<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-2900056613410233002</id><updated>2012-01-05T18:51:14.384+05:30</updated><category term='हुसैन'/><category term='mediatization'/><category term='बरखा दत्त'/><category term='मानवाधिकार'/><category term='राजनीति'/><category term='पहाड़'/><category term='किस्सा-कहानी'/><category term='यात्रा'/><category term='विकास की झलकियां'/><category term='kandhmal'/><category term='शोधपत्र'/><category term='साम्प्रदायिकता'/><category term='माओवाद'/><category term='समाचारों का सौदा'/><category term='नेपाल'/><category term='जापान'/><category term='शेखर पाठक'/><category term='मीडियाटाइजेशन'/><category 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समझने वाली न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए), एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) और इंडियन न्यूज पेपर्स सोसायटी (आईएनएस) जैसी मालिकों के प्रभाव वाली संस्थाएं काटजू को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करती रहीं. ये संगठन मीडिया मालिकों की मुनाफ़ा कमाने की स्वतंत्रता को मीडिया की स्वतंत्रता की तरह पेश करते रहे और काटजू पर मीडिया को सरकारी नियंत्रण में लाने का आरोप लगाते रहे. बहस, प्रेस की आज़ादी बनाम सरकारी नियंत्रण के आसपास केंद्रित कर दी गई. इस तरह की छद्म बहस में मीडिया स्वामित्व और उसके परिणामों से जुड़े राजनीतिक-आर्थिक मुद्दों से जानबूझ कर कन्नी काटी गई. &lt;br /&gt;उदारीकरण के दौर में भारतीय समाचार मीडिया एक किस्म की अराजकता से गुजर रहा है. बड़ी और विदेशी पूंजी के सहारे चल रहीं मीडिया कंपनियां सामाजिक सरोकारों की अनदेखी कर पत्रकारिता को धंधेबाज़ी और मुनाफ़ाखोरी का पर्याय बनाने पर तुली हुई हैं. अख़बार के पन्नों और टेलीविजन चैनलों की विषयवस्तु पर इसका असर साफ़ देखा जा सकता है. सारे हालात के लिए ज़िम्मेदार सरकार इस अराजकता को कुछ इस तरह से परिभाषित कर रही है जैसे वो भी सबकुछ देखकर हैरान-परेशान हो. जबकि हक़ीक़त सिर्फ़ इतनी है कि सरकार की आर्थक नीतियों का यह स्वाभाविक परिणाम है. ऐसे हालात में काटजू ने अपनी सीमाओं के बावजूद समाचार मीडिया पर कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठाये हैं. &lt;br /&gt;सितम्बर महीने में सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए जस्टिस काटजू हमेशा अपनी ख़ास तरह की शैली के लिए चर्चित रहे हैं. नेहरू के गुलाबी समाजवाद का असर उन पर अब तक देखा जा सकता है. वे भारत के महान अतीत (भौतिकवादी और तार्किक) का ज़िक्र करते हैं और आधुनिक मूल्यों को अपनाने पर भी बल देते हैं. वे प्रेस परिषद के नए अध्यक्ष किस की मर्जी से और क्यों बने हैं ये या तो वे जानें या उन्हें बनाने वाले. लेकिन अक्टूबर महीने में भारतीय प्रेस परिषद का काम संभालने के बाद उन्होंने सबसे पहले दिल्ली के सभी स्वनामधन्य संपादकों को अपने पास बुलाया और उन्हें मीडिया की नैतिकता पर एक लंबा भाषण पिलाया. संपादकों/मालिकों के बीच उनके कथन को लेकर काफ़ी चर्चाएं रहीं. कुछ संपादकों ने उनकी बातों को लेकर लिखित प्रतिवाद भी दर्ज किया. लेकिन यह सारी हलचल सतह पर तब आई जब तीस-इकत्तीस अक्टूबर को करन थापर ने सीएनएन आईबीएन पर अपने कार्यक्रम, डेविल्स एडवोकेट में काटजू का इंटरव्यू प्रसारित किया. इस कार्यक्रम में काटजू ने भारतीय मीडिया की अराजकता पर कई सवाल उठाए और सख्त नियमन की ज़रूरत पर बल दिया. इस इंटरव्यू के बाद मीडिया मालिकों की तरफ़ से हमला शुरू हो गया. जब बहस आगे बढ़ी तो इंडियन एक्सप्रेस ने इस विषय पर काटजू का लेख छाप दिया और द हिंदू ने भी संपादकों को पिलाए गए उनके भाषण के अंश प्रकाशित कर दिए.&lt;br /&gt;अपने भाषण, इंटरव्यू और लेख में प्रेस काउंसिल के नए अध्यक्ष जस्टिस काटजू कॉरपोरेट समाचार मीडिया को आड़े हाथों लेते हुए कहते हैं कि वो हमेशा वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाकर बेमतलब के मुद्दों को ज़्यादा अहमितयत देता है. इस बात  के लिए वे मीडिया को ध्यान दिलाते हैं कि भारतीय समाज आज सामंतवाद से आधुनिकता में संक्रमण कर रहा है इसलिए मीडिया को एक ज़िम्मेदार भूमिका निभानी चाहिए, यानी मीडिया को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे मुद्दों पर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए. दूसरी महत्वपूर्ण बात काटजू ने मीडिया में व्याप्त पूर्वाग्रहों के बारे में कही. वे इस बात पर ऐतराज करते हैं कि कहीं भी कोई बम धमाका होता है तो मीडिया उसके लिए मुस्लिम समुदाय को बिना सबूतों के ही ज़िम्मेदार ठहराना शुरू कर देता है. उन्होंने इसके लिए बम धमाकों की जिम्मेदारी लेने वाले फ़र्जी ईमेल का ज़िक्र किया, जिसमें कोई अपराधी प्रवृत्ति का व्यक्ति मुसलमान नाम के साथ घटना की जिम्मेदारी लेता है और मीडिया बिना जांच किए ही उसे प्रसारित कर देता है. मीडिया ट्रायल के साथ ही काटजू समाचार मीडिया में अंध विश्वासों और ज्योतिष के प्रचार-प्रसार की भी आलोचना करते हैं. &lt;br /&gt;किसी भी समझदार व्यक्ति या संस्था के लिए काटजू द्वारा उठाए गए ज़्यादातर मुद्दों से असहमत होना आसान नहीं है. लेकिन काटजू ने अपने बयानों से बेलगाम कॉरपोरेट मीडिया पर सवाल क्या खड़े किए, उसके सिपहसालार संवाद के न्यूनतम शिष्टाचार को भूलकर बेवजह की आक्रामकता दिखाने लगे हैं. पत्रकारिता को विशेषाधिकार का लाइसेंस समझने वाले मालिकों के पिछलग्गू कई संपादक इससे तिलमिला उठे हैं. जस्टिस काटजू के बयान के बाद टीवी न्यूज़ चैनलों ने जिस तरह उन्हें विलेन बनाकर पेश करने की कोशिश की उसे सारी देश की जनता ने देखा. लेकिन अच्छी बात ये है कि अक्खड़ मिजाज़ के काटजू अपनी बात पर अड़े रहे. टेलीविजन चैनलों की बहसों में ज़्यादातर कॉरपोरेट मीडिया के पक्षधरों को ही बुलाया गया. पूरी बहस को मीडिया नियंत्रण बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की तरह पेश किया गया. आईबीएन सेवन के संपादक (प्रबंध!) आशुतोष जैसे कुछ लोग जिन कुतर्को के साथ मालिकों के पक्ष में कदमताल करते दिखे वो वास्तव में बहुत ख़तरनाक है. इस सिलसिले में जनता को तो छोड़ दीजिए अगर मालिकों के गुलाम पत्रकारों के अलावा बाक़ी श्रमजीवी पत्रकारों की भी राय ली जाए तो पता चल जाएगा कि सब मुनाफ़ा कमाने की कॉरपोरेट होड़ से परेशान  हैं. &lt;br /&gt;काटजू ने ये सच्चाई भी बयान कर दी कि आज के ज़्यादातर पत्रकार समझदार नहीं होते, उन्हें देश-दुनिया की राजनीति, साहित्य, दर्शन और अर्थनीति की ज़्यादा जानकारी नहीं होती.  इससे कॉरपोरेट मीडिया के सेलिब्रिटी पत्रकार और ज़्यादा बौखलाए हुए हैं. जबकि सच्चाई यही है कि आज के भारतीय न्यूज रूप का माहौल निहायत ही विवेक/ज्ञान विरोधी है. ख़ास तौर पर हिंदी मीडिया के न्यूज़ रूम का हाल तो यह है कि वहां समझदार लोगों को ज्ञान बांटने वाला बुलाकर मज़ाक बनाया जाता है. ख़बरों को सनसनीखेज बनाकार बेचने में माहिर पत्रकारों को ही वहां अहमियत और पुरस्कार दिया जाता है. पढ़े-लिखे और समझदार पत्रकारों को संस्थानों में बोझ समझा जाता है. टेलीविजन चैनलों में संपादक के नाम पर बैठे जोकरों और विदूषकों के अलावा प्रिंट मीडिया में भी हाल अच्छा नहीं है. वहां संपादकों को किनारे लगातर ख़बरों का चयन करने के लिए ब्रांड मैनेजर बिठाए जा रहे हैं. जो ख़बर के चटपटेपन और बिकने का हिसाब लगाकर उसका चयन करता है. सामाजिक सरोकारो वाले पत्रकारों के लिए ऐसे मीडिया में गुजारा करना मुश्किल है. इस सच्चाई को ध्यान में रखकर काटजू बिल्कुल सही बात कह रहे हैं. वे बेलगाम मीडिया को कायदे-कानून के दायरे में रखने के लिए प्रेस काउंसिल को और ज़्यादा अधिकार दिए जाने की वकालत करते हुए कहते हैं कि इसके दायरे में अब प्रिंट के अलावा टेलीविजन को भी लाया जाना चाहिए. काटजू ने यह भी कहा है कि अगर कोई मीडिया संगठन पत्रकारिता के मूल्यों और नैतिकता का उल्लंघन करता है तो उसके लिए दंड का प्रावधान होना चाहिए. फिलहाल प्रेस काउंसिल के पास ऐसे कोई अधिकार नहीं है. वह ज़्यादा से ज़्यादा किसी मीडिया संगठन की आलोचना कर सकता है. इसलिए एक अधिकार संपन्न मीडिया काउंसिल की ज़रूरत को नकारा नही जा सकता है. इन सारे ज़रूरी मुद्दों से किनाराकशी कर काटजू को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुश्मन ठहराने वाले लोग दरअसल मीडिया में कॉरपोरेट नियंत्रण को बरकरार रखना चाहते हैं.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पत्रकारिता के रंगे सियार&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;काटजू की बातों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने में ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए), एडिटर्स गिल्ड न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एऩबीए) और इंडियन न्यूज़पेपर सोसायटी (आईएऩएस) सबसे आगे रहे हैं. ध्यान देने वाली बात यह है कि ये तीनों ही संगठन या तो सीधे-सीधे मीडिया मालिकों के हैं या उनके पिछलग्गुओं के. सबसे पहले एनबीए की बात, जब न्यूज़ चैनलों ने नाग-नागिन, भूत-प्रेत, क्रिकेट, सिनेमा, अपराध, झूठ और सनससनी परोसते हुए सारी सीमाए लांघ दी तो जनता के जागरूक तबके की तरफ़ से इसका विरोध होना शुरू हो गया. मजबूरन सरकार को भी मीडिया के नियमन के लिए कुछ दिखावा करना पड़ा. जैसे ही नियमन की बात सामने आई कॉरपोरेट मीडिया के सिपहसालार घबरा उठे. उन्होंने हड़बड़ी में एनबीए बनाया और स्वनियमन की माला जपने लगे. सेल्फ़ रेग्युलेशन के लिए बनी एऩबीए की कमेटी में समाचार चैनलों के प्रतिनिधि शामिल है. स्वनियमन का दिखावा करने के लिए इन्होंने एक कमेटी बनाई हुई हैं. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जेएस वर्मा को उन्होंने अपना अध्यक्ष बनाया हुआ है. जो खुलेआम काटजू की आलोचना कर चुके हैं और न्यूज़ चैनलों का पक्ष ले चुके हैं. स्वाभाविक तौर पर एनबीए में कॉरपोरेट विचारों का ही दबदबा है. तथाकथित सिविल सोसायटी के बाक़ी बुद्धिजीवी/सदस्य तो सिर्फ़ दिखावे के लिए है. उन लोगों के लिए भी चमक-दमक वाले कॉरपोरेट मीडिया के क़रीब रहने का यह एक अच्छा बहाना है. इस संस्था की निरर्थकता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसने एक बार सबसे बेहूदा चैनलों में से एक, इंडिया टीवी पर ख़बर से छेड़छाड़ करने पर एक लाख रुपए का जुर्माना कर दिया था. बदले में इंडिया टीवी एनबीए की सदस्यता से ही अलग हो गया. बाद में मान मनोव्वल कर उसे दोबारा इस संस्था से जोड़ा गया. &lt;br /&gt;काटजू के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने वाली दूसरी संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया है. इस संस्था में संपादक मालिकों के अलावा और कोई नहीं है. बहुसंख्यक श्रमजीवी पत्रकारों का इससे कुछ लेना-देना नहीं है. कॉरपोरेट मीडिया के संपादक मालिक इसके मुख्य कर्ता-धर्ता हैं. फिलहाल बिजनेस स्टैंडर्ड के पूर्व संपादक और मालिक टीएन नैनन इसके अध्यक्ष हैं. वे प्रिंट मीडिया में विदेशी निवेश लाने वाले पहले भारतीय मालिक/संपादक हैं. नैनन साहब मशहूर मीडिया क्रिटिक सेवंती नैनन के पति भी हैं. जिन्होंने हिंदी मीडिया पर हैडलाइंस फ्रॉम द हार्टलैंड: रीइंवेंटिंग हिंदी पब्लिक स्फ़ीयर जैसी चर्चित किताब लिखी है. जिसमें वे हिंदी समचार पत्रों के बहुसंस्करणों से बेहद उत्साहित नज़र आती हैं. उन्हें इसमें बड़ी पूंजी पर टिके मीडिया घरानों का साम्राज्य विस्तार नज़र नहीं आता है. कुल मिलाकर अपनी स्थापनाओं में वे कभी कॉरपोरेट मीडिया के पार नहीं सोच पाती हैं. विदेशी निवेश उन्हें भी ज़रूरी लगता है. इस तरह यहां मीडिया स्वामित्व, पत्रकारिता और उसकी आलोचना में भी एक अजीब सा घालमेल दिखाई देता है. टी एन नैनन से पहले सीएनएन आईबीएन के मालिक/पत्रकार राजदीप सरदेसाई एडिटर्स गिल्ड के अध्यक्ष थे. जिनकी पत्रकारिता की महान आवाज़ राडिया के टेपों में भी सुनी जा सकती है. कुल मिलाकर यह संगठन भारतीय मीडिया के मालिकों और उनके सिपहसालारों के हितों को सुरक्षित रखने के लिए बना हुआ है. अगर ऐसे संगठन मीडिया की स्वतंत्रता के नाम पर विलाप करते हैं तो उसकी हक़ीक़त को आसानी से समझा जा सकता है. &lt;br /&gt;तीसरी संस्था इंडियन न्यूज़ पेपर सोसायटी (आईएऩएस) है जिसे काटजू का बयान आपत्तिजनक लगा है. यह संस्था घोषित तौर मीडिया मालिकों की संस्था है. पिछले दिनों जब अख़बारों में काम करने वाले श्रमजीवी पत्रकारों और गैर पत्रकारों के लिए न्यूनतम तनख़्वाह निर्धारित करने के लिए वेज बोर्ड लागू करने की प्रक्रिया चल रही थी तो इसने पत्रकारों के लिए ख़िलाफ़ जिस तरह अभियान चलाया उसे कभी भूला नही जा सकता. इसने पत्रकारों को अपने मुनाफ़े में से अधिकार देने