैयार नहीं हैं. यही वजह है कि 1 नवम्बर को उत्तराखंड की खंडूरी सरकार ने जैसे ही विधानसभा में उत्तराखंड लोकायुक्त विधेयक-2011 पास किया तो अऩ्ना को बीजेपी शासित उत्तराखंड एक आदर्श राज्य नज़र आने लगा और उसके नेता आदर्श जनप्रतिनिधि. जनता की भ्रष्टाचार विरोधी अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए किसी भी पार्टी ने इस विधेयक का विरोध करने की हिम्मत नहीं की. लेकिन सवाल उठाया जाना चाहिए कि जो अन्ना समूह केंद्र की कांग्रेस सरकार से प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के दायरे में लाने पर आसमान सर पर उठाए हुए है. उत्तराखंड वाले अधिनियम में उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार को जांच के दायरे में लाने के लिए ऐसे क्या प्रावधान हैं कि वे बिना किसी झिझक के उसका समर्थन कर रहे हैं.
अधिनियम के अनुसार लोकपाल और उसके पांच सदस्यों की नियुक्ति सरकार की चयन समिति के सुझावों के बाद राज्यपाल करेगा. हमारे लोकतंत्र में कोई भी संस्था सत्ता के प्रभाव से कितनी अछूती रहती है यह बात जग ज़ाहिर है. इसलिए पूरा अधिनियम बहुत ही चालाकी से बनाया गया है. पहली नज़र में ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री, मंत्री और विधायक भी इसके दायरे में है. लेकिन अधिनियम के अध्याय छह में साफ़ लिखा गया है कि लोकपाल के सभी सदस्यों और अध्यक्ष की आम सहमति के बिना इन उच्च पदस्थ लोगों पर कोई जांच और कार्रवाई नही की जा सकती. इसे आसानी से समझा जा सकता है कि लोकायुक्त और उसके सभी सहयोगियों का किसी मुद्दे पर एकमत होना कितना मुश्किल है, वो तब, जब सत्ताधारियों के ख़िलाफ़ आरोप हों.
बीजेपी हमेशा भुवन चंद्र खंडूरी की छवि को ऐसे पेश करती है जैसे वे दूध के धुले हों. लेकिन उत्तराखंड की अधिकांश जनता उन्हें बीजेपी हाईकमान की तरफ़ से उन पर थोपा गया नेता मानती रही है. ज़िंदगी भर फ़ौज में अफ़सर रहे खंडूरी, दो हज़ार सात में बिना विधानसभा का चुनाव जीते ही उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बनाए गए थे. तब बीजेपी हाई कमान ने पद के दूसरे महत्वपूर्ण दावेदार भगत सिंह कोश्यारी को किनारे लगा दिया था. राज्य की जनता और बीजेपी कार्यकर्ता इस बात को कभी स्वीकार नहीं कर पाए. मुख्यमंत्री बनने के बाद खंडूरी अपनी फ़ौजी अनुशासन की छवि को भुनाने में कामयाब रहे. कांग्रेस की नारायण दत्त तिवारी की अराजक सरकार के बाद खंडूरी राज्य के एक तबके में लोकप्रिय भी हुए लेकिन भीतरी और बाहरी असंषोष की वजह से दो हज़ार नौ में उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी. बहाना लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड से बीजेपी का सफ़ाया बना. खंडूरी काल में उनके चहेते आईएएस अफ़सर सारंगी पर भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े आरोप लगे लेकिन खंडूरी लगातार उन्हें बचाते रहे. यहां तक की बाबा रामदेव ने भी खंडूरी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए. इस सब से तंग आकर बीजेपी हाई कमान ने रमेश पोखरियाल निशंक को उत्तराखंड का नया मुख्यमंत्री बना दिया. उनके शासन काल में उत्तराखंड भ्रष्टाचारियों का अड्डा बन गया. निशंक पर भ्रष्टाचार के अनगिनत आरोप लगे, जिस वजह से बीजेपी को भी लगा कि उनके नेतृत्व में अगला विधानसभा चुनाव लड़ा तो बीजेपी चंद सीटों में सिमट सकती है, इसीलिए चुनाव से ठीक पहले खंडूरी को मुख्यमंत्री बना दिया गया. इस सारी पृष्ठभूमि की अनदेखी करने वाले अन्नावादियों को लग रहा है कि खंड़ूरी उनकी मंशा का लोकपाल बनाने वाले पहले और स्वाभाविक नायक हैं.
गौरतलब है कि उत्तराखंड में भ्रष्टाचार का पर्याय माने जाने वाले निशंक भी अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समर्थक रहे हैं. खंडूरी पर निशंक के ख़िलाफ़ कई घोटालों में सीबीआई जांच की सिफ़ारिश करने का दबाव है लेकिन वे लगातार इस बात को टालते जा रहे हैं. देश की जनता के लिए हैरान करने वाली बात यह है कि अऩ्ना के आदमी निशंक बचाने में लगातार जुटे रहे. उनके एक बेहद क़रीबी वकील शांतिभूषण, निशंक को बचाने एक विशेष विमान से नैनीताल हाईकोर्ट पहुंचे थे. निशंक स्टर्डिया भूमि घोटाले में बुरी तरफ फंसे हुए थे. तब शांति भूषण ने ही उन्हें मुसीबत से बचाया था. आख़िरकार कोर्ट ने निशंक को स्टर्डिया घोटाले में बरी कर दिया और सारा ठीकरा राज्य की नौकरशाही पर फोड़ दिया. भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ सख्त कानून की बात करने वाले अऩ्ना के सिपहसालार ही जब इस तरह भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे एक मुख्यमंत्री को बचाने पहुंचते हैं तो इससे उनकी लड़ाई का खोखलापन भी ज़ाहिर होता है.
अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए बीजेपी को उम्मीद है कि अन्ना आंदोलन उसके लिए एक मजबूत हथियार साबित हो सकता है. बीजेपी की राजनीति को समझने के बाद भी अन्ना समूह उसकी मंशा को पूरा करने में जुटा है. इसीलिए वो पांचों राज्यों में बीजेपी के समर्थन का माहौल बना रहा है. जन लोकपाल को भ्रष्टाचार मिटाने का जादुई हथियार मानने वाले ये लोग न सिर्फ़ भ्रष्टाचार की असली जड़ों की अनदेखी कर रहे हैं बल्कि वे इससे जुड़े नैतिक पहलुओं की भी अनदेखी कर रहे हैं. यही वजह है कि लोकलुभावन नारों के सहारे आंदोलन चला रहे इंडिया अंगेस्ट करप्शन के कर्ता-धर्ता सिर्फ़ कांग्रेस को ही भ्रष्टाचार के लिए ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं. संस्थागत हो चुके भ्रष्टाचार की जड़ें उन्हें दिखाई नहीं देती हैं. फिलहाल भ्रष्टाचार के ख़िलाफ बोलना एक फ़ैशन बन गया है. अन्ना हज़ारे इस फ़ैशन के प्रतीक पुरुष हैं. इसे आगे बढ़ाने वाले भुवन चंद्र खंडूरी ख़ुद को मसीहा मान रहे हैं. कुल मिलाकर इस राजनीति में बीजेपी के हाथों में ही लड्डू दिखाई दे रहे हैं, जबकि वर्तमान हालात के लिए बीजेपी, कांग्रेस से किसी भी मामले में कम ज़िम्मेदार नहीं हैं. अगर अऩ्नावादी बीजेपी को चुनाव जिताने में किसी भी तरह का प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोग करते हैं तो इससे कांग्रेस का यह आरोप भी सही साबित होगा कि वे बीजेपी के हाथ की कठपुथली मात्र हैं.
(कुछ अख़बारों के संपादकीय विभाग में काम करने वाले दोस्तों ने इसे न छाप पाने की मजबूरी दिखाई. उन्हें नौकरी जाने का डर था.)

Monday, November 7, 2011

उन्माद की सीमा

भूपेन सिंह
अमृतसर जाने के लिए कोई बहुत ज़्यादा उत्साह नहीं था. काम निकल आया तो सोचा कि एक और नया शहर देख लेंगे. जलियांवाला बाग, स्वर्ण मंदिर देखने के बाद बाघा बॉर्डर जाने की बारी थी. बॉर्डर पर हज़ारों की भीड़ देखकर सोचता रहा कि आख़िर किस चीज़ को देखने इतने लोग यहां इकट्ठा हुए हैं. भीड़ से घिरा होने के बावजूद मैं विभाजन की त्रासदी के बारे में सोच रहा था. देशों के बीच सीमा नाम का विभाजन मुझे हमेशा बहुत ही कृत्रिम और असुविधाजनक लगता रहा है. लेकिन हक़ीकत यही थी कि इस तरफ़ भारत था और उस तरफ़ पाकिस्तान. बीच में लोहे का बना एक बड़ा सा दरवाज़ा. दोनों ही तरफ़ बड़ी संख्या में लोग दो देशों की साझा सैनिक परेड देखने को मौजूद थे. इस तरफ़ बीएसएफ़ ने और उस तरफ़ पाकिस्तान रेंजर्स ने उनके बैठने का इंतज़ाम कुछ इस तरह से किया था कि वे ओपन एयर थियेटर में चलने वाले नाटक को अच्छी तरह देख पाएं.
सूरज डूबने वाला था. सीमा पर राष्ट्रवाद अपने चरम पर था. दोनों तरफ़ से लाउड स्पीकर पर देशभक्ति के गाने चल रहे थे. देशभक्ति में अपने देश के गुणगान से ज़्यादा दूसरे देश को मटियामेट करने की धमकी साफ़ महसूस की जा सकती थी. इन गानों को सुनकर दोनों तरफ़ की जनता में और भी जोश भर रहा था. सस्ते किस्म के फिल्मी गानों में देशभक्ति की लड़ाई जारी थी. दोनों देशों के सिपाहियों में होड़ लगी थी, दूसरी तरफ़ से कोई भड़काऊ गाना चलता तो वे ईंट का ज़वाब पत्थर से दे रहे थे. इस तरफ़ से हिंदुस्तान ज़िंदाबाद के नारे लग रहे थे तो उस तरफ़ से पाकिस्तान ज़िंदाबाद के. साथ में बंदे मातरम और भारत माता की जय के नारों से भी आसमान गूंज रहा था. वहां से इस्माली नारे उछल रहे थे तो यहां से हिंदू. एक तरफ़ कुरान की आयतें थीं तो दूसरी तरफ़ संस्कृत के श्लोक.
सीमा पूरी तरह सैनिकों के हवाले थी. लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता किस चिड़िया का नाम है, उन्हें इस बात से कुछ लेना-देना नहीं था. माना कि पाकिस्तान तो घोषित तौर पर इस्लामिक राष्ट्र है लेकिन इस पार भारत या इंडिया का एक तीसरा नाम हिंदुस्तान कहां से आया, ये असहज सवाल मन में उठने लगा. यहां हिंदुस्तान ज़िंदाबाद का नारा उसके ऐतिहासिक अर्थों में नहीं बल्कि हिंदुओं की भूमि के रूप में उछल रहा था. सैनिक हिंदू प्रतीकों और संस्कृत के श्लोकों को इस्मालिक राष्ट्र के ख़िलाफ़ हिंदू प्रतिवाद के तौर पर इस्तेमाल कर रहे थे, जैसे कि भारत कोई हिंदू राष्ट्र हो. सबकुछ इतना असंगत था कि साथ में गए कुछ विदेशी पत्रकार मुझसे ऐसे सवाल करने लगे जैसे इस भूभाग में पैदा होने की वजह से मैं भी इस नाटक के लिए ज़िम्मेदार हूं.
डूबते हुए सूरज के साथ दोनों तरफ़ से कुछ वक़्त के लिए सीमा का दरवाजा खुलना था. यही तमाशे का चरम था. दोनों तरफ़ से सैनिक आक्रामक मुद्रा में झटके से दरवाजा खोलते हैं. हाथ मिलाने आमने-सामने पहुंचते हैं. उनकी निगाहों से ऐसी हिंसा टपक रही होती है जैसे वे एक-दूसरे को कच्चा चबा जाएंगे. हज़ारों की भीड़ इस मंजर को सांसें रोके देखती है. वो तुलना करती है कि किस तरफ़ का जवान ज़्यादा दमदार है. किसकी आंखों से ज़्यादा नफ़रत और राष्ट्रीय श्रेष्ठता टपक रही है. यहां आपस में मिलने वाले हाथ दोस्ती के नहीं, नफ़रत के थे. बाद में पता चला कि विभाजन के बाद से ही बीच के कुछ वर्षों को छोड़कर ये आयोजन चलता आ रहा है. इस बीच यहां हज़ारों नेता, पत्रकार और बुद्धिजीवी आ चुके होंगे. हमारे सभ्य और धर्मनिरपेक्ष नीति निर्माताओं की नज़र में ये सब नहीं आया हो, ऐसा भी नहीं हो सकता. फिर भी धार्मिक कट्टरता में लिथड़े राष्ट्रवाद का तमाशा यहां जारी है. दिन भर दोनों ओर के सैनिक इस तमाशे के लिए अभ्यास करते हैं. मैं सोचता रहा कि हमारी सभ्यता नफ़रत के ऐसे अभ्यास की कैसे इजाज़त दे सकती है?
