नीरा राडिया कांड ने भारतीय समाचार मीडिया और लोकतंत्र पर कई सवाल खड़े किए हैं. कॉरपोरेट घराने मीडिया का इस्तेमाल कर कैसे राजनीति और समाज को संचालित करते हैं इसकी झलक मिल चुकी है. इस घटना को मीडियाचालन (मीडियाटाइजेशन) की अवधारणा के तहत बेहतर तरीक़े से समझा जा सकता है. पूंजीवादवादी लोकतंत्र के परिणामस्वरूप सामने आए इस मर्ज में कई जटिलताएं हैं. ऊपरी यथार्थ के नीचे यथार्थ की कई और परतें हैं. इसे सिर्फ़ आर्थिक वैश्वीकरण और कॉरपोरेटीकरण जैसी अवधारणाओं के भीतर समेटना थोड़ा मुश्किल है. दरअसल मीडियाचालन हमारे समय की इन अवधारणाओं की उपज ज़रूर है लेकिन इसे समझने के लिए कुछ विशेष सैद्धांतीकरण ज़रूरी हैं. मीडियाचालन में न सिर्फ़ मीडिया के संरचनागत मुद्दों को उठाया जाता है बल्कि उनके प्रभावों को भी समझने की कोशिश की जाती है. इसके बावजूद यह न तो शुद्ध रूप में मीडिया के राजनीतिक अर्थशास्त्र की प्रक्रिया है और न ही सिर्फ़ मीडिया प्रभावों का सांस्कृतिक अध्ययन. (शुल्ज, 2004)
मीडियाकरण और मीडियाचालन
मीडियाकरण (मीडिएशन ) और मीडियाचालन ऐसी प्रक्रियाएं है जिनका संबंध सिर्फ़ राजनीति से ही नहीं है बल्कि इनमें हर तरह के सामाजिक अनुभव शामिल होते हैं. कई बार मीडियाचालन और मीडियाकरण को पर्याय के तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिश की जाती है. लेकिन इन दोनों में फ़र्क होता है. (मेज्ज़ोलेनी और शुल्ज, 1999) मीडिया द्वारा प्रचारित-प्रसारित घटनाओं के आधार पर अक्सर समाज के विचार और व्यवहार आकार ग्रहण करते हैं. यह एक तरह से मीडियाकरण की प्रक्रिया है. मीडियाकृत राजनीति का संबंध उस स्थिति से है जिसमें मीडिया शासित और शासकों के बीच संचार का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत बन जाता है. इस तरह के हालात में लोग राजनीतिक और सामाजिक सूचनाओं के लिए मीडिया पर निर्भर रहते हैं. ठीक इसी तरह राजनीतिज्ञ और शासक भी जनता की राय जानने और उन तक पहुंचने के लिए मीडिया का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे हालत में धीरे-धीरे राजनीतिक किरदारों का सीधा संबंध समाज से कटता जाता है. राजनीतिक संचार सभाओं, रैलियों और आमने-सामने की बातचीत के बजाय मीडिया के माध्यम से होने लगता है.
मीडियाचालन का सबसे पहले इस्तेमाल मीडिया का राजनीतिक संचार पर असर जानने के लिए किया गया. स्वीडिश मीडिया रिसर्चर केन्ट एस्प ने मीडियाचालित राजनीति के बारे में बात की. ऐस्प ने इस अवधारणा का विकास स्वीडिश समाजशास्त्री गुडमुंड हर्नेस के शब्दों से किया. हर्नेस ने मीडिया और राजनीति के संबंधों के फलस्वरूप बनने वाले समाज के लिए मीडिया ट्विस्टेड सोसायटी (मीडिया द्वारा तोड़ा-मरोड़ कर बनाया गया समाज) का इस्तेमाल किया था. (स्ट्रॉमबैक, 2008)
मीडिया तर्क बनाम राजनीतिक तर्क
मीडियाचालन को अच्छी तरह समझने के लिए मीडिया तर्क (मीडिया लॉजिक) को समझना जरूरी है. पूंजीवादी लोकतंत्र में मीडिया जब बहुत प्रभावशाली हो जाता है तो वो सबसे ज़्यादा फ़िक्र अपने व्यावसायिक हितों की करता है. सामाजिक सरोकार उसके लिए कोई मायने नहीं रखते. वो रेटिंग और प्रसार बढ़ाने के लिए कई ऊल-जलूल हरकतें करने लगता है. जिससे समाचार मीडिया में सूचना एकत्र करने से लेकर उन्हें प्रस्तुत करने के तरीक़ों में बड़ा बदलाव आ जाता है. (एलथीड और स्नो, 1979) इस तर्क के तहत लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचने के लिए मीडिया अपने फॉर्मेट में लगातार प्रयोग करता है. भारतीय न्यूज़ चैनलों और अख़बारों के फॉरमेट में हो रहे बदलावों को भी इस संदर्भ में समझा जा सकता है.
