भूपेन सिंह
‘वायु तरंगें जनता की संपत्ति हैं’
-सुप्रीम कोर्ट, भारत, फरवरी, 1995
‘एफएम रेडियो के विस्तार के लिए तीसरे चरण के निजीकरण के तहत सरकार लाइसेंस नीलाम कर एक हज़ार सात सौ तैंतीस करोड़ रुपए कमाने की सोच रही है’
-अंबिका सोनी, सूचना और प्रसारण मंत्री, जुलाई, 2011
भारत सरकार वायु तरंगों को कॉरपोरेट को बेच कर अपने ही सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी का मज़ाक उड़ा रही है. टेलीविजन समाचारों के निजीकरण के बाद अब सरकार रेडियो समाचारों के निजीकरण के रास्ते पर है. लेकिन यह प्रक्रिया टेलीविजन की तुलना में जटिल और ज़्यादा ख़तरनाक है. सात जुलाई दो हज़ार ग्यारह को सरकार द्वारा घोषित एफएम रेडियो के तीसरे चरण की विस्तार योजना में कई ख़तरों को पहचाना जा सकता है. इस चरण में सरकार ने एफएम चैनलों को एक हद तक समाचार प्रसारित करने का अधिकार भी दे दिया है. साथ ही रेडियो चैनलों में विदेशी निवेश की सीमा बीस से बढ़ाकर छब्बीस फ़ीसदी कर उसने यह भी साबित कर दिया है कि वह जनता की संपत्ति को विदेशी पूंजीपतियों के हवाले करने को लेकर कितनी उतावली है. मीडिया नियमन से लगातार कन्नी काटती सरकार का यह कदम भारतीय मीडिया के लोकतांत्रीकरण की बची-खुची उम्मीदों को भी ख़त्म करने वाला है.
नब्बे के दशक में उदारीकरण की प्रक्रिया को शुरू हुए कुछ ही वक़्त बीता था. कोलकाता क्रिकेट बोर्ड और दूरदर्शन प्रसारण अधिकारों के विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे. जस्टिस पीबी सावंत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने तब बहुमत के आधार पर कहा था कि वायु तरंगें जनता की संपत्ति हैं इसलिए उन्हें जनता के हित में ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए. इस फ़ैसले की कई प्रतिध्वनियां हैं, अपेक्षा बनी कि सरकार पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग सिस्टम को मजबूत करेगी. दूरदर्शन और रेडियो सिर्फ़ सरकारी भौंपू बनकर नहीं रहेंगे, साथ ही निजी मीडिया की मनमानी पर लगाम लगाने कि लिए भी एक कारगर रेग्युलेटरी बोर्ड बनेगा. वक़्त बीतने के साथ ये दोनों ही बातें ग़लत साबित हुईं. सरकार ने स्वायत्त पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग के नाम पर प्रसार भारती तो बनाया लेकिन सरकारी एकाधिकार ख़त्म नहीं हुआ. दूसरी ओर उसने निजी मीडिया को इतनी छूट दी कि नियमन की बात पर वे आत्मनियमन की माला जपते हुए बेशर्मी से सरकार को ही धौंस देने लगे और व्यापक जनता की अनदेखी करने लगे.
उदारीकरण की प्रक्रिया को अपनाने के दो दशक बाद अब मुनाफाख़ोरों के निशाने पर रेडियो समाचार हैं. सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने एफएम रेडियो विस्तार के तीसरे चरण में कई नए निजी रेडियो चैनलों को लाइसेंस देने की घोषणा की है. जिसके तहत अब उन्हें आकाशवाणी की ख़बरों को बिना छेड़छाड़ किए प्रसारित करने की अनुमति भी मिल जाएगी. कॉरपोरेट की तरफ़ से सरकार पर लंबे अरसे से रेडियो समाचारों के निजीकरण करने का दबाव था. जन दबाव न होने की वजह से पहले से ही तैयार सरकार ने इसके लिए हामी भर दी है. जनमत बनाने में माहिर कॉरपोरेट मीडिया सरकार के इस क़दम की जमकर तारीफ़ कर रहा है. इसी ‘ख़ुशनुमा माहौल’ में सरकार ने दबे पांव निजी रेडियो चैनलों में विदेशी निवेश की सीमा छह फ़ीसदी और बढ़ा दी है. इस पूरे घटनाक्रम को मीडिया के लोकतांत्रीकरण की बात करने वाले एक बड़े ख़तरे के तौर पर देख रहे हैं. निजी मीडिया में पेड न्यूज़ और राडिया कांड जैसी घटनाएं खुलकर सामने आने के बाद उसकी विश्वसनीयता पहले ही तार-तार हो चुकी है. निजी मीडिया मुनाफ़ा कमाने की ललक के पीछे किस हद तक जा सकता है इसका ताज़ा उदाहरण ब्रिटेन में मीडिया मुगल रूपर्ड मुर्डोक के न्यूज ऑफ़ द वर्ल्ड की करतूतों से मिलते हैं. लेकिन लगता है कि कॉरपोरेट की इशारों पर चलने वाली हमारी सरकारें इन सब से आंख मूंदकर सोई हुई हैं.
