भूपेन सिंह
काटजू से कौन डरता है?
भारतीय प्रेस परिषद के नए अध्यक्ष मार्कन्डेय काटजू ने कॉरपोरेट समाचार मीडिया की अराजकता और समाज विरोधी गतिविधियों पर दो-चार टिप्पणियां क्या कर दीं, मीडिया मालिकों और उनके सहयोगियों ने उन पर चौतरफ़ा हमला बोल दिया. पत्रकारिता को मुनाफ़ाखोरी का धंधा समझने वाली न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए), एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) और इंडियन न्यूज पेपर्स सोसायटी (आईएनएस) जैसी मालिकों के प्रभाव वाली संस्थाएं काटजू को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करती रहीं. ये संगठन मीडिया मालिकों की मुनाफ़ा कमाने की स्वतंत्रता को मीडिया की स्वतंत्रता की तरह पेश करते रहे और काटजू पर मीडिया को सरकारी नियंत्रण में लाने का आरोप लगाते रहे. बहस, प्रेस की आज़ादी बनाम सरकारी नियंत्रण के आसपास केंद्रित कर दी गई. इस तरह की छद्म बहस में मीडिया स्वामित्व और उसके परिणामों से जुड़े राजनीतिक-आर्थिक मुद्दों से जानबूझ कर कन्नी काटी गई.
उदारीकरण के दौर में भारतीय समाचार मीडिया एक किस्म की अराजकता से गुजर रहा है. बड़ी और विदेशी पूंजी के सहारे चल रहीं मीडिया कंपनियां सामाजिक सरोकारों की अनदेखी कर पत्रकारिता को धंधेबाज़ी और मुनाफ़ाखोरी का पर्याय बनाने पर तुली हुई हैं. अख़बार के पन्नों और टेलीविजन चैनलों की विषयवस्तु पर इसका असर साफ़ देखा जा सकता है. सारे हालात के लिए ज़िम्मेदार सरकार इस अराजकता को कुछ इस तरह से परिभाषित कर रही है जैसे वो भी सबकुछ देखकर हैरान-परेशान हो. जबकि हक़ीक़त सिर्फ़ इतनी है कि सरकार की आर्थक नीतियों का यह स्वाभाविक परिणाम है. ऐसे हालात में काटजू ने अपनी सीमाओं के बावजूद समाचार मीडिया पर कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठाये हैं.
सितम्बर महीने में सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए जस्टिस काटजू हमेशा अपनी ख़ास तरह की शैली के लिए चर्चित रहे हैं. नेहरू के गुलाबी समाजवाद का असर उन पर अब तक देखा जा सकता है. वे भारत के महान अतीत (भौतिकवादी और तार्किक) का ज़िक्र करते हैं और आधुनिक मूल्यों को अपनाने पर भी बल देते हैं. वे प्रेस परिषद के नए अध्यक्ष किस की मर्जी से और क्यों बने हैं ये या तो वे जानें या उन्हें बनाने वाले. लेकिन अक्टूबर महीने में भारतीय प्रेस परिषद का काम संभालने के बाद उन्होंने सबसे पहले दिल्ली के सभी स्वनामधन्य संपादकों को अपने पास बुलाया और उन्हें मीडिया की नैतिकता पर एक लंबा भाषण पिलाया. संपादकों/मालिकों के बीच उनके कथन को लेकर काफ़ी चर्चाएं रहीं. कुछ संपादकों ने उनकी बातों को लेकर लिखित प्रतिवाद भी दर्ज किया. लेकिन यह सारी हलचल सतह पर तब आई जब तीस-इकत्तीस अक्टूबर को करन थापर ने सीएनएन आईबीएन पर अपने कार्यक्रम, डेविल्स एडवोकेट में काटजू का इंटरव्यू प्रसारित किया. इस कार्यक्रम में काटजू ने भारतीय मीडिया की अराजकता पर कई सवाल उठाए और सख्त नियमन की ज़रूरत पर बल दिया. इस इंटरव्यू के बाद मीडिया मालिकों की तरफ़ से हमला शुरू हो गया. जब बहस आगे बढ़ी तो इंडियन एक्सप्रेस ने इस विषय पर काटजू का लेख छाप दिया और द हिंदू ने भी संपादकों को पिलाए गए उनके भाषण के अंश प्रकाशित कर दिए.
