Tuesday, April 5, 2011

मीडिया रेग्युलेशन से कौन डरता है?

देश में आर्थिक उदारीकरण की हवा चलने के बाद बाज़ारवाद बहुत हावी हो गया है. इसने भारतीय मीडिया संगठनों के गुणसूत्रों (डीएनए) को बदल कर रख दिया है.
-हामिद अंसारी, उपराष्ट्रपति, भारत

देश के उपराष्ट्रपति का ये बयान कई मायने में चौंकाने वाला है. ये वक्तव्य पेड न्यूज़ पर राज्य सभा में चल रही बहस के दौरान सामने आया. इससे निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उन्नीस सौ इक्यानबे में अपनाई गई नई आर्थिक नीतियों का असर बड़े पैमाने पर हमारे समाचार माध्यमों पर भी पड़ा है. इस बात को मीडिया स्कॉलर ही नहीं बल्कि सत्ता पक्ष से जुड़े लोग भी मानते हैं.
भारत में मीडिया का सही आंकलन और उसे संयमित करने का कोई ठोस रास्ता हमारे पास नहीं है. पिछले दो दशक में यहां मीडिया का असीम विस्तार हुआ है . जिसने न्यूज़ मीडिया के परिदृश्य को इस तरह बदला है कि अब वो सामाजिक सरोकारों से पीछा छुड़ाता हुआ पूरी तरह मुनाफ़ा कमाने की दौड़ में शामिल है. पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग जैसी इक्का-दुक्का अवधारणाएं सरकारी मनमानी की वजह से बेमानी बन गई हैं. निजी मीडिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में अराजकता की सारी सीमाएं लांघता जा रहा है. कुल मिलाकर आज़ादी के बाद जिस तरह के राजनीतिक और आर्थिक हालात भारत में बनते रहे हमारे समाचार माध्यम भी वैसे ही बदलते रहे.
मुक्त बाज़ार की दौड़ में शामिल इस महादेश के सामाजिक जीवन में आज बड़ी पूंजी और कॉरपोरेट का हस्तक्षेप हर तरफ़ देखा जा सकता है. ऐसे में मीडिया के नियमन की बहस को कॉरपोरेट्स के पैरोकार किस दिशा में मोड़ेंगे इस पर नज़र रखना ज़रूरी है. वे इस बहस को विषयवस्तु यानी कॉन्टेंट के नियमन तक सीमित करने की कोशिश करते हैं. लेकिन जब तक कॉन्टेंट के साथ मीडिया के मालिकाने और उससे जुड़े कारोबारी हितों के बारे में बात नहीं होगी तब तक कॉरपोरेट मीडिया की असलीयत सामने ऩहीं आ पाएगी.
बुर्जुआ लोकतंत्र ने दुनिया को फ्री प्रेस की अवधारणा दी. लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कह कर प्रेस का गुणगान किया. इस ख़ूबसूरत शब्द से भ्रमित होने की बजाय ‘फ्री प्रेस’ के निहितार्थों को समझना ज़रूरी है. मीडिया की स्वतंत्रता आख़िर है किसके लिए, ये सवाल कम महत्वपूर्ण नहीं है . जिस तरह बुर्जुआ लोकतंत्र का पहला, दूसरा और तीसरा स्तंभ संरचनात्मक तौर पर अमीरों के पक्ष में झुका रहता है वैसे ही तथाकथित चौथे स्तंभ का हाल भी कुछ अलग नहीं है. वैसे भी विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की जैसी भूमिका पूंजीवादी लोकतंत्र में है, वैसी संवैधानिक भूमिका प्रेस की नहीं है. प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ सिर्फ़ प्रतीकात्मक तौर पर ही कहा जाता है. इस ‘प्रतीकात्मकता’ की वजह से ही मुख्य धारा का समाचार मीडिया अपने लिए ग़लत तरीक़े से कई छूट हासिल करता रहा है.

सनसनी को नैतिक बनाने का धंधा
भारतीय संविधान की धारा 19 (1)(a) अपने हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देती है. हमारे यहां पर प्रेस के लिए अलग से कोई कानून नहीं है. इसी धारा के तहत प्रेस की आज़ादी की भी व्याख्या की गई है. असहमति की आवाज़ रखने वालों के लिए इस अधिकार को पाना कितना मुश्किल है ये बात किसी से छिपी नहीं है. लेकिन इस संवैधानिक धारा की आड़ में मुनाफ़ाखोर मीडिया घराने ख़ुद को हर-क़ायदे क़ानून से ऊपर रखना चाहते हैं. पत्रकारीय नीतिशास्त्र के ज़्यादातर तर्क पश्चिमी पूंजीवाद की कोख से निकले हैं. भारत और तीसरी दुनिया के परिप्रेक्ष में इनके मायनों पर भी सवाल उठते रहे हैं. मसलन दुनियाभर के पत्रकारों को सिखाया जाता है कि जब कोई कुत्ता इंसान को काटता है तो वो ख़बर नहीं है, लेकिन जब इंसान किसी कुत्ते को काटे तो उसमें ख़बर है. ये उद्धवरण, ख़बर में आम घटना से हटकर कुछ चौंकाने वाले तत्वों की मौज़ूदगी को ज़रूरी बनाता है. इसका चरम ख़बरों में सनसनी को सही ठहराने की कोशिश है. रूढ़ हो चुकी इस उद्धवरण की कई विद्वानों ने आलोचना की है. उनमें से शेल्टन गुनारांटे और कुंडा दीक्षित का नाम महत्वपूर्ण हैं.
परंपरागत पत्रकारिता के मुताबिक़ ख़बर में संतुलन (Balance), सहमति (Consensus), निष्पक्षता (Impartiality), वस्तुनिष्ठता (Objectivity) और मूल्य तटस्थता (Value neutrality) जैसे पांच मशहूर तत्वों का होना ज़रूरी है. इसके अलावा न्यूज़ वैल्यू तय करने में समीपता, तात्कालिकता, द्वंद्व, रहस्य, उत्सुकता और नवीनता जैसी मान्यताओं को भी अहमीयत दी जाती है. लेकिन ये नहीं भूला जा सकता कि ख़बर सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों के प्रभाव में ही बनती-बिगड़ती और प्रस्तुत होती है. उसकी कोई निरपेक्ष परिभाषा नहीं होती. ताक़तवर लोगों ने ख़बर बनाने का उपरोक्त फ़ार्मूला इज़ाद किया है. फ़ार्मूला विरोधी लोग इसका विरोध करते हैं. वे ख़बर लिखने की उल्टा पिरामिड शैली (सबसे महत्वपूर्ण घटना पहले फिर क्रम के हिसाब से घटनाओं का ब्यौरा देना) का भी विरोध करते हैं. उनके मुताबिक़ प्रसंग के साथ आने वाली निबंधात्मक और विश्लेषणात्मक ख़बरों को ज़्यादा अहमियत दी जानी चाहिए .
उपरोक्त आलोचना, ख़बरों की नई परिभाषा तलाशने पर ज़ोर देती है. रूढ़ मान्यताओं को तोड़ती है. अगर मीडिया आलोचना के क्षेत्र में तरक्की होती रही तो आने वाले दिनों में ख़बरों को नई परिभाषा सामने आ सकती है. जो निश्चित तौर ख़बरों के बनने और प्रसारित होने की बनी-बनाई व्यवस्था को चुनौती देने वाली होगी. तभी ख़बरों में सनसनी की स्वीकारोक्ति को भी चुनौती दी जा सकती है.