मीडिया तर्क लगातार सारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को धीरे-धीरे अपने अधीन करने की तरफ़ बढ़ता है. तब उसका टकराव राजीतिक तर्क से होता है. राजनीतिक तर्क (पॉलिटिकल लॉजिक) में नेता, मंत्री और नौकरशाह जैसे किरदार अहम रोल में होते हैं. वे हमेशा सार्वजनिक तौर पर अपनी सरकार, पार्टी और जनता के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों की बात करते हैं. वे मीडिया को बेलगाम होने की अनुमति नहीं देते बल्कि उसका इस्तेमाल अपना हित साधने में करते हैं. इस तरह पूंजी पर टिके मीडिया तर्क और राजनीतिक तर्क में हमेशा एक तनाव चलता रहता है. हाल के दौर में जिस तरह के मीडिया नियमन को लेकर मीडिया मालिकों और राजनेताओं के बीच आंख-मिचौली का खेल चल रहा है उसके आधार पर इन तर्कों के फ़र्क को समझा जा सकता है. (मेयर 2002)
मीडिया तर्क और राजनीतिक तर्क के आधार पर स्ट्रॉमबैक (2008) ने मीडिया चालित राजनीति के चार चरण बताए हैं. यह सभी चरण पश्चिमी लोकतंत्रों के आधार पर निर्धारित किए गए हैं. लेकिन अगर इनकी तुलना भारतीय मीडिया से करें तो दोनों जगह की तस्वीरें बहुत हद तक मिलती-जुलती लगेंगी.
मीडिया चालित राजनीति के चार चरण
पहले चरण में मास मीडिया सूचना और संचार का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत होता है. यह संचार नागरिकों, राजनीतिक संस्थाओं और राजनीतिक दलों के किरदारों के बीच होता है. इस दशा में राजनीति मीडियाकृत होती है. (स्ट्रॉमबैक, 2008) इस तरह यह बाद में होने वाले मीडियाचालन के लिए ज़रूरी है. यह पाठकों -दर्शकों की अभिवृत्ति, प्रत्यक्षीकरण और मत को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाता है. जब राजनीति पहले पहले चरण के मीडियाचालन में पहुंच जाती है तो मीडिया द्वारा गढ़ा गए यथार्थ का असर लोगों के प्रत्यक्षीकरण पर होने लगता है. जिनका असर लोगों के मत निर्माण के वक़्त पड़ता है. राजनीति मीडिया चालन के पहले चरण में पहुंची या नहीं इस बात का पता लगाने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि क्या मीडिया शासकों और शासितों के बीच में सूचना और संचार का प्रमुख स्रोत है या नहीं. इस चरण में राजनीतिक दलों के मीडिया को छोड़कर बाक़ी मीडिया पर राजनीतिक तर्क कम होता है लेकिन इतना भी कम नहीं होता कि मीडिया तर्क पूरी तरह हावी हो जाए. इस चरण में हर हाल में मुनाफ़ा कमाने वाला मीडिया तर्क सबसे ज़्यादा आपे में रहता है.
