Tuesday, May 14, 2013

पैसे का लोकतंत्र और पैसे की ख़बरें

भूपेन सिंह
केंद्र की यूपीए सरकार पेड न्यूज़ छापने वाले मीडिया संस्थानों के ख़िलाफ़ कोई कदम उठाने के मामले में तो पहले ही हाथ खड़े कर चुकी है, अब वह चुनावों के दौरान पैसा देकर ख़बर छपवाने वाले नेताओं को बचाने के लिए भी खुलकर सामने आ गई है. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पेश एक हलफनामे में कहा है कि चुनाव आयोग को किसी जन प्रतिनिधि को उसके चुनावी ख़र्चे के आधार पर अयोग्य घोषित करने का अधिकार नहीं है. वह चुनाव के दौरान ख़र्च के फ़र्जी कागजात पेश करने को भी इतना संगीन नहीं मानती कि इस आधार पर किसी नेता का पद छीन लिया जाए. सरकार ने महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेसी नेता अशोक चह्वाण के केस में एक ऐसा ही हलफ़नामा सुप्रीम कोर्ट को दिया है. अशोक चह्वाण 2009 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान पेड न्यूज़ मामले में बुरी तरह फंसे हैं. बचाव का कोई रास्ता न देख उन्होंने किसी जनप्रतिनिधि की सदस्यता को ख़ारिज करने संबंधी चुनाव आयोग के अधिकार को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. सरकारी हलफनामे से ज़ाहिर होता है कि वह चह्वाण को बचाने के लिए अब तक प्रचलित न्यूनतम संवैधानिक व्यवस्था को भी पलटने की पूरी तैयारी में है. सरकार का कहना है कि चुनाव आयोग तभी किसी उम्मीदवार को अयोग्य घोषित कर सकता  है जब वह अपने चुनाव ख़र्च के कागजात दिखाने में नाकाम हो, उन कागजात के सही या ग़लत होने पर आयोग कुछ नहीं कर सकता.

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की तरफ़ से इस मामले में कोई फैसला नहीं आया है लेकिन सरकार की तरफ़ से ऐसा हलफ़नामा देना इस बात की पोल खोल देता है कि वह पेड न्यूज़ मामले में कितनी गंभीर है. पेड न्यूज़ मामले में चुनाव आयोग उत्तर प्रदेश के बिसौली की विधायक उमलेश यादव को चुनाव ख़र्च के फ़र्जी दस्तावेज़ दिखाने और पेड न्यूज़ छापने के मामले में दोषी करार देकर तीन साल के लिए उनकी सदस्यता निरस्त कर चुका है. उनके अलावा झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कौड़ा, मध्य प्रदेश में बीजेपी के मंत्री नरोत्तम मिश्रा और अशोक चह्वाण को भी आयोग की तरफ़ से पेड न्यूज़ के मामले में नोटिस दिया गया है और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की प्रक्रिया जारी है. उमलेश यादव वाले मामले ने बाक़ी के आरोपी नेताओं को भी डरा रखा है इसलिए सत्ताधारी पार्टी ने अपने नेता अशोक चह्वाण को बचाने के लिए कमर कस ली है. अशोक चह्वाण पर पेड न्यूज़ के अलावा भी भ्रष्टाचार के कई मामले दर्ज हैं. मुंबई के कुख्यात आदर्श सोसायटी घोटाले में भी उनका नाम शामिल है, जिस वजह से 2010 में उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी थी. आदर्श सोसायटी को युद्ध में मारे गए सैनिकों की पत्नियों के लिए बनाया गया था लेकिन कई नेताओं और नौकरशाहों ने उन फ्लैट की आपस में ही बंदरबांट कर ली थी. अशोक चह्वाण ने भी अपने तीन रिश्तेदारों को उस बिल्डिंग में फ्लैट दिलवाए थे. इस मामले में पुख़्ता सबूत होने की वजह से आख़िरकार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाना पड़ा था. वैसे अशोक चह्वाण कांग्रेस के दुलारे हैं, तमाम आरोपों के बावजूद अब भी वे पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं. कांग्रेस की नेतागिरी से उनका पुराना नाता है, उनके पिता शंकरराव चह्वाण भी कभी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. इस लिहाज़ से देखा जाए तो परिवारवाद से घिरी कांग्रेस में इस खानदान की जडें काफ़ी गहरी हैं.

अशोक चह्वाण दो हज़ार आठ में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने थे. 13 अक्टूबर 2009 को हुआ महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव उन्हीं की अगुवाई में लड़ा गया. तब, चह्वाण महाऱाष्ट्र के नांदेड़ ज़िले की भोखर सीट से चुनाव जीते थे. उन्होंने अपने चुनाव अभियान में सिर्फ़ सात लाख रुपए का ख़र्च दिखाया. रिप्रेजेंटेशन ऑफ़ पीपल एक्ट, 1951 की धारा 77 के अनुसार एक प्रत्याशी प्रचार के दौरान दस लाख रुपए तक ख़र्च कर सकता है. चह्वाण ने चुनावों के दौरान पानी की तरह पैसा बहाया लेकिन चुनावा आयोग के सामने ख़र्च के फ़र्जी दस्तावेज़ पेश किए. द हिंदू के मशहूर पत्रकार पी साइनाथ ने अशोक चह्वाण के झूठ की पोल खोलते हुए उन्हें चुनाव अभियान के लिए निर्धारित राशि से कई गुना ज़्यादा पैसा ख़र्च करने और अवैध पेड न्यूज़ छपवाने का ज़िम्मेदार ठहराया. दरअसल महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान वहां के प्रमुख अख़बारों ने प्रत्याशियों की ख़बर छापने के लिए अपने रेट तय कर लिए थे. जो प्रत्याशी पैसा चुका रहा था उसी  की ख़बरें छापी जा रही था बाक़ी की ख़बरों को अख़बार कोई अहमियत नहीं दे रहे थे. उस दौरान सबसे बड़ी हलचल अशोक चह्वाण की एक ख़बर ने पैदा की थी. जिसके बाद पेड न्यूज़ के बारे में कोई शक बाक़ी नहीं रह गया. चह्वाण की महानता के बारे में महाराष्ट्र के तीन बड़े अख़बारों-महाराष्ट्र टाइम्स (टाइम्स ग्रुप), लोकमत और पुढारी में एक ख़बर छपी. युवा गतिमान नेतृत्व नाम से छपी इस ख़बर की सभी पंक्तियां शब्दश: एक जैसी थी. पुढारी में यह ख़बर सात अक्टुबर 2009 को छपी तो बाक़ी दो अख़बारों में 10 तारीख़ को. बाद में प्रेस परिषद की सब कमेटी की पेड न्यूज़ पर तैयार रिपोर्ट में परंजॉय गुहा ठकुरता और के श्रीनिवास रेड्डी की रिपोर्ट ने इसे सीधे-सीधे पेड न्यूज़ का मामला करार दिया. यह तो पेड न्यूज़ का एक छोटा सा उदाहरण था वरना ऐसी ख़बरों की उस दौरान महाराष्ट्र के अख़बारों में भरमार थी. पेड न्यूज़ के इस मामले ने भारतीय समाचार माध्यमों की निष्पक्षता और पत्रकारीय उसूलों पर कई सवाल उठाए. मुनाफ़े की होड़ में जुटे मीडिया घरानों की असलियत भी इस घटना से सामने आई.

पेड़ न्यूज़ के मामले में अख़बारों और पैसे वाले प्रत्याशियों का गठजोड़ नज़र आने के बाद, पी साइनाथ ने अशोक चह्वाण के चुनाव अभियान पर कड़ी नज़र रखी और पाया कि उन्होंने पेड न्यूज़ के अलावा भी चुनाव के दौरान बेहिसाब पैसा ख़र्च किया. साईसाथ ने 29 नवंबर 2009 को अपने अख़बार में इज द ईरा ऑफ़ अशोक अ न्यू ईरा  ऑफ़ न्यूज (क्या अशोक चह्वाण का दौर ख़बरों का नया दौर  है?) शीर्षक से एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने आंकड़ों के साथ बताया कि चह्वाण ने चुनाव आयोग को दिए अपने हिसाब में समाचार पत्रों में अपने विज्ञापन का ख़र्च सिर्फ़ पांच हज़ार तीन सौ उन्यासी रुपए दिखाया. लेकिन द हिंदू ने सैंतालीस पेज के रंगीन विज्ञापन इकट्ठा किए जिसमें अशोक चह्वाण के विज्ञापन छपे थे. यह सभी विज्ञापन महाराष्ट्र में सर्वाधिक प्रसार वाले दैनिकों में छपे थे. हिसाब लगाया जाए तो इनका ख़र्च ही करोड़ों रुपए में आएगा. इसके अलावा, चुनाव के दौरान फिल्मी दुनिया के फर्जी नायकों को वोट बटोरने के लिए इस्तेमाल करने का चलन भी अब काफ़ी बढ़ चुका है. कई नायकों ने तो इसे धंधा बना लिया है और वे सीजन में करोड़ों रुपया वसूलते हैं. अशोक चह्वाण भी अपने प्रचार में ऐसे नायकों का इस्तेमाल करने से नहीं चूके. उन्होंने अपने चुनाव क्षेत्र में मुंबइया फिल्मों के सलमान ख़ान जैसे सितारों को प्रचार में उतारा. यह बात जग ज़ाहिर है कि इस तरह के किसी सेलिब्रिटी का शो आयोजित करने में लाखों-करोड़ों रुपए का ख़र्च आता है. लेकिन अशोक चह्वाण इस बात से साफ़ मुकर जाते हैं. पी साइनाथ ने 10 नवंबर दो हज़ार दस को द हिंदू में लो कॉस्ट, हाई सेलिब्रिटी (कम क़ीमत में मंहगे सितारे) नाम से एक और लेख लिखा. जिसमें अशोक चह्वाण के चुनावी ख़र्च पर कई सवाल उठाए गए. चह्वाण ने पूरे चुनाव के दौरान जो सात लाख रुपए का कुल ख़र्च दिखाया था, उसमें बाक़ी ख़र्चों के अलावा सलमान ख़ान की दो रैलियां भी शामिल थीं. पहली रैली का ख़र्चा सिर्फ़ चार हज़ार चार सौ चालीस और दूसरी का चार हज़ार तीन सौ रुपया दिखाया गया. दोनों रैलियों में से प्रत्येक में डेढ़ हज़ार रुपया लाउड स्पीकर में ख़र्च दिखाया गया और रैली की जगह का किराया सिर्फ़ पांच सौ रुपया. पंडाल की कीमत दो सौ रुपया और मंच पर लगे सोफ़ा के लिए भी दो सौ रुपए का ख़र्च दिखाया गया. इस सफ़ेद झूठ पर चह्वाण अब तक क़ायम हैं. माना की सलमान, चह्वाण से अपने संबंधों की वजह से उनके प्रचार में आए लेकिन क्या मुंबई से चह्वाण के चुनाव क्षेत्र तक भी वह अपने ही ख़र्च पर आए थे? क्या उनके रहने खाने-पीने में भी कोई ख़र्च नहीं हुआ?  सबसे बड़ी बात कि एक मशहूर मुंबइया अभिनेता की एक रैली में सिर्फ़ चार-पांच हज़ार रुपए ख़र्च!  सितारे की रैली के लिए प्रचार में क्या कोई पैसा ख़र्च नहीं हुआ? ख़ैर, इस तरह के अनगिनत सवाल हो सकते हैं. जिसका जवाब कोई भी सामान्य बुद्धि वाला आदमी भी दे सकता है लेकिन लोकतंत्र की रक्षक सरकारों को यह नज़र नहीं आता है.