एफएम रेडियो में तीसरे चरण के विस्तार की घोषणा करते हुए दो सौ सत्ताईस नए शहरों में एफएम चैनलों को लाइसेंस देने का ऐलान किया गया है. इससे पहले सिर्फ़ छियासी शहरों में ही एफएम चैनल मौज़ूद थे. अब सरकार कुल आठ सौ उनतालीस नए एमएफ चैनलों को अनुमति देने के लिए तैयार है. इसके तहत एक लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में निजी एफएम चैनल शुरू हो जाएंगे. पहले और दूसरे चरण में सरकार ने इकतीस मई दो हज़ार ग्यारह तक लाइसेंस बेचकर एक हज़ार सात सौ तैंतीस करोड़ रुपए कमाए थे. सरकार का कहना है कि वो इस चरण के तहत एक ही झटके में एक हज़ार सात सौ तैंतीस करोड़ रुपए का राजस्व कमाने का इरादा रखती है. ये सारे फ़ैसले कैबिनेट ने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में लिए. जनता की संपत्ति को बेचकर मुनाफ़ा कमाने और विकास के नाम पर कॉरपोरेट का घर भरने वाले दर्शन की अगुवाई करने वाले प्रधानमंत्री को भला इसमें क्या आपत्ति हो सकती है! लेकिन जनता के सवाल अब भी बरकरार हैं.
सरकार ने नई कंपनियों को लाइसेंस देने की जो शर्तें रखी हैं उससे स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र में भी आने वाले दिनों में बड़े पूंजीपतियों का एकाधिकार साफ़ दिखाई देगा. जिन कंपनियों के पास अथाह पैसा है वे ही इसमें निवेश करने में सक्षम होंगी. पता चलता है कि सरकार की मंशा क्रॉस मीडिया होल्डिंग पर लगाम लगाने की बिल्कुल भी नहीं है. यह बात देश की विविधता का गला घोंटने वाली साबित हो सकती है. क्रॉस मीडिया होल्डिंग का सीधा सा अर्थ है कि कुछ बड़े मीडिया घराने पूंजी के बल पर रेडियो, टेलीविजन, प्रिंट और इंटरनेट में एकाधिकार स्थापित कर देश के जनमत को मनचाही दिशा में मोड़ने में सक्षम हो सकते हैं. क्षेत्रीय चैनलों में भी एक ही तरह का केद्रीय विचार ज़्यादा हावी रहेगा. यह क़दम लोकतांत्रिक संस्थाओँ के लिए सर्वाधिक घातक है. अमेरिका जैसे पूंजीवादी देश में भी क्रॉस मीडिया होल्डिंग को रोकने के लिए कुछ ठोस नियम हैं. इसके अलावा दूसरे धंधों का पैसा भी मीडिया में लगाने के चलन पर रोक लगाने की कोई व्यवस्था हमारे यहां नहीं है. यही बजह है कि हाल के दौर में आपराधिक प्रवृत्ति के कई व्यावसायी मीडिया में पैसा लगा कर मुनाफ़ा कमा रहे हैं. जबकि ख़ास तौर समाचार मीडिया में पैसा लगाने की इजाज़त किसी भी हालत में ऐसे व्यवसायियों को नहीं होनी चाहिए जो पत्रकारिता के प्रभाव का इस्तेमाल अपना दूसरा व्यवसाय चमकाने में कर सकें. चिंता की बात यह है कि सरकार क्रॉस मीडिया होल्डिंग के साथ ही क्रॉस बिजनेस होल्डिंग की भी पूरी तरह से अनदेखी कर रही है.
