Wednesday, February 2, 2011

2010 : कॉरपोरेट मीडिया के बेनकाब होने का साल

दो हज़ार दस का साल भारतीय समाचार मीडिया के चरित्र को समझने के लिहाज़ से काफ़ी महत्वपूर्ण रहा. पहली बार जनता के सामने ये बात खुल कर आ पाई कि कॉरपोरेट घराने, मीडिया के इस्तेमाल से किस तरह सत्ता का सौदा करते हैं और उसे अपने हित में इस्तेमाल करते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो इस बात की पोल खुल गई कि बड़ी पूंजी, मीडिया और राजनीतिज्ञों का गठजोड़, किस तरह उदारीकरण, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र जैसे ख़ूबसूरत शब्दों की आड़ में झूठ, फ़रेब और बेईमानी का साम्राज्य चलाता हैं.
दो हज़ार नौ में लोकसभा चुनाव के अलावा हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव भी हुए थे. इन चुनावों में कई अख़बारों पर आरोप लगा कि वे पार्टियों और उम्मीदवारों के पक्ष में ख़बर छापने के लिए पैसे मांग रहे हैं. हालांकि इस तरह की ख़बरें पहले हुए कुछ चुनावों में भी सामने आ चुकी थी. 2007 में हुए उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के दौरान भी मीडिया घरानों ने ख़बरों का सौदा शुरू कर दिया था. टाइम्स ऑफ़ इंडिया, मीडियानेट और प्राइवेट ट्रीटी के माध्यम से क़रीब दो दशक पहले ही ख़बरें बेचने का सांस्थानिक तरीक़ा तलाश चुका था. लेकिन दो हज़ार नौ की घटना के बाद पेड न्यूज़ चर्चा में आ गया. लखनऊ से सांसद का चुनाव लड़ रहे भाजपा नेता लाल जी टंडन ने दक्षिणपंथी रुझान वाले दैनिक जागरण की तरफ़ से पैसा मांगने पर याद दिलाया कि उन्होंने जागरण के लिए क्या नहीं किया, फिर भी वो पक्ष में ख़बर छापने के लिए पैसे मांग रहा है. चौतरफ़ा चर्चा होने के बाद प्रेस काउंसिल ने पेड न्यूज़ के मामले में अपनी पहल पर दो सदस्यीय जांच कमेटी का गठन किया. दो हज़ार दस में इस कमेटी ने काउंसिल को अपनी रिपोर्ट सौंप दी लेकिन प्रेस परिषद ने कॉरपोरेट लॉबी के दबाव में पूरी रिपोर्ट को सामने नहीं आने दिया. पूरी रिपोर्ट में उन अख़बारों का नाम लिया गया था जिन्होंने पक्ष में ख़बर छापने के बदले पैसे लिए थे. भले ही प्रेस परीषद ने आधिकारिक तौर पर पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की लेकिन आउटलुक पत्रिका ने अपनी वेबसाइट में पूरी रिपोर्ट प्रकाशित कर दी. उसके बाद समयांतर पत्रिका ने भी इसके महत्वपूर्ण अंशों को हिंदी में अनुवाद कर प्रकाशित किया.