उपरोक्त बातों से पता चलता है कि देश में संसद और विधानसभाओं में पहुंचने के लिए कितना पैसा ख़र्च होता है. इससे हमारे लोकतंत्र के फरेब की भी एक झलक मिलती है. कहने भर के लिए यहां देश का कोई भी नागरिक चुनाव लड़ सकता है और विधायक, सांसद, मंत्री राष्ट्रपति कुछ भी बन सकता है. लेकिन हक़ीकत देखी जाए तो साफ़ हो जाता है भारत में मुख्यधारा की संसदीय राजनीति सिर्फ़ पैसे वालों के लिए आरक्षित है. एक सरकारी रिपोर्ट (अर्जुनसेन गुप्ता कमेटी) के मुताबिक़ जिस देश के क़रीब पिचहत्तर फ़ीसदी लोग प्रति दिन बीस रुपए से भी कम कमा रहे हों, क्या वे भी कभी चुनाव लड़ने के बारे में  सोच सकते हैं? क्या उनके भी कोई लोकतांत्रिक अधिकार हैं? कुल मिलाकर चुनाव की प्रक्रिया ही ऐसी है कि जिसमें ग़रीब लोगों के लिए कोई ज़गह नहीं है. जो भी व्यक्ति चुनाव लड़ना चाहता है उसे एक निश्चित धनराशि के जमानत के नाम पर चुनाव अधिकारी के पास जमा करानी होती है. विधानसभाओं के लिए यह राशि दस हज़ार रुपए है और संसद के लिए पच्चीस हज़ार. क्या पिचहत्तर फ़ीसदी देश की ग़रीब आबादी चुनाव में इतना पैसा चुनाव लड़ने पर ख़र्च करना बर्दाश्त कर सकती है?  माना वह किसी तरह यह रक़म इकट्ठा कर भी ले, तो क्या अरबों-ख़बरों और अवैध धन वालों के सामने ग़रीब लोग चुनाव जीत सकते हैं? इन अर्थों में देखा जाए तो यह चुनावी खेल सिर्फ़ पैसे वालों का है और संसदीय मुख्यधारा की सभी पार्टियां इस झूठे खेल में गले-गले तक डूबी हैं. उनकी पार्टी के पास अरबों-खरबों रुपया कहां से आता है, इसका हिसाब देने के लिए वे तैयार नहीं. इतना बड़ा गोलमाल कर अगर कोई पार्टी नैतिकता, ईमानदारी या देशभक्ति की बात करे तो इससे बड़ा झूठ और क्या हो सकता है? ऐसे में अगर धन-पिपाशु और आपराधिक मुकदमों में फंसे लोग अवैध धन के बल पर विधानसभाओं और संसद में पहुंचते हैं तो वे बहुसंख्यक ग़रीब जनता के हित में खाक नीतियां बनाएंगे!

वैसे तो चुनाव आयोग की प्रक्रिया ही अपने आप में ग़रीबों को हाशिये पर ढकेलने वाली है. लेकिन इसने जितनी भी स्वतंत्रता और अधिकार हासिल किए थे उसे भी अब नए दौर का निजाम बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं है. जहां-जहां उसे लगता है कि पैसे वाले प्रभावशाली लोगों के अधिकारों पर चोट हो रही है वह पूरी बेशर्मी से ग़लत को सही ठहराने में जुट जाता है. चुनाव आयोग और प्रेस परिषद जैसी संस्थाओं की सीमाएं यहां  अपने-आप साबित हो जाती हैं. चुनाव आयोग कुछ कहता रहे, प्रेस परिषद अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू कितना ही निष्पक्ष दिखने की कोशिश करें, लोकसभा-राज्यसभा में पेड न्यूज पर चर्चा हो जाए, होगा वही जो पूंजी के गुलाम नेता चाहेंगे. पेड न्यूज़ पर बहस के दौरान कई बार कुछ बुद्धिजीवी मित्र इस तरह बात करते हैं, जैसे मीडिया राजनीतिक पार्टियों और नेताओं को ब्लैकमेल कर रहा है. जबकि बात इतनी सरल और आसान नहीं है. सरकार ने निजी कंपनियों के मीडिया यानी मुनाफ़ाखोरों को इतनी छूट दी है कि उनके सारे हित पूंजीवादी आर्थिक नीतियों को सही साबित करने में ही जुड़े हैं. इऩ अर्थो में देखा जाए तो पैसे वाली पार्टियों और पैसे वाले मीडिया के हित एक हैं. पेड न्यूज़ के लिए निजी मीडिया मालिक और निजीकरण की वकालत करने वाली पार्टियां समान रूप से ज़िम्मेदार हैं और दोनों इसका इस्तेमाल कर फायदे में रहते हैं. सार्वजनिक तौर पर मुनाफ़ाखोर मीडिया और कांग्रेस-बीजेपी जैसी पार्टियों से जुड़े लोग पेड न्यूज़ की कितनी ही आलोचना क्यों न करें, इस विकृति से तब तक बचना मुश्किल है जब तक मीडिया मालिकों को प्रेस की स्वतंत्रता के नाम पर मुनाफ़ा कमाने की स्वतंत्रता मिलती रहेगी और पैसे वाले लोग लोकतंत्र के नाम पर विधानसभाओं और संसद में पहुंचते रहेंगे. अशोक चह्वाण वाले मामले में सरकार की बेशर्मी को भी इन्हीं संदर्भों में समझना ज़रूरी है.