सूरज डूब चुका था. दोंनों देशों के सैनिक अपने इलाक़े में लौटकर अपना-अपना झंडा समेट रहे थे. एक तरह से उन्माद और उत्तेजना का अंत हो चुका था. भीड़ छंटने लगी. उस जगह महानता के मानसिक युद्ध के बाद बचे हुए दृश्य थे. मुझे लगा कि लोग राष्ट्रवाद के नशे में चूर नफ़रत के ऐसे ही किसी और आयोजन का प्रशिक्षण लेकर लौट रहे हैं.
(यह लेख जनसत्ता में प्रकाशित हो चुका है)

Tuesday, August 30, 2011

व्यवस्था के शस्त्रागार का एक नया हथियार

आनंद स्वरूप वर्मा, संपादक,समकालीन तीसरी दुनिया

जो लोग यह मानते रहे हैं और लोगों को बताते रहे हैं कि पूंजीवादी और साम्राज्यवादी लूट पर टिकी यह व्यवस्था सड़ गल चुकी है और इसे नष्ट किये बिना आम आदमी की बेहतरी संभव नहीं है उनके बरक्स अण्णा हजारे ने एक हद तक सफलतापूर्वक यह दिखाने की कोशिश की कि यह व्यवस्था ही आम आदमी को बदहाली से बचा सकती है बशर्ते इसमें कुछ सुधार कर दिया जाय। व्यवस्था के जनविरोधी चरित्र से जिन लोगों का मोहभंग हो रहा था उस पर अण्णा ने एक ब्रेक लगाया है। अण्णा ने सत्ताधारी वर्ग के लिए आक्सीजन का काम किया है और उस आक्सीजन सिलेंडर को ढोने के लिए उन्हीं लोगों के कंधें का इस्तेमाल किया है जो सत्ताधारी वर्ग के शोषण के शिकार हैं। उन्हें नहीं पता है कि वे उसी निजाम को बचाने की कवायद में तन-मन-धन से जुट गये जिसने उनकी जिंदगी को बदहाल किया। देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे जुझारू संघर्षों की ताप से झुलस रहे सत्ताधारियों को अण्णा ने बहुत बड़ी राहत पहुंचाई है। शासन की बागडोर किसके हाथ में हो इस मुद्दे पर सत्ताधारी वर्ग के विभिन्न गुटों के बीच चलती खींचतान से आम जनता का भ्रमित होना स्वाभाविक है पर जहां तक इस वर्ग के उदधारक् की साख बनाये रखने की बात है, विभिन्न गुटों के बीच अद्भुत एकता है। यह एकता 27 अगस्त को छुट्टी के दिन लोकसभा की विशेष बैठक में देखने को मिली जब कांग्रेस के प्रणव मुखर्जी और भाजपा की सुषमा स्वराज दोनों के सुर एक हो गये और उससे जो संगीत उपजा उसने रामलीला मैदान में एक नयी लहर पैदा कर दी। सदन में शरद यादव के भाषण से सबक लेते हुए अगले दिन अपना अनशन समाप्त करते समय अण्णा ने बाबा साहेब आंबेडकर को तो याद ही किया, अनशन तोड़ते समय जूस पिलाने के लिए दलित वर्ग और मुस्लिम समुदाय से दो बच्चों को चुना।
अण्णा हजारे का 13 दिनों का यह आंदोलन भारत के इतिहास की एक अभूतपूर्व और युगांतरकारी घटना के रूप में रेखांकित किया जाएगा। इसलिए नहीं कि उसमें लाखों लोगों की भागीदारी रही या टीवी चैनलों ने लगातार रात दिन इसका प्रसारण किया। किसी भी आंदोलन की ताकत या समाज पर पड़ने वाले उसके दूरगामी परिणामों का आकलन मात्र इस बात से नहीं किया जा सकता कि उसमें लाखों लोगों ने शिरकत की। अगर ऐसा होता तो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से लेकर रामजन्मभूमि आंदोलन, विश्वनाथ प्रताप सिंह का बोफोर्स को केंद्र में रखते हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, मंडल आयोग की रिपोर्ट पर आरक्षण विरोधी आंदोलन जैसे पिछले 30-35 वर्षों के दौरान हुए ऐसे आंदोलनों में लाखों की संख्या में लोगों की हिस्सेदारी रही। किसी भी आंदोलन का समाज को आगे ले जाने या पीछे ढकेलने में सफल/ असफल होना इस बात पर निर्भर करता है कि उस आंदोलन को नेतृत्व देने वाले कौन लोग हैं और उनका ‘विजन’ क्या है? अब तक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी बना कर जनभावनाओं का दोहन किया जाता रहा है। अण्णा के व्यक्तित्व की यह खूबी है कि इस खतरे से लोग निश्चिंत हैं। उन्हें पता है कि रालेगण सिदधी के इस फकीरनुमा आदमी को सत्ता नहीं चाहिए।
अण्णा का आंदोलन अतीत के इन आंदोलनों से गुणात्मक तौर पर भिन्न है क्योंकि आने वाले दिनों में भारतीय समाज में बदलाव के लिए संघर्षरत शक्तियों के बीच यह ध्रुवीकरण का काम करेगा। किसी भी हालत में इस आंदोलन के मुकाबले देश की वामपंथी क्रांतिकारी शक्तियां न तो लोगों को जुटा सकती हैं और न इतने लंबे समय तक टिका सकती हैं जितने लंबे समय तक अण्णा हजारे रामलीला मैदान में टिके रहे। इसकी सीधी वजह यह है कि यह व्यवस्था आंदोलन के मूल चरित्र के अनुसार तय करती है कि उसे उस आंदोलन के प्रति किस तरह का सुलूक करना है। मीडिया भी इसी आधार पर निर्णय लेता है। आप कल्पना करें कि क्या अगर किसी चैनल का मालिक न चाहे तो उसके पत्रकार या कैमरामेन लगातार अण्णा का कवरेज कर सकते थे? क्या कारपोरेट घराने अपनी जड़ खोदने वाले किसी आंदोलन को इस तरह मदद करते या समर्थन का संदेश देते जैसा अण्णा के साथ हुआ? भारत सरकार के गृहमंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीन वर्षों में यहां के एनजीओ सेक्टर को 40 हजार करोड़ रुपये मिले हैं- उसी एनजीओ सेक्टर को जिससे टीम अन्ना के प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, किरन बेदी, संदीप पांडे, स्वामी अग्निवेश जैसे लोग घनिष्ठ/ अघनिष्ठ रूप से जुड़े/ बिछड़े रहे हैं। इस सारी जमात को उस व्यवस्था से ही यह लाभ मिल रहा है जिसमें सडांध् फैलती जा रही है, जो मृत्यु का इंतजार कर रही है और जिसे दफनाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में उत्पीड़ित जनता संघर्षरत है। आज इस व्यवस्था का एक उदधारक दिखायी दे रहा है। वह भले ही 74 साल का क्यों न हो, नायकविहीन दौर में उसे जिंदा रखना जरूरी है।