सब मालिक की मर्जी क्यों है ?
जिस तरह से समाचार माध्यमों ने फूहड़ता परोसनी शुरू की है. उस पर लगाम लगाने की मांग सामने आती रही है. इस संदर्भ में ये एक महत्वपूर्ण सवाल है कि आख़िर मीडिया की विषयवस्तु कैसे लोगों तक पहुंचती है. अख़बार में कौन सी ख़बर छपेगी, न्यूज़ चैनल में कौन-सा कार्यक्रम दिखेगा ये कैसे तय होता है ? कुछ लोग तर्क देते हैं कि पत्रकारों के लिए कुछ दिशा-निर्देश बना दिए जाएं तो सब ठीक हो जाएगा. ये बात कुछ हद तक सही हो सकती है लेकिन इसी को एकमात्र रास्ता मानना ग़लत है. दरअसल निजी मीडिया का पूरा कारोबार उसके मालिक की मर्जी पर चलता है. उसका सबसे बड़ा मकसद होता है मुनाफ़ा कमाना. भारतीय मीडिया मालिकों को अब ये बात क़बूल करने में कोई शर्म नहीं है कि ख़बर उनके लिए सिर्फ़ एक उत्पाद है, जिसका उन्हें धंधा करना है. टाइम्स ऑफ़ इंडिया इस बात को खुलेआम कबूल करता है. उनके अख़बारों में संपादकों का पतन और ब्रैंड मैनेजरों का उदय भी इसी की एक तार्किक परिणति है.
पिछले कुछ वर्षों में संपादक और मालिक के बीच की रेखाएं भी धुंधली हुई हैं. कई मालिक संपादक का पद भी हथिया चुके हैं और कई पत्रकार मालिक बन गए हैं. ऐसे में पत्रकार और मालिक के हित निश्चित तौर पर एक-दूसरे से टकराते हैं . इस परिघटना के सामने आने के बाद मालिक-पत्रकार का सीधा हस्तक्षेप समाचार कक्ष में बढ़ गया है. मालिक इस बात को अच्छी तरह जानता है कि अख़बार के ज़्यादा सर्कुलेशन और टेलीविजन चैनल की बढ़ती रेटिंग में ही उसकी क़ामयाबी की कुंजी छिपी है. इसी आधार पर उसे बड़े-बड़े विज्ञापन मिलने हैं. इसलिए वो इस होड़ में आगे रहने के लिए हर तरकीब अपनाता है. जो मालिक ख़ुद संपादक नहीं हैं वे ऐसे संपादकों की नियुक्ति करते हैं जो कंपनी के लिए मुनाफ़ा कमाने में सहायक हों. फिर संपादक अपनी पसंद के पत्रकारों की नियुक्ति करते हैं. इस तरह तथाकथित मुख्यधारा के किसी भी अख़बार या टेलीविजन चैनल में ऐसा संपादक या पत्रकार तलाशना असंभव है जो अपनी मालिक की मर्जी के ख़िलाफ़ काम करता हो. ऐसे में समाचारों के निष्पक्ष होने की कल्पना करना बहुत बड़ी बेवक़ूफ़ी है.
मालिक नाम का जीव भारतीय मीडिया में लगातार ख़तरनाक रूप धारण करता जा रहा है. वो समाचार मीडिया के साथ बाक़ी सभी तरह के मीडिया में भी अपना मालिकाना बढ़ा रहा है. इस तरह अगर एक ही मालिक अगर सभी तरह के मीडिया का मालिकाना रखेगा तो विविधता कम होती जाएगी और गिने-चुने मीडिया संगठन मनमानी करते रहेंगे. छोटी पूंजी और सहकारी तौर पर चलने वाला मीडिया कहीं टिक नहीं पाएगा. इस तरह क्रॉस मीडिया होल्डिंग का रखने पर एकाधिकार की प्रवृत्ति और मजबूत होती जा रही है . मशहूर मीडिया स्कॉलर मैकचेस्नी के मुताबिक़ मीडिया आधुनिक लोकतंत्रों में आवश्वक रूप से राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक भूमिका निभाता है. इसलिए लोकतंत्र में इस तरह के मीडिया सिस्टम की ज़रूरत होती है जो लोगों को विभिन्न मतों और महत्वपूर्ण विषयों पर चलने वाली अलग-अलग बहसों से परिचित कराए . मैकचेस्नी ये भी कहते हैं कि अगर मीडिया के कॉन्टेंट को सुधारना है तो उसके मालिकाने, प्रबंधन और नियमन पर खुली बहस करनी पड़ेगी. दूसरे प्रेस कमीशन की रिपोर्ट में क्रॉस मीडिया होल्डिंग और एकाधिकार के ख़िलाफ़ कई सुझाव दिए गए थे लेकिन मालिक लॉबी के दबाव में उन पर कभी कोई क़ानून नहीं बन पाया.