अपने भाषण, इंटरव्यू और लेख में प्रेस काउंसिल के नए अध्यक्ष जस्टिस काटजू कॉरपोरेट समाचार मीडिया को आड़े हाथों लेते हुए कहते हैं कि वो हमेशा वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाकर बेमतलब के मुद्दों को ज़्यादा अहमितयत देता है. इस बात के लिए वे मीडिया को ध्यान दिलाते हैं कि भारतीय समाज आज सामंतवाद से आधुनिकता में संक्रमण कर रहा है इसलिए मीडिया को एक ज़िम्मेदार भूमिका निभानी चाहिए, यानी मीडिया को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे मुद्दों पर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए. दूसरी महत्वपूर्ण बात काटजू ने मीडिया में व्याप्त पूर्वाग्रहों के बारे में कही. वे इस बात पर ऐतराज करते हैं कि कहीं भी कोई बम धमाका होता है तो मीडिया उसके लिए मुस्लिम समुदाय को बिना सबूतों के ही ज़िम्मेदार ठहराना शुरू कर देता है. उन्होंने इसके लिए बम धमाकों की जिम्मेदारी लेने वाले फ़र्जी ईमेल का ज़िक्र किया, जिसमें कोई अपराधी प्रवृत्ति का व्यक्ति मुसलमान नाम के साथ घटना की जिम्मेदारी लेता है और मीडिया बिना जांच किए ही उसे प्रसारित कर देता है. मीडिया ट्रायल के साथ ही काटजू समाचार मीडिया में अंध विश्वासों और ज्योतिष के प्रचार-प्रसार की भी आलोचना करते हैं.
किसी भी समझदार व्यक्ति या संस्था के लिए काटजू द्वारा उठाए गए ज़्यादातर मुद्दों से असहमत होना आसान नहीं है. लेकिन काटजू ने अपने बयानों से बेलगाम कॉरपोरेट मीडिया पर सवाल क्या खड़े किए, उसके सिपहसालार संवाद के न्यूनतम शिष्टाचार को भूलकर बेवजह की आक्रामकता दिखाने लगे हैं. पत्रकारिता को विशेषाधिकार का लाइसेंस समझने वाले मालिकों के पिछलग्गू कई संपादक इससे तिलमिला उठे हैं. जस्टिस काटजू के बयान के बाद टीवी न्यूज़ चैनलों ने जिस तरह उन्हें विलेन बनाकर पेश करने की कोशिश की उसे सारी देश की जनता ने देखा. लेकिन अच्छी बात ये है कि अक्खड़ मिजाज़ के काटजू अपनी बात पर अड़े रहे. टेलीविजन चैनलों की बहसों में ज़्यादातर कॉरपोरेट मीडिया के पक्षधरों को ही बुलाया गया. पूरी बहस को मीडिया नियंत्रण बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की तरह पेश किया गया. आईबीएन सेवन के संपादक (प्रबंध!) आशुतोष जैसे कुछ लोग जिन कुतर्को के साथ मालिकों के पक्ष में कदमताल करते दिखे वो वास्तव में बहुत ख़तरनाक है. इस सिलसिले में जनता को तो छोड़ दीजिए अगर मालिकों के गुलाम पत्रकारों के अलावा बाक़ी श्रमजीवी पत्रकारों की भी राय ली जाए तो पता चल जाएगा कि सब मुनाफ़ा कमाने की कॉरपोरेट होड़ से परेशान हैं.