क्या इस तथ्य को बार बार रेखांकित करने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार का मूल स्रोत सरकार की नवउदारवादी आर्थिक नीतियां हैं? इन नीतियों ने ही पिछले 20-22 वर्षों में इस देश में एक तरफ तो कुछ लोगों को अरबपति बनाया और दूसरी तरफ बड़ी संख्या में मेहनतकश लोगों को लगातार हाशिये पर ठेल दिया। इन नीतियों ने कारपोरेट घरानों के लिए अपार संभावनाओं का द्वार खोल दिया और जल, जंगल, जमीन पर गुजर बसर करने वालों को अभूतपूर्व पैमाने पर विस्थापित किया और प्रतिरोध् करने पर उनका सफाया कर दिया। इन नीतियों की ही बदौलत आज मीडिया को इतनी ताकत मिल गयी कि वह सत्ता समीकरण का एक मुख्य घटक हो गया। जिन लोगों को इन नीतियों से लगातार लाभ मिल रहा है वे भला क्यों चाहेंगे कि ये नीतियां समाप्त हों। इन नीतियों के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में जो उथल-पुथल चल रही है उससे सत्ताधारी वर्ग के होश उड़े हुए हैं। ऐसे में अगर कोई ऐसा व्यक्ति सामने आता है जिसका जीवन निष्कलंक हो, जिसके अंदर सत्ता का लोभ न दिखायी देता हो और जो ऐसे संघर्ष को नेतृत्व दे रहा हो जिसका मकसद समस्या की जड़ पर प्रहार करना न हो तो उसे यह व्यवस्था हाथों हाथ लेगी क्योंकि उसके लिए इससे बड़ा उदधारक कोई नहीं हो सकता। अण्णा की गिरफ्रतारी, रिहाई, अनशन स्थल को लेकर विवाद आदि राजनीतिक फायदे-नुकसान के आकलन में लगे सत्ताधारी वर्ग के आपसी अंतर्विरोधें की वजह से सामने आते रहे हैं। इनकी वजह से मूल मुद्दे पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
अण्णा के आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान गांधीजी द्वारा चलाये गये सत्याग्रहों और आंदोलनों की उन लोगों को याद दिला दी जिन्होंने तस्वीरों या फील्मों के माध्यम से उस आंदोलन को देखा था। गांधी के समय भी एक दूसरी धारा थी जो गांधी के दर्शन का विरोध् करती थी और जिसका नेतृत्व भगत सिंह करते थे। जहां तक विचारों का सवाल है भगत सिंह के विचार गांधी से काफी आगे थे। भगत सिंह ने 1928-30 में ही कह दिया था कि गांधी के तरीके से हम जो आजादी हासिल करेंगे उसमें गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज सत्ता पर काबिज हो जायेंगे क्योंकि व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं होगा। तकरीबन 80 साल बाद रामलीला मैदान से अण्णा हजारे को भी यही बात कहनी पड़ी कि गोरे अंग्रेज चले गये पर काले अंग्रेजों का शासन है। इन सबके बावजूद भगत सिंह के मुकाबले गांधी को उस समय के मीडिया ने और उस समय की व्यवस्था ने जबर्दस्त ‘स्पेस’ दिया। वह तो टीआरपी का जमाना भी नहीं था क्योंकि टेलीविजन का अभी आविष्कार ही नहीं हुआ था। तो भी शहीद सुखदेव ने चंद्रशेखर आजाद को लिखे एक पत्र में इस बात पर दुःख प्रकट किया है कि मीडिया हमारे बयानों को नहीं छापता है और हम अपनी आवाज जनता तक नहीं पहुंचा पाते हैं। जब भी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन करने वाली ताकतें सर उठाती हैं तो उन्हें वहीं खामोश करने की कोशिश होती है। अगर आप अंदर के रोग से मरणासन्न व्यवस्था को बचाने की कोई भी कोशिश करते हुए दिखायी देते हैं तो यह व्यवस्था आपके लिए हर सुविधा मुहैया करने को तत्पर मिलेगी।
अण्णा हजारे ने 28 अगस्त को दिन में साढ़े दस बजे अनशन तोड़ने के बाद रामलीला मैदान से जो भाषण दिया उससे आने वाले दिनों के उनके एजेंडा का पता चलता है। एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह उन्होंने उन सारे मुद्दों को भविष्य में उठाने की बात कही है जो सतही तौर पर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का आभास देंगे लेकिन बुनियादी तौर पर वे लड़ाइयां शासन प्रणाली को और चुस्त-दुरुस्त करके इस व्यवस्था को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा टिकाऊ , दमनकारी और मजबूत बना सकेंगी। अण्णा का आंदोलन 28 अगस्त को समाप्त नहीं हुआ बल्कि उस दिन से ही इसकी शुरुआत हुई है। रामलीला मैदान से गुड़गांव के अस्पताल जाते समय उनकी एंबुलेंस के आगे सुरक्षा में लगी पुलिस और पीछे पल पल की रिपोर्टिंग के लिए बेताब कैमरों से दीवाल पर लिखी इबारत को पढ़ा जा सकता है। व्यवस्था के शस्त्रागार से यह एक नया हथियार सामने आया है जो व्यवस्था बदलने की लड़ाई में लगे लोगों के लिए आने वाले दिनों में एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी करेगा।

Saturday, August 13, 2011

एफएम रेडियो: एकाधिकार का विस्तार

भूपेन सिंह

‘वायु तरंगें जनता की संपत्ति हैं’
-सुप्रीम कोर्ट, भारत, फरवरी, 1995

‘एफएम रेडियो के विस्तार के लिए तीसरे चरण के निजीकरण के तहत सरकार लाइसेंस नीलाम कर एक हज़ार सात सौ तैंतीस करोड़ रुपए कमाने की सोच रही है’
-अंबिका सोनी, सूचना और प्रसारण मंत्री, जुलाई, 2011


भारत सरकार वायु तरंगों को कॉरपोरेट को बेच कर अपने ही सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी का मज़ाक उड़ा रही है. टेलीविजन समाचारों के निजीकरण के बाद अब सरकार रेडियो समाचारों के निजीकरण के रास्ते पर है. लेकिन यह प्रक्रिया टेलीविजन की तुलना में जटिल और ज़्यादा ख़तरनाक है. सात जुलाई दो हज़ार ग्यारह को सरकार द्वारा घोषित एफएम रेडियो के तीसरे चरण की विस्तार योजना में कई ख़तरों को पहचाना जा सकता है. इस चरण में सरकार ने एफएम चैनलों को एक हद तक समाचार प्रसारित करने का अधिकार भी दे दिया है. साथ ही रेडियो चैनलों में विदेशी निवेश की सीमा बीस से बढ़ाकर छब्बीस फ़ीसदी कर उसने यह भी साबित कर दिया है कि वह जनता की संपत्ति को विदेशी पूंजीपतियों के हवाले करने को लेकर कितनी उतावली है. मीडिया नियमन से लगातार कन्नी काटती सरकार का यह कदम भारतीय मीडिया के लोकतांत्रीकरण की बची-खुची उम्मीदों को भी ख़त्म करने वाला है.