ख़बर बड़ी कि विज्ञापन?
एक अख़बार के लिए ख़बर ज़रूरी हैं कि विज्ञापन ? मीडिया के नाम पर सरकार से तमाम सुविधाएं लेने वाले निजी माध्यम विज्ञापन के लिए कुछ भी करने के लिए क्यों तैयार रहते हैं ? ये बात सही है कि मुक्त बाज़ार में बिना विज्ञापन वाले अख़बार की कल्पना करना आसान नहीं है. लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि विज्ञापनों को अख़बारों में ख़बरों से ज़्यादा अहमियत दी जाने लगे. वर्तमान में अख़बार विज्ञापन छापने की होड़ में सारी पत्रकारीय नैतिकता को किनारे लगाते जा रहे हैं. कई अख़बार तो अपने संवाददाताओं को विज्ञापन लाने के धंधे में जुटाये रखते हैं. इसके अलावा अख़बारों में ख़बरों और विज्ञापनों का भी कोई निश्चित अनुपात नहीं है.
पहले प्रेस आयोग ने अख़बारों में ख़बरों और विज्ञापनों का अधिकतम अनुपात 60-40 तय करने की सिफ़ारिश की थी. लेकिन कानून न होने की वजह से उसे लागू नहीं किया जा सका. सरकार ने पहले प्रेस आयोग की सिफ़ारिशों के मद्देनज़र 1956 में द न्यूज पेपर प्राइज एंड पेज एक्ट बनाया था. इसका मक़सद अख़बार की पृष्ठ संख्या के हिसाब से उसकी क़ीमत तय करना था. जिसे पुणे के सकाल पेपर्स प्राइवेट लिमिटेड ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. कोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उन्नीस सौ साठ में इस एक्ट को ग़लत करार दिया. दासू कृष्णामूर्ति के अनुसार इस फैसले ने पाठकों के अधिकार की अनदेखी की और रेवेन्यू के भूखे मालिकों को ख़बर की जगह को विज्ञापन कंपनियों को बेचने का मौक़ा दे दिया.
कुछ मीडिया कंपनियां विज्ञापनों के बदले दूसरी व्यावसायिक कंपनियों में हिस्सेदारी लेती हैं और वादा करती है कि वो इन कंपनियों के ब्रैंड को लोकप्रिय बनाएंगी. मिसाल के तौर पर टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप ने अपनी कंपनी ब्रैंड कैपिटल के माध्यम से सवा सौ से ज़्यादा कंपनियों में हिस्सेदारी ली है और उनके विज्ञापन और प्रचार का कामकाज़ देखती है. ब्रैड कैपिटल का दावा है कि टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह का हिस्सा होने के बावजूद संपादकीय नीतियों पर कोई फर्क नहीं पड़ता है. लेकिन इस बात की असलियत को आसानी से समझा जा सकता है. पहले टाइम्स ऑफ़ इंडिया ये काम प्राइवेट ट्रीटी के नाम से करता था. इसलिए अगर कोई भी अख़बार इस तरह के हथकंडे अपनाता है तो उसके लिए प्राइवेट ट्रीटी शब्द एक तरह से रूढ़ हो चुका है. आज ज़्यादातर बड़े अख़बार प्राइवेट ट्रीटी के खेल में उतरे हुए हैं. इसके अलावा एक ही व्यक्ति या कंपनी के न्यूज़ मीडिया और दूसरे किसी धंधे में भी मालिकाना रखने का अधिकार भी पत्रकारिता की नैतिकता को प्रभावित करता है. मसलन कई मीडिया घराने पत्रकारिता की आड़ में अपने दूसरे धंधों को भी चमकाने की कोशिश करते हैं.
कई अख़बार विज्ञापनों को खुलेआम ख़बरों की तरह छापते हैं. टाइम्स ऑफ़ इंडिया उनका सिरमौर है. इस अख़बार के साथ हर रोज दिल्ली टाइम्स नाम का एक और अख़बार पाठकों को मुफ्त में मिलता है. जिसमें सिर्फ़ विज्ञापन या फिर पेड न्यूज़ छपती हैं. उसमें ख़बर न होने की स्वीकारोक्ति टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सीईओ रवि धारीवाल खुलेआम करते हैं . चुनावों में पेड न्यूज़ छापने की चर्चा के सामने आने से पहले ही टाइम्स ऑफ़ इंडिया दो हज़ार तीन में ही मीडियानेट नाम से इस तरह की पेड सामग्री छापना शुरू कर चुका था. प्रेस काउंसिल की पेड न्यूज़ वाली रिपोर्ट में परंजॉय गुहा ठकुराता और के श्रीनिवास रेड्डी ने में इस बात का ज़िक्र किया और इस पर अपनी चिंता ज़ाहिर की है.
आम पाठक समझता है कि दिल्ली टाइम्स भी टाइम्स ऑफ़ इंडिया का हिस्सा है. लेकिन ये सच नहीं है. हैरान करने वाली बात है कि दिल्ली टाइम्स स्वतंत्र अख़बार के तौर पर छापा जाता है. इसका रजिस्ट्रार ऑफ़ न्यूज़पेपर फ़ॉर इंडिया (आरएनआई) में अलग से रजिस्ट्रेशन है. जिसका नंबर DELENG/2003/5765 है. जबकि टाइम्स ऑफ़ इंडिया का रजिस्ट्रेशन नंबर 508/57 है. इनके संपादक भी अलग-अलग हैं, जिन्हें बाज़ार के हिसाब से ज़िम्मेदारी दी गई है. दिल्ली मार्केट के लिए टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संपादक विकास सिंह हैं. जबकि दिल्ली टाइम्स के संपादक अंशुल चतुर्वेदी हैं. दोनों अख़बारों के ये ब्यौरे इतनी छोटे अक्षरों में अख़बारों में दिए जाते हैं कि आम तौर पर इन पर किसी की नज़र नहीं जाती .