काटजू ने ये सच्चाई भी बयान कर दी कि आज के ज़्यादातर पत्रकार समझदार नहीं होते, उन्हें देश-दुनिया की राजनीति, साहित्य, दर्शन और अर्थनीति की ज़्यादा जानकारी नहीं होती. इससे कॉरपोरेट मीडिया के सेलिब्रिटी पत्रकार और ज़्यादा बौखलाए हुए हैं. जबकि सच्चाई यही है कि आज के भारतीय न्यूज रूप का माहौल निहायत ही विवेक/ज्ञान विरोधी है. ख़ास तौर पर हिंदी मीडिया के न्यूज़ रूम का हाल तो यह है कि वहां समझदार लोगों को ज्ञान बांटने वाला बुलाकर मज़ाक बनाया जाता है. ख़बरों को सनसनीखेज बनाकार बेचने में माहिर पत्रकारों को ही वहां अहमियत और पुरस्कार दिया जाता है. पढ़े-लिखे और समझदार पत्रकारों को संस्थानों में बोझ समझा जाता है. टेलीविजन चैनलों में संपादक के नाम पर बैठे जोकरों और विदूषकों के अलावा प्रिंट मीडिया में भी हाल अच्छा नहीं है. वहां संपादकों को किनारे लगातर ख़बरों का चयन करने के लिए ब्रांड मैनेजर बिठाए जा रहे हैं. जो ख़बर के चटपटेपन और बिकने का हिसाब लगाकर उसका चयन करता है. सामाजिक सरोकारो वाले पत्रकारों के लिए ऐसे मीडिया में गुजारा करना मुश्किल है. इस सच्चाई को ध्यान में रखकर काटजू बिल्कुल सही बात कह रहे हैं. वे बेलगाम मीडिया को कायदे-कानून के दायरे में रखने के लिए प्रेस काउंसिल को और ज़्यादा अधिकार दिए जाने की वकालत करते हुए कहते हैं कि इसके दायरे में अब प्रिंट के अलावा टेलीविजन को भी लाया जाना चाहिए. काटजू ने यह भी कहा है कि अगर कोई मीडिया संगठन पत्रकारिता के मूल्यों और नैतिकता का उल्लंघन करता है तो उसके लिए दंड का प्रावधान होना चाहिए. फिलहाल प्रेस काउंसिल के पास ऐसे कोई अधिकार नहीं है. वह ज़्यादा से ज़्यादा किसी मीडिया संगठन की आलोचना कर सकता है. इसलिए एक अधिकार संपन्न मीडिया काउंसिल की ज़रूरत को नकारा नही जा सकता है. इन सारे ज़रूरी मुद्दों से किनाराकशी कर काटजू को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुश्मन ठहराने वाले लोग दरअसल मीडिया में कॉरपोरेट नियंत्रण को बरकरार रखना चाहते हैं.
पत्रकारिता के रंगे सियार
काटजू की बातों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने में ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए), एडिटर्स गिल्ड न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एऩबीए) और इंडियन न्यूज़पेपर सोसायटी (आईएऩएस) सबसे आगे रहे हैं. ध्यान देने वाली बात यह है कि ये तीनों ही संगठन या तो सीधे-सीधे मीडिया मालिकों के हैं या उनके पिछलग्गुओं के. सबसे पहले एनबीए की बात, जब न्यूज़ चैनलों ने नाग-नागिन, भूत-प्रेत, क्रिकेट, सिनेमा, अपराध, झूठ और सनससनी परोसते हुए सारी सीमाए लांघ दी तो जनता के जागरूक तबके की तरफ़ से इसका विरोध होना शुरू हो गया. मजबूरन सरकार को भी मीडिया के नियमन के लिए कुछ दिखावा करना पड़ा. जैसे ही नियमन की बात सामने आई कॉरपोरेट मीडिया के सिपहसालार घबरा उठे. उन्होंने हड़बड़ी में एनबीए बनाया और स्वनियमन की माला जपने लगे. सेल्फ़ रेग्युलेशन के लिए बनी एऩबीए की कमेटी में समाचार चैनलों के प्रतिनिधि शामिल है. स्वनियमन का दिखावा करने के लिए इन्होंने एक कमेटी बनाई हुई हैं. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जेएस वर्मा को उन्होंने अपना अध्यक्ष बनाया हुआ है. जो खुलेआम काटजू की आलोचना कर चुके हैं और न्यूज़ चैनलों का पक्ष ले चुके हैं. स्वाभाविक तौर पर एनबीए में कॉरपोरेट विचारों का ही दबदबा है. तथाकथित सिविल सोसायटी के बाक़ी बुद्धिजीवी/सदस्य तो सिर्फ़ दिखावे के लिए है. उन लोगों के लिए भी चमक-दमक वाले कॉरपोरेट मीडिया के क़रीब रहने का यह एक अच्छा बहाना है. इस संस्था की निरर्थकता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसने एक बार सबसे बेहूदा चैनलों में से एक, इंडिया टीवी पर ख़बर से छेड़छाड़ करने पर एक लाख रुपए का जुर्माना कर दिया था. बदले में इंडिया टीवी एनबीए की सदस्यता से ही अलग हो गया. बाद में मान मनोव्वल कर उसे दोबारा इस संस्था से जोड़ा गया.