पेड न्यूज़ (ख़बरों का सौदा) की घटना सामने आने के बाद एक बार फिर ये साफ़ हो गया कि भारतीय लोकतंत्र में किस तरह धंधेबाज़ मीडिया भ्रष्ट नेताओं के हाथ का खिलौना है. लेकिन हैरानी की बात ये है कि इस प्रसंग में न तो मीडिया घरानों पर लगाम कसने के लिए अब तक कोई कार्रवाई हो पाई है और न ही ऐसे नेताओं को कटघरे में खड़ा किया गया है, जिन्होंने अपने पक्ष में ख़बर छापने के लिए अख़बारों को पैसे दिए. इस पूरे मामले में अख़बारों के काम को सिर्फ़ एक विचलन के तौर पर देखा गया. इसमें ना तो पूरी तरह मुनाफ़ाखोरी में बदलती पत्रकारिता पर कोई सवाल उठाया गया और न ही पूंजी पर टिकी चुनाव व्यवस्था की पोल खोली गई. हैरानी की बात ये है कि जिन नेताओं ने पक्ष में ख़बर छापने के लिए अख़बारों को पैसे दिए उन्हें किसी पीड़ित की तरफ़ पेश किया गया. इस पूरी घटना से एक बात साफ़ हो गई कि मुनाफ़ाखोरी पर टिका कॉरपोरेट मीडिया पैसे वाले राजनीतिज्ञों के साथ मिलकर सत्ता की सौदेबाज़ी करता है. इस घटनाक्रम में प्रेस परिषद जैसी संस्था के बारे में भी ये साफ़ हो गया कि उसकी संरचना और उसका काम कॉरपोरेट हितों के अनुरूप ही है. कॉरपोरेट, पेड न्यूज़ और लोकतंत्र के रिश्तों को परिभाषित करते हुए इस साल पत्रकार दिलीप मंडल ने मीडिया का अंडवरवर्ल्ड नाम से एक किताब भी लिखी है, जो कॉरपोरेट मीडिया के चेहरे से नकाब उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.
साल के आख़िर में 176 हज़ार करोड़ रुपए के टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले के उजागर होने के बाद कॉरपोरेट, मीडिया और राजनीतिज्ञों के गठजोड़ की पोल पूरी तरह खुल गई. कॉरपोरेट दलाल नीरा राडिया के साथ बातचीत के टेप सामने आऩे के बाद ये साफ़ हो गया कि टाटा और अंबानी जैसे बड़े व्यावसायिक घराने किस तरह मीडिया का इस्तेमाल करते हैं और देश की सरकार बनाने में भी भूमिका निभाते हैं. इस घटना से एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई कि इस देश में तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया का मतलब कॉरपोरेट मीडिया है, मुनाफ़ा कमाना जिसका पहला लक्ष्य है. ज़्यादातर चर्चाओं में इस पूरी घटना को इस तरह पेश करने की कोशिश की जा रही है कि ये कॉरपोरेट, मीडिया और राजनीतिज्ञों के गठजोड़ का मामला है. लेकिन इस संदर्भ में ध्यान देने वाली बात ये है कि मीडिया और लोकतंत्र का अस्तित्व कॉरपोरेट से अलग नहीं रह गया है. जिस तरह हमारा मुख्यधारा का मीडिया कॉरपोरेट मीडिया में बदल चुका है उसी तरह हमारा लोकतंत्र भी पूरी तरह कॉरपोरेट लोकतंत्र में तब्दील हो चुका है. इस लिहाज से देखा जाए तो कॉरपोरेट हितों के हिसाब से ही हमारा मीडिया भी चल रहा है और हमारा लोकतंत्र भी चल रहा है. अभी जो घटनाएं दिखाई दे रही हैं वो सिर्फ़ झांकी भर है, पूरा खेल काफी गंभीर है. उम्मीद की जानी चाहिए कि आगे इस कांड में और भी तथ्य सामने आएंगे.