मीडिया, राष्ट्रीयता और पूंजीवाद

भूपेन सिंह
दो हज़ार तेरह के साल की शुरुआत में आठ जनवरी को जम्मू-कश्मीर में भारत-पाक सीमा पर दो भारतीय जवान मारे गए थे. भारतीय सेना ने कहा कि पाकिस्तानी सेना ने नियंत्रण रेखा पार कर उस पर हमले किए और दो सैनिकों को मार डाला. भारतीय टेलीविजन पर तुरंत यह ख़बर छा गई और देश की सबसे बड़ी ख़बर बन गई. चैनलों की देशभक्ति उबाल खाने लगी और पूरे देश में युद्धोन्माद का माहौल बन गया. टेलीविजन चैनलों के स्टूडियो में दुनियाभर की हथियार कंपनियों के लिए सलाहकार का काम करने वाले सेना के कई पूर्व जनरल और रक्षा विशेषज्ञ उछल-उछलकर पाकिस्तान पर हमला बोलने की वकालत करने लगे.  
टाइम्स नाव चैनल का अर्णव गोस्वामी इस मामले मे सबका गुरु साबित हुआ. बाक़ी चैनल भी चीख-चीखकर यह बताना नहीं भूले की मारे गए सैनिकों में से एक का गला काटा गया है. कई ने तो तथ्यों से छेड़छाड़ करते हुए यह भी बताया कि पाकिस्तान ने निर्ममता से दो भारतीय सैनिकों का गला काट दिया है. जबकि पाकिस्तान ने इस घटना में हाथ होने से सीधे मना कर दिया और पूरी घटना की जांच संयुक्त राष्ट्र जैसी स्वतंत्र ऐजेंसी सी कराने की मांग की. इस घटना के ठीक दो दिन पहले पाकिस्तान ने भी भारतीय सेना पर आरोप लगाया था कि उसने नियंत्रण रेखा के पार घुसकर सैनिक चौकी में हमला किया और एक पाकिस्तानी सैनिक की हत्या कर दी. भारतीय सेना ने यह कबूल किया कि दोनों ओर से गोलीबारी हुई थी लेकिन उसक सैनिकों ने सीमा पार नहीं की. पूंजी और सत्ता के गुलाम दोनों देशों के मीडिया ने दूसरे पक्ष की बातों को अहमियत नहीं दी और तथ्यों की अनदेखी करते हुए एक-दूसरे के ख़िलाफ़ ज़हर उगलते रहा.
मुख्यधारा के मीडिया ने इस तरह का माहौल बनाया कि दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद की प्रवक्ता भारतीय जनता पार्टी और सहयोगी संगठनों समेत पूंजीपतियों के साथ मिलकर समाजवाद की कल्पना करने वाली समाजवादी पार्टी ने भी तुरंत पाकिस्तान को सबक सिखाने की मांग कर डाली. भारत में होने वाली हॉकी लीग में खेलने आए पाकिस्तानी खिलाड़ियों के ख़िलाफ प्रदर्शन हुए और उन्हें बिना मैच खेले ही वापस जाना पड़ा. कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों को भी इसी तरह की स्थितियों का सामना किया. पाकिस्तान की मशहूर रंगकर्मी मदीहा गौहर के ग्रुप अजोका को भी इसका शिकार होना पड़ा. उन्हें राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की तरफ से भारत रंग महोत्सव में सहादत हसन मंटो पर केंद्रित नाटक कौन है ये गुस्ताख़ खेलने के लिए दिल्ली आमंत्रित किया गया था. लेकिन सीमा पर तनाव को लेकर मीडिया कवरेज का ही असर था कि ऐन वक़्त पर उनके नाटक को मंचन की इजाज़त देने से मना कर दिया गया. 
यह बात और है कि कुछ प्रगतिशील युवाओं की पहलकदमी पर उसी दिन नाटक का मंचन दिल्ली में दो जगहों पर किया गया. पहला मंचन शाम को केंद्रीय दिल्ली के अक्षरा थियेटर में हुआ और दूसरा शो रात ग्यारह बजे से जेएनयू में हुआ. दोनों जगह ऑडिटोरियम में तिल रखने की भी जगह नही बची थी. युद्धोन्माद भड़काने वाले मीडिया, ख़ास तौर पर टेलीविजन मीडिया को जनता के बीच इस तरह की युद्ध विरोधी सांस्कृतिक एकता की बारीक़ियां नज़र नहीं आई.
उपरोक्त घटना मीडिया और राष्ट्रवाद के रिश्तों की भारतीय परिप्रेक्ष्य में नए सिरे से पड़ताल करने की मांग करती है. वहीं इससे यह भी सवाल उठता है कि आख़िर मीडिया और राष्ट्रवाद के जटिल रिश्तों के पीछे किस तरह का राजनीतिक अर्थशास्त्र और दर्शन काम करता है? इतना तो तय है कि अगर भारत में निजी मीडिया का इतना विस्तार नहीं हुआ होता तो कुछ ही दिन के भीतर पूरा देश युद्दोन्माद की चपेट में नहीं आता. इसका पुख्ता प्रमाण यह भी है कि हाल के वर्षों में भारत-पाक सीमा पर गोलीबारी की घटनाओं में बड़े पैमाने पर गिरावट आयी है. लेकिन निजी मीडिया का उभार छोटी-छोटी झड़पों को भी राष्ट्रीयता की चासनी में पेश कर राष्ट्रवाद भड़काने से नहीं चूकता. इस बार भी मीडिया ने जनता के बीच युद्धोन्माद का एजेंडा सेट कर दिया और अमनपसंद लोग देखते रहे गए. चिंता की बात यह है कि आज भी कुछ कट्टर मार्क्सवादी मीडिया की अहमियत को अच्छी तरह नहीं स्वीकारते और सिर्फ क्रांति में ही जनवादी मीडिया की संभावना को तलाशते हैं.
भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी कभी मीडिया से जुड़े कामों (जनमत निर्माण) को अपने प्रमुख कार्यभारों में शामिल नहीं किया. दरअसल इस दृष्टि का मूल, बेस और सुपरस्ट्रक्चर की रूढ़ हो चुकी मार्क्सवादी बहस में टिका है जो यह मानती है कि उत्पादन संबंधों में आए बदलाव या क्रांति के बाद मीडिया और संस्कृति से जुड़े सुपरस्ट्रक्चरल स्थितियां भी अपने आप बदल जाएंगी. क्रांति से पहले सुपर स्ट्रक्चर के मुद्दों को ज़्यादा अहमियत न देने के कारण ही मीडिया और संस्कृति के मुद्दे अक्सर बदलाव की लड़ाई के मुख्य कार्यभारों में शामिल नहीं हो पाते हैं. 
इटली के मार्क्सवादी विचारक अंतोनियो ग्राम्शी ने सुपर स्ट्रक्चर के मुद्दों को पहली बार अच्छी तरह पहचाना और स्वीकार किया कि मार्क्सवाद के हिसाब से तो यूरोप में पूंजीवाद के विकास के साथ सामंतवादी संस्कृति का नाश हो जाना चाहिए था. लेकिन पूंजीवाद की तरफ़ क़दम बढ़ा चुके इटली में फासीवाद और मुसोलिनी के उद्भव ने उन्हें यह समझने में मदद की कि सांस्कृतिक मुद्दे भी बदलाव की लड़ाई के कितने अहम हिस्से बन जाते हैं. ग्राम्शी ने इस बात पर भी जोर दिया कि शासक वर्ग किस तरह सूचना, ज्ञान और संस्कृति के क्षेत्र में अपने महारथियों को उतारकर सांस्कृतिक वर्चस्व कायम करता है. 
इस सिलसिले में जर्मनी में हिटलर के सूचना मंत्री गोयबल्स का यह कथन दुनियाभर में जनपक्षीय बदलाव की चाह रखने वाले कभी नहीं भूल सकते कि कोई झूठ सौ बार दोहराने से सच की तरह लगने लगता है. हिटलर ने एक तरह के छद्म राष्ट्रवाद को उभारकर प्रोपेगेंडा के इस सूत्रवाक्य को यहूदियों, जिप्सियों और बाक़ी अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ चरम पर जाकर बर्बर तरीक़े से इस्तेमाल किया. इतिहास गवाह है कि हिटलर और मुसोलिनी ने राष्ट्रवाद और मीडिया का इस्तेमाल फासीवादी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए किस तरह किया. आज भी दुनियाभर में निजी या सरकारी नियंत्रण वाला मीडिया अपनी संरचनात्मक बाध्यता की वजह से हमेशा शासक वर्ग के हित पोषित करता है और राष्ट्रीयता के नाम पर निर्दोष लोगों को बरगलाता है. बड़ी पहुंच वाला स्वतंत्र और जनपक्षीय मीडिया न होने की वजह से वैकल्पिक विचार रखने वालों के पास ऐसा कोई उपाय नहीं होता कि वे राष्ट्रवाद के छद्म से बहुसंख्यक जनता  को आगाह कर पाएं.
वर्तमान भारतीय मीडिया की संचरना और उसकी कार्य पद्धति पर अगर नज़र दौड़ाई जाए तो वह भी उन्हीं विचारों और कामों को ज़्यादा उछालता है जिससे शासक वर्ग को फायदा पहुंचे. अपनी विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए वह कभी-कभी अपवाद स्वरूप जनपक्षीय मुद्दों को भी अहमियत देता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह जन पक्षधर है. मौक़ा मिलते ही वह आमूल बदलाव के आंदोलनों का मज़ाक उड़ाने से नहीं चूकता है. भारतीय संदर्भों में द हिंदू और जनसत्ता जैसे प्रगतिशील और वामपंथी रुझान के माने जाने वाले कॉरपोरेट अख़बार भी इसका अपवाद नहीं हैं. 
इन स्थितियों से यह तर्क उभरकर आता है कि क्रांतिकारी सामाजिक बदलाव चाहने वालों को मीडिया की अहमियत को भी समझना पड़ेगा. जनमत निर्माण तैयार करने की इसकी ताक़त के पूंजीवादी हाथों में केंद्रित होने पर यह बड़े बदलाव के हर रास्ते में रोड़े अटकाने का काम कर सकता है, करता है, इसलिए उन्हें उत्पादन संबंधों में बदलाव की लड़ाई लड़ने के साथ-साथ मीडिया जैसे सांस्कृतिक मोर्चे पर भी लड़ाई जारी रखनी पड़ेगी, वरना बदलाव की ताक़तों के लिए शोषित जनता को झूठी चेतना (फॉल्स कॉन्शियसनेस) से मुक्त करना मुश्किल से मुश्किल होता चला जाएगा. इसका मतलब यह नहीं कि मीडिया के बदलने से दुनिया भी बदल जाएगी इसलिए सारी लड़ाई मीडिया को बदलने में केंद्रित कर दी जाए. यहां पर इस उत्तर आधुनिक तर्क से सावधान रहने की ज़रूरत बनी रहेगी कि राजनीतिक अर्थशास्त्र की मौत हो चुकी है इसलिए मास मीडिया ही सामाजिक बदलाव का सबसे अहम औज़ार बन चुके हैं.
यह एक स्थापित तथ्य है कि पंद्रहवी शताब्दी में प्रिंटिंग प्रेस ने अस्तिव में आकर राष्ट्रीयता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. प्रिंटिंग तकनीक और पूंजीवाद के विकास ने हस्तलिखित सामग्री को मुद्रित कर मास प्रोडक्शन (बड़े पैमाने पर उत्पादन) करना शुरू कर दिया. जिस वजह से मुद्रित सामग्री ज़्यादा से ज़्यादा लोगों के बीच पहुंचने लगी. सूचनाओं और विचारों के प्रसार से लोगों की सामुदायिकता (साझी भावनाओं और सांस्कृतिक प्रतीकों) का विकास हुआ आधुनिक राष्ट्र की अवधारणा आकार ग्रहण कर मजबूत होने लगी. तब उत्पादन के नए साधन पूंजीपतियों के ही हाथ आ गए थे और वे अपने मुनाफ़े के लिए प्रिंटिग तकनीक का इस्तेमाल कर रहे थे. 