काटजू के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने वाली दूसरी संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया है. इस संस्था में संपादक मालिकों के अलावा और कोई नहीं है. बहुसंख्यक श्रमजीवी पत्रकारों का इससे कुछ लेना-देना नहीं है. कॉरपोरेट मीडिया के संपादक मालिक इसके मुख्य कर्ता-धर्ता हैं. फिलहाल बिजनेस स्टैंडर्ड के पूर्व संपादक और मालिक टीएन नैनन इसके अध्यक्ष हैं. वे प्रिंट मीडिया में विदेशी निवेश लाने वाले पहले भारतीय मालिक/संपादक हैं. नैनन साहब मशहूर मीडिया क्रिटिक सेवंती नैनन के पति भी हैं. जिन्होंने हिंदी मीडिया पर हैडलाइंस फ्रॉम द हार्टलैंड: रीइंवेंटिंग हिंदी पब्लिक स्फ़ीयर जैसी चर्चित किताब लिखी है. जिसमें वे हिंदी समचार पत्रों के बहुसंस्करणों से बेहद उत्साहित नज़र आती हैं. उन्हें इसमें बड़ी पूंजी पर टिके मीडिया घरानों का साम्राज्य विस्तार नज़र नहीं आता है. कुल मिलाकर अपनी स्थापनाओं में वे कभी कॉरपोरेट मीडिया के पार नहीं सोच पाती हैं. विदेशी निवेश उन्हें भी ज़रूरी लगता है. इस तरह यहां मीडिया स्वामित्व, पत्रकारिता और उसकी आलोचना में भी एक अजीब सा घालमेल दिखाई देता है. टी एन नैनन से पहले सीएनएन आईबीएन के मालिक/पत्रकार राजदीप सरदेसाई एडिटर्स गिल्ड के अध्यक्ष थे. जिनकी पत्रकारिता की महान आवाज़ राडिया के टेपों में भी सुनी जा सकती है. कुल मिलाकर यह संगठन भारतीय मीडिया के मालिकों और उनके सिपहसालारों के हितों को सुरक्षित रखने के लिए बना हुआ है. अगर ऐसे संगठन मीडिया की स्वतंत्रता के नाम पर विलाप करते हैं तो उसकी हक़ीक़त को आसानी से समझा जा सकता है.
तीसरी संस्था इंडियन न्यूज़ पेपर सोसायटी (आईएऩएस) है जिसे काटजू का बयान आपत्तिजनक लगा है. यह संस्था घोषित तौर मीडिया मालिकों की संस्था है. पिछले दिनों जब अख़बारों में काम करने वाले श्रमजीवी पत्रकारों और गैर पत्रकारों के लिए न्यूनतम तनख़्वाह निर्धारित करने के लिए वेज बोर्ड लागू करने की प्रक्रिया चल रही थी तो इसने पत्रकारों के लिए ख़िलाफ़ जिस तरह अभियान चलाया उसे कभी भूला नही जा सकता. इसने पत्रकारों को अपने मुनाफ़े में से अधिकार देने से साफ़ मना कर दिया और ये आरोप लगाया कि इससे भी मीडिया की स्वतंत्रता ख़त्म हो जाएगी, क्योंकि पत्रकारों की तनख़्वाह के लिए क़ानून बनाकर सरकार मालिकों के अधिकार छीनना चाहती है. गौरतलब है कि श्रमजीवी पत्रकारों की मांग से मजबूर होकर सरकार को इस सिलसिले में पहलकदमी लेने पर मजबूर होना पड़ा था. भारतीय मीडिया में यह बात भी छिपी नहीं है कि मालिकों के कुछ पिछलग्गू और दलाल पत्रकारों को जहां हर महीने लाखों की तनख़्वाह मिलती है वहीं अपना श्रम बेचने वाले आम पत्रकारों को मजबूरी में न्यूनतम तीन हज़ार रुपए तक का वेतन स्वीकार करना पड़ता है. कुल मिलाकर यह संस्था जन विरोधी होने के साथ बहुसंख्यक पत्रकार विरोधी भी है.