ये बात सही है कि राडिया कांड कॉरपोरेट घरानों के आपसी विवाद के चलते ही सामने आ पाया. लेकिन इसी बहाने अब लोग पर्दे के पीछे चलने वाले कॉरपोरेट खेल को समझने लगे हैं. इस लिहाज़ से ये साल कॉरपोरेट मीडिया की छवि के दरकने का साल भी है. एनडीटीवी और द हिंदू जैसे गंभीर और तथाकथित जनपक्षीय माने जाने वाले टीवी चैनलों और अख़बारों की असलीयत भी पूरी तरह जनता के सामने आ चुकी है. प्रणव रॉय ने एनडीटीवी का साम्राज्य बनाने के लिए कितने कुकृत्य किए हैं इस पर से भी पर्दा उठने लगे है. प्रणव रॉय़ का इतिहास इस मामले में कॉरपोरेट अपराधों और साजिशों की तरफ़ इशारा करने वाला है. इस सिलसिले में द संडे गार्डियन में ख़बर छपते ही मीडिया के हलकों में खलबली मच गई. इसी तरह हिंदू जैसे अख़बार ने भले ही पेड न्यूज़ को लेकर संपादकीय और पी. साईनाथ के कई लेख छापे हों लेकिन नीरा राडिया केस में इस ग्रुप के ही बिजनेस लाइन के संपादक और नीरा राडिया की बातचीत का टेप भी सामने आ चुका है. एक टेप में तो द हिंदू के संपादक एन राम का भी जिक्र है. इसलिए मुनाफ़ाखोरी पर टिका मीडिया कितना ही न्यायसंगत और प्रगतिशील क्यों न दिखाई दे उससे बहुत ज़्यादा उम्मीदें पालना ठीक नहीं. उदाहण के लिए द हिंदू ने इस इस बार मीडिया क्रिटिक सेवंती नैनन का राडिया कांड पर लिखा कॉलम अख़बार में छापने से मना कर दिया. इन सब बातों से पता चलता है कि कॉरपोरेट मीडिया की असलीयत क्या है. इसलिए अब ज़रूरी हो गया है कि मीडिया में नैतिकता की बात जोर-शोर से उठाई जाए और पत्रकारिता को सिर्फ़ पूंजीपतियों के हवाले गिरवी रखने का विरोध किया जाए. इस बारे में ठोस नियम-क़ायदों की मांग हर हाल में की जानी चाहिए. अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब कॉरपोरेट लूट-खसोट की आज़ादी से बिल्कुल नहीं होना चाहिए.
अंतरराष्ट्रीय मीडिया की घटनाओं को देखें तो ये साल विकिलीक्स और जूलियन अंसाज का साल है. जूलियन अंसाज ने अपने साथियों के साथ वो काम कर दिखाया है जिसे करने में कॉरपोरेट मीडिया मुनाफ़ा ना मिलने की हालत में अक्सर बच के निकलता रहा है. अंसाज ने जिस तरह से अपनी वेबसाइट विकिलीक्स में सत्ता से जुड़े लोगों की जनविरोधी करतूतों से दुनियाभर को जागरूक किया है. विकिलीक्स ने पर्दाफ़ाश किया है कि अमेरिका ने अपनी ज़िद की ख़ातिर इराक और अफ़गानिस्तान पर किस कदर सितम ढाए थे. इस बात से बौखलाया अमेरिका अंसाज के पीछे पड़ गया है. यही वजह है कि ऑस्ट्रेलियाई नागरिक असांज को ब्रिटेन में गिरफ़्तार किया गया है. उस पर अमेरिकी खुफ़िया एजेंसी के दबाव में दो महिलाओं ने स्वीडन में बलात्कार का केस दर्ज किया है. इस घटना ने एक बार फिर मीडिया में तकनीकी विकास की वजह से आ रही नई स्थितियों को हमारे सामने रखा है. ये बात सही है कि अभी इंटरनेट या न्यू मीडिया तक सभी वर्गों की पहुंच संभव नहीं हो पाई है. लेकिन विकिलीक्स के जो काम किया है उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती. हाल के दौर मे जिस तरह से कई नए ब्लॉग और साइट्स हमारे सामने आए हैं उससे भी पता चलता है कि इस मीडिया पर फिलहाल ज़्यादा लोकतांत्रिक जगह मौजूद है. ऐसा नहीं है कि ये माध्यम पूरी तरह से कॉरपोरेट हस्तक्षेप से मुक्त है लेकिन असांज जैसे गुरिल्ला पत्रकारिता के कुछ उदारहणों के लिए ये ज़्यादा बेहतर जगह मुहैया करा रहा है.