बेनेडिक्ट एंडरसन जैसे विद्वान ने अपनी किताब इमेजिन्ड कम्युनिटी में इस बात पर जोर देते  हुए प्रिंट कैपिटलिज्म की विस्तार से चर्चा की है. एंडरसन राष्ट्र को एक काल्पनिक समुदाय (इमेजिन्ड कम्युनिटी) से ज़्यादा कुछ नहीं मानते हैं. दरअसल राष्ट्र भाषा, संस्कृति और भौगोलिकता समरूपता के आधार पर अपनी एक अस्मिता का निर्माण करता है. लेकिन इस अस्मिता के निर्माण में हमेशा समाज के प्रभावशाली तबके अपनी भूमिका निभाते हैं. ग़रीब और वंचित लोगों के लिए किसी राष्ट्र का कोई मतलब नहीं होता. राष्ट्रीयता की अवधारणा आगे बढ़कर आधुनिक राष्ट्र राज्य के रूप में सामने आयी. आधुनिक राष्ट्र राज्यों का उदय सामंतवाद से पीछा छुड़ाकर हो रहा था. उसी दौरान राष्ट्र राज्य की सम्प्रभुता का दावा भी सामने आया और इसे एक तरह से सार्वभौमिक सत्य की तरह पेश करने की कोशिश शुरू हुई.
औद्योगीकरण और पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली कुछ राष्ट्रों को मज़बूत बना रही थी तो वहीं कच्चे माल के लिए दुनिया के ग़रीब इलाक़ों को वे अपना उपनिवेश भी बना रहे थे. इस तरह भारत समेत तीसरी दुनिया के कई उपनिवेशों में राष्ट्रीयता की भावना का विकास उपनिवेशवाद के दौर में हुआ और उपनिवेशवाद से लड़ने में राष्ट्रीय आज़ादी की लड़ाइयों ने एक अहम भूमिका निभाई. इस लिहाज़ से देखा जाए तो राष्ट्रीयता की लड़ाई एक हद तक आज भी साम्राज्यवाद और आर्थिक वैश्वीकरण के ख़िलाफ़ लड़ने में भूमिका निभा सकती है लेकिन इसकी प्रतिक्रिया अक्सर संकीर्ण राष्ट्रवाद का गुणगान करने में ही होती है. 
भारत जैसा राष्ट्र-राज्य, भाषा और संस्कृति के मामले में कई विविधताओं से भरा हुआ है इसलिए समाजशास्त्री यहां पर कई तरह की राष्ट्रीयताओं के अस्तित्व को स्वीकारते हैं. भारतीय मीडिया के समाज शास्त्र का अध्ययन करने वाले राबिन जैफ्री भारत के एक राष्ट्र के रूप में आकार ग्रहण करने या राष्ट्र निर्माण में मीडिया और पूंजीवाद के विकास की अहम भूमिका देखते हैं. अपनी किताब इंडियाज न्यूज़पेपर रिवोल्यूशन और मीडिया एंड मॉडर्निटी में वे इस बात का ज़िक्र विस्तार से करते हैं. पूरे भारतीय भूभाग में भाषाई विविधता के बावजूद किस तरह बाक़ी राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रतीक मीडिया की मदद से एक साझेपन का भाव पैदा करते हैं, इस बात का ज़िक्र उन्होंने किया है. वह यह भी पहचानने की कोशिश करते हैं कि किस तरह बड़ी पूंजी पर टिका मीडिया अपने हित में भारतीय राष्ट्रवाद का प्रवक्ता बनकर काम करता है. यहीं पर मीडिया के स्वार्थों का एक बिल्कुल स्पष्ट अंतरविरोध सामने आता है, एक तरफ तो कॉरपोरेट मीडिया युद्धोन्माद पर टिके दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद को हवा देता है लेकिन वहीं साम्राज्यवाद और बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगे समर्पण को वह राष्ट्र का विकास मानता है. देशभर के संसाधनों की लूट में जुटी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हमदर्द बनने की पीछे यह एक मुख्य कारण है.
नब्बे के दशक में जब से भारत ने नई आर्थिक नीतियों को अपनाकर पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के नए प्रयोग शुरू किए, भारतीय बाज़ार नए मीडिया उत्पादों से पट गए हैं. यह स्थिति लगातार देश में मध्यवर्ग का विस्तार कर रही है और इस भ्रम को जीवित रखे हुए है कि ट्रिकल डाउन थ्योरी काम कर रही है और एक दिन विकास का शहद रिस कर सबसे कमज़ोर और ग़रीब इंसान तक ज़रूर पहुंचेगा. मध्यवर्ग के लिए इससे सुविधाजनक तर्क और कुछ नहीं हो सकता. क्रय शक्ति बढ़ने के साथ उसकी इच्छाओं में भी अपार बृद्धि हुई है और बड़ी पूंजी पर टिका मीडिया उसमें उपभोग के नए-नए तरीक़े सुझा रहा है. 
यूरोप में इस तरह की स्थिति काफ़ी पहले ही आ चुकी थी जिसकी पहचान करते हुए जर्मनी में फ्रैंकफर्ट स्कूल के अडोर्नो और होर्खाइमर जैसे विद्वानों ने छह सात दशक पहले ही मीडिया के इस विकास को संस्कृति उद्योग का नाम दिया था. तब उन्होंने कहा था कि यह जनता के वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाकर एक झूठी चेतना का निर्माण करता है, उसके बीच एक झूठी ज़रूरतें पैदा करता है. आज के भारतीय मीडिया पर अगर नज़र डाली जाए तो यह साफ़ हो जाता है कि वह संस्कृति उद्योग के पूंजीवादी उद्देश्यों को पूरा  करने में जी-जान से जुटा है. उसके लिए सामाजिक सरोकारों या समता पर आधारित समाज का कोई मतलब नहीं है. वह समाजवादी आदर्शों का मज़ाक उड़ाने के साथ मीडिया मालिकों और पूंजीवादी राजसत्ता का गुणगान करता है.
संख्या के लिहाज़ से भारतीय मीडिया के सामने दुनिया को कोई देश नहीं टिकता है. दो हज़ार बारह तक देश में कुल 82,222 समाचार पत्र और 831 टेलीविजन चैनल पंजीकृत हो चुके थे. लेकिन पूंजी का केंद्रीकरण बढ़ने के साथ ही दुनियाभर के मीडिया में भी संकेंद्रण बढ़ रहा है. पूरी दुनिया के मीडिया को अगर टाइम वार्नर, न्यूज़ कॉरपोरेशन, डिज्नी, बर्तेल्स्मान, वायाकॉम, सोनी और विवेंडी इंटरनेशनल जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियां नियंत्रित कर रही है. भारतीय मीडिया में भी इन कंपनियों की उपस्थिति काफ़ी मजबूत है. 
भारतीय मीडिया को भी किसी न किसी विदेशी कंपनियों की मदद से देश की कुछ  गिनी-चुनी बड़ी कंपनियां नियंत्रित कर रही हैं. बेनेट एंड कोलमैन, टीवी 18, इंडिया टुडे समूह, सन समूह, जी टी.वी, मलयालम मनोरमा समूह, ए.बी.पी समूह, कस्तूरी एंड संस जैसी कंपनियां इनमें प्रमुख हैं. इन कंपनियों में बड़े पैमाने पर नेताओं और देश के उद्योगपतियों का भी पैसा लगा हुआ है. यह विशालकाय कंपनियां छोटी कंपनियों को बाज़ार में टिकने नहीं दे रही हैं जिससे देश में मीडिया के एकाधिकार का ख़तरा बढ़ता ही जा रहा है. 
यह बात बिल्कुल साफ़ है कि अगर मीडिया पर कुछ गिने-चुने पूंजीपतियों का ही अधिकार स्थापित हो जाएगा तो वह हर संभव जनता की परिवर्तनकामी चेतना को कुंद करने का काम करेंगे और मुनाफे के लिए युद्धोन्माद से लेकर भ्रष्ट्राचार का कोई भी हथकंडा अपनाने से नहीं चूकेंगे. ऐसे में विकल्प तलाशने वालों के लिए बड़ी पूंजी पर टिके इस मीडिया का मुकाबला करना कठिन होता जाएगा. वैसे भी वैकल्पिक पत्रकारिता करने वाले छोटा मीडिया पूंजीवादी मीडिया के सामने पूरे समंदर की एक बूंद जितनी जनसंख्या को भी प्रभावित करने में भी सक्षम नहीं है. मीडिया की ताकत और जनमत निर्माण में उसकी भूमिका को ध्यान में रखकर अगर वाम-लोकतांत्रिक ताक़तों ने जनता से संवाद करने के लिए अपना मीडिया तंत्र विकसित करने की कोशिश नहीं की तो उन्हें हाथिये में जाने से कोई रोक नहीं सकता.
प्रख्यात अमेरिकी विद्वान हर्मन और चोम्सकी कई साल पहले अपनी किताब मैन्युफैक्चरिंग कंसेंट: पॉलिटिकल इकोनॉमी ऑफ मास मीडिया में कह चुके हैं कि बड़ी पूंजी पर टिका मास मीडिया जनता में किस तरह झूठी सहमति या राय का निर्माण करता है. वह असली मुद्दों से ध्यान हटाकर पूंजीवादी नीतियों का प्रोपेगेंडा करता है. यहां तक कि अब यह भी कहा जाने लगा है कि पूंजीवादी मीडिया सहमति का ही निर्माण नहीं करता बल्कि वह असहमति का भी निर्माण करने लगा है. हाल के दौर में कई जनआंदोलनों को पूंजीवादी मीडिया का निर्माण माना जा रहा है जो वास्तव में सत्ता पर सवाल उठाने के बजाय कुछ नए कानूनों बनाने तक ही लड़ाई को सीमित कर देते हैं. वे विशाल जनता को इस भ्रम में उलझाकर दावा करते  हैं कि एक कानून बनाने से देश पूरी तरह बदल जाएगा. मीडिया को इस तरह के मुद्दे काफ़ी पसंद आते हैं. बदलाव की चाह रखने वाली ताक़तों को बहुत ही सावधानी से इस तरह के आंदोलनों का मूल्यांकन कर अपना पक्ष तय करना होगा.
विश्व पूंजीवाद और मीडिया से जुड़ी जटिल स्थिति को ध्यान में रखकर आज सामाजिक बदलाव की चाह  रखने वालों के बीच जनपक्षधर मीडिया के निर्माण का सवाल मुंह बाये खड़ा है. मार्क्सवादी नज़रिए से जहां मीडिया के पूंजीवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र पर चोट करनी  होगी, वहीं इसे आमूल परिवर्तन की लड़ाई से भी जोड़ना पड़ेगा. इसके लिए मीडिया के पूंजीवादी मालिकाने को निशाना बनाना और उन्हें प्रश्रय देने वाली पूंजीवादी राष्ट्रीय नीतियों का विरोध ज़रूरी है. 
पूंजी के गुलाम बन चुके विद्वान दावा करते हैं कि वर्तमान हालात में पूंजीवादी मीडिया का कोई विकल्प नहीं है. ऐसे लोग यह भूल जाते हैं कि बदलाव की लड़ाई एक दिन में पूरी नहीं हो जाती. असंभव को संभव बनाने की इच्छा ही यथास्थिति को तोड़ने में मददगार हो सकती है. नया रचने का साहस ही किसी लड़ाई की मूल प्रेरणा बनता है. ऐसे में भले ही पूरा मीडिया तुरंत न बदले लेकिन स्थितियों में कुछ न कुछ बदलाव दिखने लगते हैं. दूसरी तरह के विद्वान मानते हैं कि पूंजीवादी मीडिया में कुछ सुधार कर, एक तरह का नियमन कर उसे सुधारा जा सकता है.इस तरह का दृष्टिकोण उदारवादी पूंजीवाद के तर्कों से बाहर नहीं निकल पाता है. जिसमें एक तरह से पूंजीवाद को विकल्पहीन ठहराने की हड़बड़ी और स्वार्थ होता है.
अंत में कहा जा सकता है कि भारतीय मीडिया का भविष्य बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि भविष्य के भारत की राजनीति और अर्थनीति कैसी होगी लेकिन इसी के साथ यह भी सही है कि अगर जनपक्षीय भविष्य का कोई सपना देखता है तो वह मीडिया को जनपक्षीय बनाने की लड़ाई छेड़े बिना संभव नहीं हो सकता. इसके लिए अनिवार्य तौर पर मीडिया के पूंजीवादी स्वामित्व का ख़ात्मा करना होगा, तभी अस्मिता से जुड़े राष्ट्रवाद जैसे भावुक मुद्दे शोषित-उत्पीड़ित जनता को ज़्यादा वक़्त के लिए बेवकूफ़ नहीं नहीं बना पाएंगे. कोई बरगलाने की कोशिश करेगा भी तो लोग एकजुट होकर उसे करारा ज़वाब देंगे.
 