एनबीए की तर्ज पर ही टीवी न्यूज़ चैनलों के संपादकों/ मालिकों ने मिलकर ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन बनाया है. इस दौर में ज़्यादातर टीवी संपादक या तो ख़ुद मालिक बन बैठे हैं या फिर मालिक के बेहद क़रीबी हैं. प्रणय रॉय, राजदीप सरदेसाई और जहांगीर पोचा जैसे कई लोग आज मालिक/पत्रकार दोनों ही बने हुए हैं. उन्हें पत्रकारितीय नैतिकता से ज़्यादा कुछ लेना देना नहीं है. इसलिए बीईए श्रमजीवी पत्रकारों का संगठन नहीं बल्कि सीधे-सीधे मीडिया मालिकों का ही मुखौटा है. फिलहाल स्टार न्यूज़ के साज़ी ज़मा इसके अध्यक्ष हैं और साधना चैनल के एनके सिंह इसके महासचिव हैं. स्टार न्यूज़ के एक बड़े हिस्से का मालिक दुनिया का भ्रष्टतम न्यूज मीडिया मालिक रुपर्ट मुर्डॉक भी है वहीं साधना न्यूज़, मूल रूप से साधना टीवी का हिस्सा है जो मुनाफ़े के लिए धार्मिक चैनल से देश की ‘वैज्ञानिक चेतना’ का विकास करने में जुटा है. इन दोनों के अलावा अर्णब गोस्वामी, पंकज पचौरी, आशुतोष और सतीश कुमार सिंह जैसे कई ‘महान पत्रकार’ इस एसोसिएशन की कार्यकारिणी में हैं. इऩ्हीं की संस्थाओं में काम करने वाले आम पत्रकार मालिकों के इन पिट्टुओं से परेशान रहते हैं. इसलिए ऐसी संरचना वाला संगठन अगर अभिव्यक्ति और मीडिया की स्वतंत्रता की बात करे तो उसकी हक़ीक़त आसानी से समझी जा सकती है.
आम पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करने वाले सारे पत्रकार संगठन मीडिया नियमन के पक्ष में हैं. वे चाहते हैं कि प्रेस काउंसिल जैसी संस्था को और ज़िम्मेदार और अधिकार संपन्न होना चाहिए. वे चाहते हैं कि मीडिया से ठेकेदारी प्रथा ख़त्म हो और वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट लागू हो, जिसके तहत आम पत्रकारो को उनके अधिकार मिल पाएं. लेकिन उनकी आवाज़ को कभी को अहमियत नहीं दी जाती. उनकी न्यायसंगत आवाज़ को दबाना मीडिया मालिक अपना हक़ और आज़ादी समझते हैं. मीडिया के लोकतांत्रिक विकास के लिए मालिकों के चाटुकार पत्रकारों को आम पत्रकारों का ठेका लेने से रोकना भी ज़रूरी है.
कागजी शेर से काम नहीं चलेगा
जस्टिस काटजू जिस भारतीय प्रेस परिषद में सुधार की बात कर रहे हैं. अगर उसकी संरचना को देखा जाए तो उसमें आज भी मालिकों के पक्षधर सदस्यों का पलड़ा ही भारी रहता है. उसमें श्रमजीवी पत्रकारों का उचित प्रतिनिधित्व नहीं है. काउंसिल के पास कानूनी कार्रवाई के अधिकार भी नहीं हैं. यही वजह है कि जब पेड न्यूज़ पर परंजॉय गुहा ठकुराता और श्रीनिवास रेड्डी की बहत्तर पृष्ठों की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की बात सामने आई तो काउंसिल में मौजूद मालिकों के प्रतिनिधियों ने उसे सार्वजनिक नहीं होने दिया. इस रिपोर्ट में पेड न्यूज़ छापने वाले अख़बारों के नाम का भी जिक्र किया गया था. जब ये रिपोर्ट आउटलुक पत्रिका ने सार्वजनिक कर दी और कई छोटी पत्रिकाओं ने इसे छाप लिया तो मजबूरन प्रेस परिषद को भी इसे अपनी वेबसाइट पर डालना पड़ा. ये एक चौंकाने वाली बात है कि हाल ही में चुनाव आयोग ने पेड न्यूज़ छपवाने की वजह से उत्तर प्रदेश की एक विधायक उमलेश यादव की सदस्यता रद्द की है. लेकिन यह उतनी ही हैरान करने वाली बात है कि अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे जिन अख़बारों ने चुनाव के दौरान उमलेश के पक्ष में पेड न्यूज़ छापी उन पर किसी ने कोई कार्रवाई नहीं की. यह एक तरह से ठीक वैसा ही है जैसे घूस देने वाले सज़ा दी जाए और लेने वाले को खुला छोड़ दिया जाए.