से साफ़ मना कर दिया और ये आरोप लगाया कि इससे भी मीडिया की स्वतंत्रता ख़त्म हो जाएगी, क्योंकि पत्रकारों की तनख़्वाह के लिए क़ानून बनाकर सरकार मालिकों के अधिकार छीनना चाहती है. गौरतलब है कि श्रमजीवी पत्रकारों की मांग से मजबूर होकर सरकार को इस सिलसिले में पहलकदमी लेने पर मजबूर होना पड़ा था. भारतीय मीडिया में यह बात भी छिपी नहीं है कि मालिकों के कुछ पिछलग्गू और दलाल पत्रकारों को जहां हर महीने लाखों की तनख़्वाह मिलती है वहीं अपना श्रम बेचने वाले आम पत्रकारों को मजबूरी में न्यूनतम तीन हज़ार रुपए तक का वेतन स्वीकार करना पड़ता है. कुल मिलाकर यह संस्था जन विरोधी होने के साथ बहुसंख्यक पत्रकार विरोधी भी है. &lt;br /&gt;एनबीए की तर्ज पर ही टीवी न्यूज़ चैनलों के संपादकों/ मालिकों ने मिलकर ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन बनाया है. इस दौर में ज़्यादातर टीवी संपादक या तो ख़ुद मालिक बन बैठे हैं या फिर मालिक के बेहद क़रीबी हैं. प्रणय रॉय, राजदीप सरदेसाई और जहांगीर पोचा जैसे कई लोग आज मालिक/पत्रकार दोनों ही बने हुए हैं. उन्हें पत्रकारितीय नैतिकता से ज़्यादा कुछ लेना देना नहीं है. इसलिए बीईए श्रमजीवी पत्रकारों का संगठन नहीं बल्कि सीधे-सीधे मीडिया मालिकों का ही मुखौटा है. फिलहाल स्टार न्यूज़ के साज़ी ज़मा इसके अध्यक्ष हैं और साधना चैनल के एनके सिंह इसके महासचिव हैं. स्टार न्यूज़ के एक बड़े हिस्से का मालिक दुनिया का भ्रष्टतम न्यूज मीडिया मालिक रुपर्ट मुर्डॉक भी है वहीं साधना  न्यूज़, मूल रूप से साधना टीवी का हिस्सा है जो मुनाफ़े के लिए धार्मिक चैनल से देश की ‘वैज्ञानिक चेतना’ का विकास करने में जुटा है. इन दोनों के अलावा अर्णब गोस्वामी, पंकज पचौरी, आशुतोष और सतीश कुमार सिंह जैसे कई ‘महान पत्रकार’ इस एसोसिएशन की कार्यकारिणी में हैं. इऩ्हीं की संस्थाओं में काम करने वाले आम पत्रकार मालिकों के इन पिट्टुओं से परेशान रहते हैं. इसलिए ऐसी संरचना वाला संगठन अगर अभिव्यक्ति और मीडिया की स्वतंत्रता की बात करे तो उसकी हक़ीक़त आसानी से समझी जा सकती है. &lt;br /&gt;आम पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करने वाले सारे पत्रकार संगठन मीडिया नियमन के पक्ष में हैं. वे चाहते हैं कि प्रेस काउंसिल जैसी संस्था को और ज़िम्मेदार और अधिकार संपन्न होना चाहिए. वे चाहते हैं कि मीडिया से ठेकेदारी प्रथा ख़त्म हो और वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट लागू हो, जिसके तहत आम पत्रकारो को उनके अधिकार मिल पाएं. लेकिन उनकी आवाज़ को कभी को अहमियत नहीं दी जाती. उनकी न्यायसंगत आवाज़ को दबाना मीडिया मालिक अपना हक़ और आज़ादी समझते हैं. मीडिया के लोकतांत्रिक विकास के लिए मालिकों के चाटुकार पत्रकारों को आम पत्रकारों का ठेका लेने से रोकना भी ज़रूरी है.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कागजी शेर से काम नहीं चलेगा &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जस्टिस काटजू जिस भारतीय प्रेस परिषद में सुधार की बात कर रहे हैं. अगर उसकी संरचना को देखा जाए तो उसमें आज भी मालिकों के पक्षधर सदस्यों का पलड़ा ही भारी रहता है. उसमें श्रमजीवी पत्रकारों का उचित प्रतिनिधित्व नहीं है. काउंसिल के पास कानूनी कार्रवाई के अधिकार भी नहीं हैं. यही वजह है कि जब पेड न्यूज़ पर परंजॉय गुहा ठकुराता और श्रीनिवास रेड्डी की बहत्तर पृष्ठों की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की बात सामने आई तो काउंसिल में मौजूद मालिकों के प्रतिनिधियों ने उसे सार्वजनिक नहीं होने दिया. इस रिपोर्ट में पेड न्यूज़ छापने वाले अख़बारों के नाम का भी जिक्र किया गया था. जब ये रिपोर्ट आउटलुक पत्रिका ने सार्वजनिक कर दी और कई छोटी पत्रिकाओं ने इसे छाप लिया तो मजबूरन प्रेस परिषद को भी इसे अपनी वेबसाइट पर डालना पड़ा. ये एक चौंकाने वाली बात है कि हाल ही में चुनाव आयोग ने पेड न्यूज़ छपवाने की वजह से उत्तर प्रदेश की एक विधायक उमलेश यादव की सदस्यता रद्द की है. लेकिन यह उतनी  ही हैरान करने वाली बात है कि अमर उजाला और दैनिक जागरण जैसे जिन अख़बारों ने चुनाव के दौरान उमलेश के पक्ष में पेड न्यूज़ छापी उन पर किसी ने  कोई कार्रवाई नहीं की. यह एक तरह से ठीक वैसा ही है जैसे घूस देने वाले सज़ा दी जाए और लेने वाले को खुला छोड़ दिया जाए. &lt;br /&gt;जस्टिस काटजू अगर टेलीविजन चैनलों को भी प्रेस परिषद में लाकर उसका नाम मीडिया काउंसिल करने की बात कर रहे हैं तो यह बात पहली बार सामने नहीं आ रही है. जनता के जागरूक तबकों से लगातार इस बात को उठाया जाता रहा है. भारत में नई आर्थिक नीतियों को लागू करने के बाद मीडिया का असीम विस्तार हुआ है. विदेशी पूंजी ने इसका मिजाज बदल दिया है. ख़ास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का विस्फोट हुआ है. इसलिए पुरानी संस्थाएं अब मीडिया को सही तरह से समझ पाने और उन्हें सही रास्ता दिखा पाने में सक्षम नहीं रह गई है. इसलिए पहले और दूसरे प्रेस आयोग की तर्ज पर तीसरा प्रेस आयोग बनाने की बात उठने लगी है. ऐसे हालत में प्रेस परिषद की  जगह अधिकार संपन्न मीडिया परिषद बनाने की बात अपनी ज़गह पूरी तरह तर्कसंगत है. फिलहाल तो प्रेस काउंसिल को सिर्फ़ कागजी शेर ही माना जाता है. कही ऐसा न हो कि जस्टिस काटजू की दहाड़ भी  ऐसे ही ग़ायब हो जाए. &lt;br /&gt;तीसरा प्रेस आयोग वर्तमान मीडिया का गहराई से अध्ययन पर आगे का रास्ता सुझाकर इसे कॉरपोरेट अराजकता से छुटकारा दिलाने में कुछ हद तक मददगार हो सकता है. इस आयोग में देशभर के मीडिया बुद्धिजीवी, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता और मीडियाकर्मी अपने सुझाव दे सकते हैं. लेकिन इस बात की बहुत आशंका है कि जैसे मोंटेक सिंह अहलुवालिया  जैसे लोग देश के प्लानिंग कमिशन के महान भविष्य दृष्टा हो सकते हैं वैसे ही कोई मीडिया का उद्धारक भी सरकार न खोज लाए. माना किसी तरह ये आयोग नव उदारवादी उद्धारकों से बच भी गया तो उसकी सिफ़ारिशें आसानी से मान ली जाएं ऐसा  नहीं लगता. अगर जन दबाव की वजह से एक बार सही रिपोर्ट आ गई तो उससे भविष्य का एक सही रास्ता चुनने में ज़रूर मदद मिलेगी. जैसे तीसरी दुनिया के देशों की मांग पर यूनेस्को को मैकब्राइट कमीशन बनाने पर मजबूर होना पड़ा था और उसने दुनिया के लिए अमेरिका और विकसित देशों के सूचना के मुक्त प्रवाह की नीति को बदल कर रखा दिया. तब तीसरी दुनिया की पहलकदमी की वजह से सूचना के संतुलित प्रवाह की बात सामने आई थी. विकसित देशों की तरफ़ से प्रचारित सूचना का मुक्त प्रवाह दरअसल सूचना का इकरफ़ा प्रवाह था. जो सूचना के संसाधनों पर विकसित देशों के क़ब्ज़े की वजह से ग़रीब देशों की तरफ़ होता है. यूनेस्को की तरफ़ से संतुलित प्रवाह की बात मानने के बाद भी आज वैश्वीकरण और नई आर्थिक नीतियों के लागू होने के बाद सूचना का इकतरफ़ा प्रवाह ज़्यादा मजबूत हुआ है. &lt;br /&gt;अगर प्रेस परिषद की जगह नया मीडिया आयोग बनता है तो इसमें जब तक बहुसंख्यक श्रमजीवी पत्रकारों और वैकल्पिक मीडिया के वकालत करने वालों को प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाएगा तब तक  इसका कोई मतलब नहीं निकलेगा. जस्टिस काटजू की स्थापनाएं यहीं पर कुछ अधूरी लगती है. वे वर्तमान मीडिया में विषय वस्तु की अराजकता पर तो ढेर सारी बातें कहते हैं लेकिन इसके लिए ज़िम्मेदारी आर्थिक-राजनीतिक कारणों पर एक भी बात नहीं करते. जबकि असली बात भारतीय मीडिया के स्वामित्व को लेकर है. असली अराजकता की जड़ वहीं छिपी हुई है. पेड न्यूज, राडिया कांड या फिर अऩ्ना आंदोलन, जेसिका लाल जैसी चुनी हुई इंसाफ़ की लड़ाइयां कॉरपोरेट मीडिया की स्वाभाविक अभिव्यक्तियां हैं. जब तक मीडिया पर गिने चुने मीडिया घरानों के एकाधिकार, क्रॉस मीडिया होल्डिंग (एक ही मीडिया घराने का हर तरह के मीडिया में स्वामित्व) और मुनाफ़ाखोरी पर लगाम नहीं लगेगी तब तक बड़े पैमाने पर अच्छे मीडिया की कल्पना कर पाना संभव नहीं है. इसलिए आज सिर्फ़ मीडिया के विषयवस्तु को ही नहीं बल्कि मीडिया के स्वामित्व और उसकी संरचना को लेकर भी ठोस कानून बनाना ज़रूरी है. इतना ज़रूर ध्यान रखा जाना चाहिए कि ऐसा सरकार और कॉरपोरेट हितों से अलग किसी स्वायत्त संस्था के नेतृत्व में होना चाहिए. ताकि सरकारी और कॉरपोरेट नियंत्रण को कम से कम किया जा सके. अगर मीडिया काउंसिल को इस तर्ज पर बनाया गया तो इससे ज़रूर कुछ फ़र्क पड़ेगा. &lt;br /&gt;प्रेस परिषद के एक पूर्व अध्यक्ष जस्टिव पीवी सावंत ने अपने कार्यकाल में कॉरपोरेट मीडिया के ख़िलाफ़ को-ऑपरेटिव मीडिया की स्थापना पर ज़ोर दिया था. लेकिन उनकी आवाज़, नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बनकर रह गई. उदारीकरण की नीतियों के तहत आगे बढ़कर सरकार के लिए ऐसी बातों को स्वीकार कर पाना मुश्किल है लेकिन जन दबाव हो तो उसे झुकने पर मजबूर होना पड़ सकता है. यहां पर यह याद रखना ज़रूरी है कि नव उदारवादी सरकारें और कॉरपोरेट भले ही कितने ही एक-दूसरे के ख़िलाफ़ तलवार खींचे क्यों न दिखें, वे एक दूसरे के स्वाभाविक सहयोगी हैं. समाज में अगर जनता के अधिकारों के लिए आंदोलन तेज़ होंगे तो इससे हमारे मीडिया में भी बदलाव आएगा. इस लिहाज़ से मीडिया के बदलाव की लड़ाई व्यापक राजनीतिक-आर्थिक बदलावों की लड़ाई से भी जुड़ती है. इसका मतलब ये नहीं कि क्रांति होने तक इंतजार ही करते रहा जाए. बदलाव एक दिन में नही होगा. आंदोलनों के दवाब में ज़रूर कुछ लगातार बदलता रहेगा. जस्टिस काटजू हों या जस्टिस सावंत उनकी बातें मीडिया और समाज में बदलाव चाहने वालों के लिए एक समर्थन की तरह हैं. जिनकी सीमाएं भी हैं और संभावनाएं भी. &lt;br /&gt;(समकालीन तीसरी दुनिया के दिसंबर अंक में प्रकाशित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2900056613410233002-4463302509849010122?l=indiancoffeehouse.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/feeds/4463302509849010122/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2900056613410233002&amp;postID=4463302509849010122&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/4463302509849010122'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/4463302509849010122'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/2011/12/blog-post_14.html' title='मीडिया की आज़ादी और पत्रकारिता के रंग सियार'/><author><name>bhupen</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05878017724167078478</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://bp2.blogger.com/_hhZqGrtQ7i4/R1Onhpa7xcI/AAAAAAAAAHY/jf-2bBrz7pI/S220/bhupen+1.color'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2900056613410233002.post-3308817210578896041</id><published>2011-12-13T10:33:00.002+05:30</published><updated>2011-12-13T10:36:38.160+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेख'/><title type='text'>काटजू को सागरिका और राजदीप क्यों नहीं दिखते?