हंसता भी हूं, हंसाता भी हूं
फिर भी लगता है
मैं ऐसा नहीं करता
मेरे भीतर का विदूषक
अपनी भूमिका निभाता है
दुख को सुख और
विसंगति को संगति बताता है
भले ही अघाये हुए आलोचक
इस भूमिका के लिए
कोई पुरस्कार दे दें
वो शर्म कहां जाएगी
जो अब चेहरे पर नहीं दिखती
स्मृतियों से बचने की कोशिश में
वो ख़त्म नहीं होतीं
चली जाती हैं अवचेतन में
फर्क सिर्फ इतना होता है कि
टुच्चे सुखों की ख़ातिर
बंद हो जाता है उनसे उलझना
अब भी होता हूं कई बार
अवचेतन से संचालित
और गुजरता हूं
कुंठा, तनाव और पीड़ा के रास्तों से
दुख के पास भी जीतने के
कितने तरीक़े हैं
Thursday, June 28, 2007
एक विदूषक की आत्म-स्वीकारोक्ति
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6 comments:
सही चल रहे हो.
हंसता भी हूं, हंसाता भी हूं
फिर भी लगता है
मैं ऐसा नहीं करता
मेरे भीतर का विदूषक
अपनी भूमिका निभाता है
आपकी इन पक्तिंयो ने मन मोह लिया मुझे भी एसा लगता है की हम कुछ नही करते हमारे अन्दर एसा कुछ है जो हमे यह सब करने पर मजबूर करता है
शानू
"वो शर्म कहां जाएगी
जो अब चेहरे पर नहीं दिखती"
वाह वाह। क्या बात कही है आपने।
दुख के पास भी जीतने के
कितने तरीक़े हैं
बेहतरीन आपने तो नब्ज को ही पकड़ लिया,
आप्के विचारों की अंत:सलिला क्या खूब बह रही है इस कविता में, यूं ही लिखते रहें
दिल की कलम से
नाम आसमान पर लिख देंगे कसम से
गिराएंगे मिलकर बिजलियाँ
लिख लेख कविता कहानियाँ
हिन्दी छा जाए ऐसे
दुनियावाले दबालें दाँतो तले उगलियाँ ।
NishikantWorld
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