नब्बे के दशक में उदारीकरण की प्रक्रिया को शुरू हुए कुछ ही वक़्त बीता था. कोलकाता क्रिकेट बोर्ड और दूरदर्शन प्रसारण अधिकारों के विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे. जस्टिस पीबी सावंत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने तब बहुमत के आधार पर कहा था कि वायु तरंगें जनता की संपत्ति हैं इसलिए उन्हें जनता के हित में ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए. इस फ़ैसले की कई प्रतिध्वनियां हैं, अपेक्षा बनी कि सरकार पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग सिस्टम को मजबूत करेगी. दूरदर्शन और रेडियो सिर्फ़ सरकारी भौंपू बनकर नहीं रहेंगे, साथ ही निजी मीडिया की मनमानी पर लगाम लगाने कि लिए भी एक कारगर रेग्युलेटरी बोर्ड बनेगा. वक़्त बीतने के साथ ये दोनों ही बातें ग़लत साबित हुईं. सरकार ने स्वायत्त पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग के नाम पर प्रसार भारती तो बनाया लेकिन सरकारी एकाधिकार ख़त्म नहीं हुआ. दूसरी ओर उसने निजी मीडिया को इतनी छूट दी कि नियमन की बात पर वे आत्मनियमन की माला जपते हुए बेशर्मी से सरकार को ही धौंस देने लगे और व्यापक जनता की अनदेखी करने लगे.
उदारीकरण की प्रक्रिया को अपनाने के दो दशक बाद अब मुनाफाख़ोरों के निशाने पर रेडियो समाचार हैं. सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने एफएम रेडियो विस्तार के तीसरे चरण में कई नए निजी रेडियो चैनलों को लाइसेंस देने की घोषणा की है. जिसके तहत अब उन्हें आकाशवाणी की ख़बरों को बिना छेड़छाड़ किए प्रसारित करने की अनुमति भी मिल जाएगी. कॉरपोरेट की तरफ़ से सरकार पर लंबे अरसे से रेडियो समाचारों के निजीकरण करने का दबाव था. जन दबाव न होने की वजह से पहले से ही तैयार सरकार ने इसके लिए हामी भर दी है. जनमत बनाने में माहिर कॉरपोरेट मीडिया सरकार के इस क़दम की जमकर तारीफ़ कर रहा है. इसी ‘ख़ुशनुमा माहौल’ में सरकार ने दबे पांव निजी रेडियो चैनलों में विदेशी निवेश की सीमा छह फ़ीसदी और बढ़ा दी है. इस पूरे घटनाक्रम को मीडिया के लोकतांत्रीकरण की बात करने वाले एक बड़े ख़तरे के तौर पर देख रहे हैं. निजी मीडिया में पेड न्यूज़ और राडिया कांड जैसी घटनाएं खुलकर सामने आने के बाद उसकी विश्वसनीयता पहले ही तार-तार हो चुकी है. निजी मीडिया मुनाफ़ा कमाने की ललक के पीछे किस हद तक जा सकता है इसका ताज़ा उदाहरण ब्रिटेन में मीडिया मुगल रूपर्ड मुर्डोक के न्यूज ऑफ़ द वर्ल्ड की करतूतों से मिलते हैं. लेकिन लगता है कि कॉरपोरेट की इशारों पर चलने वाली हमारी सरकारें इन सब से आंख मूंदकर सोई हुई हैं.
एफएम रेडियो में तीसरे चरण के विस्तार की घोषणा करते हुए दो सौ सत्ताईस नए शहरों में एफएम चैनलों को लाइसेंस देने का ऐलान किया गया है. इससे पहले सिर्फ़ छियासी शहरों में ही एफएम चैनल मौज़ूद थे. अब सरकार कुल आठ सौ उनतालीस नए एमएफ चैनलों को अनुमति देने के लिए तैयार है. इसके तहत एक लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में निजी एफएम चैनल शुरू हो जाएंगे. पहले और दूसरे चरण में सरकार ने इकतीस मई दो हज़ार ग्यारह तक लाइसेंस बेचकर एक हज़ार सात सौ तैंतीस करोड़ रुपए कमाए थे. सरकार का कहना है कि वो इस चरण के तहत एक ही झटके में एक हज़ार सात सौ तैंतीस करोड़ रुपए का राजस्व कमाने का इरादा रखती है. ये सारे फ़ैसले कैबिनेट ने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में लिए. जनता की संपत्ति को बेचकर मुनाफ़ा कमाने और विकास के नाम पर कॉरपोरेट का घर भरने वाले दर्शन की अगुवाई करने वाले प्रधानमंत्री को भला इसमें क्या आपत्ति हो सकती है! लेकिन जनता के सवाल अब भी बरकरार हैं.