इधर, हमारे देश में भी हालात ऐसे बन रहे हैं कि जो भी पत्रकार असहमति की आवाज़ उठाएगा, कॉरपोरेट लोकतंत्र के लिए चुनौती खड़ा करेगा वो मारा जाएगा. कुल मिलाकर जैसा हमारा समाज है, वैसा ही मीडिया है. यही वजह है कि जब शासक वर्ग देश के विकास की तस्वीर दिखाता है तो कॉरपोरेट मीडिया उसके सुर में सुर मिलाकर राष्ट्रीय गौरव के गीत गाने लगता है. तब भारत को दुनिया में एक सुपर पावर की तरह देखने और ग्रोथ रेट के हिसाब से देश का विकास मापने का चलन स्थापित हो जाता है. जो भी इस विकास की पोल खोलता है वो ना तो कॉरपोरेट लोकतंत्र के काम का होता है ना ही मीडिया के. यही वजह है कि जब इस साल आंध्र प्रदेश पुलिस ने वामपंथी पत्रकार हेमचंद्र पांडे की सीपीआई (माओवादी) के प्रवक्ता आज़ाद के हत्या साथ फर्जी मुठभेड़ में हत्या की तो कॉरपोरेट मीडिया को इसमें कोई ख़बर नज़र नहीं आई. पुलिसिया फीडबैक पर काम करते हुए वो इस बात में ज़्यादा उलझा रहा कि हेम चंद्र पांडे का माओवादी पार्टी से कोई संबंध तो नहीं था. उसने इस विवेक का इस्तेमाल करने की ज़रूरत नहीं समझी कि हेम चंद्र पांडे अगर माओवादी भी थे तो क्या पुलिस को उन्हें फर्जी मुठभेड़ में मारने का अधिकार मिल जाता है ? अच्छी बात ये है कि देशभर के जनवादी पत्रकारों ने हेम की हत्या का विरोध किया और पत्रकारों की अंतरराष्ट्रीय बिरादरी ने भी इस हत्याकांड की निंदा की. लेकिन पैसे के बल पर बड़े पत्रकार बने किसी भी कॉरपोरेट एजेंट ने इस घटना पर जुबान नहीं खोली, नई दुनिया के संपादक आलोक मेहता की तरह अगर किसी ने जुबान खोली भी तो उसने हेम को पत्रकार मानने से ही इनकार कर दिया. इस तरह के पत्रकार जब अपने बंद एसी कमरों से बाहर जनता के बीच आते हैं तो उन्हें जनता का आक्रोश झेलना पड़ता है. आलोक मेहता के साथ भी हिंदी पत्रिका हंस के सालाना जलसे में यही हुआ. समारोह में मौजूद युवाओं ने उनके ख़िलाफ़ नारेबाज़ी की. कुल इसी तरह का हाल प्रेस क्लब में हुई एक मीटिंग में राजदीप सरदेसाई का भी था. जब राडिया कांड में दलाल पत्रकारों को सही साबित करने वाली उनकी मनमानी व्य़ाख्याओं के ख़िलाफ़ पत्रकारों ने कड़ा विरोध दर्ज किया.
ख़ुफिया एंजेंसियां और कॉरपोरेट हमेशा कुछ पत्रकारों को ख़बरें प्लांट करने के लिए इस्तेमाल करते हैं. बरखा, वीर सांघवी और प्रभु चावला वाला केस सामने आने से पहले इस साल एनडीटीवी की नीता शर्मा का मामला चर्चा में आया. नीता शर्मा को इस साल सर्वश्रेष्ठ समाचार रिपोर्टर का पुरस्कार मिला. द हिंदू के पत्रकार सिद्धार्थ वर्दराजन ने इस पुरस्कार के ख़िलाफ़ जूरी के सदस्य विनोद मेहता को ख़त लिखा. इसके बाद नीता शर्मा के ख़िलाफ़ पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग सामने आया. नीता ने कभी हिंदुस्तान टाइम्स में रहते हुए कश्मीर टाइम्स के दिल्ली संवाददाता इफ्तिख़ार गिलानी को पुलिस के कहने पर आतंकवादी ठहरा दिया था. जिसके परिणामस्वरूप गिलानी को काफी समय जेम में भी बिताना पड़ा. वहीं उन्होंने निर्दोष होने के बावजूद प्रताड़ना झेलने वाले अपने पअनुभवों पर एक किताब भी लिखी. गौरतलब है कि कुछ इसी तरह की इकतरफ़ा ख़बरें आजकल टाइम्स ऑफ़ इंडिया की राखी चक्रवर्ती भी दे ऱही है. कॉरपोरेट, पुलिस और सरकार के ऐसे एजेंट पत्रकारों की संख्या अकेले दिल्ली में ही सैंकड़ों में है. जहां आम श्रमजीवी पत्रकार को अपनी नौकरी गंवाने का डर रहता है. वहीं ऐसे पत्रकारों को लाखों-करोड़ों रुपए की अश्लील तनख्वाह मिलती है और पुरस्कार अलग से मिलते हैं. पिछले दरवाज़े से आने वाले पैसे को कोई हिसाब यहां नहीं है. आम लोगों को ये जानकार हैरानी हो सकती है कि सीएनबीसी चैनल के एक संपादक ने इस साल छह करोड़ रुपए का वैध टैक्स चुकाया है.