</title><content type='html'>&lt;strong&gt;भूपेन सिंह &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;भारतीय प्रेस परिषद का नया अध्यक्ष बनते ही जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने जिस तरह की सक्रियता दिखाई थी, अब धीरे-धीरे उसकी हक़ीक़त सामने आने लगी है. काटजू ने बेलगाम कॉरपोरेट मीडिया को कटघरे में खड़ा कर उसके सख़्त नियमन के लिए कई सुझाव दिए थे. इससे नाराज़ देशभर के बड़े मीडिया घरानों ने उनके ख़िलाफ़ चौतरफ़ा मोर्चा खोल लिया. आख़िरकार काटजू को आत्मरक्षा की मुद्रा में आना पड़ा और वे जल्दबाज़ी में कॉरपोरेट मीडिया को क्लीन चिट देते नज़र आने लगे हैं. इस बीच कॉरपोरेट मीडिया के आत्मनियमन के लिए हाय-तौबा मचाने वालों में अव्वल रहने वाले न्यूज़ चैनल सीएनएन-आईबीएन की सीनियर एंकर सागरिका घोष ने पत्रकारीय नैतिकता को ठेंगा दिखाकर पूर्व रिकॉर्डेड दृश्यों को एक बहस के दौरान लाइव बताकर प्रसारित कर डाला. पहले भी चैनल के मालिक और मुख्य संपादक राजदीप सरदेसाई चैनल की रेंटिग बढ़ाने और अपना एजेंडा सेट करने के लिए दर्शकों की तरफ़ से नकली मतदान करवा चुके हैं. सागरिका और राजदीप आज की भारतीय पत्रकारिता में कॉरपोरेट बेईमानी के बड़े प्रतीक बन चुके हैं, फिर क्या बात हैं कि काटजू को उनकी हरकतें दिखाई नहीं देतीं? &lt;br /&gt;काटजू के करतब&lt;br /&gt;सितंबर महीने में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर होने के बाद अक्टूबर महीने में ही काटजू की नियुक्ति भारतीय प्रेस परिषद के नए अध्यक्ष के तौर पर हो गई थी. काटजू ने कुछ ही दिन बाद सीएनएन-आईबीएन में करन थापर के प्रोग्राम डेविल्स एडवोकेट में इंटरव्यू देकर कॉरपोरेट किरदारों की नींद उड़ा दी. इंडियन एक्सप्रेस और द हिंदू ने भी काटजू के विचारों को प्रकाशित कर इस मुद्दे को और हवा दी. काटजू का कहना था कि आज का मीडिया ज़रूरी मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए फालतू  किस्म के विषयों को ज़्यादा अहमियत दे रहा है. उन्होंने मीडिया मालिकों की तरफ़ से प्रचारित किए जा रहे स्वनियमन की अवधारणा को पूरी तरह से नकार दिया था. काटजू ने अपने विचारों में मीडिया के नियमन की वकालत की थी. इसके अलावा काटजू ने अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति मीडिया के पूर्वाग्रह को उठाकर एक तरह से मीडिया में न्यूज़रूप डायवर्सिटी न होने का मुद्दा भी उठाया था. उन्होंने ये हक़ीक़त भी बयान कर डाली कि आज के ज़्यादातर पत्रकार कम समझदार हैं. नए दौर में मीडिया सही काम करे इसके लिए उन्होंने प्रेष परिषद के दायरे में प्रिंट के साथ ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी लाने की वकालत कर डाली. &lt;br /&gt;काटजू की बातें मीडिया मालिकों और उनके मुखौटाधारी पत्रकारों को नागवार गुज़री और उन्होंने काटजू के बयानों को इस तरह पेश किया जैसे वे मीडिया के सरकारी नियंत्रण की बात कर रहे हों. मीडिया के नियमन की बात को सरकारी नियंत्रण बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बहस के तौर पर पेश किया गया. कई टेलीवीजन चैनलों और अख़बारों ने इस विषय पर प्रायोजित बहस चलाई. जिसमें ज़्यादातर कॉरपोरेट मीडिया के एजेंडा के हिसाब से बात करने वाले चुने हुए बुद्धिजीवियों को ही बुलाया गया. आख़िरकार काटजू पर बनाया गया दबाव काम आया और काटजू बचाव की मुद्रा में नज़र आने लगे. उन्हें द हिंदू में एक लेख लिखकर सफ़ाई देनी पड़ी कि वे मीडिया के ख़िलाफ़ नहीं है (जैसे कॉरपोरेट मीडिया और जन पक्षीय मीडिया में कोई फ़र्क ही न हो). उनके बयानों को तोड-मरोड़ कर पेश किया गया वगैरह-बगैरह. हद तो तब हो गई जब कॉरपोरेट मीडिया के पक्ष में  कदमताल करते हुए उन्होंने देश में मीडिया नैतिकता को ठेंगा दिखाने वाले टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप और ब्रिटिश उपनिशवाद के प्रतीक रॉयटर्स के साझा चैनल पर कोर्ट की तरफ़ से लगाए गए सौ करोड़ के जुर्माने को ग़लत करार दे दिया. प्रेस परिषद के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस पीबी सावंत ने टाइम्स नाव पर मानहानि का मुकदमा किया था. चैनल ने बिना जांच-पड़ताल किए गाजियाबाद पीएफ़ स्कैम में आरोपी जज सामंत के बदले पीबी सावंत का फोटो प्रसारित करता रहा. उनके शिकायत करने पर भी चैनल ने उनकी फ़ोटो नहीं हटाई. लिखित शिकायत करने पर भी चैनल ने पांच दिन तक माफ़ी नहीं मांगी आख़िरकार सावंत को कानूनी कार्रवाई का फ़ैसला लेना पड़ा. आख़िरकार मुंबई  हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी जस्टिस सावंत के हक़ में फ़ैसला दिया. &lt;br /&gt;काटजू की डैमेज कंट्रोल की कोशिशों के बावजूद भी मीडिया मालिकों के संगठन उन्हें सबक सिखाना चाहते हैं. फिलहाल मीडिया मालिकों और काटजू के बीच चुहे-बिल्ली का खेल जारी है. प्रेस काउसिंल की पहली बैठक में इंडियन न्यूज़पेरस सोसायटी (आईएनएस) के चार प्रतिनिधियों ने काटजू के बयान से नाराज़ बैठक का बहिष्कार किया. बड़े अख़बार मालिकों के प्रभाव वाली संस्था आईएनएस ने बड़ी चालाकी से काटजू के बाक़ी मुद्दों को  किनारे करते हुए उनसे इस बात पर माफ़ी मांगने के लिए जोर दिया है कि वो अपनी इस बात के लिए माफ़ी मांगें कि भारतीय मीडिया में ज़्यादातर पत्रकार कम समझदार हैं. आईएनएस चाहता है कि काटजू इस मुद्दे पर माफ़ी मांग लें तो उनकी बाक़ी सभी स्थापनाओं पर भी अपने आप प्रश्न चिन्ह लग जाएगा. काटजू पर दबाव का ही नतीज़ा है कि पहले उन्होंने प्रेस परिषद के कागजी शेर वाली भूमिका पर भी सवाल उठाए थे. उन्होंने घोषणा की थी कि वे प्रधानमंत्री से इस मामले में हस्तक्षेप कर काउंसिल को दंडात्मक अधिकार दिए जाने की बात करेंगे. लेकिन काटजू अब अपनी इस बात से भी पीछे हट गए हैं.&lt;br /&gt;काटजू ने जो भी बातें कही हैं उनको नकारा नहीं जा सकता, लेकिन वे सिर्फ़ मीडिया की सामग्री के नियमन पर ही ज़्यादा ज़ोर देते हैं. वे सिर्फ़ बुरे परिणामों की तरफ़ इशारा कर रहे हैं. उनकी वजहों पर बात करने से साफ़-साफ़ बच रहे हैं. जिस प्रेस परिषद के वे फिलहाल अध्यक्ष हैं, उसकी संरचना पर ही नज़र डाली जाए तो वो प्रकाशकों और सरकार के पक्ष में ज़्यादा झुकी हुई हैं. प्रेस परिषद के अध्यक्ष का चयन भी सरकार की मर्जी के ख़िलाफ़ नहीं हो सकता. इसलिए काटजू भी सरकार की उन नीतियों पर बिल्कुल भी बात नहीं करते जिस वजह से हमारे मीडिया की आज ये हालत है. वे मीडिया में उदारीकरण की नीतियों से पैदा हुई एकाधिकार, मीडियानेट और प्राइवेटी ट्रीटी जैसी बीमारियों पर भी बात नहीं करते.  ऐसा होने पर स्वाभाविक तौर सरकार के राजनीतिक-आर्थिक फ़ैसलों पर भी सवाल उठेंगे. इसलिए काटजू मीडिया मालिकों की मुनाफ़ा कमाने की होड़ पर भी सवाल नहीं उठाते. इस तरह देखा जाए तो सरकार और मीडिया मालिकों के बीच मीडिया नियमन के नाम पर जिस तरह नकली युद्ध चल रहा है. काटजू भी उसी की पैदावार हैं. सरकारी नीतियों के वजह से ही विशालकाय कॉरपोरेट मीडिया का उदय हुआ है. मीडिया और राजनीतिज्ञों के रिश्ते भी जग ज़ाहिर हो चुके हैं. राडिया टेप कांड और पेड न्यूज़ जैसे मामले इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण हैं. टेलीकम्युनिकेशन से संबंधित टूजी स्पेक्ट्रम की नीलामी को अगर देखें तो इससे पता चलता है कि उदारवादी आर्थिक नीतियों के तार किस तरह मीडिया, कॉरपोरेट और राजनीति से जुड़े हैं. काटजू से ज़्यादा समझदार तो प्रेस परिषद के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस सावंत थे जिन्होंने कॉरपोरेट मीडिया के बजाय को-ऑपरेटिव मीडिया स्थापित करने पर ज़ोर दिया था. &lt;br /&gt;नव उदारवादी आर्थिक नीतियों ने हमारे मीडिया का चरित्र बदलकर रख दिया है. आम पत्रकारों को इसमें कोई अधिकार नहीं हैं. पत्रकार संगठनों को गैरजरूरी बना दिया गया है. इसलिए संपूर्ण पत्रकार विरादरी की तरफ़ से कुछ सेलिब्रिटी किस्म के मालिकों के एजेंट पत्रकार जगह-जगह बोलते दिखाई देते हैं. ठेके पर काम करने की वजह से आम पत्रकारों के ऊपर हर वक़्त नौकरी जाने के ख़तरा बना रहता है, तो वे कैसे पत्रकारिता के आदर्शों को सुरक्षित रख पाएंगे. मजबूरी में उन्हें वो सबकुछ करना पड़ता है जो मालिक, प्रबंधन और उनका पिछलग्गू संपादक चाहता है. आज ज़रूरत इस बात की है कि कूड़ेदान में पड़े वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट को मजबूती से लागू करवाया जाए. काटजू बहुसंख्यक पत्रकारों की इस हालत की तरफ़ बिल्कुल भी ध्यान नहीं देते. &lt;br /&gt;सागरिका घोष और राजदीप सरदेसाई होने का मतलब&lt;br /&gt;सीएनएन-आईबीएन ने चैनल पर फेस द नेशन कार्यक्रम के तहत उत्तर प्रदेश प्रदेश की राजनीति को लेकर एक बहस आयोजित की थी. बहस के दौरान बाक़ी वक़्ता आपस में सीधे बातचीत रहे थे लेकिन धार्मिक नेता श्रीश्री रविशंकर वहां मौज़ूद नहीं थे. सागरिका घोष दर्शकों को ऐसे दिखाती रही कि जैसे रविशंकर चैनल से लाइव बात कर रहे हों, जबकि  उनकी रिकॉर्डिंग काफ़ी पहले की जा चुकी थी. इस तरह कार्यक्रम देख रहे दर्शकों के साथ यह सीधे-सीधे छल था. मीडिया में स्वनियमन की माला जपने वाले संस्थान में इस तरह का फ़रेब स्वनियमन के सारे दावों की पोल खोल देता है. इससे पहले इसी चैनल के मालिक-संपादक और सागरिका घोष के पति राजदीप सरदेसाई भी इसी से मिलती-जुलती एक हरकत को अंजाम दे चुके हैं. &lt;br /&gt;राडिया टेप सामने आ चुके थे. बरखा दत्त, वीर सांघवी, प्रभु चावला समेत राजदीप सरदेसाई की आवाज़ भी उन टेप में मौज़ूद थी. सेलिब्रिटी पत्रकारों का दलाल और लिजलिजा चेहरा पहली बार जनता के सामने आ रहा था. राजदीप सरदेसाई उस दौरान मालिकों की मुखौटा संस्था एडिटर्स गिल्ड के अध्यक्ष भी हुआ करते थे. जब देश में कॉरपोरेट लॉबीइस्ट नीरा राडिया के ऊपर चारों तरफ़ थू-थू हो रही थी. तभी राजदीप अपने चैनल में इंडिया एट नाइन कार्यक्रम के तहत ये बहस आयोजित करवाई कि भारत में लॉबीइंग को कानूनी क्यों नहीं किया जाना चाहिए? एजेंडा को सेट करते हुए राजदीप ने अपने पसंद के वक़्ताओं को शो में बुलाया और यह स्टैंड लेते रहे कि लॉबीइंग यानी दलाली के धंधे में कुछ बुराई नहीं है. इसी बीच चैनल ने कुछ दर्शकों की तरफ़ से लॉबीइंग को कानूनी करने के संबंध में ट्वीटर के संदेशों को प्रसारित किया. एक सचेत दर्शक की कोशिशों की वजह से बाद में पता चला कि ये सारे मैसेज फ़र्जी थे और उन्हें चैनल वालों ने ही खुद डाला था. इस बात का पर्दाफ़ाश होने के बाद चैनल की काफ़ी फ़जीहत हुई थी और राजदीप को माफ़ी भी मांगनी पड़ी. &lt;br /&gt;सीएऩएन-आईबीएन, सागरिका घोष और राजदीप सरदेसाई की उपरोक्त करतूतों को जानने बाद यह जानना भी ज़रूरी है कि ये भारतीय पत्रकारिता के चरित्र को किस तरह प्रदूषित कर रहे हैं. सागरिका और राजदीप आपस में पति-पत्नी भी हैं. सागरिका दूरदर्शन के पूर्व निदेशक भास्कर घोष की बेटी हैं तो राजदीप पूर्व क्रिकेटर दिलीप सरदेसाई के बेटे हैं. वे पत्रकार ही नही बल्कि अपने चैनल के मालिक भी हैं. इस लिहाज़ से देखा जाए तो उनके चैनल में मालिक के व्यवसायिक हितों और पत्रकारीय हितों में सीधा टकराव है. (यह बात कम पूंजी से निकलने वाले नो प्रोफिट-नो लॉस वाले माध्यमों पर लागू नहीं होती) लेकिन फिर भी वे दोनों पद संभाले हुए हैं. सागरिका भी कमोबेश इसी भूमिका मे चैनल के साथ जुड़ी हैं. चैनल का मुख्य मकसद भारतीय बाज़ार में मुनाफ़ा कमाना है. जन सरोकार उनके लिए बहुत बाद की चीज़ है. हां, सरोकारों का दिखावा करना उनके लिए ज़रूरी है. जिसके लिए सरकार की तरफ़ से उन्हें पद्मश्री मिल चुका है. इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि आख़िर एक पत्रकार, मालिक बनने की होड़ में कैसे शामिल हो जाता है. &lt;br /&gt;सीएऩएऩ-आईबीएऩ, दुनिया की सबसे बड़ी मीडिया कंपनियों में से एक टाइम एंड वॉर्नर की सहयोगी कंपनी है. इसका मुख्य चैनल सीएऩएऩ अमेरिका से प्रसारित होता है. इसकी मुख्य कंपनी ने दुनियाभर के मीडिया बाज़ार पर कब्ज़ा कर उन देशों की संस्कृति और वहां की स्वतंत्र संस्थाओं को बर्बाद कर दिया है. अब यही काम सीएनएन-आईबीएन के माध्यम से भारत में भी हो रहा है. नब्बे के बाद जिस तरह से सरकार ने बहुराष्ट्रीय निगमों के लिए भारतीय बाज़ार खोल दिया गया. हर संस्था की तरह मीडिया में भी उनका हस्तक्षेप उसी अनुपात में बढ़ा है. मीडिया के माध्यम से मुनाफ़ा कमाने की होड़ को भी इसी संदर्भ में समझा जा सकता है. &lt;br /&gt;सागरिका घोष और राजदीप सरदेसाई होने का मतलब कॉरपोरेट मीडिया की लूट में शामिल होना है. &lt;br /&gt;न्यायविद जस्टिस काटजू कॉरपोरेट लूट की इस होड़ पर क्यों चुप हैं ?&lt;br /&gt;(यह लेख समयांतर पत्रिका के दिसंबर अंक में प्रकाशित हो चुका है)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2900056613410233002-3308817210578896041?l=indiancoffeehouse.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/feeds/3308817210578896041/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2900056613410233002&amp;postID=3308817210578896041&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/3308817210578896041'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/3308817210578896041'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='काटजू को सागरिका और राजदीप क्यों नहीं दिखते?'/><author><name>bhupen</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05878017724167078478</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://bp2.blogger.com/_hhZqGrtQ7i4/R1Onhpa7xcI/AAAAAAAAAHY/jf-2bBrz7pI/S220/bhupen+1.color'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2900056613410233002.post-1721335543925041359</id><published>2011-11-26T11:23:00.002+05:30</published><updated>2011-12-15T14:10:52.886+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='mediatization'/><title type='text'>Mediatization of Politics and Paid News</title><content type='html'>&lt;span style="font-style:italic;"&gt;Bhupen Singh&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;Journalism is often placed at a high pedestal as a profession guided by ethics, as if the profession brims with greatness. There are many myths related to this profession. It is said to be the fourth pillar of democracy. It is believed that the journalists bring out truth even at cost of their lives, that media has idealists who fight for a better society and so on. While doing this it is often overlooked that our news media is a product and reflection of the economic and political structure of society. The exposure of many corporate media houses and celebrity journalists have cracked this glorified image somewhat, however the whole truth is still elusive to us.