सरकार ने नई कंपनियों को लाइसेंस देने की जो शर्तें रखी हैं उससे स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र में भी आने वाले दिनों में बड़े पूंजीपतियों का एकाधिकार साफ़ दिखाई देगा. जिन कंपनियों के पास अथाह पैसा है वे ही इसमें निवेश करने में सक्षम होंगी. पता चलता है कि सरकार की मंशा क्रॉस मीडिया होल्डिंग पर लगाम लगाने की बिल्कुल भी नहीं है. यह बात देश की विविधता का गला घोंटने वाली साबित हो सकती है. क्रॉस मीडिया होल्डिंग का सीधा सा अर्थ है कि कुछ बड़े मीडिया घराने पूंजी के बल पर रेडियो, टेलीविजन, प्रिंट और इंटरनेट में एकाधिकार स्थापित कर देश के जनमत को मनचाही दिशा में मोड़ने में सक्षम हो सकते हैं. क्षेत्रीय चैनलों में भी एक ही तरह का केद्रीय विचार ज़्यादा हावी रहेगा. यह क़दम लोकतांत्रिक संस्थाओँ के लिए सर्वाधिक घातक है. अमेरिका जैसे पूंजीवादी देश में भी क्रॉस मीडिया होल्डिंग को रोकने के लिए कुछ ठोस नियम हैं. इसके अलावा दूसरे धंधों का पैसा भी मीडिया में लगाने के चलन पर रोक लगाने की कोई व्यवस्था हमारे यहां नहीं है. यही बजह है कि हाल के दौर में आपराधिक प्रवृत्ति के कई व्यावसायी मीडिया में पैसा लगा कर मुनाफ़ा कमा रहे हैं. जबकि ख़ास तौर समाचार मीडिया में पैसा लगाने की इजाज़त किसी भी हालत में ऐसे व्यवसायियों को नहीं होनी चाहिए जो पत्रकारिता के प्रभाव का इस्तेमाल अपना दूसरा व्यवसाय चमकाने में कर सकें. चिंता की बात यह है कि सरकार क्रॉस मीडिया होल्डिंग के साथ ही क्रॉस बिजनेस होल्डिंग की भी पूरी तरह से अनदेखी कर रही है.
एफएम रेडियो के दूसरे चरण के विस्तार की योजनाओं में सरकार ने मीडिया घरानों से कहा था कि सरकार की तरफ़ से क्रॉस मीडिया होल्डिंग संबंधी कोई नियम लाने पर उऩ्हें छह महीने के भीतर अपने मालिकाने में बदलाव करना होगा. यह बात अपने आप में खोखली साबित हुई. क्योंकि क्रॉस मीडिया होल्डिंग को लेकर सरकार अब तक कोई नीति नहीं बना पाई है. सिर्फ़ दिखावे से इस मामले में काम नहीं चलने वाला है क्योंकि आज बड़ी और मुनाफ़ाख़ोर मीडिया कंपनियों के लिए नई कंपनी बनाना बांयें हाथ का खेल है. मालिकाना बदलने का दिखावा करने में भी वे माहिर हैं. अब तो लगता है कि सरकार ने क्रॉस मीडिया होल्डिंग की चिंता से पूरी तरह किनाराकशी कर ली है.
उन्नीस सौ सत्ताईस में हमारे यहां रेडियो की शुरुआत ही एक निजी कंपनी के तहत हुई लेकिन आज़ादी के बाद नेहरू के गुलाबी समाजवाद के कुछ रंग हमारे रेडियो में भी दिखे. रेडियो में सरकार बजती रही. एफएम रेडियो उन्नीस सौ सतहत्तर में देश में पहुंचा. तब चेन्नई में आकाशवाणी के भीतर ही इसकी शुरुआत हुई लेकिन निजीकरण से जुड़ा इसका रूप नब्बे के दशक में ही देखने को मिला. उन्नीस सौ तिरानबे में सरकार ने नई आर्थिक नीतियों के अनुरूप पहली बार एफएम रेडियो की योजना पर अमल शुरू किया. इस दौर में मद्रास, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और गोवा में एफएम चैनल शुरू हुए. तब आकाशवाणी के चैनलों में ही निजी क्षेत्र को विषयवस्तु में निवेश की अनुमति दी गई. निजी कंपनियां सरकारी रेडियो में अपने लिए टाइम स्लॉट ख़रीदने लगीं. जुलाई उन्नीस सौ निन्यानबे में सरकार ने फ़ैसला किया कि वो एफएम रेडियो में पूरी तरह निजी निवेश को स्वीकृति देने जा रही है. इसे एफएम रेडियो विस्तार का पहला चरण कहा गया. मार्च दो हज़ार में सरकार ने लाइसेंस देने के लिए एक सौ आठ रेडियो चैनलों के लिए खुली नीलामी की. इऩ चैनलों को ख़बरों को छोड़कर शिक्षा, स्वास्थ्य और मनोरंजन से जुड़े कार्यक्रम पेश करने का अधिकार था. यह एफएम रेडियो के क्षेत्र में निजी पूंजी की पूरी तरह से घुसपैठ थी. इस चरण में कोई स्पष्ट और कारगर नीति न होने की वजह से लाइसेंस देने और उनके क्रियान्वयन में काफ़ी गड़बड़ियां सामने आईं. नतीजतन सिर्फ़ बारह शहरों में इक्कीस रेडियो चैनल ही अपना काम जारी रख पाए. प्रचार किया गया कि एफएम विस्तार के पहले चरण में निजी ऑपरेटरों को घाटा उठाना पड़ा है.
पहले चरण की नीतियां सही तरह से काम नहीं कर पाई तो सरकार ने लाइसेंस देने की प्रक्रिया में सुधार करने के नाम पर दूसरे चरण में कदम रखा. तब उद्धार के लिए पूंजीपतियों के संगठन फिक्की के अमित मित्रा की अगुवाई में रेडियो प्रसारण नीति कमेटी (रेडियो ब्राडकास्ट पॉलिसी कमेटी) बनाई गई. इस कमेटी ने उन्नीस विंदुओं पर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी. जिसकी निजी संगठनों ने काफ़ी तारीफ़ की. दो हज़ार पांच में इस कमेटी की रिपोर्ट को लागू करने के बाद रेडियो स्टेशन स्थापित करने की कीमत में काफ़ी कमी आ गई. परिणामस्वरूप रेडियो निजीकरण के दूसरे चरण में इक्यानबे शहरों में तीन सौ सैंतीस स्टेशनों की नीलामी की गई. यह नीलामी जनवरी दो हज़ार छह में पूरी हुई. इस तरह जून दो हज़ार नौ में इक्यानबे शहरों से दो सौ अड़तालीस रेडियो स्टेशन काम करने लगे थे. आख़िरकार तीसरे चरण में एफएम रेडियो में ख़बर परोसने की भी अनुमति निजी हाथों को दे दी गई है.