जस्टिस काटजू अगर टेलीविजन चैनलों को भी प्रेस परिषद में लाकर उसका नाम मीडिया काउंसिल करने की बात कर रहे हैं तो यह बात पहली बार सामने नहीं आ रही है. जनता के जागरूक तबकों से लगातार इस बात को उठाया जाता रहा है. भारत में नई आर्थिक नीतियों को लागू करने के बाद मीडिया का असीम विस्तार हुआ है. विदेशी पूंजी ने इसका मिजाज बदल दिया है. ख़ास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का विस्फोट हुआ है. इसलिए पुरानी संस्थाएं अब मीडिया को सही तरह से समझ पाने और उन्हें सही रास्ता दिखा पाने में सक्षम नहीं रह गई है. इसलिए पहले और दूसरे प्रेस आयोग की तर्ज पर तीसरा प्रेस आयोग बनाने की बात उठने लगी है. ऐसे हालत में प्रेस परिषद की जगह अधिकार संपन्न मीडिया परिषद बनाने की बात अपनी ज़गह पूरी तरह तर्कसंगत है. फिलहाल तो प्रेस काउंसिल को सिर्फ़ कागजी शेर ही माना जाता है. कही ऐसा न हो कि जस्टिस काटजू की दहाड़ भी ऐसे ही ग़ायब हो जाए.
तीसरा प्रेस आयोग वर्तमान मीडिया का गहराई से अध्ययन पर आगे का रास्ता सुझाकर इसे कॉरपोरेट अराजकता से छुटकारा दिलाने में कुछ हद तक मददगार हो सकता है. इस आयोग में देशभर के मीडिया बुद्धिजीवी, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता और मीडियाकर्मी अपने सुझाव दे सकते हैं. लेकिन इस बात की बहुत आशंका है कि जैसे मोंटेक सिंह अहलुवालिया जैसे लोग देश के प्लानिंग कमिशन के महान भविष्य दृष्टा हो सकते हैं वैसे ही कोई मीडिया का उद्धारक भी सरकार न खोज लाए. माना किसी तरह ये आयोग नव उदारवादी उद्धारकों से बच भी गया तो उसकी सिफ़ारिशें आसानी से मान ली जाएं ऐसा नहीं लगता. अगर जन दबाव की वजह से एक बार सही रिपोर्ट आ गई तो उससे भविष्य का एक सही रास्ता चुनने में ज़रूर मदद मिलेगी. जैसे तीसरी दुनिया के देशों की मांग पर यूनेस्को को मैकब्राइट कमीशन बनाने पर मजबूर होना पड़ा था और उसने दुनिया के लिए अमेरिका और विकसित देशों के सूचना के मुक्त प्रवाह की नीति को बदल कर रखा दिया. तब तीसरी दुनिया की पहलकदमी की वजह से सूचना के संतुलित प्रवाह की बात सामने आई थी. विकसित देशों की तरफ़ से प्रचारित सूचना का मुक्त प्रवाह दरअसल सूचना का इकरफ़ा प्रवाह था. जो सूचना के संसाधनों पर विकसित देशों के क़ब्ज़े की वजह से ग़रीब देशों की तरफ़ होता है. यूनेस्को की तरफ़ से संतुलित प्रवाह की बात मानने के बाद भी आज वैश्वीकरण और नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद सूचना का इकतरफ़ा प्रवाह ज़्यादा मजबूत हुआ है.