रेटिंग यानी चुहा दौड़
बाज़ार से संचालित मीडिया की कुछ अंतर्निहित विरूपताएं होती हैं. जिनमें से एक है बाज़ार में टिके रहने की प्रतियोगिता. यही वजह है कि अख़बारों और चैनलों में रेंटिग बढ़ाने की अंतहीन दौड़ लगातार चलती रहती है. गुणवत्ता से ज़्यादा सनसनी को केंद्र में रखा जाने लगता है. चाहे अख़बारों की रेटिंग का मामला हो या टेलीविजन की, इनमें सिर्फ़ विज्ञापन कंपनियों के हितों को ध्यान में रखा जाता है.
मीडिया को लेकर अगर कुछ ठोस नियम बनाए जाएं तो इससे रेटिंग के मायने बदले जा सकते हैं. अब ये सोचने का वक़्त आ गया है कि क्या कुछ अख़बार और चैनल बिना विज्ञापनों के भी संभव हैं? जो सिर्फ़ सब्सक्रिप्शन (ग्राहकों से मिलने वाले पैसे) से चलें. तब अख़बारों और चैनलों की रेटिंग निकाली जाए, तो वो सामाजिक हित में शोध की दृष्टि से निकाली जाए. ऐसा करने पर आंकड़ों का पूरा खेल ही बदल सकता है. रेंटिग को अगर बाज़ार की ताक़तों के हवाले खुला छोड़ा जाता रहा तो आने वाले दिनों में स्थिति और भी बदतर हो सकती है.
बेईमानी का दूसरा नाम टीआरपी
हमारे देश में टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट (टीआरपी) को लेकर काफ़ी विवाद है. फिर भी ये मुनाफ़े पर टिके टेलीविजन चैनलों की संचालक शक्ति बनी हुई है. टीआरपी का मापन करने वाली संस्था टैम मीडिया रिसर्च लिमिटेड भी क्रॉस होल्डिंग के आरोपों से घिरी रही है. इस कंपनी में एसी नीलसन और आईएमआरबी इंटरनेशनल की पचास-पचास फ़ीसदी की भागीदारी है. आईएमआरबी इंटरनेशनल प्रमुख विज्ञापन कंपनी जे वॉल्टर थॉम्पसन (जेडब्ल्यूटी) की मार्केट रिसर्च विंग है. एसी नीलसन की रिसर्च के भी कई मीडिया चैनल ग्राहक हैं. इस तरह क्रॉस होल्डिंग का मामला यहां भी मौजूद है. जो टीआरपी के आंकड़ों की विश्वसनीयता को संदेहास्पद बनाता है.
टीआरपी मापने की अवैज्ञानिकता की बात भी कई बार उठी है. इस आलोचना से ध्यान हटाने के लिए दो हज़ार सात में इंडियन सोसायटी ऑफ़ एडवर्टाइजर, इंडियन ब्रॉडकास्ट फ़ाउंडेशन और एडवर्टाइजिंग एजेंसीज ऐसोसिएशन ने ब्राडक्रास्ट ऑडियंस रिसर्स काउंसिल (बार्क) का गठन किया था. मुनाफ़े पर नज़र रखने वाली इन कंपनियों ने टीआरपी मापन के लिए यहां भी आत्मनियमन की अपनी जिद नहीं छोड़ी. आख़िरकार जब बार्क पूरी तरह नाकाम हो गया तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने मई दो हजार दस में फिक्की के महासचिव अमित मित्रा के नेतृत्व में एक कमेटी गठित की थी. इस कमेटी ने जनवरी दो हज़ार ग्यारह में अपनी रिपोर्ट पेश की . इस रिपोर्ट में भी बार्क की बैधता को स्वीकृति दी गई है. रेटिंग एजेंसी, विज्ञापन कंपनी और ब्रॉडकास्टर के बीच क्रॉस होल्डिंग रोकने को कहा गया. इस रिपोर्ट में तीन साल के भीतर सैंपल साइज को आठ हज़ार से बढ़ाकर तीस हज़ार तक करने की सिफ़ारिश भी है. लेकिन इस सवाल पर ज़रा भी विचार नहीं किया गया कि हर हफ्ते टीआरपी निकालना क्यों ज़रूरी है? टीआरपी की घोषणा छह महीने या साल में एक बार जाए तो इससे विज्ञापनदाता संस्थाओं के दबाव को कुछ हद तक कम किया जा सकता है.
टीआरपी के मामले में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भी बाज़ारू शक्तियों के हाथ की कठपुतली बना हुआ है. टेलीविजन चैनलों की रेटिंग मापने का मक़सद यहां सिर्फ़ विज्ञापन पाने के मक़सद से किया जा रहा है. समाचार माध्यमों को भी मुनाफ़े के इस धंधे के हवाले कर दिया जाना किसी भी हालत में न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता है. सरकारी और निजी हस्तक्षेप से मुक्त एक प्रभावशाली नियामक संस्था का अभाव यहां भी खलने वाला है.
धंधे पर टिका रीडरशिप सर्वे
प्रिंट माध्यमों की हालत भी अराजकता के मामले में इलेक्ट्रोनिक माध्यमों से बहुत अलग नहीं है. अख़बारों की पाठक संख्या बताने के लिए हर साल रीडरशिप सर्वे किए जाते हैं. पहले इंडियन रीडरशिप सर्वे और नेशनल रीडरशिप सर्वे अलग-अलग आंकड़े एकत्र करते थे. लेकिन अब समझौते के बाद सिर्फ़ इंडियन रीडरशिप सर्वे ही बचा रह गया है. इसमें भी एक बड़ा गोरखधंधा है. आम तौर पर अख़बारों की प्रसार संख्या का हिसाब किताब ऑडिट ब्यूरो ऑफ़ सर्कुलेशन रखता है. हर अख़बार अपना सर्कुलेशन ज़्यादा दिखाने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाता है. इससे उसे विज्ञापन तो ज्यादा मिलते ही हैं अख़बार छापने के लिए ज़्यादा न्यूज़ प्रिंट (कागज़) भी रियायती दरों पर हासिल होता है. कई अख़बार तो इस न्यूज़ प्रिंट को बेचने का अवैध धंधा भी करते हैं.
अखबारों की पाठक संख्या बताने के लिए साल में दो बार जो रीडरशिप सर्वे निकलता है उसका मकसद तो विज्ञापनधर्मी है ही. संचालन में भी कई ख़ामियां हैं. इस सर्वे को नेशनल रीडरशिप स्टडीज काउंसिल (एनआरएससी) निकालता है. इसमें इंडियन न्यूज पेपर सोसायटी(आईएनएस) एडवर्टाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (एएएआई) और ऑडिट ब्यूरो ऑफ़ सर्कुलेशन (एबीसी) शामिल हैं. ये तीनों संगठन भी शुद्ध तौर पर मालिकों और मुनाफ़ाखोरों के हैं. इनमें जनता या आम पाठक का प्रतिनिधित्व कोई भी संगठन नहीं करता है. अखबारों के सर्कुलेशन की तरह ही कई बार रीडरशिप सर्वे पर भी आरोप लगते हैं कि ये भी मैनेज्ड होते हैं. अखबार अपने पाठक संख्या ज़्यादा दिखाने के लिए कई हथकंडे अपनाते हैं. मसलन, आपने अपने कस्बे-शहर के कई इलाक़ों में अख़बारों के बड़े-बड़े होर्डिंग्स देखे होंगे. इन होर्डिंग्स को ख़ास मक़सद से लगाया जाता है. बार-बार देखने की वजह से ये दर्शक की स्मृति में बस जाते हैं. जब कभी रीडरशिप सर्वे कराने वाले लोग पाठकों के पास पहुंचते हैं तो पाठक अख़बार पढ़े या न पढ़े उन अख़बारों के नाम सूची में भर देता है जिसको वो रोज-रोज अपने आस-पास देख रहा होता है.