&lt;br /&gt;The phenomenon of paid news has put the relations between news media, political actors and democracy behind the dock. The relation of paid news with the state policies can be better understood with the concept of Mediatization. Mediatization, as a product of the liberal democracy has many complexities and layers. It can not be explained by only economic neo liberalism and corporatization.  It is shaped by these, but to understand Mediatization, it needs further conceptualization. In Mediatization, not only the structural issues of media are raised, but an attempt is made to understand the effects as well. Mediatization is neither purely a politico-economic process of media, nor a cultural study of its impacts (Schulz, 2004). The process of mediatization enables us to fully understand the state of media in liberal democracy. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Mediation and Mediatization&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;Mediation and Mediatization are processes that are not only related to politics, but include different kinds of social experiences. Many a times, Mediation and Mediatization are used inter-changeably. But they are in fact different (Mazzolini and Schulz, 1999). The events propagated and highlighted by media shape the thoughts and behavior of society. This is in a way the process of mediation. Mediated politics is that situation in which media becomes the prime medium between the public and government. The people remain dependent on media for the political and social information. Also the politicians and rulers make use of media to get the people’s opinions. These kind of mediated relations have cut short the direct relationship between the political actors and the society. The political communication instead of being direct as in case of public meetings, rallies etc. has become completely mediated.  &lt;br /&gt;‘Mediatization’ was first used to understand the impact of media on the political communication. Kent Asp, a Swedish media researcher brought forward the concept of mediated politics. He developed this concept with the help of the term introduced by the Swedish Sociologist Gudmund Hernes- that is, media twisted society. Hernes used the term for the society as shaped by the relations between politics and media (Stomback, 2008). &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Media logic versus Political logic&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;In order to understand the concept of Mediatization, it is essential to understand ‘media logic’.  In Capitalist democracies when media actors become very influential they mostly think about their business interests, ignoring the social concerns. Media indulges in irrational activities to increase its ratings. This has brought many changes in the methods of news gathering and presentation (Althied and Snow, 1979). Using the media logic, media consistently experiments with its format to attract more attention. The frequent changes in formats of the Indian news channels and papers can be understood in this context.&lt;br /&gt;Media logic tries to dominate all other democratic institutions. In this way, it gets in conflict with the political logic. The chief actors of political logic are the leaders, ministers and bureaucrats. They claim publically to be responsible towards the party, government and people. They do not give free reign to media, but use it for their own benefits. Thus, the capitalist media logic and political logic remain in a conflicting relationship. (Mayor 2002) The difference between these two logics is made evident by the recent competitive attempts of media owners and politicians to regulate the media.&lt;br /&gt;On the basis of media logic and political logic, Stromback (2008) has proposed four phases of mediatized politics. These phases are in accordance with the western democracies. Still while comparing with the India democracy, the situation is by and large similar.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Four phases of Mediatized Politics&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;In the first stage, media is the most important source of information and communication. This communication takes place between the citizens, political parties and political institutions. In this situation, the politics is mediated. Mediation is important for the later process of Mediatization as it influences greatly the expressions, opinions and perception of the audience. In this very first step of Mediatization of politics, the perception of people starts getting shaped by the reality as projected by media.  To understand whether politics has reached this first step of Mediatization, it is important to know whether media is the prime source of information and communication between the media-rulers and media-ruled. In this stage, the media, other than political media, is less regulated by political logic. But the political logic on the other meida is not so less, that they get regulated by media logic as well. Thus, in this phase, the profit centered media logic remains limited.&lt;br /&gt;The second phase is marked by a media, freer from the political and government institutions. Now the media logic becomes operational. The capitalist profits become more dominating. A demand of professionalism from journalists is made. They are expected to be more realists rather than being loyalists to the politics. Attempts are made to innovate the news formats in order to appease and attract the audiences and readers. Still the media logic does not rule completely in this phase. The state laws and regulations create obstacles in its way. Media remains midway in terms of freedom. Although the political and institutional actors are strong in this phase, they do not rule the media and are not able to force their interests on it.  &lt;br /&gt;In the third phase, media is the most important source of information and communication for the various classes of society. The media becomes more independent than the second phase. This forces the political and societal actors to mould themselves according to media. The media logic starts dominating the political logic. The political actors start using news management and spin doctoring to meet their ends. This further pushes the acceptance of media in politics and society. The media logic becomes all powerful. Its role in the policy making increases and it becomes near impossible to overlook the media. The process of agenda setting and framing also starts.  All these are initiated by media owners for their own benefits. Althied and Snow (1991) describe this situation as one in which all institutions appear to be media institutions. The institutional journalism appears to be disappearing. News becomes products. Rather than the news itself, their presentation becomes primary. In these circumstances, the political actors have to use news events to put forward their views. Sensations and celebrities assume prime importance in media. &lt;br /&gt;By this phase, reality starts getting presented on the basis of media logic. Thus, a mediated reality is constructed, in which reality itself disappears. The mediated reality becomes more important than reality. As only mediated reality reaches people, they respond to that only. Lippon (1997) describes the mediated reality as an environment of façade and Nimmo and Comb (1983) describe it as a world of fantasy. In this phase the political and societal actors remain frustrated with the role of media. The conflict between media and political logic intensifies. The political actors treat media as an external element; still they remain dependent on the news. While the election campaign, formulating policies and in governance, they remain more concerned about the media rather than about their people.  &lt;br /&gt;By the fourth phase, media logic becomes so powerful that media starts breaking all boundaries of moralities for its benefits. In such a situation, often the political-societal actors forget the differences between media logic and political logic. Politics gets colonized by media. Political actors surrender before the media logic. The media is used to mould politics as desired.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Mediatization and Paid News&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;It is time for the people who believe media as fourth pillar of democracy to realize that this watchdog has instead become a corporate-lapdog. The process of Mediatization is at its peak. Media logic is operating at full steam to achieve its purpose of profit earning, even at cost of people’s concerns and democratic values. We cannot neglect the fact that media has the extreme power to influence people’s opinion. It can guide the opinions in the direction it desires. Thus, the danger behind the attempts of media to shape opinions in favour of an idea or person in order to further its’ own interests, is great.  &lt;br /&gt;After the advent of neoliberal policies, many media houses have been trading news, sidelining and molding the rules-regulations. Biggest example of this is the Times of India Group, which initiated the medianet and private treaty. In 2003 medianet was started, many supplements with the main newspaper were introduced. With this paper, a daily paper named ‘Delhi Times’ is supplied free of cost. This supplement prints only such news for which the newspaper gets money.  The common reader has no idea that the Times of India and the Delhi Times are two separate newspapers. Both have separate RNI registration numbers as well as editors.&lt;br /&gt;The news is manipulated through the private treaties as well. The corporate media houses buy partnership in other corporate companies in lieu of advertisements and promises of popularizing their brand name. For instance, the Times of India Group is in partnership with more than 125 companies through their company Brand Capital. It looks after the advertisement and promotion of these companies. At first the group did this in name of private treaties. Private treaty has become common for most of the newspapers and private television channels.  &lt;br /&gt;The year of 2009 saw the Parliament elections as well as Haryana and Maharashtra state assembly elections. These elections made evident how the media houses influences politics for their benefits, once the corporate media logic becomes powerful. The newspapers openly demanded money for including news favoring particular leaders.  They had their rates for different candidates. Many political leaders and parties registered complaints of demands of money for favorable news on the newspapers. This phenomenon was earlier observed during the Uttarakhand Assembly elections of 2007, when media houses had started the practice of selling space in their publications. Some politicians paid money for getting publicity in news-form. This phenomenon is known as ‘Paid News’. A powerful BJP leader, Lalji Tandon, was surprised when Dainik Jagran, a paper that is considered pro-BJP, asked him for money during his campaign in the Lucknow Parliamentary elections. Press Council of India (PCI) prepared an inquiry report, under Srinivas Reddy and Paranjoy Guha Thakruta  (Thakurta and Reddy, 2010) on this issue of ‘paid news’. They defined paid news as “Any news or analysis appearing in any media (Print &amp; Electronic) for a price in cash or kind as consideration”&lt;br /&gt;Paid news is the biggest challenge for Indian media in today’s scenario. Its roots are in the neo-liberal policies that created the space for media to be so unregulated. The political parties which overlook the media regulations should also realize that the mainstream media is now capable enough to overlook them. The politicians who are responsible to formulate legislations and regulations for the whole country are forced by the media to trade for space in news media. If this process of Mediatization continues like this, it will become more and more difficult for the common person to protect their already diminishing democratic rights.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Diminishing Public Sphere and a Search for Alternatives&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;The process of Mediatization is molding the society and politics as per its own interests. Even in the capitalist democracy, it is imperative that the flow of information between the ruler and the ruled remains intact. It is important that there remains a space for discussion amongst the people, and media plays role of a watchdog. In other words, we can say that the freedom of press is not for press, but also is needed to strengthen democracy (Baker, 2007). Public Sphere is that platform, which provides space for collective discussions about social problems.  It impacts the political initiatives. Public sphere is the space other than market and state, for voicing of people’s concerns. The discussions in public sphere, at one hand, opine people and at the other hand, pressurize the state to take notice.  Habermas (1989), the German sociologist, studied the European public sphere of 18th-19th century.  In those times, coffee houses and salons used to be main centers for discussions.  The growth of print media added new meaning to public sphere. Newspapers also discussed problems and concerns of people. In this way, the changes in media also brought changes in the public sphere. &lt;br /&gt;In the last two decades Indian media has undergone historical changes. In the era of economic liberalization, media has propagated at unprecedented scale. Mediums like Newspaper, radio, TV, internet have become important sources of information. We have already discussed how the information through media that remains a toy in the hands of corporate, remain a facade. If we do not realize and oppose this situation, it will become more dangerous in coming days. Whatever public sphere is left with us, will also disappear. The mediated and mediatized information is capable to create people completely dysfunctional for the society and politics.&lt;br /&gt;It is not that before the onset of this for of Mediatization, the politics in capitalist democracy was without problems. But now, the mainstream media plays an important role as an institution, for furthering corruption in politics. The civil society, responsible to check the capitalist democracy, is itself lacking in accountability now. An important element of civil society, the NGOs, is facing questions about their credibility, in view of the huge funding. The NGOs either receive funding from the Government or from the corporate houses. &lt;br /&gt;The people’s movements for the rights of people on the resources and the extreme left movement are truly challenging the mediated reality. They are creating an alternative communication structure, however small. In these terms they are creating a counter-public sphere.    There is sufficient proof that if a group of people are guided by a strong political ideology, they remain less influenced by the media (MacComb, 2004). These kinds of counter public sphere come forward with new agendas of social transformations. In these spheres, discussions are not one dimensional, but multi-dimensional. These spheres, unlike the bourgeoisie public sphere, are not regulated by a single class base. The counter public sphere keeps alive the alternative to the mediatized politics.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Refrences:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;Altheide ,  D. L. &amp;  Snow, R.P. (1979). Media Logic. Beverly Hills, CA: Sage.&lt;br /&gt;Altheide ,  D. L. &amp;  Snow, R.P. (1991) Media world in post journalism era. New York . Eldain da Gruetar. &lt;br /&gt;Altheide ,  D. L. &amp;  Snow, R.P. (1988). Towards a theory of mediation. In communication year book,  Editor: J A Anderson. 11 edition. Newbery Park C A: Sage &lt;br /&gt;Baker, C.A. (2007). Media Concentration and Democracy: Why Ownership Matters. New York:  Cambridge University Press.&lt;br /&gt;Hjarvard, S. (2008). The Mediatization of Society: A Theory of Media as Agents of Social and Cultural Change. Nordicom Review. 29 (2), 105-134.&lt;br /&gt;Hjarvard, S. (2004). “From bricks to bytes: mediatization of global toy industry” European culture and media.&lt;br /&gt;Hebaemas, J. (1989) The Structural Transformation of the Public Sphere: an Inquiry into a Category of Bourgeois Society, Polity Press&lt;br /&gt;Lipmann, W. (1997). Public Opinion. New York: Free Press (First edition published in 1922).&lt;br /&gt;Mccombs, M. (2004). Setting the Agenda: The mass media and public opinion. Malden, MA, Blackwell Publishing Inc. &lt;br /&gt;Mazzoleni, G., &amp; Schulz, W. (1999). "Mediatization" of Politics: A Challenge for Democracy?Political Communication, 16(3), 247-261.&lt;br /&gt;Meyer, T, 2002 Media democracy: How the media colonize politics, Cambridge: Polity. &lt;br /&gt;Nimmo, D and James E Coms. 1983. Mediated Political Reality. New York. Longman.&lt;br /&gt;Pandey, S.K. &amp; Madhok, S. (2010). “From watch dog to lap dog?” Press for sale: watch dog unmasked. DMCT and Delhi Union of Journalists&lt;br /&gt;Schulz,W. (2004). Reconstructing Mediatization as an Analytical Concept. European Journal of Communication. 19(1), 87-101.&lt;br /&gt;Stromback, J. (2008). Four Phases of Mediatization: An Analysis of the Mediatization of Politics.The International Journal of Press/politics, 13 (3), 228-246.&lt;br /&gt;Thakurata P R and Reddy, 2010. “Paid News”: How corruption in the Indian media undermines democracy. Unpublished report of Press Council of India (PCI)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2900056613410233002-1721335543925041359?l=indiancoffeehouse.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/feeds/1721335543925041359/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2900056613410233002&amp;postID=1721335543925041359&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/1721335543925041359'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/1721335543925041359'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/2011/11/mediatization-of-politics-and-paid-news.html' title='Mediatization of Politics and Paid News'/><author><name>bhupen</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05878017724167078478</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://bp2.blogger.com/_hhZqGrtQ7i4/R1Onhpa7xcI/AAAAAAAAAHY/jf-2bBrz7pI/S220/bhupen+1.color'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2900056613410233002.post-1106542538481487943</id><published>2011-11-26T10:48:00.003+05:30</published><updated>2011-11-26T10:52:36.443+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेख'/><title type='text'>जन लोकपाल का पाखंड</title><content type='html'>&lt;span style="font-style:italic;"&gt;भूपेन सिंह&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;जब से उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी ने राज्य में लोकपाल विधेयक पास किया है वे अऩ्ना हज़ारे और उनके समर्थकों के दुलारे बने हुए हैं. इससे राज्य में भ्रष्टाचार के आरोपों से गले-गले तक डूबी भारतीय जनता पार्टी अन्ना के सहारे आगामी विधानसभा चुनाव में फिर से जीतने का सपना देखने लगी है. खंडूरी का कहना है कि वे जल्द ही राज्य में एक बड़ी रैली करने जा रहे हैं जिसमें अन्ना ने भी शिरकत करने की सहमति दी है. लेकिन जिस लोकपाल के लिए अन्ना के सिपहसालार फूले नहीं समा रहे हैं शायद उसकी स्थापनाओं को उन्होंने अभी अच्छी तरह पढ़ा नहीं है या वे जानबूझकर बीजेपी के पक्ष में माहौल बना रहे हैं. &lt;br /&gt;अन्ना हज़ारे और इंडिया अगेंस्ट करप्शन को इस बात का श्रेय ज़रूर दिया जाना चाहिए कि उन्होंने पूरे देश में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक माहौल बनाया है लेकिन उनकी ज़िद और एकांगी सोच की वजह से वे इस मर्ज की असली वजह पर कुछ भी सोचने के लिए तैयार नहीं हैं. यही वजह है कि 1 नवम्बर को उत्तराखंड की खंडूरी सरकार ने जैसे ही विधानसभा में उत्तराखंड लोकायुक्त विधेयक-2011 पास किया तो अऩ्ना को बीजेपी शासित उत्तराखंड एक आदर्श राज्य नज़र आने लगा और उसके नेता आदर्श जनप्रतिनिधि. जनता की भ्रष्टाचार विरोधी अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए किसी भी पार्टी ने इस विधेयक का विरोध करने की हिम्मत नहीं की. लेकिन सवाल उठाया जाना चाहिए कि जो अन्ना समूह केंद्र की कांग्रेस सरकार से प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के दायरे में लाने पर आसमान सर पर उठाए हुए है. उत्तराखंड वाले अधिनियम में उच्च स्तरीय भ्रष्टाचार को जांच के दायरे में लाने के लिए ऐसे क्या प्रावधान हैं कि वे बिना किसी झिझक के उसका समर्थन कर रहे हैं.  &lt;br /&gt;अधिनियम के अनुसार लोकपाल और उसके पांच सदस्यों की नियुक्ति सरकार की चयन समिति के सुझावों के बाद राज्यपाल करेगा. हमारे लोकतंत्र में कोई भी संस्था सत्ता के प्रभाव से कितनी अछूती रहती है यह बात जग ज़ाहिर है. इसलिए पूरा अधिनियम बहुत ही चालाकी से बनाया गया है. पहली नज़र में ऐसा लगता है कि मुख्यमंत्री, मंत्री और विधायक भी इसके दायरे में है. लेकिन अधिनियम के अध्याय छह में साफ़ लिखा गया है कि लोकपाल के सभी सदस्यों और अध्यक्ष की आम सहमति के बिना इन उच्च पदस्थ लोगों पर कोई जांच और कार्रवाई नही की जा सकती. इसे आसानी से समझा जा सकता है कि लोकायुक्त और उसके सभी सहयोगियों का किसी मुद्दे पर एकमत होना कितना मुश्किल है, वो तब, जब सत्ताधारियों के ख़िलाफ़ आरोप हों.  &lt;br /&gt;बीजेपी हमेशा भुवन चंद्र खंडूरी की छवि को ऐसे पेश करती है जैसे वे दूध के धुले हों. लेकिन उत्तराखंड की अधिकांश जनता उन्हें बीजेपी हाईकमान की तरफ़ से उन पर थोपा गया नेता मानती रही है. ज़िंदगी भर फ़ौज में अफ़सर रहे खंडूरी, दो हज़ार सात में बिना विधानसभा का चुनाव जीते ही उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बनाए गए थे. तब बीजेपी हाई कमान ने पद के दूसरे महत्वपूर्ण दावेदार भगत सिंह कोश्यारी को किनारे लगा दिया था. राज्य की जनता और बीजेपी कार्यकर्ता इस बात को कभी स्वीकार नहीं कर पाए. मुख्यमंत्री बनने के बाद खंडूरी अपनी फ़ौजी अनुशासन की छवि को भुनाने में कामयाब रहे. कांग्रेस की नारायण दत्त तिवारी की अराजक सरकार के बाद खंडूरी राज्य के एक तबके में लोकप्रिय भी हुए लेकिन भीतरी और बाहरी असंषोष की वजह से दो हज़ार नौ में उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी. बहाना लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड से बीजेपी का सफ़ाया बना. खंडूरी काल में उनके चहेते आईएएस अफ़सर सारंगी पर भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े आरोप लगे लेकिन खंडूरी लगातार उन्हें बचाते रहे. यहां तक की बाबा रामदेव ने भी खंडूरी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए. इस सब से तंग आकर बीजेपी हाई कमान ने रमेश पोखरियाल निशंक को उत्तराखंड का नया मुख्यमंत्री बना दिया. उनके शासन काल में उत्तराखंड भ्रष्टाचारियों का अड्डा बन गया. निशंक पर भ्रष्टाचार के अनगिनत आरोप लगे, जिस वजह से बीजेपी को भी लगा कि उनके नेतृत्व में अगला विधानसभा चुनाव लड़ा तो बीजेपी चंद सीटों में सिमट सकती है, इसीलिए चुनाव से ठीक पहले खंडूरी को मुख्यमंत्री बना दिया गया. इस सारी पृष्ठभूमि की अनदेखी करने वाले अन्नावादियों को लग रहा है कि खंड़ूरी उनकी मंशा का लोकपाल बनाने वाले पहले और स्वाभाविक नायक हैं. &lt;br /&gt;गौरतलब है कि उत्तराखंड में भ्रष्टाचार का पर्याय माने जाने वाले निशंक भी अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समर्थक रहे हैं. खंडूरी पर निशंक के ख़िलाफ़ कई घोटालों में सीबीआई जांच की सिफ़ारिश करने का दबाव है लेकिन वे लगातार इस बात को टालते जा रहे हैं. देश की जनता के लिए हैरान करने वाली बात यह है कि अऩ्ना के आदमी निशंक बचाने में लगातार जुटे रहे. उनके एक बेहद क़रीबी वकील शांतिभूषण, निशंक को बचाने एक विशेष विमान से नैनीताल हाईकोर्ट पहुंचे थे. निशंक स्टर्डिया भूमि घोटाले में बुरी तरफ फंसे हुए थे. तब शांति भूषण ने ही उन्हें मुसीबत से बचाया था. आख़िरकार कोर्ट ने निशंक को स्टर्डिया घोटाले में बरी कर दिया और सारा ठीकरा राज्य की नौकरशाही पर फोड़ दिया. भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ सख्त कानून की बात करने वाले अऩ्ना के सिपहसालार ही जब इस तरह भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे एक मुख्यमंत्री को बचाने पहुंचते हैं तो इससे उनकी लड़ाई का खोखलापन भी ज़ाहिर होता है. &lt;br /&gt;अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए बीजेपी को उम्मीद है कि अन्ना आंदोलन उसके लिए एक मजबूत हथियार साबित हो सकता है. बीजेपी की राजनीति को समझने के बाद भी अन्ना समूह उसकी मंशा को पूरा करने में जुटा है. इसीलिए वो पांचों राज्यों में बीजेपी के समर्थन का माहौल बना रहा है. जन लोकपाल को भ्रष्टाचार मिटाने का जादुई हथियार मानने वाले ये लोग न सिर्फ़ भ्रष्टाचार की असली जड़ों की अनदेखी कर रहे हैं बल्कि वे इससे जुड़े नैतिक पहलुओं की भी अनदेखी कर रहे हैं. यही वजह है कि लोकलुभावन नारों के सहारे आंदोलन चला रहे इंडिया अंगेस्ट करप्शन के कर्ता-धर्ता सिर्फ़ कांग्रेस को ही भ्रष्टाचार के लिए ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं. संस्थागत हो चुके भ्रष्टाचार की जड़ें उन्हें दिखाई नहीं देती हैं. फिलहाल भ्रष्टाचार के ख़िलाफ बोलना एक फ़ैशन बन गया है. अन्ना हज़ारे इस फ़ैशन के प्रतीक पुरुष हैं. इसे आगे बढ़ाने वाले भुवन चंद्र खंडूरी ख़ुद को मसीहा मान रहे हैं. कुल मिलाकर इस राजनीति में बीजेपी के हाथों में ही लड्डू दिखाई दे रहे हैं, जबकि वर्तमान हालात के लिए बीजेपी, कांग्रेस से किसी भी मामले में कम ज़िम्मेदार नहीं हैं. अगर अऩ्नावादी बीजेपी को चुनाव जिताने में किसी भी तरह का प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोग करते हैं तो इससे कांग्रेस का यह आरोप भी सही साबित होगा कि वे बीजेपी के हाथ की कठपुथली मात्र हैं. &lt;br /&gt;(कुछ अख़बारों के संपादकीय विभाग में काम करने वाले दोस्तों ने इसे न छाप पाने की मजबूरी दिखाई. उन्हें नौकरी जाने का डर था.)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2900056613410233002-1106542538481487943?l=indiancoffeehouse.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' 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src='http://bp2.blogger.com/_hhZqGrtQ7i4/R1Onhpa7xcI/AAAAAAAAAHY/jf-2bBrz7pI/S220/bhupen+1.color'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2900056613410233002.post-7806973488077615968</id><published>2011-11-07T10:23:00.003+05:30</published><updated>2011-11-07T12:09:31.963+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेख'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सोच-विचार'/><title type='text'>उन्माद की सीमा</title><content type='html'>&lt;span style="font-style:italic;"&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;भूपेन सिंह&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;अमृतसर जाने के लिए कोई बहुत ज़्यादा उत्साह नहीं था. काम निकल आया तो सोचा कि एक और नया शहर देख लेंगे. जलियांवाला बाग, स्वर्ण मंदिर देखने के बाद बाघा बॉर्डर जाने की बारी थी. बॉर्डर पर हज़ारों की भीड़ देखकर सोचता रहा कि आख़िर किस चीज़ को देखने इतने लोग यहां इकट्ठा हुए हैं. भीड़ से घिरा होने के बावजूद मैं विभाजन की त्रासदी के बारे में सोच रहा था. देशों के बीच सीमा नाम का विभाजन मुझे हमेशा बहुत ही कृत्रिम और असुविधाजनक लगता रहा है. लेकिन हक़ीकत यही थी कि इस तरफ़ भारत था और उस तरफ़ पाकिस्तान. बीच में लोहे का बना एक बड़ा सा दरवाज़ा. दोनों ही तरफ़ बड़ी संख्या में लोग दो देशों की साझा सैनिक परेड देखने को मौजूद थे. इस तरफ़ बीएसएफ़ ने और उस तरफ़ पाकिस्तान रेंजर्स ने उनके बैठने का इंतज़ाम कुछ इस तरह से किया था कि वे ओपन एयर थियेटर में चलने वाले नाटक को अच्छी तरह देख पाएं.&lt;br /&gt;सूरज डूबने वाला था. सीमा पर राष्ट्रवाद अपने चरम पर था. दोनों तरफ़ से लाउड स्पीकर पर देशभक्ति के गाने चल रहे थे. देशभक्ति में अपने देश के गुणगान से ज़्यादा दूसरे देश को मटियामेट करने की धमकी साफ़ महसूस की जा सकती थी. इन गानों को सुनकर दोनों तरफ़ की जनता में और भी जोश भर रहा था. सस्ते किस्म के फिल्मी गानों में देशभक्ति की लड़ाई जारी थी. दोनों देशों के सिपाहियों में होड़ लगी थी, दूसरी तरफ़ से कोई भड़काऊ गाना चलता तो वे ईंट का ज़वाब पत्थर से दे रहे थे. इस तरफ़ से हिंदुस्तान ज़िंदाबाद के नारे लग रहे थे तो उस तरफ़ से पाकिस्तान ज़िंदाबाद के. साथ में बंदे मातरम और भारत माता की जय के नारों से भी आसमान गूंज रहा था. वहां से इस्माली नारे उछल रहे थे तो यहां से हिंदू. एक तरफ़ कुरान की आयतें थीं तो दूसरी तरफ़ संस्कृत के श्लोक.&lt;br /&gt;सीमा पूरी तरह सैनिकों के हवाले थी. लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता किस चिड़िया का नाम है, उन्हें इस बात से कुछ लेना-देना नहीं था. माना कि पाकिस्तान तो घोषित तौर पर इस्लामिक राष्ट्र है लेकिन इस पार भारत या इंडिया का एक तीसरा नाम हिंदुस्तान कहां से आया, ये असहज सवाल मन में उठने लगा. यहां हिंदुस्तान ज़िंदाबाद का नारा उसके ऐतिहासिक अर्थों में नहीं बल्कि हिंदुओं की भूमि के रूप में उछल रहा था. सैनिक हिंदू प्रतीकों और संस्कृत के श्लोकों को इस्मालिक राष्ट्र के ख़िलाफ़ हिंदू प्रतिवाद के तौर पर इस्तेमाल कर रहे थे, जैसे कि भारत कोई हिंदू राष्ट्र हो. सबकुछ इतना असंगत था कि साथ में गए कुछ विदेशी पत्रकार मुझसे ऐसे सवाल करने लगे जैसे इस भूभाग में पैदा होने की वजह से मैं भी इस नाटक के लिए ज़िम्मेदार हूं.&lt;br /&gt;डूबते हुए सूरज के साथ दोनों तरफ़ से कुछ वक़्त के लिए सीमा का दरवाजा खुलना था. यही तमाशे का चरम था. दोनों तरफ़ से सैनिक आक्रामक मुद्रा में झटके से दरवाजा खोलते हैं. हाथ मिलाने आमने-सामने पहुंचते हैं. उनकी निगाहों से ऐसी हिंसा टपक रही होती है जैसे वे एक-दूसरे को कच्चा चबा जाएंगे. हज़ारों की भीड़ इस मंजर को सांसें रोके देखती है. वो तुलना करती है कि किस तरफ़ का जवान ज़्यादा दमदार है. किसकी आंखों से ज़्यादा नफ़रत और राष्ट्रीय श्रेष्ठता टपक रही है. यहां आपस में मिलने वाले हाथ दोस्ती के नहीं, नफ़रत के थे. बाद में पता चला कि विभाजन के बाद से ही बीच के कुछ वर्षों को छोड़कर ये आयोजन चलता आ रहा है. इस बीच यहां हज़ारों नेता, पत्रकार और बुद्धिजीवी आ चुके होंगे. हमारे सभ्य और धर्मनिरपेक्ष नीति निर्माताओं की नज़र में ये सब नहीं आया हो, ऐसा भी नहीं हो सकता. फिर भी धार्मिक कट्टरता में लिथड़े राष्ट्रवाद का तमाशा यहां जारी है. दिन भर दोनों ओर के सैनिक इस तमाशे के लिए अभ्यास करते हैं. मैं सोचता रहा कि हमारी सभ्यता नफ़रत के ऐसे अभ्यास की कैसे इजाज़त दे सकती है?&lt;br /&gt;सूरज डूब चुका था. दोंनों देशों के सैनिक अपने इलाक़े में लौटकर अपना-अपना झंडा समेट रहे थे. एक तरह से उन्माद और उत्तेजना का अंत हो चुका था. भीड़ छंटने लगी. उस जगह महानता के मानसिक युद्ध के बाद बचे हुए दृश्य थे. मुझे लगा कि लोग राष्ट्रवाद के नशे में चूर नफ़रत के ऐसे ही किसी और आयोजन का प्रशिक्षण लेकर लौट रहे हैं.&lt;br /&gt;(यह लेख जनसत्ता में प्रकाशित हो चुका है)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2900056613410233002-7806973488077615968?l=indiancoffeehouse.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/feeds/7806973488077615968/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2900056613410233002&amp;postID=7806973488077615968&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/7806973488077615968'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/7806973488077615968'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='उन्माद की सीमा'/><author><name>bhupen</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05878017724167078478</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://bp2.blogger.com/_hhZqGrtQ7i4/R1Onhpa7xcI/AAAAAAAAAHY/jf-2bBrz7pI/S220/bhupen+1.color'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2900056613410233002.post-7114516778006901918</id><published>2011-08-30T23:38:00.003+05:30</published><updated>2011-11-09T17:01:44.303+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आनंद स्वरूप वर्मा'/><title type='text'>व्यवस्था के शस्त्रागार का एक नया हथियार</title><content type='html'>&lt;span style="font-style:italic;"&gt;आनंद स्वरूप वर्मा, संपादक,समकालीन तीसरी दुनिया&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो लोग यह मानते रहे हैं और लोगों को बताते रहे हैं कि पूंजीवादी और साम्राज्यवादी लूट पर टिकी यह व्यवस्था सड़ गल चुकी है और इसे नष्ट किये बिना आम आदमी की बेहतरी संभव नहीं है उनके बरक्स अण्णा हजारे ने एक हद तक सफलतापूर्वक यह दिखाने की कोशिश की कि यह व्यवस्था ही आम आदमी को बदहाली से बचा सकती है बशर्ते इसमें कुछ सुधार कर दिया जाय। व्यवस्था के जनविरोधी  चरित्र से जिन लोगों का मोहभंग हो रहा था उस पर अण्णा ने एक ब्रेक लगाया है। अण्णा ने सत्ताधारी वर्ग के लिए आक्सीजन का काम किया है और उस आक्सीजन सिलेंडर को ढोने के लिए उन्हीं लोगों के कंधें का इस्तेमाल किया है जो सत्ताधारी वर्ग के शोषण के शिकार हैं। उन्हें नहीं पता है कि वे उसी निजाम को बचाने की कवायद में तन-मन-धन  से जुट गये जिसने उनकी जिंदगी को बदहाल किया। देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे जुझारू संघर्षों की ताप से झुलस रहे सत्ताधारियों को अण्णा ने बहुत बड़ी राहत पहुंचाई है। शासन की बागडोर किसके हाथ में हो