कारपोरेट संपादकों की 'चिंताएं' और 'मीडिया विमर्श'

-भूपेन सिंह
सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस) ने दक्षिण दिल्ली के साकेत के अपने शानदार ऑफिस में पत्रकारिता की वर्तमान हालत पर एक बातचीत करवाई थी. जिसमें ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) के प्रतिनिधियों के अलावा न जाने किस गल़ती से मुझ जैसे कुछ ऐक्टिविस्ट और पत्रकारों को भी बुला लिया गया था. बहस में बीईए के महासचिव एनके सिंह, हाल ही तक आजतक-टीवी टुडे ग्रुप के संपादक रहे क़मर वहीद नक़वी, टीवी संपादक-सीईओ रहे राहुल देव, गवर्नेंस नॉव के संपादक वीवी राव, मिंट अख़बार में मीडिया पर कॉलम लिखने वाली सीएमएस की मुख्य कर्ता-धर्ता पीएन वासंती, उनके पिता और सीएमएस के अध्यक्ष भास्कर राव के अलावा कुल पच्चीस-तीस पत्रकार जमा थे. उपरोक्त लोगों का नाम लिखने की ज़रूरत इसलिए पड़ी क्योंकि उनमें से कुछ लोग उम्र, पद और प्रतिष्ठा का रुतबा दिखाकर बहस को एक गढ़ी गई आम सहमति में बदलने की कोशिश कर रहे थे. सारी बातें ऐसी थी जिससे कॉरपोरेट मीडिया और भारतीय लोकतंत्र की महानता बार-बार झलके और ऐसा लगे कि मीडिया की वर्तमान विसंगतियों के लिए बीईए से ज़्यादा चिंतित और कोई नहीं है. वहां बार-बार बीईए और सीएमएस के साथ मिलकर भारतीय मीडिया की बेहतरी के लिए एक साझा प्रोजेक्ट पर काम करने की बात भी हो रही थी. मेरी समझ में मीटिंग का मक़सद बड़ी देर से आया! असहमत लोगों की बातें उनके लिए अव्यावहारिक और क्रांतिकारी विचारधारा से प्रेरित थीं.
बातचीत के केंद्र में ज़ी न्यूज़ संपादकों की तरफ़ से कोयला घोटाले से जुड़े उद्योगपति और कांग्रेसी सांसद नवीन जिंदल से सौ करोड़ की वसूली का मामला था. बहस में शामिल नामधारी लोग ज़ी न्यूज़ संपादक सुधीर चौधरी और ज़ी बिजनेस के संपादक समीर अहलुवालिया की आलोचना कर रहे थे. साथ ही वे यह भी बताने की कोशिश कर रहे थे कि मीडिया का स्वनियमन ही सबसे सही रास्ता है. बहस को स्वनियमन बनाम सरकारी नियंत्रण की बहस में बदला जा रहा था. ये महानुभाव चालाकी दिखाते हुए थोड़ी सी आत्मालोचना में इतना ज़रूर स्वीकार कर रहे थे कि आज के समाचार माध्यमों में सुधीर और समीर जैसे लोगों की ही चलती है और आज वे किसी भी मीडिया मालिक के लिए सबसे ज़्यादा काम के आदमी हैं. उनके पास कॉरपोरेट मीडिया की साख बचाने के लिए स्वनियमन की माला जपने वाले बीईए और उसकी तरफ़ से बनाई गई नियामक संस्था न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड अथॉरिटी (एनबीएसए) की नैतिकता और प्रासंगिकता के पक्ष में अनगिनत दलीलें थीं और वे चाह रहे थे बाक़ी लोग अच्छे बच्चे की तरह उनकी हां में हां मिलाएं.
मैंने कहा कि स्वनियमन के लिए बनाई गई संस्था एनबीएसए और उसकी जननी बीईए जिस स्वनियमन की बात करती हैं उस स्व में आम पत्रकारों के लिए कोई जगह नहीं है. वह टेलीविजन एडिटर्स की पहलकदमी से बनाई गई संस्था है और एडिटर, कॉरपोरेट मीडिया में मालिक की मर्जी के ख़िलाफ़ कोई नहीं बन सकता. अलग-अलग मीडिया संगठनों में काम करने वाले अनगिनत साधारण पत्रकारों के हितों का इन संपादकों को कोई ध्यान नहीं रहता. उन्हें लाखों-करोड़ों रुपए की अश्लील तनख्वाह मिलती है जबकि आम पत्रकारों के लिए हज़ार किफ़ायत बरतने के बाद भी अपना घर चलाना मुश्किल होता है. मैंने सीधे पूछा कि आप लोग संपादक रहे हैं, हैंक्या आप लोगों ने कभी आम पत्रकारों को अपने अख़बार-चैनल में संगठन बनाने की इज़ाजत दीअगर आप बहुसंख्यक पत्रकारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते तो फिर आपको उनकी आड़ में स्वनियमन की बात करने का कोई अधिकार नहीं है.
महान पत्रकारों को ख़ुद के लिए कॉरपोरेट पत्रकार का संबोधन बिल्कुल ही आपत्तिजनक लगा. कोई ज़वाब न होने पर बोलने लगे कि सिर्फ़ आप ही बोल रहे हैं दूसरों को बोलने नहीं दे रहे, जबकि हक़ीक़त यह थी कि वहां संपादक-आयोजक प्रवचन कर रहे थे और हमसे भक्तों की तरह ज्ञान हासिल करने की उम्मीद कर रहे थे. जब बर्दाश्त नहीं हुआ तो हमने कहा कि अगर आपने हमें बुलाया है तो बात सुननी भी पड़ेगी वरना हम जा रहे हैं. स्थिति असामान्य हो गई. एजेंडा सेटिंग का विरोध करने वाला हमारा दिमाग उनकी शातिर बातों को मानने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था. जब उनके सामने कहा गया कि पत्रकार-मालिक-सीईओ एक ही इंसान होगा तो क्या इसमें हितों का टकराव नहीं हैसुधीर चौधरी एक साथ ज़ी न्यूज़ का बिजनेस हेड और संपादक कैसे बन गयाराजदीप  सरदेसाई, अरुण पुरी, प्रवण रॉय जैसे कई लोग मालिक हैं कि पत्रकारइस तरह के सवाल उन्हें कल्पनाओं से परे और बहुत ही आपत्तिजनक लगे. मालिकों की दया से बने संपादक, बड़ी पूंजी के मालिकों और पत्रकारीय हितों के बीच टकराव की अनदेखी करते हुए झल्लाकर बोले, क्या आप चाहते हैं कि पत्रकार हमेशा नौकर ही बना रहे वह मालिक नहीं बने?  अरुण पुरी जैसे लोगों ने पत्रकारिता के नए मानदंड खड़े किए हैं, वे कभी संपादक के अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं करते. अख़बार टीवी शुरू करने में करोड़ों रुपए लगते हैं, क्या कोई मालिक घाटा उठाने लिए पूंजी लगाएगाआप ही बताइए इसका क्या विकल्प हैआप इल इनफॉर्म्ड हैं हमारे एक साथी ने लगे हाथों यह भी पूछ लिया कि सुधीर चौधरी पहले भी दिल्ली की एक स्कूल शिक्षिका उमा खुराना को फर्जी तौर पर वेश्याओं का दलाल बताकर उन्हें बदमाम कर चुका है, जिस वजह से सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने उस चैनल न्यूज लाइव को पंद्रह दिनों के लिए बंद करवा दिया था. इतनी जानकारी के बाद भी वह बीईए का कोषाध्यक्ष कैसे बन गया कौन इल इन्फॉर्म्ड है कॉरपोरेट संपादकों ने झल्लाहट के बावजूद पूरे आत्मविश्वास से कॉरपोरेट मीडिया और उसके मालिकों का बचाव किया. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सरकारी नियंत्रण का डर दिखाया और सुधीर चौधरी जैसी घटनाओं के लिए ख़ुद बदलो-जग बदलेगा जैसा दर्शन दिया और इसके लिए स्वनियमन को ज़रूरी बताया. वहां अपेक्षाकृत सीधे और सरल माने जाने वाले संपादक वीवी राव ने कहा कि पत्रकारों और मीडिया संगठनों के ख़िलाफ़ भी मुख्यधारा के मीडिया में आलोचना छपनी चाहिए तो उनकी बात को भी यूं ही उड़ा दिया गया. मीटिंग में मौज़ूद महान विभूतियां हमारी बातों को विचारधारा से प्रेरित और क्रांतिकारी घोषित कर पहले ही अप्रासांगिक ठहराने की कोशिश कर चुकी थीं.
ऊपर हुई घटनाओं का ज़िक्र करने का मक़सद सिर्फ़ इतना है कि इस बहाने पता चल पाए सत्ता तक पहुंच रखने वाले कॉरपोरेट संपादक और नामचीन एनजीओ, पत्रकारिता में नैतिकता की बहस को किस दिशा में मोड़ना चाहते हैं. ऐसा नहीं कि यह बहस सिर्फ़ लगातार बाज़ार के हवाले होते जा रहे भारत जैसे देश में ही हो रही है, भारतीय अभिजात्य के औपनिवेशिक आका रहे ब्रिटेन में भी नियमन को लेकर बहस तेज़ है. वहां लेवसन रिपोर्ट चर्चा का विषय बनी हुई है. भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू लेवसन रिपोर्ट का हवाला देते हुए द हिंदू अख़बार में एक लेख लिखकर किसी अधिकार संपन्न स्वायत्त संस्था से मीडिया नियमन की वक़ालत कर चुके हैं लेकिन कॉरपोरेट मीडिया के कर्ता-धर्ताओं को यह बात बिल्कुल भी क़बूल नहीं है.
मुनाफाखोर मीडिया घराने कितना नीचे गिर सकते हैं, अमेरिका और यूरोप के कई देशों का मीडिया इसका उदाहरण है. ब्रिटेन में कॉरपोरेट मीडिया सरदार रुपर्ट मर्डोक की न्यूज़ कॉर्प की ब्रिटिश कंपनी न्यूज़ इंटरनेशनल का अख़बार न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड का किस्सा इसका एक बड़ा उदाहरण है. अख़बार ने दो हज़ार दो के बाद पत्रकारिता के सारे मानदंड़ों का मखौल उड़ाते हुए ब्रिटेन के कई प्रभावशाली लोगों के फोन हैक कर उऩकी निजी बातचीत को रिकॉर्ड कर लिया था. इनमें ब्रिटेन के राज परिवार समेत कई सेलिब्रिटीज के फोन भी शामिल थे. इस बात का पता चलने पर अख़बार और मर्डोक की आलोचना होती रही है. न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड का पत्रकार क्लाइव गुडमैन 2007 में राज परिवार के सदस्यों के फोन मैसेज हैक करने के मामले में जेल की हवा खा आया है. अख़बार के पत्रकारों और निजी जासूसों की मिलीभगत देखकर आम जनता दंग थी, इसमें पुलिस वालों को घूस देने का मामला भी था. इन तमाम बातों के बावजूद रुपर्ट मर्डोक का कारोबार ब्रिटेन में बढ़ता ही जा रहा था लेकिन जैसे ही जुलाई 2011 में पता चला कि अख़बार ने कत्ल की गई स्कूली छात्रा मिली डॉवलर समेत लंदन बम धमाकों के एक शिकार का भी फोन सनसनीखेज़ ख़बरों के लिए टेप किया था तो लोग भड़क उठे. पूरे ब्रिटेन में हंगामा मच गया. परिणाम स्वरूप मर्डोक को 10 जुलाई 2011 को 168 साल से चला आ रहा अख़बार न्यूज़ ऑफ द वर्ल्ड बंद करना पड़ा. अब रुपर्ट मर्डोक और उसके बेटे पर भी अदालत में मामला चल रहा है.
न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड की घटना के बाद ब्रिटश मीडिया में अनियमितताओं की जांच के लिए प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने जुलाई 2010 में जस्टिस लेवसन के नेतृत्व में एक छह सदस्यीय जांच कमेटी गठित थी. इस कमेंटी ने नवंबर 2012 में अपनी  रिपोर्ट पेश की. 'एन एन्क्वायरी इनटू द कल्चर, प्रैक्टिसेज एंड इथिक्स ऑफ़ द प्रेस' नाम की यह रिपोर्ट दो हिस्सों में है. पहले हिस्से में ब्रिटिश कॉरपोरेट मीडिया के जनविरोधी व्यहार का अध्ययन करते हुए उसे सही तरह से संचालित कराने के लिए ठोस नियम बनाने की वकालत की गई है. दूसरे हिस्से में न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड वाले मामले की विशेष छानबीन की गई है, कोर्ट में मामला चलने की वजह से उसे अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है.
लेवसन रिपोर्ट में मीडिया की नैतिकता को ध्यान में  रखकर एक स्वायत्तशासी और ज़्यादा अधिकार संपन्न आयोग बनाने की सिफ़ारिश की है, साथ ही प्रेस कंप्लेन कमिशन (पीसीसी) की जगह एक नयी नियामक संस्था बनाने पर ज़ोर दिया गया है. पीसीसी को ब्रिटेन में अख़बारों के प्रतिनिधियों ने मिलकर स्वनियमन के नाम पर बनाया हुआ है. लेकिन यह अब तक बिल्कुल भी कारगर साबित नहीं हुई है. इसकी  हालत कुछ-कुछ प्रकाशकों के प्रभाव वाली हमारे प्रेस परिषद जैसी है. भारतीय प्रेस परिषद की तरह इसे भी दंत विहीन संस्था माना जाता है. ब्रिटिश मीडिया में न्यूज़ ऑफ द वर्ल्ड की घटनाओं के बाद सरकार को मजबूर होकर इस बारे में बात करनी पड़ी. अब फिलहाल लेवसन रिपोर्ट पर वहां राजनीति गरमा रही है. विपक्ष जहां सारी सिफ़ारिशों को जस का तस मान लेने की बात कर रहा है वहीं सरकारी पक्ष कुछ बातों पर बहस करवाना चाहता है. लेकिन माना जा रहा है कि 2013 में वहां पर एक स्वायत्तशासी नियामक संस्था अस्तित्व में आ जाएगी जो सरकार और कॉरपोरेट के सीधे दखल से मुक्त होगी.
भारतीय मीडिया की हालत देखकर आज यहां भी एक स्वायत्तशासी नियामक संस्था बनाने का वक़्त आ चुका है. लेकिन इसके लिए पहली शर्त यही है कि कॉरपोरेट की ताक़त के ख़िलाफ़ एक जनमत तैयार हो और सरकार पर ऐसा करने के लिए ब्रिटेन की तरह ही दबाव पड़े. सिर्फ़ पिछले पांच साल की घटनाओं को ही देखें तो यहां कॉरपोरेट, मीडिया और राजनीति के गठजोड़ की पोल खोलता राडिया टेप कांड जैसा भयानक मामला सामने आया है जिसमें बरखा दत्त, वीर सांघवी, प्रभु चावला जैसे कई तथाकथित महान पत्रकारों की संदिग्ध भूमिका का पता चला. लेकिन व्यापक जन दबाव न होने की वजह से इस मामले में अब तक कोई ठोस जांच नहीं करवाई गई. राडिया टेप कांड के तमाम दागी लोग आज भी बड़ी बेशर्मी से पत्रकारिता कर रहे हैं. हैरानी की बात यह है कि हमारे यहां उल्टी गंगा बह रही है, उद्योगपति रतन टाटा ने पोल खुलने पर निजी अधिकारों के हनन के नाम पर बाक़ी राडिया टेप सार्वजनिक होने पर ही कोर्ट से स्टे ले लिया. पेड न्यूज़ को लेकर प्रेस परिषद की सब कमेटी ने रिपोर्ट तैयार की और उसमें कई अख़बारों को दोषी पाया गया लेकिन मालिकों के प्रभुत्व वाली परिषद की कमेटी ने उस रिपोर्ट को पास नही किया. कोयला घोटाले में दैनिक भास्कर, इंडिया टुडे ग्रुप, प्रभात ख़बर और लोकमत जैसी मीडिया कंपनियों का जुड़ाव होने के बाद भी सरकार के कानों में जूं तक नहीं रेंगी. ज़ी न्यूज़ के संपादकों वाले मामले में भी अब तक कोई आधाकारिक जांच नहीं हो रही है.
उदारीकरण की नीतियां अपनाने के बाद भारत में निजी मीडिया का असीम विकास हुआ है. उद्योगपति पत्रकारिता का इस्तेमाल कर अपने बाक़ी धंधों को चमकाने के लिए मीडिया में पैसा लगा रहे हैं. परिणाम स्वरूप पत्रकारों का एक बड़ा हिस्सा उद्योगपतियों के दलाल या स्टैनोग्राफ़र में बदल गया हैं. इन हालात में यहां भी मीडिया के नियमन के लिए लेवसन आयोग की तरह एक जांच ज़रूरी है. देश के मीडिया की वस्तुस्थिति की जानकारी के लिए एक अधिकार संपन्न तीसरे प्रेस आयोग की स्थापना इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, वशर्ते उसका हश्र पहले और दूसरे प्रेस आयोग की रिपोर्ट की तरह न हो. अगर इस तरह की पहलकदमी का जनदबाव बनता है कि इससे मालिकों की भाषा बोलने वाले बीईए के होश अपने आप ठिकाने आ जाएंगे. 