सूचना और प्रसारण मंत्रालय की तरफ़ से जैसे ही रेडियो के निजीकरण के तीसरे चरण की घोषणा की. कॉरपोरेट के प्रवक्ता फूले नहीं समाए उन्होंने सरकारी फ़ैसले को जायज़ ठहराने की हरसंभव कोशिश की. जनता की तरफ़ से कोई प्रतिरोध देखने को नहीं मिला इसलिए कॉरपोरेट मांग करने लगे कि उन्हें मुनाफ़ा कमाने की अंतहीन आज़ादी चाहिए. सरकार भले ही इस मामले में जनता का मूड भांपने के लिए धीरे-धीरे अपने पत्ते खोल रही हो लेकिन अति उत्साहित कॉरपोरेट सबकुछ एक साथ पा लेना चाह रहे हैं. उनकी मांग है कि सरकार उन्हें ख़बर प्रसारित करने का पूर्ण अधिकार दे. फिलहाल समाचार प्रसारित करने पर सरकारी भौंपू आकाशवाणी का एकाधिकार है. अब निजी एफएम चैनल आकाशवाणी के बुलेटिनों में बिना छेड़छाड़ किए उन्हें प्रसारित कर पाएंगे. इसके अलावा गैर समाचारों की श्रेणी में खेल से जुड़ी सूचनाएं, यातायात, मौसम, करियर काउंसिलिंग, एडमिशन, महोत्सव और सांस्कृतिक ख़बरों को प्रसारित करने की भी अनुमति होगी. आकाशवाणी कई एजेंसियों से ख़बर लेती है लेकिन सरकार ने निजी चैनलों को अभी एजेंसियों से सीधे ख़बरें लेने की अनुमति नहीं दी है. ऐसा लगता है कि जानबूझकर इस तरह की ढील-ढाली व्यवस्था बनाई गई है ताकि जल्द ही रेडियो समाचारों को पूरी तरह निजी हाथों में सौंपा जा सके. सूचना और प्रसारण मंत्रालय मान भी चुका है कि आने वाले दिनों में इसकी इजाज़त दी जा सकती है. मतलब साफ़ है कि आने वाले दिनों में निजी टेलीविजन न्यूज चैनलों ने जिस तरह का अराजक माहौल बना रखा है वैसा ही माहौल रेडियो समाचारों के क्षेत्र में भी दिख सकता है.
टू जी स्पेट्रम घोटाला अभी पुराना नहीं हुआ है. उसमें बरखा जैसे कई स्वनामधन्य पत्रकारों की भूमिका अब छुपी नहीं रही. कॉरपोरेट, मीडिया और राजनेताओं का गठजोड़ किस तरह जनता को बेवकूफ़ बनाता है इसका एक बड़ा उदाहरण मिल चुका है. इस घोटाले को याद रख सरकार अब नए रेडियो चैनलों के लिए थ्री जी स्पेक्ट्रम की जो नीलामी में ई-ऑक्शन का तरीक़ा अपनाने जा रही है यानी लाइसेंस की नीलामी इंटरनेट के माध्यम से होगी. ऐसा कदम उठाकर सरकार यह दिखाना चाह रही है कि जिस तरह टू जी स्पेट्रम की नीलामी में कुछ प्रभावशाली लोगों ने धनबल-बाहुबल के आधार पर स्प्रेक्ट्रम हथिया लिए थे वैसा थ्री जी स्पेक्ट्रम की नीलामी में न होने पाए. कोई गड़बड़ी न हो इसके लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय विशेषज्ञों की एक समिति बनाने जा रहा है. लेकिन धंधे की बारीकियों पर नज़र रखने वाले जानते हैं कि कॉरपोरेट का काम बिना अपराध के चल ही नहीं सकता इसलिए उनके लिए चोर दरवाजे भी कभी बंद नहीं हो सकते. सरकार के मुताबिक़ नीलामी की यह प्रक्रिया इस वित्तीय वर्ष के अंत तक ख़त्म हो जाएगी और इस प्रक्रिया को पूरा होने में तीन साल लगेंगे. अब अगर कोई यह मानता है कि इस मामले में नीरा राडिया जैसे लाबिइंग के उस्ताद चुप बैठे रहेंगे तो यह उनकी सदइच्छा है.
फिलहाल हिंदुस्तान में छत्तीस रेडियो ऑपरेटर ही हैं. इनका सालाना व्यवसाय एक हज़ार दो सौ करोड़ का है. अनुमान लगाया जा रहा है कि नई नीति लागू हो जाने के बाद इसमें तीन साल के भीतर तिगुना उछाल आ जाएगा. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि रेडियो में निवेश करने वाले ज़्यादातर कॉरपोरेट घराने वही हैं जिनका पहले से ही मीडिया से जुड़े दूसरे कारोबारों में पैसा लगा है. टाइस्म ऑफ़ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स और मिड डे जैसे कई बड़े मीडिया घरानों का पैसा एफएम रेडियो में लगा है. टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने निजी रेडियो में घुसपैठ के लिए इंटरटेनमेंट नेटवर्क इंडिया लिमिटेड (आईएनआईएल) बनाया है. यह कंपनी देशभर में रेडियो मिर्ची नाम से एफएम रेडियो चैनल चलाती है. दो हज़ार में पहले चरण की लाइसेंसिंग नीलामी में इस कंपनी ने सबसे ज़्यादा फ्रीक्वेंसी झटक ली थी. दो हज़ार छह में इसने पच्चीस फ्रीक्वेंसीज हासिल कर ली थी और फिलहाल तैंतीस शहरों में इसके रेडियो चैनल चल रहे हैं. क्रॉस मीडिया होल्डिंग कैसे देश के जनमत को एक ही दिशा में मोड़ने का का काम करती है इसका एक छोटा सा नमूना यह है कि बारह जुलाई को टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप के अख़बार इकोनोमिक टाइम्स ने एफएम रेडियो के तीसरे दौर की लाइसेंसिंग के बारे में राजेश नायडु की एक रिपोर्ट छापी. पूरी रिपोर्ट में अपने ही रेडियो चैनल रेडियो मिर्ची की तारीफ़ की गई है और भविष्य में टाइम्स ऑफ़ इंडिया की तरह ही रेडियो के क्षेत्र में उसके छा जाने की छुपी हुई घोषणा है. एफएम रेडियो के क्षेत्र में आने वाले छोटे निवेशकों के प्रति इस ग्रुप का क्या ख़्याल है उसे लेखक की इन पंक्तियों से समझा जा सकता है.‘घाटे में रहने वाले रेडियो मालिक अपनी फ्रीक्वेंसीज को बेचकर बाहर हो जाएंगे, जबकि मजबूत और मुनाफ़े में रहने वाले खिलाड़ी इन फ्रीक्वेंसीज पर कब्ज़ा कर लेंगे. बड़े प्लेयर द्वारा छोटे प्लेयरों का यह कब्ज़ा श्रोताओं का विस्तार करेगा और बड़े खिलाड़ियों की विज्ञापनों में हिस्सेदारी को बढ़ाएगा.’ इससे साफ़ समझा जा सकता है कि आने वाले दिनों में इस क्षेत्र में कैसा ऑनरशिप पैटर्न देखने में आएगा. टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अलावा कई और बड़े मीडिया और कॉरपोरेट हाउस अब थ्री जी स्पेक्ट्रम हथियाने मे लगे हैं. इस सिलसिले में उद्योगपति अनिल अंबानी के बिग एफएम जैसे और भी कई उदाहरण हैं.