दूसरे चरण में मीडिया सरकारी और राजनीतिक संस्थाओं से ज़्यादा स्वतंत्र हो जाता है. यहां मीडिया तर्क काम करता शुरू कर देता है. इसमें व्यवसायिक हित ज़्यादा हावी होने लगते हैं. पत्रकारों के पेशेवर होने की दुहाई दी जाने लगती है. राजनीति को लेकर स्वामीभाव रखने के बजाय ज़्यादा यथार्थपरक नज़रिया अपनाना शुरू हो जाता है. ख़बरों के फॉर्मेट में पाठकों-दर्शकों को लुभाने के लिए हर रोज़ कुछ नयापन तलाशने की कोशिश करता है. फिर भी इस चरण में मीडिया तर्क को पूरी छूट नहीं मिल पाती. राज्य के नियम-कानून उसके रास्ते की बाधा बनते रहते हैं. इस तरह यहां मीडिया आधी स्वतंत्रता हासिल कर लेता है. राजनीतिक और सांस्थानिक किरदार इसमें प्रभावशाली होते हैं लेकिन वे मीडिया को नियंत्रण में नहीं रख पाते और मीडिया में अपने हितों को जबरदस्ती नहीं थोप सकते.
तीसरे चरण में भी मीडिया समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सूचना और संचार का प्रमुख स्रोत होता है. मीडिया की आत्मनिर्भरता दूसरे चरण की तुलना में ज़्यादा बढ़ जाती है. इसमें राजनीतिक और सामाजिक किरदारों को मीडिया के अनुसार ढलना पड़ता है. इसमें राजनीतिक तर्क पर मीडिया तर्क हावी होने लगता है. खीझे हुए राजनीक किरदारों को न्यूज मैनेजमेंट और स्पिन डॉक्टरिंग की मदद लेनी पड़ती है. इसमें राजनीतिक और दूसरे सामाजिक किरदारों के पास मीडिया को अपनाने के अलावा कोई चारा नहीं बचता. इस हालत में मीडिया लॉजिक बहुत ताकतवर हो जाता है. राजनीतिक नीति-निर्माण में भी मीडिया की भूमिका बढ़ जाती है. यहां मीडिया इतना मजबूत हो जाता है कि राजनीतिक-सामाजिक किरदारों के लिए मीडिया की अनदेखी करना मुश्किल हो जाता है. यहीं कहीं एजेंटा सेंटिग और फ्रेमिंग की प्रक्रिया भी चलती है. ये सब मीडिया मालिक अपने फ़ायदे के लिए करते हैं. इस स्थिति के बारे में एथलीड और स्नो (1991) कहते हैं- ऐसा लगता है जैसे सारी संस्थाएं मीडिया संस्थाएं बन गई हों. वे आगे कहते है कि ऐसे हालात में सांगठनिक पत्रकारिता का अंत दिखाई देने लगता है. ख़बरें उत्पाद में बदल जाती हैं और असली ख़बरों से ज़्यादा उनके प्रस्तुतिकरण पर ज़्यादा ध्यान दिया जाने लगता है. इन दबावों की वजह से राजनीतिक और सामाजिक किरदार अपनी बात सामने लाने के लिए न्यूज इवेंट करने लगते हैं. मीडिया में इस तरह सनसनी और सेलिब्रेटीज को ज़्यादा अहमियत मिलने लगती है.
इस चरण में थथार्थ का चित्रण पूरी तरह मीडिया तर्क के आधार पर होने लगता है. इस तरह एक मीडियाकृत यथार्थ का निर्माण होता है, जिसमें यथार्थ ग़ायब हो जाता है. इस तरह यथार्थ से ज़्यादा महत्वपूर्ण मीडियाकृत यथार्थ हो जाता है. क्यों कि लोगों की पहुंच में यही मीडियाकृत यथार्थ होता है इसलिए वे इसी पर अपनी प्रतिक्रिया ज़ाहिर करते हैं. लिपमन (1997) की भाषा में यह छद्म वातारण है तो निम्मो और कॉम्ब (1983) इसे फंतासी की दुनिया कहते हैं. इस चरण में राजनीतिक और सामाजिक किरदार मीडिया की भूमिका से खिन्न रहने लगते हैं. वे कोशिश शुरू करते हैं कि राजनीतिक तर्क मजबूत हो पाए. तस तरह मीडिया और राजनीतिक तर्क के बीच तनाव तेज़ हो जाता है. तीसरे चरण में राजनीतिक किरदार मीडिया को बाहरी तत्व मानते हैं लेकन वे ख़बरों के लिए उसी पर निर्भर रहते हैं. वे चुनाव प्रचार के दौरान, नीतियां बनाते हुए और शासन चलाते हुए जनता की बजाय हमेशा मीडिया का ध्यान रखते हैं.
