राखी सावंत फिर चर्चा में है. इस बार इमेजिन टीवी पर प्रसारित होने वाला उसका शो राखी का इंसाफ़ विवादों के केंद्र में है. इस शो में हिस्सेदारी कर रहे झांसी के लक्ष्मण प्रसाद को राखी ने इस तरह जलील किया कि अपमान और अवसाद की वजह से उसने आत्महत्या कर ली. इस घटना के बाद राखी और उसके शो के बारे में तरह-तरह की चर्चाएं हैं. सूचना और प्रसारण मंत्रालय का कहना है कि इस शो में अश्लील भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है, नतीजतन इसके प्रसारण का वक़्त बदलकर रात नौ बजे के बदले ग्यारह बजे कर दिया गया, ताकि बच्चे इस शो को न देख पाएं. लेकिन इस घटना के मूल कारणों पर कोई भी सवाल उठाने का काम नहीं कर रहा है. एक इंसान को बेवजह मौत की तरफ़ धकेलने वाले इंसाफ़ पर हमारी सरकारें चुप्पी साधे हुए हैं.
भारतीय लोकतंत्र में न्याय हासिल करना कितना आसान है ये बात किसी से छिपी नहीं है! राखी का ये कार्यक्रम न्याय के उसी पाखंड की उपज है. एक तरह से राखी का इंसाफ़ वर्तमान न्याय प्रणाली की पोल खोलने वाला भी है, ये न्याय की पूरी अवधारणा को एक मज़ाक में बदल देता है. चैनल दावा करता है कि वो लोगों के पारिवारिक झगड़ों को सुलझाएगा. यानी, न्याय के लिए अब लोकतांत्रिक संस्थाओं के पास जाने की ज़रूरत नहीं, राखी सावंत जैसी जज नए न्याय सिद्धांतों के साथ अवतरित हो चुकी है ! न्याय दिलाने का दावा करने वाले इस तरह के रियलिटी शो लगातार न्यायपालिका की जगह लेने की कोशिश कर रहे हैं. इसके मूल में टेलीविजन चैनलों की मुनाफ़ा कमाने की होड़ के अलावा और कुछ नहीं है. ज़ाहिर होता है कि हमारे समाज में न्याय पाने के अधिकार की खिल्ली उड़ाई जा रही है.
इस साल सोलह अक्टूबर को राखी का इंसाफ़ शुरू हुआ था. शुरुआत से ही एक जज के तौर पर राखी की फूहड़ता अपने चरम पर थी. कहा गया कि बिना किसी क़ानूनी झंझट में पड़े राखी इसमें अपने दिल से न्याय करेगी. इस शो में पारिवारिक झगड़े सुलझाने में जुटी राखी ने झांसी के लक्ष्मण को नामर्द बोलकर उसे प्रताड़ित किया. शो में मौजूद दर्शकों ने भी उसका मज़ाक बनाया, जिसे वो बर्दाश्त नहीं कर पाया और उसने आत्महत्या कर ली. इतनी बड़ी घटना के बाद भी एनडीटीवी अपने इस शो को जारी रखे हुए हैं. शो की आलोचना के बाद बड़े-बड़े दिग्गज इसके पक्ष में कूद पड़े हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर वे दुनियाभर के बेहूदा तर्क दे रहे हैं. इस तरह कॉरपोरेट मीडिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहाने अराजकता की सारी हदें पार करता जा रहा है. राखी का इंसाफ़ जैसे रियलिटी शो भी इसी का एक उदाहरण हैं. गौरतलब है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रतता हमेशा सामाजिक वर्गों के हिसाब से परिभाषित होती रही है. वैसे भी, इसकी कोई निरपेक्ष परिभाषा नहीं है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को हमेशा समय और स्थान की सापेक्षता के संदर्भ में ही समझा जा सकता है. हाल के दौर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा झंडा पूंजीवादी मीडिया घराने ही उठा रहे हैं. मीडिया के नियमन की जब भी बात उठती है तो वे अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ लेने लगते हैं. मीडिया एथिक्स को ठेंगा दिखाकर वे हमेशा कॉरपोरेट हितों को पूरा करने में जुटे रहते हैं. इस तरह मुनाफ़ा कमाने की होड़ में एक बेहद ख़ूबसूरत विचार को उन्होंने बेहूदगी में बदल दिया है.
