Sunday, May 15, 2011

कैसे ख़त्म होगी साम्प्रदायिकता?

साम्प्रदायिकता से कैसे निपटा जाए यह बहस फ़िर गर्म है. कई उतार-चढ़ावों के बाद सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार समिति ने साम्प्रदायिक हिंसा विरोधी विधेयक का मसौदा तैयार कर लिया है. फिलहाल इस पर सरकार का रुख साफ़ नहीं है लेकिन मसौदा समिति के सदस्यों को उम्मीद है कि यह विधेयक ज़रूर पास होगा. अगर यह विधेयक अपने मूल स्वरूप में पास हो जाता है तो इसके आधार पर दंगे वाले इलाक़े के अधिकारी भी सज़ा के हक़दार होंगे. राज्य भी अपनी ज़िम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ पाएगा और दंगा कराने वाले नेताओं पर भी शिकंजा कसा जा सकेगा.

दो हज़ार पांच में पहली बार साम्प्रदायिक हिंसा विरोधी विधेयक का मसौदा तैयार किया गया था. तब इसकी ख़ामियों को लेकर सामाजिक संगठनों ने काफ़ी आलोचना की थी. उसमें राज्य की साम्प्रदायिक भूमिका का ज़िक्र नही था. दंगों के दौरान होने वाली यौन हिंसा को सिर्फ़ यौन अपराध के तौर पर ही देखा गया था. पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों पर भी सवाल उठाने की कोई गुंजाइश नहीं थी. लेकिन नए विधेयक में इन सारे मुद्दों पर विचार किया गया है. इस मसौदे पर दो हज़ार पांच से ही काम हो रहा था लेकिन दो हज़ार दस में नए लोगों को इसकी ज़िम्मेदारी दी गई. राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य हर्ष मंदर और फ़राह नक़वी को इसका संयोजक बनाया गया और गोपाल सुब्रह्मण्यम, माजा दारूवाला, नजम बाज़िरी, पीआई जोस, तीस्ता सीतलवाड़, उषा रानाथन और वृंदा ग्रोवर की सात सदस्यीय मसौदा कमेटी बनायी गई. इस कमेटी ने पुराने मसौदे में अस्सी बदलाव कर उसका कायापलट कर दिया है.

इस विधेयक को पहले के मुक़ाबले ज़्यादा व्यापक बनाया गया है. अब इसमें साम्प्रदायिकता के साथ ही हर तरह की समूहगत हिंसा (सेक्टेरियन वॉयलेंस) को भी जोड़ दिया गया है. इसलिए इसका नाम बदलकर प्रिवेंशन ऑफ़ कम्युनल एंड टारगेटेड वॉयलेंस (एक्सेस टू जस्टिस एंड रेपरेशन) बिल हो गया है. अब इसमें अनुसूचित जाति और जनजातियों के अलावा धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों पर होने वाले हमलों को भी ध्यान में रखा गया है. भाषाई अल्पसंख्यकों को ध्यान में रखने का एक संदर्भ मुंबई में राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस द्वारा बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों को निशाना बनाया जाना है. साम्प्रदायिक और सामूहिक हिंसा में धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र और दूसरी पहचानों के आधार पर की जाने वाली हिंसा को शामिल किया गया है.
इसके लागू होने पर राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर बनी साम्प्रदायिक हिंसा विरोधी संस्था में पीड़ित व्यक्ति न्याय की गुहार लगा सकते हैं. लोगों को हिंसा से बचाने की पूरी ज़िम्मेदारी राज्य की होगी. हिंसा के दायरे में सामाजिक बहिष्कार और जबरन विस्थापन को भी शामिल किया गया है. इस केंद्रीय संस्था मे पीड़ितों के राहत, पुनर्वास और क्षतिपूर्ति के लिए सिफ़ारश करेगी. इसका प्रस्तावित नाम नेशनल अथॉरिटी फ़ॉर कम्युनल हार्मनी, जस्टिस एंड रेपरेशन प्रस्तावित किया गया है. इसके सात सदस्य होंगे. एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष होगा. चार सदस्य महिलाएं होंगी. अथॉरिटी के सात में से चार सदस्य उन समूहों से लिए जाएंगे विधेयक में जिनकी सुरक्षा की बात की गई है. सदस्यों का चयन करने के लिए एक पैनल की सिफ़ारिश की गई है. इसमें प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष, गृह मंत्री और राष्ट्रीय पार्टियों के प्रतिनिधि होंगे .