चौथे चरण में मीडिया तर्क इतना ताकतवर हो जाता है कि मीडिया अपने फ़ायदे के लिए नैतिकता की हर हद तोड़ने लगता है. ऐसे हालात में कई बार राजनीतिक-सामाजिक किरदार मीडिया तर्क और राजनीतिक तर्क का फ़र्क भी भूल जाते हैं. इस तरह यहां एक तरह से राजनीति, मीडिया लॉजिक का उपनिवेश बन जाती है. राजनीतिक किरदार पूरी तरह मीडिया तर्क के सामने समर्पण कर देते हैं. इस चरण में मीडिया का इस्तेमाल राजनीति को मनमुताबिक ढालने में होने लगता है.
राडिया कांड, पेड न्यूज़ और मीडियाचालन
न्यूज मीडिया को लोकतंत्र को चौथा स्तंभ मानने वालों के लिए यह वक़्त आंख खोलने का है. उन्हें अब समझना पड़ेगा कि लोकतंत्र का तथाकथित वॉचडॉग (पहरेदारी करने वाला) अब लैपडॉग (कॉरपोरेट की गोद में खेलने वाला कुत्ता) बन चुका है. इस तरह हमारे यहां मीडियाचालन की प्रक्रिया अपने पूरे ज़ोर पर है. मीडिया तर्क यहां पूरी तरह अपने काम में जुटा है.
कॉरपोरेट दलाल नीरा राडिया के पत्रकारों, कॉरपोरेट उस्तादों, उद्योगपतियों और नेताओं से बातचीत के टेप सामने आने के बाद ये साफ़ हो गया है कि किस तरह वो मीडिया की मदद से राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश कर रही थी. राडिया की जनसंपर्क कंपनी वैष्णवी कम्युनिकेशन के ग्राहक टाटा और मुकेश अंबानी जैसे पूंजीपति थे. उसने उनके पक्ष में देश की नीतियों की मोड़ने के लिए पत्रकारों, नौकरशाहों और नेताओं का इस्तेमाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यह कारपोरेट घरानों द्वारा पेशेवर संवादकर्मियों की आड़ लेकर लोकतंत्र को विरूपित करने का एक अहम उदाहरण है. नीरा राडिया बहुत हद तक कामयाब रही और सरकार पर अपने टाटा और अंबानी जैसे अपने ग्राहकों के पक्ष में माहौल बनाने को लेकर दबाव बना पाई. राडिया ने डीएमके सांसद ए राजा को दूरसंचार मंत्रालय बनाने के लिए कितनी तिकड़म भिड़ाई, टेप में दर्ज बातचीत से यह बात भी सामने आ चुकी है. एनडीटीवी की बरखा दत्त जैसी कई पत्रकारों ने इस काम में उसकी मदद की. फिलहाल एक लाख छिहत्तर हज़ार करोड़ रुपए के टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले में ए राजा सलाखों के पीछे हैं. लेकिन नीरा राडिया और उससे आपत्तिजनक बात करने वाले पत्रकार, नेता और उद्योगपति अब भी बड़े आराम से अपने पुराने धंधों में लगे हुए हैं. अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर वे डैमेज कंट्रोल कर रहे हैं.