राखी का इंसाफ़ की आलोचनाओं बाद एनडीटीवी इस पर एक टॉक शो करवाता है. दलाली के आरोपों से घिरी बरखा दत्त उसमें ज़्यादातर ऐसे वक़्ताओं को बुलाती है जिनकी पक्षधरता साफ़ दिखाई देती है. शो में मौजूद ज़्यादातर लोग इसे मॉरल पुलिसिंग से जोड़कर देखते हैं. इस तरह प्रणय रॉय की हिस्सेदारी वाली एक कंपनी राखी का इंसाफ़ दिखा रही है तो दूसरी तरफ़ उनका समाचार चैनल उस टॉक शो के पक्ष में माहौल बनाने का काम कर रहा है. (पिछले साल दिसंबर में एनडीटीवी इमेजिन को टर्नर ब्रॉडकास्टिंग सिस्टम को बेच दिया गया था लेकिन अब भी क़रीब आठ फ़ीसदी शेयर एनडीटीवी के पास बचे हैं.) इससे भारत में मीडिया क्रॉस होल्डिंग को लेकर किसी ठोस क़ानून का न होना भी सामने आता है. जिसका फ़ायदा उठाकर एक ही कंपनी समाचार चैनल भी चला रही है और मनोरंजन चैनल भी. इसके अलावा बाक़ी कई धंधों में भी समाचार चैनल चलाने वाली कंपनियों की हिस्सेदारी रहती है, जो स्वाभाविक तौर पर सहयोगी कंपनियों के पक्ष में माहौल बनाने का काम करती हैं.
मुख्यधारा के मीडिया में राखी सावंत पहले से आइटम गर्ल के नाम से कुख्यात है. यानी, बाज़ारू मीडिया ने एक महिला की गरिमा को यहां पर एक सेक्स आइटम यानी वस्तु में बदल दिया है. राखी को भी इस पर कोई आपत्ति नहीं है, क्यों कि उसकी रोजी-रोटी इसी से चलती है लेकिन एक सभ्य समाज में इस तरह की शब्दावली की स्वीकृति भी हमारे लोकतंत्र पर कई सवाल खड़े करती है. हमारी न्याय प्रणाली में ऐसा कोई रास्ता नहीं है जो इस तरह की बेहूदगी के प्रसार को रोक पाए. बाज़ार के इस पूरे खेल में राखी जैसे महिलाओं को एक सनसनी के तौर पर मीडिया इस्तेमाल करता है और अपना धंधा चमकाता है. राखी की इसी छवि को अब एनडीटीवी इमेजिन इस्तेमाल कर रहा है और न्याय को फ़ूहड़ता और सनसनी का पर्याय बनाने में तुला हुआ है.
गौरतलब है कि सबसे पहले स्टार प्लस पर किरण की कचहरी नाम से पूर्व आइपीएस अफ़सर किरण बेदी से न्याय कराया था. साफ़ है कि स्टार प्लस का भी न्याय दिलाने में कोई भरासा नहीं था. अपने कार्यक्रम की रेटिंग बढ़ाना और मुनाफ़ा कमाना ही उसका भी मुख्य लक्ष्य था. इसके लिए उसने तेज तर्रार मानी जाने वाली देश की पहली महिला आईपीएस अफ़सर की छवि को भुनाने की कोशिश की. बाज़ार में न्याय की अवधारणा के साथ इस तरह की छेड़छाड़ अब राखी का इंसाफ़ तक पहुंची है.
(समकालीन जनमत के दिसंबर अंक में प्रकाशित)
Monday, December 13, 2010
इंसाफ़ की दुकान
Posted by
bhupen
at
12/13/2010
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