एफएम रेडियो के दूसरे चरण के विस्तार की योजनाओं में सरकार ने मीडिया घरानों से कहा था कि सरकार की तरफ़ से क्रॉस मीडिया होल्डिंग संबंधी कोई नियम लाने पर उऩ्हें छह महीने के भीतर अपने मालिकाने में बदलाव करना होगा. यह बात अपने आप में खोखली साबित हुई. क्योंकि क्रॉस मीडिया होल्डिंग को लेकर सरकार अब तक कोई नीति नहीं बना पाई है. सिर्फ़ दिखावे से इस मामले में काम नहीं चलने वाला है क्योंकि आज बड़ी और मुनाफ़ाख़ोर मीडिया कंपनियों के लिए नई कंपनी बनाना बांयें हाथ का खेल है. मालिकाना बदलने का दिखावा करने में भी वे माहिर हैं. अब तो लगता है कि सरकार ने क्रॉस मीडिया होल्डिंग की चिंता से पूरी तरह किनाराकशी कर ली है.
उन्नीस सौ सत्ताईस में हमारे यहां रेडियो की शुरुआत ही एक निजी कंपनी के तहत हुई लेकिन आज़ादी के बाद नेहरू के गुलाबी समाजवाद के कुछ रंग हमारे रेडियो में भी दिखे. रेडियो में सरकार बजती रही. एफएम रेडियो उन्नीस सौ सतहत्तर में देश में पहुंचा. तब चेन्नई में आकाशवाणी के भीतर ही इसकी शुरुआत हुई लेकिन निजीकरण से जुड़ा इसका रूप नब्बे के दशक में ही देखने को मिला. उन्नीस सौ तिरानबे में सरकार ने नई आर्थिक नीतियों के अनुरूप पहली बार एफएम रेडियो की योजना पर अमल शुरू किया. इस दौर में मद्रास, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और गोवा में एफएम चैनल शुरू हुए. तब आकाशवाणी के चैनलों में ही निजी क्षेत्र को विषयवस्तु में निवेश की अनुमति दी गई. निजी कंपनियां सरकारी रेडियो में अपने लिए टाइम स्लॉट ख़रीदने लगीं. जुलाई उन्नीस सौ निन्यानबे में सरकार ने फ़ैसला किया कि वो एफएम रेडियो में पूरी तरह निजी निवेश को स्वीकृति देने जा रही है. इसे एफएम रेडियो विस्तार का पहला चरण कहा गया. मार्च दो हज़ार में सरकार ने लाइसेंस देने के लिए एक सौ आठ रेडियो चैनलों के लिए खुली नीलामी की. इऩ चैनलों को ख़बरों को छोड़कर शिक्षा, स्वास्थ्य और मनोरंजन से जुड़े कार्यक्रम पेश करने का अधिकार था. यह एफएम रेडियो के क्षेत्र में निजी पूंजी की पूरी तरह से घुसपैठ थी. इस चरण में कोई स्पष्ट और कारगर नीति न होने की वजह से लाइसेंस देने और उनके क्रियान्वयन में काफ़ी गड़बड़ियां सामने आईं. नतीजतन सिर्फ़ बारह शहरों में इक्कीस रेडियो चैनल ही अपना काम जारी रख पाए. प्रचार किया गया कि एफएम विस्तार के पहले चरण में निजी ऑपरेटरों को घाटा उठाना पड़ा है.
पहले चरण की नीतियां सही तरह से काम नहीं कर पाई तो सरकार ने लाइसेंस देने की प्रक्रिया में सुधार करने के नाम पर दूसरे चरण में कदम रखा. तब उद्धार के लिए पूंजीपतियों के संगठन फिक्की के अमित मित्रा की अगुवाई में रेडियो प्रसारण नीति कमेटी (रेडियो ब्राडकास्ट पॉलिसी कमेटी) बनाई गई. इस कमेटी ने उन्नीस विंदुओं पर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी. जिसकी निजी संगठनों ने काफ़ी तारीफ़ की. दो हज़ार पांच में इस कमेटी की रिपोर्ट को लागू करने के बाद रेडियो स्टेशन स्थापित करने की कीमत में काफ़ी कमी आ गई. परिणामस्वरूप रेडियो निजीकरण के दूसरे चरण में इक्यानबे शहरों में तीन सौ सैंतीस स्टेशनों की नीलामी की गई. यह नीलामी जनवरी दो हज़ार छह में पूरी हुई. इस तरह जून दो हज़ार नौ में इक्यानबे शहरों से दो सौ अड़तालीस रेडियो स्टेशन काम करने लगे थे. आख़िरकार तीसरे चरण में एफएम रेडियो में ख़बर परोसने की भी अनुमति निजी हाथों को दे दी गई है.