Wednesday, December 12, 2012


नेशनल हेरल्ड, कांग्रेस और दो हज़ार करोड़ का घोटाला

घोटाला क़रीब दो हज़ार करोड़ रुपए की संपत्ति का है और इस बार इसके तार कांग्रेसी अख़बार नेशनल हेरल्ड से जुड़े हैं. घोटाले में सोनिया गांधी और राहुल गांधी जैसे कांग्रेस के पारिवारिक दिग्गजों पर सीधा आरोप है कि उन्होंने अवैध तरीक़े से अख़बार की संपत्ति पर कब्ज़ा कर लिया. लगातार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी कांग्रेस के लिए यह घोटाला एक नई मुसीबत लेकर आया है. विरोधियों ने तो इस मामले में पार्टी की मान्यता ही ख़त्म करने की मांग कर डाली. इस घटना ने समाचार मीडिया की आड़ में मुनाफ़ा कमाने वाले निजी घरानों की नैतिकता को तो कटघरे में खड़ा किया ही है, प्रभावशाली नेताओं और राजनीतिक पार्टियों के मीडिया में निवेश करने को लेकर भी सवाल उठाये हैं. इससे यह भी पता चलता है कि भारत का ज़्यादातर समाचार मीडिया अब पूरी तरह बड़ी पूंजी का गुलाम हो गया है जिसमें निजी फायदा उठाने की अनगिनत साजिशें चलती रहती हैं. कभी-कभी इन पर से पर्दा हटता है तो करोडों-खरबों के घोटाले नज़र आते हैं. लेकिन ये पर्दे के पीछे चलने वाले घोटालों की सिर्फ़ एक झलक(टिप ऑफ द आइसबर्ग) है. नेशनल हेरल्ड का मामला भी ऐसे घोटालों का एक छोटा सा उदाहरण है.