ब्रॉडकास्ट रेग्यूलेशन बिल का शिगूफ़ा
जनता की तरफ़ से लगातार दबाव पड़ने के बाद सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी बार-बार टेलीविजन चैनलों के नियमन की बात करती हैं. लेकिन दो हज़ार सात में उन्होंने जो ड्राफ्ट तैयार करवाया वो भी मालिकाने की समस्या को संबोधित नहीं करता है. इस ड्राफ्ट में कुछ हद तक क्रॉस मीडिया होल्डिंग पर सवाल उठाए गए हैं. ब्रॉडकास्टर और नेटवर्क ऑपरेटर की क्रॉस होल्डिंग को ख़त्म करने की बात इसमें थी. ये बात इस धंधे पर गिद्ध दृष्टि रखने वालों को अच्छी नहीं लगी. आख़िरकार ये बिल कैबिनेट से पास होने के बाद भी संसद में पेश नहीं हो पाया.
सरकार और मीडिया व्यावसायियों के बीच चूहे बिल्ली का खेल चलता रहता है. सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने दो हज़ार नौ में मीडिया रेग्यूलेशन के लिए एक थ्री टीयर प्लान पेश किया था. इस प्लान के मुताबिक सबसे पहले चैनल में दिखाए जा रहे कार्यक्रम की जिम्मेदारी खुद चैनल की होनी थी. दूसरे स्तर पर इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स ऐसोशिएशन जैसे संगठन को चैनलों के कामकाज पर नजर रखनी थी. आखिरी में अगर जरूरी हुआ तो एक ऑटोनॉमस रेग्यूलेटरी बॉडी द्वारा चैनलों पर नजर रखने की बात थी लेकिन मंत्रालय को मीडिया मालिकों का समर्थन नहीं मिला. इस तरह रेग्यूलेशन का ये लचीला विचार भी कभी मूर्त रूप नहीं ले सका.