सूचना और प्रसारण मंत्रालय की तरफ़ से जैसे ही रेडियो के निजीकरण के तीसरे चरण की घोषणा की. कॉरपोरेट के प्रवक्ता फूले नहीं समाए उन्होंने सरकारी फ़ैसले को जायज़ ठहराने की हरसंभव कोशिश की. जनता की तरफ़ से कोई प्रतिरोध देखने को नहीं मिला इसलिए कॉरपोरेट मांग करने लगे कि उन्हें मुनाफ़ा कमाने की अंतहीन आज़ादी चाहिए. सरकार भले ही इस मामले में जनता का मूड भांपने के लिए धीरे-धीरे अपने पत्ते खोल रही हो लेकिन अति उत्साहित कॉरपोरेट सबकुछ एक साथ पा लेना चाह रहे हैं. उनकी मांग है कि सरकार उन्हें ख़बर प्रसारित करने का पूर्ण अधिकार दे. फिलहाल समाचार प्रसारित करने पर सरकारी भौंपू आकाशवाणी का एकाधिकार है. अब निजी एफएम चैनल आकाशवाणी के बुलेटिनों में बिना छेड़छाड़ किए उन्हें प्रसारित कर पाएंगे. इसके अलावा गैर समाचारों की श्रेणी में खेल से जुड़ी सूचनाएं, यातायात, मौसम, करियर काउंसिलिंग, एडमिशन, महोत्सव और सांस्कृतिक ख़बरों को प्रसारित करने की भी अनुमति होगी. आकाशवाणी कई एजेंसियों से ख़बर लेती है लेकिन सरकार ने निजी चैनलों को अभी एजेंसियों से सीधे ख़बरें लेने की अनुमति नहीं दी है. ऐसा लगता है कि जानबूझकर इस तरह की ढील-ढाली व्यवस्था बनाई गई है ताकि जल्द ही रेडियो समाचारों को पूरी तरह निजी हाथों में सौंपा जा सके. सूचना और प्रसारण मंत्रालय मान भी चुका है कि आने वाले दिनों में इसकी इजाज़त दी जा सकती है. मतलब साफ़ है कि आने वाले दिनों में निजी टेलीविजन न्यूज चैनलों ने जिस तरह का अराजक माहौल बना रखा है वैसा ही माहौल रेडियो समाचारों के क्षेत्र में भी दिख सकता है.
टू जी स्पेट्रम घोटाला अभी पुराना नहीं हुआ है. उसमें बरखा जैसे कई स्वनामधन्य पत्रकारों की भूमिका अब छुपी नहीं रही. कॉरपोरेट, मीडिया और राजनेताओं का गठजोड़ किस तरह जनता को बेवकूफ़ बनाता है इसका एक बड़ा उदाहरण मिल चुका है. इस घोटाले को याद रख सरकार अब नए रेडियो चैनलों के लिए थ्री जी स्पेक्ट्रम की जो नीलामी में ई-ऑक्शन का तरीक़ा अपनाने जा रही है यानी लाइसेंस की नीलामी इंटरनेट के माध्यम से होगी. ऐसा कदम उठाकर सरकार यह दिखाना चाह रही है कि जिस तरह टू जी स्पेट्रम की नीलामी में कुछ प्रभावशाली लोगों ने धनबल-बाहुबल के आधार पर स्प्रेक्ट्रम हथिया लिए थे वैसा थ्री जी स्पेक्ट्रम की नीलामी में न होने पाए. कोई गड़बड़ी न हो इसके लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय विशेषज्ञों की एक समिति बनाने जा रहा है. लेकिन धंधे की बारीकियों पर नज़र रखने वाले जानते हैं कि कॉरपोरेट का काम बिना अपराध के चल ही नहीं सकता इसलिए उनके लिए चोर दरवाजे भी कभी बंद नहीं हो सकते. सरकार के मुताबिक़ नीलामी की यह प्रक्रिया इस वित्तीय वर्ष के अंत तक ख़त्म हो जाएगी और इस प्रक्रिया को पूरा होने में तीन साल लगेंगे. अब अगर कोई यह मानता है कि इस मामले में नीरा राडिया जैसे लाबिइंग के उस्ताद चुप बैठे रहेंगे तो यह उनकी सदइच्छा है.