नवंबर महीने की दो तारीख़ को कांग्रेस पार्टी ने मान लिया कि उसने नेशनल हेरल्ड निकालने वाली कंपनी एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड (एजेएल) को नब्बे करोड़ रुपए का ब्याज़ मुक्त लोन दिया था. कांग्रेस की तरफ़ से बयान आया कि उसने 2008 में यह कर्ज नेशनल हेरल्ड को दोबारा शुरू करने के लिए दिया था और अख़बार का प्रकाशन उसके लिए एक भावुक मुद्दा है. वह(बेशर्मी से नव उदारवादी आर्थिक नीतियों को लागू करने वाली पार्टी) अख़बार को फिर से शुरू कर गांधी-नेहरू के आदर्शों (?) को आगे बढ़ाना चाहतीहै. लेकिन इन लोक लुभावन बातों के पीछे की जो हक़ीक़त सामने आई उससे लोकतंत्र की आड़ में भ्रष्टाचार का परचम फहराने वालों का चेहरा पूरी तरह बेपर्दा हो गया. कांग्रेस पार्टी और उसके सर्वोच्च नेताओं ने भ्रष्टाचार का इतना महीन खेल खेला है कि उसे समझने के लिए ठीक-ठाक समझदार लोगों को भी अच्छी-ख़ासी कसरत करनी पड़ जाए.

नेशनल हैरल्ड का प्रकाशन बंद हुए चार साल बीत चुके हैं. अब पूरा खेल नेशनल हेरल्ड को प्रकाशित करने वाली कंपनी एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड (एजेएल) की दो हज़ार करोड़ रुपए की संपत्ति को हथियाने का है. इस पूरे मामले में बड़ी चालाकी से कांग्रेस पार्टी ने अपनी अध्यक्ष सोनिया गांधी और महासचिव राहुल गांधी की नव गठित कंपनी यंग इंडियन को सारे अधिकार देने का रास्ता साफ़ कर डाला. सोनिया के दामाद रॉबर्ट बाड्रा पर आरोप लगने के बाद अब सीधे सोनिया-राहुल पर गड़बड़ी कर संपत्ति हथियाने का आरोप है. नेशनल हेरल्ड की स्थापना कभी कांग्रेस ने आज़ादी की लड़ाई को धार देने के लिए की थी. इसे प्रकाशित करने वाली कंपनी एजेएल उर्दू में कौमी आवाज़ और हिंदी में नवजीवन का भी प्रकाशन करती रही है. नेशनल हेरल्ड को उन्नीस सौ अड़तीस में जवाहरलाल नेहरू ने शुरू किया था, छोटे अरसे के लिए ख़ुद नेहरू भी इसके संपादक रहे. तब अख़बार का एक ही संस्करण लखनऊ से छपता था. आज़ादी के पक्ष में होने की वजह से ब्रिटिश सरकार ने उन्नीस सौ बयालीस से उन्नीस सौ पैंतालीस तक इस पर पाबंदी लगा दी थी. उन्नीस सौ छियालीस तक के रामाराव इसके संपादक रहे. उन्नीस सौ सैंतालीस में आज़ादी मिलने के बाद नेहरू प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने नेशनल हैरल्ड के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया. तब उनका सोचना था कि एक आज़ाद देश में अख़बार को ख़ास राजनीतिक पार्टी से प्रभावित नहीं होना चाहिए. तब से अख़बार के संपादक मनीकोंडा चलपति राव थे. वे नेहरू के अच्छे दोस्त थे लेकिन नेहरू सरकार की आलोचना करने से कभी नहीं झिझकते थे. चलपति राव उन्नीस सौ छिहत्तर तक अख़बार के संपादक रहे. कहा जाता है कि तब कांग्रेस का प्रकाशन होने के बाद भी अख़बार को बहुत सारे मामलों में संपादकीय स्वतंत्रता थी.

1964 में नेहरू की मौत के बाद स्थितियां बदलीं. 1968 में अख़बार का दिल्ली संस्करण भी शुरू हुआ. इंदिरा गांधी को आलोचना पसंद नहीं थी इसलिए अख़बार का संपादकीय पतन होना शुरू हो गया. चलपति राव के जाने के बाद कुछ वक़्त के लिए खुशवंत सिंह भी अख़बार के संपादक रहे. लेकिन खुशवंत सिंह अख़बार से कभी तनख़्वाह नहीं ले पाए. वे इलस्ट्रेटेड वीकली छोड़कर आए थे, तब अख़बार में बकाया वेतन की मांग को लेकर कर्मचारियों की हड़ताल चल रही थी.ख़ुशवंत सिंह ने सबसे वादा किया कि जब तक सभी कर्मचारियों को पैसा नहीं मिल जाता तब तक वे भी अपनी तनख्वाह नहीं लेंगे. इस बात का ज़िक्र उन्होंने अपनी किताब ट्रुथ, लव एंड लिटिल मलाइस में कियाहै. सत्ताधारी पार्टी का अख़बार होने के बाद भी तब अख़बार में लगातार आर्थिक दिक्कतें बनी रहती थीं. ख़ुशवंत लिखते हैं कि अख़बार में पैसे की कमी की वजह से कर्मचारियों का असंतोष बढ़ने पर रहस्यमय तरीक़े से दफ़्तर में रुपयों से भरे सूटकेस पहुंच जाते थे और कर्मचारियों को उनके बकाये का भुगतान किया जाता था (सूटकेस में आने वाले पैसों की वैधता का अनुमान लगाएं!). 1990-92 के बीच अख़बार के संपादक रहे शुभब्रता भट्टाचार्य का कहना है कि अख़बार का वित्तीय प्रबंधन कभी ठीक तरह से नही हो पाया. सिर्फ़ छियालीस से पचास के बीच में जब फिरोज़ गांधी प्रबंध निदेशक थे तभी काम ठीक चला था.

वित्तीय संकट की वजह से 2008 में अख़बार को बंद करना पड़ा था. तक कांग्रेस पार्टी ने कर्मचारियों का बकाया चुकाने के लिए अख़बार चलाने वाली कंपनी एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड को नब्बे करोड़ रुपये का ब्याज मुक्त कर्ज दिया था. अख़बार बंद होने के बाद एजेएल सिर्फ़ एक रीयल एस्टेट कंपनी बनकर रह गई. इसकी दिल्ली, मुंबई और लखनऊ में संपत्ति थी और बैलेंस शीट में दो हज़ार करोड़ रुपए थे. इसके बदले में वो कांग्रेस की नब्बे करोड़ रुपए की देनदार हो गई. एजेएल में हज़ार से ज़्यादा शेयर होल्डर थे. कांग्रेस का पैसा चुकाने के बाद भी कंपनी अपनी अचल संपत्ति को बांटकर हिस्सेदारों में बांट सकती थी लेकिन कंपनी ने ऐसा नहीं किया. सारे कायदे कानूनों को ताक पर रखकर राहुल गांधी और सोनिया गांधी की मालिकाने वाली कंपनी यंग इंडियन ने एजेएल को ख़रीद लिया.