इस उदाहरण से कहा जा सकता है कि भारत में भी मीडियाचालन की प्रक्रिया तेज़ी से चल रही है. मुद्गल (2011) कहते हैं कि नीरा राडिया का दायरा आम मीडिया कवरेज को बहुत पीछे छोड़, राजनीतिक नियुक्त, नीति निर्माण और देश के साझे प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन के इर्द-गिर्द अंधाधुंध मिथक पैदा करने की सीमा तक जा पहुंचा है. वे आगे कहते हैं आधुनिक लोकतांत्रिक समाज दिन-प्रतिदिन पहले से ज़्यादा मीडियाचालित होता जा रहा है. राडिया कांड में जिस तरह मीडिया का इस्तेमाल राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करने के लिए किया गया वो इस बात की सिर्फ़ झलक भर है कि हमारा लोकतंत्र कैसे काम करता है. वैश्वीकरण के दौर में कुछ ऐसी ख़ास तरह की स्थतियां बनी हैं जब कॉरपोरेट घराने मीडिया का इस्तेमाल देश के संसाधनों की लूट के लिए कर रहे हैं. इन प्रक्रियाओं के पक्ष में जनमत निर्माण का एक पूरा उद्योग चल रहा है. ऐसे में आम आदमी लगातार हाशिए पर जा रहा है और लोकविमर्श के मंच लगातार ग़ायब होते जा रहे हैं. समाज के लगातार मीडियाकृत होते चले जाने की वजह से जनता ज़्यादा निष्कृय होती जा रही है. सीधे राजनीति के उसका नाता टूट चुका है. वो राजनीति के बारे में सिर्फ़ संचार माध्यमों से जानती है. जो आम तौर पर तोड़-मरोड़ कर पेश की जाती हैं.
ऐसा नहीं है कि राडिया कांड के तौर पर पहली बार हमें राजनीतिक को प्रभावित करने की कोशिश दिखी हो. इससे पहले भी चुनावों के दौरान कई मीडिया घरानों ने नेताओं से उनकी ख़बरें छापने के लिए पैसे मांगे. दो हज़ार नौ में लोकसभा चुनाव के अलावा हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव भी हुए थे. कई नेताओं और राजनीतिक पार्टियों ने इन चुनावों में अख़बारों पर आरोप लगाए थे कि वे पक्ष में ख़बर छापने के लिए पैसे मांग रहे हैं हालांकि इस तरह की ख़बरें पहले भी सामने आ चुकी थी. दो हज़ार सात में हुए उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के दौरान ही मीडिया घरानों ने ख़बरों का सौदा शुरू कर दिया था. इस घटनाक्रम को हम भारतीय मीडिया के इतिहास में पेड न्यूज़ के नाम से जानते हैं. भारतीय प्रेस परिषद ने इस संदर्भ में एक रिपोर्ट तैयार की. लेकिन मालिक लॉबी के दबाव में उस रिपोर्ट को भी दबा दिया गया. (सिंह, 2010) उपरोक्त उदारणों से समझा जा सकता है कि देश में कॉरपोरेट मीडिया तर्क कितनी मजबूती से काम कर रहा है.
सिकुड़ता पब्लिक स्फ़ीयर और विकल्पों की तलाश
मीडियाचालन की प्रक्रिया समाज और राजनीति को अपने स्वार्थ के हिसाब से मोड़ रही है. पूंजीवादी लोकतंत्र में भी इस बात की ज़रूरत होती है कि शासकों से शासितों तक सूचनाएं पहुंचती रहें और शासितों की सूचनाएं शासकों तक पहुंचती रहें. जनता के बीच विमर्श के लिए भी जगह बची रहे और मीडिया वॉच डॉग की भूमिका में दिखे. दूसरे शब्दों में प्रेस की स्वतंत्रता सिर्फ़ प्रेस के लिए नहीं है बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करना भी इसका काम है. (बेकर, 2007) इस लिहाज़ से लोकवृत (पब्लिक स्फ़ीयर) एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जहां लोग इकट्ठा होकर सामाजिक समस्याओं पर बात कर सकें. जिसका असर राजनीतिक पहलकदमी पर पड़े. यह बाज़ार और सरकार के अलावा एक ऐसी जगह है जहां जनता की अनसुनी आवाज़ों को सुना जाता है. इन जगहों पर हुई बातचीत जनता के बीच फ़ैलती है तो सरकार को उन आवाज़ों को सुनने के लिए मजबूर होना पड़ता है. जर्मन समाजशास्त्री हैबरमास (1989) ने अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी में यूरोपीय समाज के पब्लिक स्फ़ीयर का अध्ययन किया. तब कॉफ़ी हाउस और सैलून जैसी जगहें लोकविमर्श के केंद्र हुआ करते हैं. प्रिंट मीडिया के विकास ने पब्लिक स्फ़ीयर को नए मायने दिए. अख़बारों में भी लोगों की समस्याओं पर विमर्श सामने आने लगा. इस तरह मीडिया में आए बदलावों के साथ पब्लिक स्फ़ीयर भी बदलता गया.