फिलहाल हिंदुस्तान में छत्तीस रेडियो ऑपरेटर ही हैं. इनका सालाना व्यवसाय एक हज़ार दो सौ करोड़ का है. अनुमान लगाया जा रहा है कि नई नीति लागू हो जाने के बाद इसमें तीन साल के भीतर तिगुना उछाल आ जाएगा. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि रेडियो में निवेश करने वाले ज़्यादातर कॉरपोरेट घराने वही हैं जिनका पहले से ही मीडिया से जुड़े दूसरे कारोबारों में पैसा लगा है. टाइस्म ऑफ़ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स और मिड डे जैसे कई बड़े मीडिया घरानों का पैसा एफएम रेडियो में लगा है. टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने निजी रेडियो में घुसपैठ के लिए इंटरटेनमेंट नेटवर्क इंडिया लिमिटेड (आईएनआईएल) बनाया है. यह कंपनी देशभर में रेडियो मिर्ची नाम से एफएम रेडियो चैनल चलाती है. दो हज़ार में पहले चरण की लाइसेंसिंग नीलामी में इस कंपनी ने सबसे ज़्यादा फ्रीक्वेंसी झटक ली थी. दो हज़ार छह में इसने पच्चीस फ्रीक्वेंसीज हासिल कर ली थी और फिलहाल तैंतीस शहरों में इसके रेडियो चैनल चल रहे हैं. क्रॉस मीडिया होल्डिंग कैसे देश के जनमत को एक ही दिशा में मोड़ने का का काम करती है इसका एक छोटा सा नमूना यह है कि बारह जुलाई को टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप के अख़बार इकोनोमिक टाइम्स ने एफएम रेडियो के तीसरे दौर की लाइसेंसिंग के बारे में राजेश नायडु की एक रिपोर्ट छापी. पूरी रिपोर्ट में अपने ही रेडियो चैनल रेडियो मिर्ची की तारीफ़ की गई है और भविष्य में टाइम्स ऑफ़ इंडिया की तरह ही रेडियो के क्षेत्र में उसके छा जाने की छुपी हुई घोषणा है. एफएम रेडियो के क्षेत्र में आने वाले छोटे निवेशकों के प्रति इस ग्रुप का क्या ख़्याल है उसे लेखक की इन पंक्तियों से समझा जा सकता है.‘घाटे में रहने वाले रेडियो मालिक अपनी फ्रीक्वेंसीज को बेचकर बाहर हो जाएंगे, जबकि मजबूत और मुनाफ़े में रहने वाले खिलाड़ी इन फ्रीक्वेंसीज पर कब्ज़ा कर लेंगे. बड़े प्लेयर द्वारा छोटे प्लेयरों का यह कब्ज़ा श्रोताओं का विस्तार करेगा और बड़े खिलाड़ियों की विज्ञापनों में हिस्सेदारी को बढ़ाएगा.’ इससे साफ़ समझा जा सकता है कि आने वाले दिनों में इस क्षेत्र में कैसा ऑनरशिप पैटर्न देखने में आएगा. टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अलावा कई और बड़े मीडिया और कॉरपोरेट हाउस अब थ्री जी स्पेक्ट्रम हथियाने मे लगे हैं. इस सिलसिले में उद्योगपति अनिल अंबानी के बिग एफएम जैसे और भी कई उदाहरण हैं.
ऐसा नहीं है कि सरकार एकाधिकार और क्रॉसमीडिया होल्डिंग के ख़तरों से अनजान है इसलिए उसने दिखावे के लिए कुछ प्रावधान बनाए हैं. लेकिन ये प्रावधान इतने सतही हैं कि इनके होने न होने से बहुत फ़र्क नहीं पड़ता. सूचना और प्रसारण मंत्रालय का कहना है कि तीसरे चरण में राष्ट्रीय स्तर पर एक कंपनी को कुल चैनलों में से सिर्फ़ पंद्रह फ़ीसदी चैनल ही रखने का अधिकार होगा. यह शर्त पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर के चैनलों पर लागू नहीं होगी. कल्पना की जा सकती है कि भारत जैसे विशाल देश में अगर पंद्रह फ़ीसदी रेडियो प्रसारण पर एक ही रेडियो कंपनी का अधिकार होगा तो वह अपने आप में कितना ताक़तवर हो जाएगी. पहले किसी कंपनी को एक शहर में एक चैनल से ज्यादा में स्वामित्व रखने का अधिकार नहीं था. लेकिन अब एक कंपनी को एक शहर में एक से ज़्यादा चैनल रखने की अनुमति होगी लेकिन उसे इलाक़े के सभी चैनलों के मालिकाने के चालीस फ़ीसदी से ज़्यादा रखने का अधिकार नहीं होगा. यह फ़ैसला एक तरह से खुले आम एकाधिकार का समर्थन करने वाला है. नई नीति के मुताबिक़ पहले के दस सालों के मुक़ाबले अब पंद्रह साल के लिए लाइसेंस दिए जाएंगे.