दो हज़ार दस में दिल्ली से निकलने वाले बिजनेस स्टैंडर्ड में काम करने वाली पत्रकार निरुपमा की उसके घर कोडरमा (झारखंड) में हुई मौत ने भी मीडिया और हमारे समाज पर कई सवाल खड़े किए. इस घटना के बाद उसके मां-बाप पर ही हत्या के आरोप लगे. निरूपमा अपने अपनी मर्जी से अंतर्जातीय विवाह करना चाहती थी लेकिन उसके परिवार को ये मंजूर नहीं था. इस तरह सामंती समाज की जकड़न तोड़ रही एक लड़की की आवाज़ को हमेशा के लिए शांत कर दिया. इस मामले को स्थानीय मीडिया ने जिस तरह से उठाया उससे पता चला कि हमारे मीडिया में जातीय गोलबंदी भी किस हद तक फ़ैली हुई है. दिल्ली के कुछ पत्रकार भी इस मामले में जातीय गोलबंदी करते देखे गए. इस बात को ध्यान में रखते हुए न्यूज़ रूम विविधता का सवाल एक बार फिर महत्वपूर्ण हो जाता है. जिसमें दलित, आदिवासियों के साथ ही हर सामाजिक तबके लोगों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके.
इस साल एक ख़ास बात और हुई कि राडिया कांड में बरखा दत्ता, वीर सांघवी, प्रभु चावला, राजदीप सरदेसाई, एमके वेणु जैसे कई स्वनामधन्य पत्रकारों का नाम आने के बाद उनके पक्ष में भी माहौल बनाने की कोशिशें चल रही है. हेमचंद्रपांडे के पत्रकार होने ना होने पर जिस तरह कॉरपोरेट मीडिया ने सवाल उठाए वैसे कोई इस बात पर सवाल नहीं उठा रहा है कि राजदीप सरदेसाई पत्रकार हैं या नहीं ? अगर पत्रकार है तो वो शख़्स अपनी कंपनी का मालिक कैसे हो सकता है. क्या मालिक और पत्रकार के हित आपस में नहीं टकराते? यही सवाल अपनी कंपनी में मालिकाना हक़ रखने वाले प्रणव रॉय और बरखा दत्त जैसे लोगों से भी पूछा जा सकता है.
अंत में दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स की भी थोड़ी-सी चर्चा करना ज़रूरी है. इस दौरान भी धंधेबाज़ मीडिया के ख़ूब वारे-न्यारे हुए. जिनको आर्थिक फ़ायदे नहीं मिले वो आयोजन की अव्यवस्थाओं के बारे में लिखता रहा. लेकिन जैसे ही गेम शुरू हुए, विज्ञापनों का फ्लो बढ़ा नकारात्मक ख़बरें आनी बंद हो गईं. अब कॉमनवैल्थ खेलों के दौरान हुए भ्रष्टाचार को राडिया कांड ने पूरी तरह ढक दिया है. हो सकता है कि आने वाले दिनों में कोई प्रायोजित बड़ी घटना हो जाए और स्पेक्ट्रम घोटाला और राडिया कांड कभी पृष्ठभूमि में चला जाए. लेकिन इस सब के बावज़ूद इतना तय है कि अब बोतल से बाहर निकले जिन्न को फिर से बंद करना इतना आसान भी नहीं होगा. लोगों के पास कॉरपोरेट मीडिया की हक़ीक़त समझाने वाले कई उदाहरण सामने आ चुके हैं. इस बात का ज़रूर ध्यान रखना होगा कि कॉरपोरेट मीडिया जिस तरह एजेंडा सेट करता है, वो बीच में ही कहीं एजेंडा ना बदल दे.
(समकालीन जनमत के जनवरी अंक में प्रकाशित)

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