अगर प्रेस परिषद की जगह नया मीडिया आयोग बनता है तो इसमें जब तक बहुसंख्यक श्रमजीवी पत्रकारों और वैकल्पिक मीडिया के वकालत करने वालों को प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाएगा तब तक इसका कोई मतलब नहीं निकलेगा. जस्टिस काटजू की स्थापनाएं यहीं पर कुछ अधूरी लगती है. वे वर्तमान मीडिया में विषय वस्तु की अराजकता पर तो ढेर सारी बातें कहते हैं लेकिन इसके लिए ज़िम्मेदारी आर्थिक-राजनीतिक कारणों पर एक भी बात नहीं करते. जबकि असली बात भारतीय मीडिया के स्वामित्व को लेकर है. असली अराजकता की जड़ वहीं छिपी हुई है. पेड न्यूज, राडिया कांड या फिर अऩ्ना आंदोलन, जेसिका लाल जैसी चुनी हुई इंसाफ़ की लड़ाइयां कॉरपोरेट मीडिया की स्वाभाविक अभिव्यक्तियां हैं. जब तक मीडिया पर गिने चुने मीडिया घरानों के एकाधिकार, क्रॉस मीडिया होल्डिंग (एक ही मीडिया घराने का हर तरह के मीडिया में स्वामित्व) और मुनाफ़ाखोरी पर लगाम नहीं लगेगी तब तक बड़े पैमाने पर अच्छे मीडिया की कल्पना कर पाना संभव नहीं है. इसलिए आज सिर्फ़ मीडिया के विषयवस्तु को ही नहीं बल्कि मीडिया के स्वामित्व और उसकी संरचना को लेकर भी ठोस कानून बनाना ज़रूरी है. इतना ज़रूर ध्यान रखा जाना चाहिए कि ऐसा सरकार और कॉरपोरेट हितों से अलग किसी स्वायत्त संस्था के नेतृत्व में होना चाहिए. ताकि सरकारी और कॉरपोरेट नियंत्रण को कम से कम किया जा सके. अगर मीडिया काउंसिल को इस तर्ज पर बनाया गया तो इससे ज़रूर कुछ फ़र्क पड़ेगा.
प्रेस परिषद के एक पूर्व अध्यक्ष जस्टिव पीवी सावंत ने अपने कार्यकाल में कॉरपोरेट मीडिया के ख़िलाफ़ को-ऑपरेटिव मीडिया की स्थापना पर ज़ोर दिया था. लेकिन उनकी आवाज़, नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बनकर रह गई. उदारीकरण की नीतियों के तहत आगे बढ़कर सरकार के लिए ऐसी बातों को स्वीकार कर पाना मुश्किल है लेकिन जन दबाव हो तो उसे झुकने पर मजबूर होना पड़ सकता है. यहां पर यह याद रखना ज़रूरी है कि नव उदारवादी सरकारें और कॉरपोरेट भले ही कितने ही एक-दूसरे के ख़िलाफ़ तलवार खींचे क्यों न दिखें, वे एक दूसरे के स्वाभाविक सहयोगी हैं. समाज में अगर जनता के अधिकारों के लिए आंदोलन तेज़ होंगे तो इससे हमारे मीडिया में भी बदलाव आएगा. इस लिहाज़ से मीडिया के बदलाव की लड़ाई व्यापक राजनीतिक-आर्थिक बदलावों की लड़ाई से भी जुड़ती है. इसका मतलब ये नहीं कि क्रांति होने तक इंतजार ही करते रहा जाए. बदलाव एक दिन में नही होगा. आंदोलनों के दवाब में ज़रूर कुछ लगातार बदलता रहेगा. जस्टिस काटजू हों या जस्टिस सावंत उनकी बातें मीडिया और समाज में बदलाव चाहने वालों के लिए एक समर्थन की तरह हैं. जिनकी सीमाएं भी हैं और संभावनाएं भी.
(समकालीन तीसरी दुनिया के दिसंबर अंक में प्रकाशित)
Wednesday, December 14, 2011
मीडिया की आज़ादी की आड़ में कॉरपोरेट लूट
Posted by
bhupen
at
12/14/2011
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