2010 के नवंबर महीने में अचानक पांच लाख रुपए की लागत से सेक्शन 25 के तहत यंग इंडियन नाम की एक नई कंपनी बनायी गई. इस कंपनी में राहुल और सोनिया की 38-38 फीसदी(कुल छिहत्तर फ़ीसदी) की हिस्सेदारी थी. बाक़ी बारह-बारह फ़ीसदी की हिस्सेदारी परिवार के वफ़ादार ऑस्कर फर्नांडिस और मोतीलाल वोरा की है. दिसंबर दो हज़ार दस में, कांग्रेस पार्टी की तरफ से एजेएल को दिए गए नब्बे करोड़ रुपए से ज़्यादा के लोन का अधिकार यंग इंडियन कंपनी के पास आ गया. इसके लिए लिए कंपनी ने पार्टी को सिर्फ पचास लाख रुपए चुकाए. कांग्रेस ने पचास लाख घटाकर नवासी दशमलव सात पांच लाख का घाटा दिखाया. इससे यंग इंडिया को एजेएल से नब्बे करोड़ रुपए की वसूली का अधिकार मिल गया. आखिरकार फरवरी दो हज़ार बारह में एजेएल ने नब्बे करोड़ रुपए को यंग इंडियन के शेयरों में बदल दिया. ऐसा करने से यंग इंडियन एजेएल के निन्यानबे फीसदी हिस्से की मालिक हो गई. अब एजेएल पर पूरी तरह यंग इंडियन का कब्ज़ा है.
जब एजेएल के पास दो हज़ार करोड़ से भी ज्यादा की संपत्ति है तो उसने सिर्फ़ नब्बे करोड़ में अपनी पूरी हिस्सेदारी क्यों छोड़ दी. कांग्रेस की तरफ़ से महासचिव जनार्दन द्विवेदी का बयान आया कि कांग्रेस ने नेशनल हैरल्ड को फिर से पुनर्जीवित करने के लिए नब्बे करोड़ का लोन दिया था क्योंकि उसके लिए अख़बार का फिर से निकलना एक भावुक मुद्दा है, लेकिन उनकी बातों का झूठ इसी बात से साबित हो जाता है कि 2008 में जब कांग्रेस ने लोन दिया था तब अख़बार बंद हो रहा था और कर्मचारियों के बकाए के भुगतान के लिए नब्बे करोड़ रुपए दिए गए थे. इतने सालों तक यह बात दबी रही कि कांग्रेस ने एजेएल को लोन दिया. मामला बिल्कुल साफ़ है कि कांग्रेस के सर्वोच्च नेताओं ने एजेएल को हथियाने के लिए ही यंग इंडियन का गठन किया. इसलिए चुन-चुनकर इसमें गांधी परिवार का वर्चस्व बनाया गया.
नेशनल हेरल्ड से जुड़े कांग्रेस के इस घोटाले की ख़बर जब जनता पार्टी के सुब्रह्मण्यम स्वामी को मिली तो वे तुरंत कोर्ट चल गए और उऩ्होंने पूरे घोटाले की परत दर परद खोलते हुए कांग्रेस पार्टी की मान्यता रद्द करने की मांग कर डाली. उन्होंने ऐसी ही मांग चुनाव आयोग और प्रधानमंत्री से भी की. लेकिन जैसा कि होना था, वर्तमान व्यवस्था में कांग्रेस की सदस्यता रद्द होना लगभग असंभव है, वैसा ही हुआ. कोर्ट ने भी स्वामी की बात मानने से इनकार कर दिया. स्वामी इस बिनाह पर यह मांग कर रहे थे कि एक राजनीतिक पार्टी को व्यवसाय के लिए पैसा देने का अधिकार नहीं है. स्वामी ने यह भी आरोप लगाया कि राहुल गांधी ने एजेएल में अपनी हिस्सेदारी (छोटी ही सही) का ब्यौरा भी चुनाव आयोग को सौंपे अपने हलफनामे में नहीं दिया है इसलिए उनकी लोकसभा सदस्यता भी रद्द की जानी चाहिए. इन सारी घटनाओं को लेकर स्वामी ने बाक़ायदा सारे दस्तावेज पेश किए. यहां देखा जाए तो स्वामी व्यवस्था में निहित भ्रष्टाचार की जड़ों पर चोट करने के बजाय सिर्फ़ कानूनी समाधान तलाश रहे थे, नव उदारवादी लोकतंत्र की अनैतिकता उनके सवालों के घेरे से बाहर है.
इस घटनाक्रम से इस बात का भी पता चलता है कि लोकतंत्र के नाम पर किस तरह देश की जनता को बेवकूफ़ बनाया जा रहा है. कोई यह सवाल नहीं उठा रहा कि कांग्रेस के पास नब्बे करोड़ रुपए उधार देने के लिए पैसा कहां से आया. दूसरे शब्दों में यह भी पूछा जा सकता है कि राजनीतिक पार्टियों के पास अरबों-खरबों के हिसाब से पैसा आता कहां से है? इसका जवाब सिर्फ़ इतना दिया जाता है कि उनके समर्थकों ने उन्हें चंदा दिया है, तो ऐसे अरबों का चंदा देने वाले समर्थक देश के बड़े आपराधिक कॉरपोरेट कंपनियों के अलावा और कौन हो सकते हैं? कांग्रेस-भाजपा जैसी राजनीतिक पार्टियां इस बात को साफ़ क्यों नहीं करती कि उनके पास इतना पैसा आया कहां से है. स्वाभाविक है कि जब पूंजीपतियों के अवैध पैसे से पार्टियां और सरकारें चलेंगी तो फैसले भी उन्हीं के पक्ष में होंगे. कॉरपोरेट लोकतंत्रका चरित्र यहां पर बिल्कुल साफ हो जाता है लेकिन मीडिया का इस्तेमाल कर जनता में ऐसी झूठी चेतना का निर्माण किया जाता है कि जैसे कॉरपोरेट लोकतंत्र से महान कोई व्यवस्था नहीं है. आम जनता भी इस छद्म को नहीं समझ पाता. उसे यही रटाया जाता है न्यूनतम अर्हता को पूरा करने वाला कोई भी व्यक्ति विधानसभा या लोकसभा का चुनाव लड़ सकता है और राजनीतिक पार्टी बना सकता है.वह देश का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बन सकता है. लेकिन हक़ीक़त यही है कि राजनीति करने के लिए जब तक कॉरपोरेट का हाथ सर पर न हो आम आदमी के लिए इस लोकतंत्र में राजनीतिक हिस्सेदारी हासिल कर पाना असंभव है. सवाल यह भी है कि जिस देश की क़रीब अस्सी फ़ीसदी आबादी बीस रुपए से कम रोज कमाती है. उस तबके का इंसान चुनाव लड़ने के लिए हज़ारों रुपए पंजीकरण शुल्क कहां से लाएगा? माना उसने किसी तरह इतना पैसा इकट्ठा कर भी लिया तो वह चुनाव प्रचार के लिए करोड़ों रुपए कैसे खर्च करेगा? बड़ी राजनीतिक पार्टियों के पास आने वाले पैसे की वैधता का सवाल यहां पर बहुत अहम हो जाता है. जब अवैध पैसे के इस्तेमाल से ऐसी पार्टियां सरकार में पहुंचेंगी तो वह कैसे आम जनता के पक्ष में न्याय की बात कर सकती हैं?
कांग्रेस पार्टी के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा एजेएल के एक प्रमुख डायरेक्टर भी थे उन्होंने ही सारे मामले में प्रमुख भूमिका निभाई. वोरा यंग इंडियन के भी प्रमुख सदस्य हैं और उनकी भी इस नई कंपनी में बारह फीसदी की हिस्सेदारी है, जबकि एजेएस में उनकी एक फ़ीसदी से भी कम की हिस्सेदारी थी. एजेएल के ज्यादातर पुराने शेयर होल्डर मर-खप गए हैं लेकिन कंपनी ने उनका ब्यौरा रजिस्ट्रार ऑफ़ कंपनी के पास नहीं दिया था. सुब्रह्मण्यम स्वामी ने जब पहले कांग्रेस और गांधी परिवार की पोल खोली तो कांग्रेस स्वामी के आरोपों को चुनौती देने की मुद्रा में दिखाई दी. राहुल गांधी के ऑफिस ने स्वामी पर अवमानना का केस दर्ज करने की धमकी दी. बाद में कांग्रेस की तरफ़ से इस बात को टाल दिया गया. कांग्रेस की तरफ़ से बयान आया कि स्वामी का तो काम भी कांग्रेस पर कीचड़ उछालना है इसलिए उसे उनके आरोपों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है लेकिन असल बात तो यह है कि स्वामी ने जो आरोप लगाए हैं उसका कांग्रेस के पास कोई तार्किक जवाब नहीं है.
नेशनल हेरल्ड से जुड़ा एक और घोटाला इंदौर से भी सामने आयाहै. अस्सी के दशक में कांग्रेस के अर्जुन सिंह ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में अख़बार के नाम पर वहां बाईस हज़ार स्वायर फीट की ज़मीन मुहैया कराई थी. अब वह ज़मीन विष्णु गोयल नाम के एक चिट फंड के व्यवसाय से जुड़े एक धंधेबाज़ के कब्ज़े में है. बाद में बीजेपी सरकार ने अख़बार के प्रकाशन को अवैध घोषित कर दिया और दो हज़ार ग्यारह में इंदौर डेवलेपमेंट अथॉरिटी ने लीज वापस लेने का आदेश दिया लेकिन विष्णु गोयल ने इसकी शिकायत प्रेस परिषद में की और हाईकोर्ट से स्टे लेने मे कामयाब हो गया. इस तरह आज भी उसके अख़बार का ज़मीन पर कब्ज़ा है.कहा जाता है कि गोयल कांग्रेस नेता मोती लाल वोरा का बेहद करीबी है और उऩ्होंने ही उसके लिए सारी व्यवस्था की है. दिखावे के लिए हर रोज़ रायपुर से नेशनल हेरल्ड का का प्रकाशन जारी है, जिसमें कुछ प्रतियां प्रिंट कर सूचना विभाग में उसका अस्तित्व बचा के रखा गया है. अख़बार ने एक वेब साइट भी बनाई है. जिसका पता है- http://nationalherald.org/. यह घटना इस बात का भी सबूतहै कि कांग्रेस के सहयोग से ही नेशनल हेरल्ड अपनी करोड़ों की संपत्ति जोड़ पाया.दिल्ली, मुंबई, लखनऊ के अलावा इंदौर में भी इसके पास बड़ी संपत्ति होना इस बात का प्रमाणहै. सारा मामला अब उस संपत्ति को हथियाने को लेकर चल रहा है. कांग्रेस के सर्वोच्च नेता अब इस संपत्ति को दूसरे के पास नहीं देना चाहते इसलिए एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी को निजी मिल्कीयत वाली कंपनी बना दिया गया और कांग्रेस के समर्थक सेठ को इंदौर की ज़मीन सौंप दी गई.
हेरल्ड वाले मामले से देश में मीडिया संबंधित सही नियम-कायदों के अभाव का भी पता चलता है. न तो यहां तरह-तरह का धंधा कर रहे पूंजीपतियों के समाचार मीडिया पर निवेश करने को लेकर कोई पाबंदीहै और न ही राजनीतिक पार्टियों द्वारा सत्ता का इस्तेमाल कर मीडिया का कारोबार खड़ा करने पर कोई रोक है. आज देशभर में, उत्तर से लेकर दक्षिण तक कई राजनीतिक पार्टियों का पैसा मीडिया में लगा हुआ है. इस तरह पूंजीपति और राजनीतिक पार्टियां देश के जनमत को मनमानी दिशा मे हांकने में जुटे हुए हैं. साथ ही मीडिया का इस्तेमाल अपना व्यवसाय और राजनीति को चमकाने के लिए धड़ल्ले से हो रहा है.