पिछले दो दशकों में भारतीय मीडिया ने ऐतिहासिक बदलाव देखे हैं. आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में मीडिया का जबरदस्त विस्फोट हुआ है. अख़बार, रेडियो, टीवी, इंटरनेट जैसे माध्यम सूचना के सबसे महत्वपूर्ण स्रोत बन चुके हैं. कॉरपोरेट हाथों का खिलौना इस मीडिया से आने वाली सूचनाएं कितनी मीडियाचालित और छद्म हैं इस बात का ज़िक्र हम कर चुके हैं. अगर जनता सचेत होकर यथास्थिति का विरोध नहीं करेगी तो आने वाले दिनों में हालात और भी ख़तरनाक हो सकते हैं. जो भी है- जैसा भी है, हमारा सहा-सहा पब्लिक स्फ़ीयर भी काल के गाल में समा जाएगा. मीडियाकृत और मीडियाचालित सूचनाएं लोगों को समाज और राजनीति को लेकर पूरी तरह निष्क्रिय बना सकती हैं.
ऐसा नहीं है कि मीडियाचालन की अवधारणा के सामने आने से पहले पूंजीवादी लोकतंत्र की राजनीति बहुत दूध की धुली थी. हां, अब उस राजनीति की बेईमानी में तथाकथित मुख्यधारा का मीडिया भी एक संस्थाऩ के तौर पर पूरी तरह भागीदार है. इस स्थिति से उबारने के लिए पूंजीवादी लोकतंत्र में जिस नागरिक समाज की नाम लिया जाता है. उसके कई घटक ख़ुद विश्वसनीयता का संकट झेल रहे हैं. स्वयंसेवी संस्थाओं की फंडिंग का सवाल उनकी ईमानदारी पर सवाल खड़ा कर रहा है. ज्यादातर एनजीओ या तो सरकार से मदद पाते हैं या फिर कॉरपोरेट घरानों से. हां, जनता के संसाधनों पर कब्ज़े के खिलाफ़ चलने वाले जन आंदोलन और उग्र वामपंथी आंदोलन पूरी ईमानदारी के साथ ज़रूर यथास्थिति और मीडियाकृत यथार्थ को चुनौती दे रहे हैं. देखा जाए तो इस तरह से यह काउंटर पब्लिक स्फ़ीयर का भी निर्माण कर रहे हैं. इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि अगर नागरिकों का कोई समूह मजबूत राजनीतिक विचारधारा से संचालित हो रहा हो तो वो मीडिया के प्रभाव में कम आता है. (मैककॉम्ब, 2004) इस तरह के काउंटर पब्लिक स्फ़ीयर समाज बदलाव के नए एजेंडे के साथ सामने आते हैं. जहां विमर्श एक रेखीय होने के बजाय बहुआयामी होता है. जिनमें बुर्जुआ पब्लिक स्फीयर की तरह ख़ास वर्ग, लिंग, अस्मिता का प्रभुत्व नहीं रहता है. इसकी मौजूदगी हमेशा मीडियाचालित राजनीति के वैकल्पिक तर्क को जीवित रखती है.
संदर्भ:
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(कथादेश के मीडिया विशेषांक में प्रकाशित)
Monday, April 4, 2011
मीडिया चालित राजनीति और राडिया कांड
Posted by
bhupen
at
4/04/2011
Labels: मीडिया, मीडियाटाइजेशन, राडियाकांड, शोधपत्र
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