नियमन बनाम आत्मनियमन
मीडिया नियमन की बहस का एक पक्ष निजी मीडिया घराने बने हुए हैं तो दूसरी तरफ़ सरकार है. निजी मीडिया संगठन आत्मनियमन से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं. उनका कहना है कि मीडिया के लिए कोई भी नियम- कानून बनाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है. जबकि सरकार बार-बार मीडिया की अराजकता पर लगाम लगाने के लिए कुछ दिखावा करती है. इस हालत में लोकतांत्रिक मूल्यों पर भरोसा रखने वाला एक तबका भी दुविधा की हालत में है. मीडिया के सरकारी नियंत्रण में जाने का डर उसे उन्नीस सौ पिचहत्तर के आपातकाल की याद दिलाता है, तो वो कॉरपोरेट धूर्तता की अनदेखी करने लगता है. इसलिए मुक्त बाज़ार के इस दौर में मीडिया से नैतिकता की मांग करने के लिए पूंजी और सरकार के रिश्तों को समझना ज़रूरी है.
चौतरफ़ा दबाव के बाद टेलीविजन न्यूज़ चैनलों ने मिलकर दो हज़ार आठ में न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एऩबीए) का गठन किया. एनबीए ने आत्मनियमन के लिए न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड्स (डिस्प्यूट्स रिड्रेसल) अथॉरिटी का गठन किया. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जेएस वर्मा को इसका अध्यक्ष बनाया गया. इसके अलावा कुछ बुद्धिजीवियों को भी इसका सदस्य बनाया गया. लेकिन कुछ ही वक्त बाद इस संस्था की असलीयत सबके सामने आ गई. फरहाना अली मामले में सनसनीखेज़ कार्यक्रम दिखाने के लिए इंडिया टीवी की एनबीए ने आलोचना की और उस पर एक लाख रुपए का जुर्माना थोपा. इंडिया टीवी ने बेशर्मी दिखाते हुए अपनी ग़लती क़ुबूल करने से मना कर दिया और ख़ुद को एनबीए से अलग कर दिया . इससे आत्मनियमन की पूरी तरह पोल खुल गई. फ़जीहत होने पर बाद में मनुहार कर इंडिया टीवी को वापस एनबीए में ले लिया गया. अनुशासनात्मक कार्रवाई का असली मुद्दा कहीं ग़ायब हो गया. अपने गठन के बाद दो साल में एनबीए ने सिर्फ़ चार बार टेलीविजन चैनलों की आलोचना की. इनमें से सिर्फ़ एनडीटीवी ने एक बार ग़लती मानते हुए टेलीविजन स्क्रीन के नीचे वाले हिस्से में स्क्रॉल चलाकर इतिश्री समझ ली. एनबीए के बनने से पहले ही टेलीविजन चैनलों (समाचार और मनोरंजन) का इंडियन ब्रॉडकास्टर्स फाउंडेशन अस्तित्व में है. लेकिन उसकी हालत भी एनबीए से बहुत ज़्यादा अलग नहीं है. आत्मनियमन की माला जपना उसका भी प्रिय शगल है.
एनबीएन अपने उद्देश्यों के बारे में बढ़-चढ़कर बताता है . वो भारतीय लोकतंत्र की महानता और अभिव्यक्ति की आज़ादी की दुहाई देता है. फिर अपने मतलब की बात पर आते हुए घोषणा करता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए ज़रूरी है, मीडिया की विषयवस्तु पर सरकार का कोई नियंत्रण ना हो. इसमें सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की आज़ादी को एक-दूसरे का पक्का दुश्मन बताया गया है. सारी लच्छेदार बातों का मतलब आत्मनियमन की वकालत करने की अलावा और कुछ नहीं है. दिखाने के लिए एनबीए ने पत्रकारों के लिए भी कुछ नैतिक मूल्य तय किए हैं.
वैश्विक अनुभवों से ये बात सामने आ चुकी है कि आत्म नियमन की बात करना कॉरपोरेट बेईमानी के अलावा कुछ नहीं है इसलिए मीडिया के नियमन की बात करते हुए कानूनी बाध्यता का होना ज़रूरी है. इससे भी ज़्यादा ज़रूरी है कि उनका पालन किया जाना. वैसे देशभर के चैनलों की विषयवस्तु पर नज़र रखने के लिए भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मॉनीटरिंग सेंटर है . ये प्रोग्राम कोड, एडवर्टाइजिंग कोड, केबल टेलीविजन नेटवर्क्स रेग्यूलेशन एक्ट (1995) के मुताबिक़ काम करता है. यहां पर सभी चैनलों की मॉनीटरिंग की जाती है. इसके लिए नब्बे दिन तक चैनलों की रिकॉर्डिंग रखी जाती है. उसके बाद वो सामग्री अपने आप ख़त्म हो जाती है. हैरानी की बात है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय के इस विभाग को किसी भी चैनल में मीडिया की नैतिकता के उल्लंघन का कोई उदाहरण क्यों नज़र नहीं आता.