देश में जनपक्षीय रेडियो की स्थापना के लिए उसके आर्थिक पक्ष के साथ तकनीकी और सामाजिक पक्ष को जोड़कर देखना भी ज़रूरी है. भारत में मुख्यतया दो तरह से रेडियो प्रसारण होता है. पुराना और परंपरागत तरीक़ा एमएम (एम्प्लीफ़ाइड मॉड्यूलेशन) का है. जिसमें शॉर्ट वेव और मीडियम वेव पर प्रसारण होता है. पहुंच के मामले में यह देश के निन्यानबे फ़ीसदी आबादी और नब्बे फ़ीसदी भूभाग को कवर करता है. जब कि एफएम (फ्रीक्वेंसी मॉड्यूलेशन) फिलहाल चालीस फ़ीसदी आबादी और पच्चीस फ़ीसदी भूभाग को कवर करता है. एफएम रेडियो का संचालन हमारे देश में मुख्यतौर पर दो तरह से हो रहा है पहला है व्यावसायिक एफएम रेडियो चैनलों का प्रसारण और दूसरा कम्युनिटी रेडियो चैनलों का प्रसारण. इन दोनों के बीच मुख्य फ़र्क यही है कि पहले का मक़सद जहां विशुद्ध तौर पर मुनाफ़ा कमाना है वहीं कम्युनिटी रेडियो का मक़सद क्षेत्रीय समुदाय के हितों के अनुरूप काम करना है. लेकिन कम्युनिटी रेडियो को हमारे यहां ज़्यादा अधिकार नहीं हैं. इसके साथ ही इसका दायरा भी एफएम रेडियो की तुलना में सीमित है. एफएम रेडियो की पहुंच आम तौर पर साठ से सौ किलोमीटर के बीच होती है, जबकि कम्युनिटी रेडियो का दायरा एफएम के विपरीत पांच-दस किलोमीटर होता है.
रेडियो प्रसारण के क्षेत्र में हुए तकनीकी विकास का फ़ायदा देश के नागरिकों को मिले इसके लिए सबसे बेहतर स्थिति यही होती कि देश का पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग सिस्टम मजबूत होता लेकिन सरकार ऐसा बिल्कुल नहीं चाहती. इसलिए रेडियो के निजीकरण का कदम उठाया जा रहा है. ऐसे हालात में यह ज़रूरी हो जाता है कि पूंजीवादी लोकतंत्र के हिसाब से ही सही, कुछ नियम-कायदों का पालन किया जाए. बड़े-बड़े पूंजीपतियों को देशभर के शहरों में रेडियो चैनल स्थापित करने की इजाज़त विविधता को तो ख़त्म करेगी ही यह छोटे-छोटे रेडियो चैनलों को भी नहीं पनपने देगी. लाइसेंस की बड़ी क़ीमतों की वजह से इसमें छोटे निवेशकों के लिए कोई जगह नहीं बचेगी. बेहतर यह होता कि सरकार स्थानीय तौर पर लाइसेंस का बंटवारा करती और किसी मीडिया घराने को एक से ज़्यादा चैनल खोलने की इजाज़त नहीं देती. इसका एक ख़तरनाक उदाहरण देश की जनता अख़बारों के अनगिनत क्षेत्रीय संस्करणों के रूप में देख चुकी है जहां बड़ी पूंजी वाले अख़बारों के क्षेत्रीय संस्करण स्थानीय संस्कृति का प्रतिनिधत्व करने वाले कई अख़बारों को निगल चुके हैं. एफएम रेडियो के मामले में सरकार पर इसी नीति को न दोहराने का दबाव होना चाहिए. सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि निजी रेडियो में समाचार प्रसारित करने की इजाज़त दे भी दी जाए तो सरकार समाचारों को सिर्फ़ उत्पाद समझकर उनका धंधा न करवाए. वरना उसके लोकतंत्र का तथाकथित चौथा स्तंभ यहां भी सिर्फ मुनाफ़े का ही हिसाब लगाता दिखेगा.
(समयांतर के अगस्त अंक में प्रकाशित)
Saturday, August 13, 2011
एफएम रेडियो: एकाधिकार का विस्तार
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