आफताब आलम अंसारी को गोरखपुर धमाकों के आरोप में जिस तरह फंसाने की कोशिश की गई उसके ख़िलाफ़ कई लोगों ने अपनी आवाज़ बुलंद की है. अल्पसंख्यकों के साथ पुलिसिया व्यवहार पर नदीम ने कुछ अहम सवाल उठाए हैं तो आशीष ने देश के माहौल पर एक भावुक-सी टिप्पणी की है.
संजय बेंगाणी :
मजे की बात है दोषियों को बचाया जाता है और बेगुनाहों को सजा दे दी जाती है. बहुत से बेगुनाह जो मुसलमान नहीं होंगे, पकड़ा जाता रहा है. धर्म के आधार पर न पकड़ा जाना चाहिए, न छोड़ा जाना चाहिए.
नदीम:
इस विषय पर साथियों की राय जानकार अच्छा लगा. चलो कोई तो है जो इस तरह सोचता है. वैसे एक मुसलमान होकर किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है क मुसलमान के आलावा कौन बेहतर जान सकता है.में पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मी नगर में रहता हूँ पिछली घटनाओ और आतंकियों की पकड़ के बाद से ये इलाका +काफी बदनाम या कहें की मशहूर हो चूका है. आप यकीन मानेंगे की में पिछले ४ सालों से लगातार अपना वोटर आई कार्ड साथ लेकर चलता हूँ.कारन ये की कोई भी समस्या या पूछताछ के समय अन्य किसी वर्ग से अगर ४ सवाल किये जाते हैं तो एक मुस्लिम से ६, वहीं यदि अन्य वर्ग २ सवालों के जवाब गलत देगा तो उसे थोडी ढिलाई से छोड़ दिया जाता है लेकिन हम लोग ६ में से यदि एक सवाल का जवाब भी गलत दे दें सो समझ जाइये शाम को थाने में हाजरी पक्की है.कब तक लोग हमारी देश भक्ति पर शक करते रहेंगे? हम भी ये सोचकर चुप हो जाए हैं की हमीं में से कुछ लोगों ने हमें बदनाम कर रखा है.
आशीष:
कभी कभी सोचता हूं कि यदि मैं मुस्लिम होता है तो इस देश में कैसे जीता?
घुघूती बासूती:
नदीम जी, आपकी बात को कुछ कछ समझ सकती हूँ । आशीष जी की तरह बहुत बार अपने आप को आपकी जगह रख कर सोचा है । स्थिति ऐसी हो गई है कि प्रकाश की किरण को हम सबको मिलकर ढूँढना होगा । हमें अपनी व आपकी व हम सबके धर्मों के लोगों की मानसिकता को भी समझना होगा । अन्य देशों के मुसलमानों के बारे में तो नहीं कह सकती, परन्तु अपने देश के लोगों के लिए जो समझ आता है वह कुछ वैसा लगता है जैसा मुझे पहाड़, उत्तराखंड को लेकर लगता है । यदि मैं उत्तराखंड में रह रही होती या मेरे आसपास के सब लोग उत्तराखंडी होते या मैं यहाँ एक अकेली उत्तराखंडी ना होती या मेरे घर में मेरी मातृभाषा कुमाऊँनी बोली जाती तो शायद मुझे वहाँ की इतनी याद, इतनी नॉराई नहीं लगती । बहुसंख्यक को ना अपनी भाषा , न अपनी संस्कृति को बचाए रखने का उतना उत्साह होता है, ना उसके खोने का उतना भय होता है जितना अल्पसंख्यक को । जहाँ तक पुलिस का प्रश्न है तो जैसा वेतन हम उन्हें देते हैं उसके अनुकूल ही उनका व्यवहार व निष्ठा हम पाते हैं । यदि हम सोचें कि मूँगफली देकर महामानव पुलिस वाले पाएँगें तो हम मूर्ख हैं।
नदीम:
घुघूती जी आपके विचारों के लिए तथा सहानभूति के लिए धन्यवाद. अब अगर ये समाज बदलेगा तो केवल पढ़ लिखे तथा खुले विचारों के लोग ही सुधरेंगे. मुझे उम्मीद है आप लोगों जैसे साथियों का साथ बना रहेगा.
Sunday, February 17, 2008
मैं मुसलमान होता तो इस देश में कैसे जीता?
Posted by
bhupen
at
2/17/2008
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15 comments:
नदीम जी दिल छोटा ना करे शायद हम सब लोग ऐसे ही किसी बुरे वक्त से गुजर रहे है पर उम्मीद रखिये नजरिया बदलेगा ,बहारे फ़िर से आयेगी,
नदीम भाई सलाम,
पहले तो मे आशीष जी के सवाल का जबाब देता हु.