ऐसा नहीं है कि सरकार एकाधिकार और क्रॉसमीडिया होल्डिंग के ख़तरों से अनजान है इसलिए उसने दिखावे के लिए कुछ प्रावधान बनाए हैं. लेकिन ये प्रावधान इतने सतही हैं कि इनके होने न होने से बहुत फ़र्क नहीं पड़ता. सूचना और प्रसारण मंत्रालय का कहना है कि तीसरे चरण में राष्ट्रीय स्तर पर एक कंपनी को कुल चैनलों में से सिर्फ़ पंद्रह फ़ीसदी चैनल ही रखने का अधिकार होगा. यह शर्त पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर के चैनलों पर लागू नहीं होगी. कल्पना की जा सकती है कि भारत जैसे विशाल देश में अगर पंद्रह फ़ीसदी रेडियो प्रसारण पर एक ही रेडियो कंपनी का अधिकार होगा तो वह अपने आप में कितना ताक़तवर हो जाएगी. पहले किसी कंपनी को एक शहर में एक चैनल से ज्यादा में स्वामित्व रखने का अधिकार नहीं था. लेकिन अब एक कंपनी को एक शहर में एक से ज़्यादा चैनल रखने की अनुमति होगी लेकिन उसे इलाक़े के सभी चैनलों के मालिकाने के चालीस फ़ीसदी से ज़्यादा रखने का अधिकार नहीं होगा. यह फ़ैसला एक तरह से खुले आम एकाधिकार का समर्थन करने वाला है. नई नीति के मुताबिक़ पहले के दस सालों के मुक़ाबले अब पंद्रह साल के लिए लाइसेंस दिए जाएंगे.
देश में जनपक्षीय रेडियो की स्थापना के लिए उसके आर्थिक पक्ष के साथ तकनीकी और सामाजिक पक्ष को जोड़कर देखना भी ज़रूरी है. भारत में मुख्यतया दो तरह से रेडियो प्रसारण होता है. पुराना और परंपरागत तरीक़ा एमएम (एम्प्लीफ़ाइड मॉड्यूलेशन) का है. जिसमें शॉर्ट वेव और मीडियम वेव पर प्रसारण होता है. पहुंच के मामले में यह देश के निन्यानबे फ़ीसदी आबादी और नब्बे फ़ीसदी भूभाग को कवर करता है. जब कि एफएम (फ्रीक्वेंसी मॉड्यूलेशन) फिलहाल चालीस फ़ीसदी आबादी और पच्चीस फ़ीसदी भूभाग को कवर करता है. एफएम रेडियो का संचालन हमारे देश में मुख्यतौर पर दो तरह से हो रहा है पहला है व्यावसायिक एफएम रेडियो चैनलों का प्रसारण और दूसरा कम्युनिटी रेडियो चैनलों का प्रसारण. इन दोनों के बीच मुख्य फ़र्क यही है कि पहले का मक़सद जहां विशुद्ध तौर पर मुनाफ़ा कमाना है वहीं कम्युनिटी रेडियो का मक़सद क्षेत्रीय समुदाय के हितों के अनुरूप काम करना है. लेकिन कम्युनिटी रेडियो को हमारे यहां ज़्यादा अधिकार नहीं हैं. इसके साथ ही इसका दायरा भी एफएम रेडियो की तुलना में सीमित है. एफएम रेडियो की पहुंच आम तौर पर साठ से सौ किलोमीटर के बीच होती है, जबकि कम्युनिटी रेडियो का दायरा एफएम के विपरीत पांच-दस किलोमीटर होता है.
रेडियो प्रसारण के क्षेत्र में हुए तकनीकी विकास का फ़ायदा देश के नागरिकों को मिले इसके लिए सबसे बेहतर स्थिति यही होती कि देश का पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग सिस्टम मजबूत होता लेकिन सरकार ऐसा बिल्कुल नहीं चाहती. इसलिए रेडियो के निजीकरण का कदम उठाया जा रहा है. ऐसे हालात में यह ज़रूरी हो जाता है कि पूंजीवादी लोकतंत्र के हिसाब से ही सही, कुछ नियम-कायदों का पालन किया जाए. बड़े-बड़े पूंजीपतियों को देशभर के शहरों में रेडियो चैनल स्थापित करने की इजाज़त विविधता को तो ख़त्म करेगी ही यह छोटे-छोटे रेडियो चैनलों को भी नहीं पनपने देगी. लाइसेंस की बड़ी क़ीमतों की वजह से इसमें छोटे निवेशकों के लिए कोई जगह नहीं बचेगी. बेहतर यह होता कि सरकार स्थानीय तौर पर लाइसेंस का बंटवारा करती और किसी मीडिया घराने को एक से ज़्यादा चैनल खोलने की इजाज़त नहीं देती. इसका एक ख़तरनाक उदाहरण देश की जनता अख़बारों के अनगिनत क्षेत्रीय संस्करणों के रूप में देख चुकी है जहां बड़ी पूंजी वाले अख़बारों के क्षेत्रीय संस्करण स्थानीय संस्कृति का प्रतिनिधत्व करने वाले कई अख़बारों को निगल चुके हैं. एफएम रेडियो के मामले में सरकार पर इसी नीति को न दोहराने का दबाव होना चाहिए. सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि निजी रेडियो में समाचार प्रसारित करने की इजाज़त दे भी दी जाए तो सरकार समाचारों को सिर्फ़ उत्पाद समझकर उनका धंधा न करवाए. वरना उसके लोकतंत्र का तथाकथित चौथा स्तंभ यहां भी सिर्फ मुनाफ़े का ही हिसाब लगाता दिखेगा.
(समयांतर के अगस्त अंक में प्रकाशित)