मसौदा समिति के सदस्यों का कहना है कि अथॉरिटी वर्तमान न्याय प्रणाली की जगह लेने के बजाय सलाहकार की ही भूमिका में रहेगी. जो संघीय ढांचे का पूरा सम्मान करेगी. लेकिन इसके लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से ज़्यादा अधिकारों की वकालत की गई है. क्योंकि गुजरात दंगों के वक़्त गुजरात सरकार ने आयोग की सलाह मानने से इनकार कर दिया था और आयोग इस मामले में कुछ नहीं कर पाया. साम्प्रदायिक हिंसा विरोधी मसौदे के मुताबिक़ हिंसा से निपटने के लिए राज्य को मजबूत करने वाली अवधारणा की बजाय इसमें सरकार की ज़िम्मेदारी तय की गई है. इसके अलावा पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा के लिए कानूनी तौर पर विशेष प्रावधान करने की वकालत की गई है. सरकारी अधिकारियों के साथ ही नेताओं पर भी इस मसौदे में शिकंजा कसने का प्रावधान है. न्याय प्रक्रिया को ज़्यादा पारदर्शी बनाने के लिए हर ट्रायल की वीडियोग्राफ़ी की जाएगी. दंगे में मारे गए व्यक्ति की संबंधित राज्य की सरकार पंद्रह लाख रुपए देगी. हर तीन साल में इसका मूल्यांकन किया जाएगा. फिलहाल इस मसौदे पर विशेषज्ञों और जनता से राय ली जा रही है. इसे राष्ट्रीय सलाहकार समिति की वेबसाइट में डाला जाना है. सभी पक्षों की राय आने के बाद इसे प्रधानमंत्री के पास भेजा जाएगा.
इस मसौदे की पृष्ठभूमि में उन्नीस चौ चौरासी के सिख विरोधी दंगों, दो हज़ार दो के गुजरात दंगों और दो हज़ार आठ के कंधमाल दंगों की प्रकृति को ख़ास तौर पर ध्यान में रखा गया है. मसौदा राष्ट्रीय सलाहकार समिति के बाद अब गेंद सरकार के पाले में जाने के लिए तैयार है. मसौदे का भविष्य सरकार के हाथों में है. अगर इसमें बहुत ज़्यादा फ़ेर-बदल नहीं किए गए तो यह कानून साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने में काफ़ी मददगार साबित हो सकता है. गौरतलब है कि इसका इस्तेमाल पुराने दंगों के दोषियों पर शिकंजा कसने के लिए भी किया जा सकता है. ऐसे हालात में दंगों की राजनीति करने वाले कांग्रेस और बीजेपी जैसे दल इस मसौदे को लेकर क्या रुख अपनाएंगे यह जल्द ही साफ़ हो जाएगा.

ऐसा नहीं है कि इस विधेयक के कानून बन जाने के बाद साम्प्रदायिक हिंसा पर पूरी तरह लगाम लग जाएगी. इसके लिए ज़रूरत इस बात की है कि देश में साम्प्रदायिक हिंसा की मूल जड़ों को पहचाना जाए. शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी असली मुद्दों से ध्यान हटाने वाली अस्मिता की राजनीति को जब तक हवा दी जाती रहेगी तब तक इस तरह की हिंसा को पूरी तरह रोक पाना संभव नहीं होगा. देश में धर्मनिरपेक्षता की असली अवधारणा से पीछा छुड़ाकर जब तक राज्य के कामों में धर्म का दोहन किया जाता रहेगा तब तक साम्प्रदायिकता को ख़त्म करना खाम ख्य़ाली होगी

1 comments:

अनुनाद सिंह said...

कम्युनिस्ट भी चले गये किन्तु साम्प्रदायिकता(?) नहीं गयी!