कभी कभी सोचता हूं कि यदि मैं मुस्लिम होता है तो इस देश में कैसे जीता? आशीष जी कया मुस्लिम लोग अपने देश ( भारत ) मे दुखी हे,जेसे ओर लोग जि रहे हे,बेसे ही तुम जीते,अगर देखना हे तो देखो पडोसी देश को वहां तो सभी मुस्लिम हे,वो कितने प्यार से रहते हे? वहा कोई भुखा नही? कभी वहां खुनखारावा नही होता? आशीष जी थोडा आसपास देख कर बोलते हे भारत मे बाकी सभी सुखी हे कया ?
नदीम भाई,आप की परेशानी समझता हू,लेकिन जिस जगह के लोग या जो जगह कुछ खास लोगो के कारण बदनाम हो,आम लोग भी वहां से जाने से कतराते हे,फ़िर पुलिस तो पुरी पुछ्ताछ करती हे,चाहे वहां हिदु हो सिख हो या फ़िर मुस्लिम,हमारा पहला फ़र्ज देश के प्रति बनता हे,फ़िर बाद मे धर्म के प्रति,अगर हमारे आसपास कुछ गेर कानुनी होता हे,या देश के बिरुध होता हे तो हमारा फ़र्ज उसे रोकना हे,
जिस देश मे मे रहता हु, मुझे इस परकार की कोई मुश्किल नही आती, कई लोगो को आती हे लेकिन उन्ही लोगो को मुश्किल आती हे जो गलत काम करते हे, या गलत लोगो का साथ देते हे या उस इलाके मे रहते हे जहां ९०% गलत लोग रहते हे,
नदीम भाई मेरा सब से अच्छा दोस्त पकिस्तान से हे,जिसे मे अपना जिगरी दोस्त कहता हु,कई बार दुसरो की गलतिया का हर्जाना हमे भुगतना पड्ता हे,उस कारण देश कॊ या दुसरे देश वासियो को बुरा मत कहॊ,यह सब दुसरो के साथ भी हो सकता हे, नदीम भाई हम आप के साथ हे ऎसी बातो को नजर अंन्दाज करो
भूपेन - पिछली दो पोस्ट समर्थ सच्ची आवाजों की दिखीं -आपकी इन आवाज़ को ज़माने के दम मिलें - यहाँ इसलिए आवाज़ से जुड़ रहा हूँ कि (१) हर इंसान (हर पीढी?) के लिए उसके जीते इतिहास का कोई न कोई एक हिस्सा बाकी बचों से ज्यादा दर्द रखता है, इसलिए क्योंकि वही एक समय एक वार से बहुत सारे मूल्यों, मान्यताओं, सपनों को खट झटके में उड़ा देता है -[ ऐसा मुझे लगता है (जैसे अमूमन आपात्काल मुझसे ज़्यादा उमरदारों के लिए, और विभाजन उनसे ज़्यादा बड़े बुजुर्गों के लिए रहा)]. (२) अपने बारे में हासिल ऐसी दुर्घटना के लिए कह सकता हूँ कि - एक तरह नीति गत पृथक हिन्दू- मुस्लिम संवादों को महत्तम बनाने और उस बनावट पर नए राजनीतिक समीकरण को बुनना, कौम की सेंधों में जमे अविश्वास को दरारों का जामा देना, उसे देखना (बिना कुछ कर पाये) मेरी चेतन ज़िंदगी का सबसे बड़ा हादसा रहा है - (३) मुझे अभी भी लगता है कि मेरा बचपन का हिंदोस्तां/ भारत सिकुड़ कर उस समय संकुचित हो गया जब मस्जिद मन्दिर के मामले आवेगों के हवाले हुए - (४) सबसे बड़ा दुःख ये रहा कि धर्मांध कथा के इस अध्याय के नायक बहुत पढे लिखे रहे और हर क्रिया प्रतिक्रिया पूरी वैज्ञानिक व्याख्या के साथ पेशे खिदमत रही - (५) ताकि सनद रहे एक हिन्दोस्तान सारी दुनिया पर भारी रहेगा - अनेक टुकड़े किसी की इंसानियत बहाल नहीं रखेंगे (६) घृणा के बीजों पर संहाराओं का तांडव ही होगा - किसको चाहिए - [ उन्माद की माफी ] - मनीष
मेरे एक मित्र हैं, उस खेमे से जो मुस्लिमों के विरोध पर एक हद तक जीवित है। उन से मैं ने एक दिन पूछ लिया-अगर ईसा और मुहम्मद भारत में ही पैदा हुए होते तो?
हमारे पास चौबीस हैं हम उन्हें बुद्ध की तरह इन में शामिल कर अवतार छब्बीस कर देते। यह उन का उत्तर था।
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