सफ़ेद हाथी का क्या करें?
कॉरपोरेट दलाल राडिया के टेप सामने आने के बाद कई पत्रकार और मीडिया संगठन बेनकाब हुए. उससे आपत्तिजनक बात करते हुए प्रिंट और टेलीविजन के कई पत्रकार फ़ंसे. लेकिन पत्रकारीय नैतिकता के लिए बनी संस्थाओं पर इससे कोई फ़र्क नहीं पढ़ा. कॉरपोरेट हितों को लेकर बनी संस्था न्यूज़ ब्रॉडकास्टर एसोसिएशन से ज़्यादा उम्मीद न भी करें तो प्रेस काउंसिल जैसी तथाकथित स्वायत्त संस्था भी इसमें कहीं नज़र नहीं आई. इस घटना पर सख़्त कदम उठाना तो दूर उसने कोई आलोचनात्मक टिप्पणी तक नहीं की. इससे ज़ाहिर होता है कि प्रेस काउंसिल सफ़ेद हाथी के अलावा कुछ नहीं है.
प्रेस काउंसिल की निरर्थकता कई बार साबित हुई है. अभी ज़्यादा वक़्त नहीं बीता जब काउंसिल ने पेड न्यूज़ पर प्रंजॉय गुहा ठकुराता और के श्रीनिवास रेड्डी वाली अपने ही दो सदस्यों की रिपोर्ट को दबा दिया था. वजह सिर्फ़ इतनी थी कि इस रिपोर्ट में पेड न्यूज़ छापने वाले अख़बारों का नाम लिया गया था. लेकिन प्रकाशक लॉबी के दबाव में रिपोर्ट को दबाने की कोशिश की गई. आख़िरकार रिपोर्ट से वो हिस्सा हटा दिया गया जिसमें अख़बारों का नाम लिया गया था. ये बात और है कि आउटलुक पत्रिका ने पूरी रिपोर्ट हासिल कर उसे अपनी वेब साइट पर छाप दिया .
वैसे तो प्रेस काउंसिल को स्वायत्तशासी और क़ानूनी संस्था माना जाता है. इसका अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट का कोई पूर्व न्यायाधीश होता है. जिसका चयन राज्यसभा और लोकसभा के अध्यक्ष के साथ निर्वाचित सदस्यों वाली कमेटी करती है. लेकिन इस कमेटी के बाकी सदस्यों का जो प्रतिनिधित्व है, उसमें मीडिया मालिकों का प्रतिनिधित्व ज़्यादा है. इसके संरचनात्मक तौर पर कॉरपोरेट मीडिया के पक्ष में झुके होने की वजह से अक्सर इसकी चिंताएं प्रत्रकारीय नीतिशास्त्र की रक्षा करने की बजाय मालिकों के हितों को सुरक्षित रखना ज़्यादा बन जाता है. यूं तो इसने पत्रकारीय आचारसंहिता को लेकर कई निर्देश जारी किए हैं. लेकिन इसका कोई असर देखने को नहीं मिलता. मसलन साम्प्रदायिक दंगों के वक़्त भावनाओं को भड़काने वाले अख़बारों पर काउंसिल कोई लगाम नहीं लगा पाती. उसने कभी समाचार कक्ष में विविधता की वकालत नहीं की है. जिससे समाचारों में बहुसंख्यक और प्रभावशाली विचार ही न छाए रहें.
भारत में आज़ादी के बाद से ही मीडिया को संयमित रखने की बात उठती रही है. उन्नीस सौ बावन में मीडिया का जायज़ा लेने के लिए पहले प्रेस आयोग का गठन किया गया था. इस आयोग ने उन्नीस चौवन में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी. पहले प्रेस आयोग ने मीडिया के मालिकाने पर तब भी गंभीरता से विचार किया था और संकेद्रण पर चिंता ज़ाहिर की थी. आयोग ने प्रेस के काम को सामाजिक सेवा के दायरे में रखा था. इस कमीशन ने प्रेस के आकंडों पर नज़र रखने के लिए प्रेस रजिस्ट्रार और वॉच डॉग का काम करने के लिए प्रेस काउंसिल के गठन की भी सिफ़ारिश की थी. पहले आयोग की रिपोर्ट के बाद उन्सीस सौ छप्पन में रजिस्ट्रार ऑफ़ न्यूज़ पेपर सोसायटी का गठन किया गया और उन्सीस सौ पैंसठ में इंडियन प्रेस काउंसिल एक्ट बनाया गया. इस तरह उन्नीस सौ छियासठ में पहली बार भारतीय प्रेस परिद अस्तित्व में आई. इसने उन्नीस सौ छिहत्तर तक काम किया. आपातकाल लगने की वजह से प्रेस काउंसिल को भी भंग कर दिया गया. आपातकाल के बाद उन्नीस सौ अठहत्तर में जनता पार्टी फिर से नया प्रेस काउंसिल एक्ट पास कर अप्रैल उन्नीस सौ उन्यासी में प्रेस काउंसिल को पुनर्जीवित किया. अठहत्तर में ही जनता सरकार ने दूसरे प्रेस आयोग का गठन किया. जिसने उन्नीस सौ बयासी में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी.
दूसरे प्रेस आयोग ने प्रेस काउंसिल को जारी रखने की वकालत की और मीडिया के संकेंद्रण और क्रॉस मीडिया होल्डिंग पर फिर से चिंता जाहिर की. आयोग ने अपनी सिफ़ारिश में ये भी कहा था कि जो अख़बार पत्रकारिता की आचारसंहिता का उल्लंघन करता है उस पर कानूनी कार्रवाई का अधिकार प्रेस काउंसिल के पास हो. एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने इस मांग का समर्थन नहीं किया. मतलब साफ़ है कि ज़्यादातर एडिटर जनता के नहीं बल्कि मालिक के आदमी होते हैं और उसी के लिए प्रतिबद्ध होते हैं. इस संस्था ने अपने कामों से ये बार-बार से साबित किया है. दो हज़ार दस में भी राडिया कांड के सामने आने के बाद एडीटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष राजदीप सरदेसाई ख़ुद आरोपों से घिरे रहे, फिर भी शान से अपने और बाक़ी दाग़ी पत्रकारों के पक्ष में तर्क गढ़ते रहे .
आर्थिक उदारीकरण के दौर में धीरे-धीरे पत्रकारों के श्रमिक अधिकारों को छीन लिया है. जब तक पत्रकारों की सुरक्षा की गारंटी नहीं होगी तब तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करना बेमानी होगा. वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट को नए सिरे से लागू कर इस बात का ध्यान रखा जा सकता है. मीडिया कंपनी में प्रबंधन और पत्रकारीय हितों के बीच संतुलन के लिए दोनों प्रेस आयोगों ने पत्रकार संगठनों की ज़रूरत पर बल दिया था. लेकिन इस बात पर पूरी तरह कभी अमल नहीं हो पाया. ज़रूरी है कि पत्रकारों को अश्लील तनख़्वाहों की बजाय उनके श्रमिक अधिकार मिलें. इन सभी बातों पर अमल कर पाना वर्तमान प्रेस काउंसिल के बस की बात नहीं है इसलिए अब नियमन के नए रास्ते तलाशने ज़रूरी हैं.

वक़्त की मांग है नियमन
जनजीवन में जनसंचार माध्यमों के बढ़ते महत्व और न्यू मीडिया के बढ़ते उभार ने जनहित में संचार के प्रभावी नियमन की ज़रूरत को बढ़ा दिया है . जिस तरह तरह मीडिया की तकनीक और पहुंच में विस्तार हुआ है, उस लिहाज़ से सिर्फ़ इंडियन ब्रॉडकास्ट एक्ट या किसी एक माध्यम को लेकर कानून बनाकर काम नहीं चल सकता. इसके लिए मीडिया के हर रूप पर नज़र रखने वाले किसी आयोग के बारे में सोचा जा सकता है. जो देश में मीडिया के हालात का अध्ययन करे और उसके सही संचालन के लिए निर्देश जारी करे. इस तरह के आयोग के पास पूरे कानूनी अधिकार हों ताकि वो प्रेस काउंसिल की तरह सिर्फ़ कागजी शेर बनकर न रह जाए.
अब आत्मनियमन का फ़रेब करने वालों को कटघरे में खड़ा करने का वक़्त आ गया है. सवाल उठाना लाजिमी है कि मीडिया ख़ुद कटघरे में खड़ा होकर न्यायाधीश कैसे बन सकता है. राडिया कांड में सीएनएन-आईबीएन के मालिक-संपादक राजदीप सरदेसाई, न्यूज एक्स के मालिक-संपादक जहांगीर पोचा, एनडीटीवी की संपादक और मालिकाने में हिस्सेदार बरखा दत्त, टाइम्स नाव की नवीका कुमार, टीवी टुडे ग्रुप से प्रभु चावला, हिंदुस्तान टाइम्स के वीर सांघवी जैसे कई पत्रकारों पर संगीन आरोप हैं. अब ये लोग समाचार माध्यमों के आत्मनियमन की वकालत करें तो इससे बड़ा मज़ाक और क्या हो सकता है. अगर मीडिया संगठन स्वनियमन करना चाहते हैं तो रोका किसने हैं. वे जितना चाहें आत्मनियमन करें. लेकिन असली बात ये है कि वे आत्मनियमन की आड़ में बेईमानी करने की आज़ादी न मांगें.
मीडिया कंवर्जेंस की तरफ़ बढ़ रहे युग में प्रिंट, रेडियो, टेलीविजन, इंटरनेट जैसे सभी माध्यमों के उत्पादन, प्रसारण और वितरण के तरीक़ों पर नए सिरे से विचार हो. केबल, सैटेलाइट या थ्री- जी जैसी आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल और नियमन की बात भी साफ़ हो. इसके साथ समाचार माध्यमों और मनोरंजन माध्यमों के लिए भी अलग-अलग नियम बनाना ज़रूरी है. ऐसा बहुत लंबे वक़्त नहीं चल सकता है कि दोनों माध्यमों को एक ही तराजू पर तोला जाए. समाचार माध्यमों का आंकलन पत्रकारिता के उसूलों के हिसाब से किया जाए और मनोरंजन माध्यमों का आंकलन दूसरी तरीक़े से. अगर मीडिया उद्योग के नाम पर दोनों को एक ही श्रेणी में रखना है तो फिर समाचार माध्यमों को सामाजिक सेवा मानते हुए इन्हें विशेष सेवाएं देनी बंद कर देनी चाहिए.
अब कॉरपोरेट और सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त, कोई स्वायत्तशासी और अधिकार संपन्न आयोग ही मीडिया नियमन की उम्मीद जगा सकता है. ऐसा तभी हो सकता है जब सरकार पर जनता का दबाव हो.


संदर्भ:

पांच मार्च दो हज़ार दस को पेड न्यूज़ पर चर्चा के दौरान राज्य सभा में उद्धृत उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का वक्तव्य.
इंडिया इन बिजनेस, आइटीपी डिविजन, मिनिस्ट्री ऑफ़ एक्सटर्नल अफ़ेयर, गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया.
http://www.indiainbusiness.nic.in/industry-infrastructure/service-sectors/media-entertainment.htm

भूपेन सिंह, पत्रकारिता बनाम धंधेबाज़ी, समयांतर, दिल्ली, जनवरी, 2011
जेरोम बैरोन, फ़्रीडम ऑफ़ द प्रेस फॉर हूम ? द राइट ऑफ़ एक्सेस टू द मास मीडिया (ब्लूमिंगटन यू. ऑफ़ इंडियन प्रेस, 1973). सी एडविन बेकर की किताब मीडिया, मार्केट एंड डेमोक्रेसी में उद्धृत, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 2002
केवल जे कुमार, मास कम्युनिकेशन इन इंडिया, जैको पब्लिशिंग हाउस, मुंबई, 2009
शेल्टल गुनारत्ने : ‘मीडिया सबसर्विएंस एंड डेवलपमेंट जर्नलिज्म’ कम्युकेशन एंड डेवलपमेंट रिव्यू, वोल्यूम. 2, नं. 3
कुंडा दीक्षित : डेटलाइन अर्थ: जर्नलिज्म एज इफ़ द प्लैनेट मैटर्ड, इंटर प्रेस सर्विस/ एशिया पैसिफ़िक.
केवल जे कुमार, मास कम्युनिकेशन इन इंडिया, जैको पब्लिशिंग हाउस, मुंबई, 2009

स्टार न्यूज़ कई सालों से अपराध पर सनसनी नाम का एक न्यूज़ कार्यक्रम ही चला रहा है.
आउटलुक के वार्षिकांक (1 नवंबर 2010)में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सीईओ रवि धारीवाल का बयान
भूपेन सिंह, पत्रकारिता बनाम धंधेबाज़ी, समयांतर, दिल्ली, जनवरी, 2011
रॉबिन जैफ्री, इंडियाज न्यूजपेपर रेवोल्यूशन, ऑक्सफ़ोर्ड, 2003

रॉबर्ट मैकचेस्नी (1998), मेकिंग मीडिया डेमोक्रेटिक, बोस्टन रिव्यू, अमेरिका.
द न्यूजपेपर (प्राइज एंड पेज) एक्ट, 1956

दासू कृष्णामूर्ति, रीडर्स एंड मीडिया, द हूट http://www.thehoot.org/web/home/story.php?storyid=979&pg=1&mod=1§ionId=34§ionname=FOR%20READERS/%20VIEWERS%20%20%20%20%20%20%20%20%20%20&valid=true

आउटलुक के वार्षिकांक (1 नवंबर 2010)में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सीईओ रवि धारीवाल का बयान

परंजॉय गुहा ठकुराता और के श्रीनिवास रेड्डी की पेड न्यूज़ पर प्रेस काउंसिल के लिए तैयार की गई रिपोर्ट
टाइम्स ऑफ़ इंडिया और दिल्ली टाइम्स के 11 जनवरी 2011 के दिल्ली संस्करण.
भूपेन सिंह, मीडिया नियमन के सवाल, समयांतर, सितंबर 2009, दिल्ली
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से 10 जनवरी 2011 को जारी प्रेस विज्ञप्ति
न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन की साइट. http://www.nbanewdelhi.com/images/Upload/Decisions-taken-by-the-NBA.pdf
एनबीए की वेबसाइट में कोड ऑफ़ एथिक्स एंड ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड्स http://www.nbanewdelhi.com/codeof-ethics-broadcasting-standards.asp
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मॉनीटरिंग सेंटर की वेबसाइट http://emmc.gov.in/ShowArticle.aspx?id=MTI=
http://www.outlookindia.com/article.aspx?266542
प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में 3 दिसंबर 2010 को दिया गया राजदीप सरदेसाई का भाषण.
वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट 1956
कम्पेन फॉर प्रेस एंड ब्रॉडकास्टिंग फ्रीडम, ब्रिटेन, 2001
(समयांतर के मीडिया विशेषांक में प्रकाशित)

1 comments:

Bhagat Singh Panthi said...

बहुत ही अच्छा ब्लॉग है मैंने पहली बार इस तरह का नॉन स्टॉप ब्लॉग पडा