इस मुद्दे पर सत्ताधारी वर्ग के विभिन्न गुटों के बीच चलती खींचतान से आम जनता का भ्रमित होना स्वाभाविक है पर जहां तक इस वर्ग के उदधारक्  की साख बनाये रखने की बात है, विभिन्न गुटों के बीच अद्भुत एकता है। यह एकता 27 अगस्त को छुट्टी के दिन लोकसभा की विशेष बैठक में देखने को मिली जब कांग्रेस के प्रणव मुखर्जी और भाजपा की सुषमा स्वराज दोनों के सुर एक हो गये और उससे जो संगीत उपजा उसने रामलीला मैदान में एक नयी लहर पैदा कर दी। सदन में  शरद यादव के भाषण से सबक लेते हुए अगले दिन अपना अनशन समाप्त करते समय अण्णा ने बाबा साहेब आंबेडकर को तो याद ही किया, अनशन तोड़ते समय जूस पिलाने के लिए दलित वर्ग और मुस्लिम समुदाय से दो बच्चों को चुना। &lt;br /&gt;अण्णा हजारे का 13 दिनों का यह आंदोलन भारत के इतिहास की एक अभूतपूर्व और युगांतरकारी घटना के रूप में रेखांकित किया जाएगा। इसलिए नहीं कि उसमें लाखों लोगों की भागीदारी रही या टीवी चैनलों ने लगातार रात दिन इसका प्रसारण किया। किसी भी आंदोलन की ताकत या समाज पर पड़ने वाले उसके दूरगामी परिणामों का आकलन मात्र इस बात से नहीं किया जा सकता कि उसमें लाखों लोगों ने शिरकत की। अगर ऐसा होता तो जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से लेकर रामजन्मभूमि आंदोलन, विश्वनाथ प्रताप सिंह का बोफोर्स को केंद्र में रखते हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, मंडल आयोग की रिपोर्ट पर आरक्षण विरोधी  आंदोलन जैसे पिछले 30-35 वर्षों के दौरान हुए ऐसे आंदोलनों में लाखों की संख्या में लोगों की हिस्सेदारी रही। किसी भी आंदोलन का समाज को आगे ले जाने या पीछे ढकेलने में सफल/ असफल होना इस बात पर निर्भर करता है कि उस आंदोलन को नेतृत्व देने वाले कौन लोग हैं और उनका ‘विजन’ क्या है? अब तक भ्रष्टाचार विरोधी  आंदोलन को सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी बना कर जनभावनाओं का दोहन किया जाता रहा है। अण्णा के व्यक्तित्व की यह खूबी है कि इस खतरे से लोग निश्चिंत हैं। उन्हें पता है कि रालेगण सिदधी  के इस फकीरनुमा आदमी को सत्ता नहीं चाहिए। &lt;br /&gt;अण्णा का आंदोलन अतीत के इन आंदोलनों से गुणात्मक तौर पर भिन्न है क्योंकि आने वाले दिनों में भारतीय समाज में बदलाव के लिए संघर्षरत शक्तियों के बीच यह ध्रुवीकरण का काम करेगा। किसी भी हालत में इस आंदोलन के मुकाबले देश की वामपंथी क्रांतिकारी शक्तियां न तो लोगों को जुटा सकती हैं और न इतने लंबे समय तक टिका सकती हैं जितने लंबे समय तक अण्णा हजारे रामलीला मैदान में टिके रहे। इसकी सीधी  वजह यह है कि यह व्यवस्था आंदोलन के मूल चरित्र के अनुसार तय करती है कि उसे उस आंदोलन के प्रति किस तरह का सुलूक करना है। मीडिया भी इसी आधार पर निर्णय लेता है। आप कल्पना करें कि क्या अगर किसी चैनल का मालिक न चाहे तो उसके पत्रकार या कैमरामेन लगातार अण्णा का कवरेज कर सकते थे? क्या कारपोरेट घराने अपनी जड़ खोदने वाले किसी आंदोलन को इस तरह मदद करते या समर्थन का संदेश देते जैसा अण्णा के साथ हुआ? भारत सरकार के गृहमंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीन वर्षों में यहां के एनजीओ सेक्टर को 40 हजार करोड़ रुपये मिले हैं- उसी एनजीओ सेक्टर को जिससे टीम अन्ना के प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, किरन बेदी, संदीप पांडे, स्वामी अग्निवेश जैसे लोग घनिष्ठ/ अघनिष्ठ रूप से जुड़े/ बिछड़े रहे हैं। इस सारी जमात को उस व्यवस्था से ही यह लाभ मिल रहा है जिसमें सडांध् फैलती जा रही है, जो मृत्यु का इंतजार कर रही है और जिसे दफनाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में उत्पीड़ित जनता संघर्षरत है। आज इस व्यवस्था का एक उदधारक दिखायी दे रहा है। वह भले ही 74 साल का क्यों न हो, नायकविहीन दौर में उसे जिंदा रखना जरूरी है।&lt;br /&gt;क्या इस तथ्य को बार बार रेखांकित करने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार का मूल स्रोत सरकार की नवउदारवादी आर्थिक नीतियां हैं? इन नीतियों ने ही पिछले 20-22 वर्षों में इस देश में एक तरफ तो कुछ लोगों को अरबपति बनाया और दूसरी तरफ बड़ी संख्या में मेहनतकश लोगों को लगातार हाशिये पर ठेल दिया। इन नीतियों ने कारपोरेट घरानों के लिए अपार संभावनाओं का द्वार खोल दिया और जल, जंगल, जमीन पर गुजर बसर करने वालों को अभूतपूर्व पैमाने पर विस्थापित किया और प्रतिरोध् करने पर उनका सफाया कर दिया। इन नीतियों की ही बदौलत आज मीडिया को इतनी ताकत मिल गयी कि वह सत्ता समीकरण का एक मुख्य घटक हो गया। जिन लोगों को इन नीतियों से लगातार लाभ मिल रहा है वे भला क्यों चाहेंगे कि ये नीतियां समाप्त हों। इन नीतियों के खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में जो उथल-पुथल चल रही है उससे सत्ताधारी वर्ग के होश उड़े हुए हैं। ऐसे में अगर कोई ऐसा व्यक्ति सामने आता है जिसका जीवन निष्कलंक हो, जिसके अंदर सत्ता का लोभ न दिखायी देता हो और जो ऐसे संघर्ष को नेतृत्व दे रहा हो जिसका मकसद समस्या की जड़ पर प्रहार करना न हो तो उसे यह व्यवस्था हाथों हाथ लेगी क्योंकि उसके लिए इससे बड़ा उदधारक कोई नहीं हो सकता। अण्णा की गिरफ्रतारी, रिहाई, अनशन स्थल को लेकर विवाद आदि राजनीतिक फायदे-नुकसान के आकलन में लगे सत्ताधारी वर्ग के आपसी अंतर्विरोधें की वजह से सामने आते रहे हैं। इनकी वजह से मूल मुद्दे पर कोई फर्क नहीं पड़ता। &lt;br /&gt;अण्णा के आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान गांधीजी द्वारा चलाये गये सत्याग्रहों और आंदोलनों की उन लोगों को याद दिला दी जिन्होंने तस्वीरों या फील्मों के माध्यम से उस आंदोलन को देखा था। गांधी  के समय भी एक दूसरी धारा थी जो गांधी  के दर्शन का विरोध् करती थी और जिसका नेतृत्व भगत सिंह करते थे। जहां तक विचारों का सवाल है भगत सिंह के विचार गांधी से काफी आगे थे। भगत सिंह ने 1928-30 में ही कह दिया था कि गांधी के तरीके से हम जो आजादी हासिल करेंगे उसमें गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेज सत्ता पर काबिज हो जायेंगे क्योंकि व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं होगा। तकरीबन 80 साल बाद रामलीला मैदान से अण्णा हजारे को भी यही बात कहनी पड़ी कि गोरे अंग्रेज चले गये पर काले अंग्रेजों का शासन है। इन सबके बावजूद भगत सिंह के मुकाबले गांधी को उस समय के मीडिया ने और उस समय की व्यवस्था ने जबर्दस्त ‘स्पेस’ दिया। वह तो टीआरपी का जमाना भी नहीं था क्योंकि  टेलीविजन का अभी आविष्कार ही नहीं हुआ था। तो भी शहीद सुखदेव ने चंद्रशेखर आजाद को लिखे एक पत्र में इस बात पर दुःख प्रकट किया है कि मीडिया हमारे बयानों को नहीं छापता है और हम अपनी आवाज जनता तक नहीं पहुंचा पाते हैं। जब भी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन करने वाली ताकतें सर उठाती हैं तो उन्हें वहीं खामोश करने की कोशिश होती है। अगर आप अंदर के रोग से मरणासन्न व्यवस्था को बचाने की कोई भी कोशिश करते हुए दिखायी देते हैं तो यह व्यवस्था आपके लिए हर सुविधा  मुहैया करने को तत्पर मिलेगी। &lt;br /&gt;अण्णा हजारे ने 28 अगस्त को दिन में साढ़े दस बजे अनशन तोड़ने के बाद रामलीला मैदान से जो भाषण दिया उससे आने वाले दिनों के उनके एजेंडा का पता चलता है। एक कुशल राजनीतिज्ञ की तरह उन्होंने उन सारे मुद्दों को भविष्य में उठाने की बात कही है जो सतही तौर पर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का आभास देंगे लेकिन बुनियादी तौर पर वे लड़ाइयां शासन प्रणाली को और चुस्त-दुरुस्त करके इस व्यवस्था को पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा टिकाऊ , दमनकारी और मजबूत बना सकेंगी। अण्णा का आंदोलन 28 अगस्त को समाप्त नहीं हुआ बल्कि उस दिन से ही इसकी शुरुआत हुई है। रामलीला मैदान से गुड़गांव के अस्पताल जाते समय उनकी एंबुलेंस के आगे सुरक्षा में लगी पुलिस और पीछे पल पल की रिपोर्टिंग के लिए बेताब कैमरों से दीवाल पर लिखी इबारत को पढ़ा जा सकता है। व्यवस्था के शस्त्रागार से यह एक नया हथियार सामने आया है जो व्यवस्था बदलने की लड़ाई में लगे लोगों के लिए आने वाले दिनों में एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी करेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2900056613410233002-7114516778006901918?l=indiancoffeehouse.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/feeds/7114516778006901918/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2900056613410233002&amp;postID=7114516778006901918&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/7114516778006901918'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/7114516778006901918'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/2011/08/blog-post_30.html' title='व्यवस्था के शस्त्रागार का एक नया हथियार'/><author><name>bhupen</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05878017724167078478</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://bp2.blogger.com/_hhZqGrtQ7i4/R1Onhpa7xcI/AAAAAAAAAHY/jf-2bBrz7pI/S220/bhupen+1.color'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2900056613410233002.post-5168270498993201994</id><published>2011-08-13T19:45:00.003+05:30</published><updated>2011-08-13T19:55:13.212+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया'/><title type='text'>एफएम रेडियो: एकाधिकार का विस्तार</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;भूपेन सिंह&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;‘वायु तरंगें जनता की संपत्ति हैं’&lt;br /&gt;-सुप्रीम कोर्ट, भारत, फरवरी, 1995 &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;‘एफएम रेडियो के विस्तार के लिए तीसरे चरण के निजीकरण के तहत सरकार लाइसेंस नीलाम कर एक हज़ार सात सौ तैंतीस करोड़ रुपए कमाने की सोच रही है’&lt;br /&gt;-अंबिका सोनी, सूचना और प्रसारण मंत्री, जुलाई, 2011&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत सरकार वायु तरंगों को कॉरपोरेट को बेच कर अपने ही सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी का मज़ाक उड़ा रही है. टेलीविजन समाचारों के निजीकरण के बाद अब सरकार रेडियो समाचारों के निजीकरण के रास्ते पर है. लेकिन यह प्रक्रिया टेलीविजन की तुलना में जटिल और ज़्यादा ख़तरनाक है. सात जुलाई दो हज़ार ग्यारह को सरकार द्वारा घोषित एफएम रेडियो के तीसरे चरण की विस्तार योजना में कई ख़तरों को पहचाना जा सकता है. इस चरण में सरकार ने एफएम चैनलों को एक हद तक समाचार प्रसारित करने का अधिकार भी दे दिया है. साथ ही रेडियो चैनलों में विदेशी निवेश की सीमा बीस से बढ़ाकर छब्बीस फ़ीसदी कर उसने यह भी साबित कर दिया है कि वह जनता की संपत्ति को विदेशी पूंजीपतियों के हवाले करने को लेकर कितनी उतावली है. मीडिया नियमन से लगातार कन्नी काटती सरकार का यह कदम भारतीय मीडिया के लोकतांत्रीकरण की बची-खुची उम्मीदों को भी ख़त्म करने वाला है. &lt;br /&gt;नब्बे के दशक में उदारीकरण की प्रक्रिया को शुरू हुए कुछ ही वक़्त बीता था. कोलकाता क्रिकेट बोर्ड और दूरदर्शन प्रसारण अधिकारों के विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे. जस्टिस पीबी सावंत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने तब बहुमत के आधार पर कहा था कि वायु तरंगें जनता की संपत्ति हैं इसलिए उन्हें जनता के हित में ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए. इस फ़ैसले की कई प्रतिध्वनियां हैं, अपेक्षा बनी कि सरकार पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग सिस्टम को मजबूत करेगी. दूरदर्शन और रेडियो सिर्फ़ सरकारी भौंपू बनकर नहीं रहेंगे, साथ ही निजी मीडिया की मनमानी पर लगाम लगाने कि लिए भी एक कारगर रेग्युलेटरी बोर्ड बनेगा. वक़्त बीतने के साथ ये दोनों ही बातें ग़लत साबित हुईं. सरकार ने स्वायत्त पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग के नाम पर प्रसार भारती तो बनाया लेकिन सरकारी एकाधिकार ख़त्म नहीं हुआ. दूसरी ओर उसने निजी मीडिया को इतनी छूट दी कि नियमन की बात पर वे आत्मनियमन की माला जपते हुए बेशर्मी से सरकार को ही धौंस देने लगे और व्यापक जनता की अनदेखी करने लगे. &lt;br /&gt;उदारीकरण की प्रक्रिया को अपनाने के दो दशक बाद अब मुनाफाख़ोरों के निशाने पर रेडियो समाचार हैं. सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने एफएम रेडियो विस्तार के तीसरे चरण में कई नए निजी रेडियो चैनलों को लाइसेंस देने की घोषणा की है. जिसके तहत अब उन्हें आकाशवाणी की ख़बरों को बिना छेड़छाड़ किए प्रसारित करने की अनुमति भी मिल जाएगी. कॉरपोरेट की तरफ़ से सरकार पर लंबे अरसे से रेडियो समाचारों के निजीकरण करने का दबाव था. जन दबाव न होने की वजह से पहले से ही तैयार सरकार ने इसके लिए हामी भर दी है. जनमत बनाने में माहिर कॉरपोरेट मीडिया सरकार के इस क़दम की जमकर तारीफ़ कर रहा है. इसी ‘ख़ुशनुमा माहौल’ में सरकार ने दबे पांव निजी रेडियो चैनलों में विदेशी निवेश की सीमा छह फ़ीसदी और बढ़ा दी है. इस पूरे घटनाक्रम को मीडिया के लोकतांत्रीकरण की बात करने वाले एक बड़े ख़तरे के तौर पर देख रहे हैं. निजी मीडिया में पेड न्यूज़ और राडिया कांड जैसी घटनाएं खुलकर सामने आने के बाद उसकी विश्वसनीयता पहले ही तार-तार हो चुकी है. निजी मीडिया मुनाफ़ा कमाने की ललक के पीछे किस हद तक जा सकता है इसका ताज़ा उदाहरण ब्रिटेन में मीडिया मुगल रूपर्ड मुर्डोक के न्यूज ऑफ़ द वर्ल्ड की करतूतों से मिलते हैं. लेकिन लगता है कि कॉरपोरेट की इशारों पर चलने वाली हमारी सरकारें इन सब से आंख मूंदकर सोई हुई हैं.  &lt;br /&gt;एफएम रेडियो में तीसरे चरण के विस्तार की घोषणा करते हुए दो सौ सत्ताईस नए शहरों में एफएम चैनलों को लाइसेंस देने का ऐलान किया गया है. इससे पहले सिर्फ़ छियासी शहरों में ही एफएम चैनल मौज़ूद थे. अब सरकार कुल आठ सौ उनतालीस नए एमएफ चैनलों को अनुमति देने के लिए तैयार है. इसके तहत एक लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में निजी एफएम चैनल शुरू हो जाएंगे. पहले और दूसरे चरण में सरकार ने इकतीस मई दो हज़ार ग्यारह तक लाइसेंस बेचकर एक हज़ार सात सौ तैंतीस करोड़ रुपए कमाए थे. सरकार का कहना है कि वो इस चरण के तहत एक ही झटके में एक हज़ार सात सौ तैंतीस करोड़ रुपए का राजस्व कमाने का इरादा रखती है. ये सारे फ़ैसले कैबिनेट ने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में लिए. जनता की संपत्ति को बेचकर मुनाफ़ा कमाने और विकास के नाम पर कॉरपोरेट का घर भरने वाले दर्शन की अगुवाई करने वाले प्रधानमंत्री को भला इसमें क्या आपत्ति हो सकती है! लेकिन जनता के सवाल अब भी बरकरार हैं. &lt;br /&gt;सरकार ने नई कंपनियों को लाइसेंस देने की जो शर्तें रखी हैं उससे स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र में भी आने वाले दिनों में बड़े पूंजीपतियों का एकाधिकार साफ़ दिखाई देगा. जिन कंपनियों के पास अथाह पैसा है वे ही इसमें निवेश करने में सक्षम होंगी. पता चलता है कि सरकार  की मंशा क्रॉस मीडिया होल्डिंग पर लगाम लगाने की बिल्कुल भी नहीं है. यह बात देश की विविधता का गला घोंटने वाली साबित हो सकती है. क्रॉस मीडिया होल्डिंग का सीधा सा अर्थ है कि कुछ बड़े मीडिया घराने पूंजी के बल पर रेडियो, टेलीविजन, प्रिंट और इंटरनेट में एकाधिकार स्थापित कर देश के जनमत को मनचाही दिशा में मोड़ने में सक्षम हो सकते हैं. क्षेत्रीय चैनलों में भी एक ही तरह  का केद्रीय विचार ज़्यादा हावी रहेगा. यह क़दम लोकतांत्रिक संस्थाओँ के लिए सर्वाधिक घातक है. अमेरिका जैसे पूंजीवादी देश में भी क्रॉस मीडिया होल्डिंग को रोकने के लिए कुछ ठोस नियम हैं. इसके अलावा दूसरे धंधों का पैसा भी मीडिया में लगाने के चलन पर रोक लगाने की कोई व्यवस्था हमारे यहां नहीं है. यही बजह है कि हाल के दौर में आपराधिक प्रवृत्ति के कई व्यावसायी मीडिया में पैसा लगा कर मुनाफ़ा कमा रहे हैं. जबकि ख़ास तौर समाचार मीडिया में पैसा लगाने की इजाज़त किसी भी हालत में ऐसे व्यवसायियों को नहीं होनी चाहिए जो पत्रकारिता के प्रभाव का इस्तेमाल अपना दूसरा व्यवसाय चमकाने में कर सकें. चिंता की बात यह है कि सरकार क्रॉस मीडिया होल्डिंग के साथ ही क्रॉस बिजनेस होल्डिंग की भी पूरी तरह से अनदेखी कर रही है. &lt;br /&gt;एफएम रेडियो के दूसरे चरण के विस्तार की योजनाओं में सरकार ने मीडिया घरानों से कहा था कि सरकार की तरफ़ से क्रॉस मीडिया होल्डिंग संबंधी कोई नियम लाने पर उऩ्हें छह महीने के भीतर अपने मालिकाने में बदलाव करना होगा. यह बात अपने आप में खोखली साबित हुई. क्योंकि क्रॉस मीडिया होल्डिंग को लेकर सरकार अब तक कोई नीति नहीं बना पाई है. सिर्फ़ दिखावे से इस मामले में काम नहीं चलने वाला है क्योंकि आज बड़ी और मुनाफ़ाख़ोर मीडिया कंपनियों के लिए नई कंपनी बनाना बांयें हाथ का खेल है. मालिकाना बदलने का दिखावा करने में भी वे माहिर हैं. अब तो लगता है कि सरकार ने क्रॉस मीडिया होल्डिंग की चिंता से पूरी तरह किनाराकशी कर ली है. &lt;br /&gt;उन्नीस सौ सत्ताईस में हमारे यहां रेडियो की शुरुआत ही एक निजी कंपनी के तहत हुई लेकिन आज़ादी के बाद नेहरू के गुलाबी समाजवाद के कुछ रंग हमारे रेडियो में भी दिखे. रेडियो में सरकार बजती रही. एफएम रेडियो उन्नीस सौ सतहत्तर में देश में पहुंचा. तब चेन्नई में आकाशवाणी के भीतर ही इसकी शुरुआत हुई लेकिन निजीकरण से जुड़ा इसका रूप नब्बे के दशक में ही देखने को मिला. उन्नीस सौ तिरानबे में सरकार ने नई आर्थिक नीतियों के अनुरूप पहली बार एफएम रेडियो की योजना पर अमल शुरू किया. इस दौर में मद्रास, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और गोवा में एफएम चैनल शुरू हुए. तब आकाशवाणी के चैनलों में ही निजी क्षेत्र को विषयवस्तु में निवेश की अनुमति दी गई. निजी कंपनियां सरकारी रेडियो में अपने लिए टाइम स्लॉट ख़रीदने लगीं. जुलाई उन्नीस सौ निन्यानबे में सरकार ने फ़ैसला किया कि वो एफएम रेडियो में पूरी तरह निजी निवेश को स्वीकृति देने जा रही है. इसे एफएम रेडियो विस्तार का पहला चरण कहा गया. मार्च दो हज़ार में सरकार ने लाइसेंस देने के लिए एक सौ आठ रेडियो चैनलों के लिए खुली नीलामी की. इऩ चैनलों को ख़बरों को छोड़कर शिक्षा, स्वास्थ्य और मनोरंजन से जुड़े कार्यक्रम पेश करने का अधिकार था. यह एफएम रेडियो के क्षेत्र में निजी पूंजी की पूरी तरह से घुसपैठ थी. इस चरण में कोई स्पष्ट और कारगर नीति न होने की वजह से लाइसेंस देने और उनके क्रियान्वयन में काफ़ी गड़बड़ियां सामने आईं. नतीजतन सिर्फ़ बारह शहरों में इक्कीस रेडियो चैनल ही अपना काम जारी रख पाए. प्रचार किया गया कि एफएम विस्तार के पहले चरण में निजी ऑपरेटरों को घाटा उठाना पड़ा है. &lt;br /&gt;पहले चरण की नीतियां सही तरह से काम नहीं कर पाई तो सरकार ने लाइसेंस देने की प्रक्रिया में सुधार करने के नाम पर दूसरे चरण में कदम रखा. तब उद्धार के लिए पूंजीपतियों के संगठन फिक्की के अमित मित्रा की अगुवाई में रेडियो प्रसारण नीति कमेटी (रेडियो ब्राडकास्ट पॉलिसी कमेटी) बनाई गई. इस कमेटी ने उन्नीस विंदुओं पर अपनी  रिपोर्ट सरकार को सौंपी. जिसकी निजी संगठनों ने काफ़ी तारीफ़ की. दो हज़ार पांच में इस कमेटी की रिपोर्ट को लागू करने के बाद रेडियो स्टेशन स्थापित करने की कीमत में काफ़ी कमी आ गई. परिणामस्वरूप रेडियो निजीकरण के दूसरे चरण में इक्यानबे शहरों में तीन सौ सैंतीस स्टेशनों की नीलामी की गई. यह नीलामी जनवरी दो हज़ार छह में पूरी हुई. इस तरह जून दो हज़ार नौ में इक्यानबे शहरों से दो सौ अड़तालीस रेडियो स्टेशन काम करने लगे थे. आख़िरकार तीसरे चरण में एफएम रेडियो में ख़बर परोसने की भी अनुमति निजी हाथों को दे दी गई है.&lt;br /&gt;सूचना और प्रसारण मंत्रालय की तरफ़ से जैसे ही रेडियो के निजीकरण के तीसरे चरण की घोषणा की. कॉरपोरेट के प्रवक्ता फूले नहीं समाए उन्होंने सरकारी फ़ैसले को जायज़ ठहराने की हरसंभव कोशिश की. जनता की तरफ़ से कोई प्रतिरोध देखने को नहीं मिला इसलिए कॉरपोरेट मांग करने लगे कि उन्हें मुनाफ़ा कमाने की अंतहीन आज़ादी चाहिए. सरकार भले ही इस मामले में जनता का मूड भांपने के लिए धीरे-धीरे अपने पत्ते खोल रही हो लेकिन अति उत्साहित कॉरपोरेट सबकुछ एक साथ पा लेना चाह रहे हैं. उनकी मांग है कि सरकार उन्हें ख़बर प्रसारित करने का पूर्ण अधिकार दे. फिलहाल समाचार प्रसारित करने पर सरकारी भौंपू आकाशवाणी का एकाधिकार है. अब निजी एफएम चैनल आकाशवाणी के बुलेटिनों में बिना छेड़छाड़ किए उन्हें प्रसारित कर पाएंगे. इसके अलावा गैर समाचारों की श्रेणी में खेल से जुड़ी सूचनाएं, यातायात, मौसम, करियर काउंसिलिंग, एडमिशन, महोत्सव और सांस्कृतिक ख़बरों को प्रसारित करने की भी अनुमति होगी. आकाशवाणी कई एजेंसियों से ख़बर लेती है लेकिन सरकार ने निजी चैनलों को अभी एजेंसियों से सीधे ख़बरें लेने की अनुमति नहीं दी है. ऐसा लगता है कि जानबूझकर इस तरह की ढील-ढाली व्यवस्था बनाई गई है ताकि जल्द ही रेडियो समाचारों को पूरी तरह निजी हाथों में सौंपा जा सके. सूचना और प्रसारण मंत्रालय मान भी चुका है कि आने वाले दिनों में इसकी इजाज़त दी जा सकती  है. मतलब साफ़ है कि आने वाले दिनों में निजी टेलीविजन न्यूज चैनलों ने जिस तरह का अराजक माहौल बना रखा है वैसा ही माहौल रेडियो समाचारों के क्षेत्र में भी दिख सकता है.  &lt;br /&gt;टू जी स्पेट्रम घोटाला अभी पुराना नहीं हुआ है. उसमें बरखा जैसे कई स्वनामधन्य पत्रकारों की भूमिका अब छुपी नहीं रही. कॉरपोरेट, मीडिया और राजनेताओं का गठजोड़ किस तरह जनता को बेवकूफ़ बनाता है इसका एक बड़ा उदाहरण मिल चुका है. इस घोटाले को याद रख सरकार अब नए रेडियो चैनलों के लिए थ्री जी स्पेक्ट्रम की जो नीलामी में ई-ऑक्शन का तरीक़ा अपनाने जा रही है यानी लाइसेंस की नीलामी इंटरनेट के माध्यम से होगी. ऐसा कदम उठाकर सरकार यह दिखाना चाह रही है कि जिस तरह टू जी स्पेट्रम की नीलामी में कुछ प्रभावशाली लोगों ने धनबल-बाहुबल के आधार पर स्प्रेक्ट्रम हथिया लिए थे वैसा थ्री जी स्पेक्ट्रम की नीलामी में न होने पाए. कोई गड़बड़ी न हो इसके लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय विशेषज्ञों की एक समिति बनाने जा रहा है. लेकिन धंधे की बारीकियों पर नज़र रखने वाले जानते हैं कि कॉरपोरेट का काम बिना अपराध के चल ही नहीं सकता इसलिए उनके लिए चोर दरवाजे भी कभी बंद नहीं हो सकते. सरकार के मुताबिक़ नीलामी की यह प्रक्रिया इस वित्तीय वर्ष के अंत तक ख़त्म हो जाएगी और इस प्रक्रिया को पूरा होने में तीन साल लगेंगे. अब अगर कोई यह मानता है कि इस मामले में नीरा राडिया जैसे लाबिइंग के उस्ताद चुप बैठे रहेंगे तो यह उनकी सदइच्छा है. &lt;br /&gt;फिलहाल हिंदुस्तान में छत्तीस रेडियो ऑपरेटर ही हैं. इनका सालाना व्यवसाय एक हज़ार दो सौ करोड़ का है. अनुमान लगाया जा रहा है कि नई नीति लागू हो जाने के बाद इसमें तीन साल के भीतर तिगुना उछाल आ जाएगा. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि रेडियो में निवेश करने वाले ज़्यादातर कॉरपोरेट घराने वही हैं जिनका पहले से ही मीडिया से जुड़े दूसरे कारोबारों में पैसा लगा है. टाइस्म ऑफ़ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स और मिड डे जैसे कई बड़े मीडिया घरानों का पैसा एफएम रेडियो में लगा है. टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने निजी रेडियो में घुसपैठ के लिए इंटरटेनमेंट नेटवर्क इंडिया लिमिटेड (आईएनआईएल) बनाया है. यह कंपनी देशभर में रेडियो मिर्ची नाम से एफएम रेडियो चैनल चलाती है. दो हज़ार में पहले चरण की लाइसेंसिंग नीलामी में इस कंपनी ने सबसे ज़्यादा फ्रीक्वेंसी झटक ली थी. दो हज़ार छह में इसने पच्चीस फ्रीक्वेंसीज हासिल कर ली थी और फिलहाल तैंतीस शहरों में  इसके रेडियो चैनल चल रहे हैं. क्रॉस मीडिया होल्डिंग कैसे देश के जनमत को एक ही दिशा में मोड़ने का  का काम करती है इसका एक छोटा सा नमूना यह है कि बारह जुलाई को टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप के अख़बार इकोनोमिक टाइम्स ने एफएम रेडियो के तीसरे दौर की लाइसेंसिंग के बारे में राजेश नायडु की एक रिपोर्ट छापी. पूरी रिपोर्ट में अपने ही रेडियो चैनल रेडियो मिर्ची की तारीफ़ की गई है और भविष्य में टाइम्स ऑफ़ इंडिया की तरह ही रेडियो के क्षेत्र में उसके छा जाने की छुपी हुई घोषणा है. एफएम रेडियो के क्षेत्र में आने वाले छोटे निवेशकों के प्रति इस ग्रुप का क्या ख़्याल है उसे लेखक की इन पंक्तियों से समझा जा सकता है.‘घाटे में रहने वाले रेडियो मालिक अपनी फ्रीक्वेंसीज को बेचकर बाहर हो जाएंगे, जबकि मजबूत और मुनाफ़े में रहने वाले खिलाड़ी इन फ्रीक्वेंसीज पर कब्ज़ा कर लेंगे. बड़े प्लेयर द्वारा छोटे प्लेयरों का यह कब्ज़ा श्रोताओं का विस्तार करेगा और बड़े खिलाड़ियों की विज्ञापनों में  हिस्सेदारी को बढ़ाएगा.’ इससे साफ़ समझा जा सकता है कि आने वाले दिनों में इस क्षेत्र में कैसा ऑनरशिप पैटर्न देखने में आएगा. टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अलावा कई और बड़े मीडिया और कॉरपोरेट हाउस अब थ्री जी स्पेक्ट्रम हथियाने मे लगे हैं. इस सिलसिले में उद्योगपति अनिल अंबानी के बिग एफएम जैसे और भी कई उदाहरण हैं. &lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि सरकार एकाधिकार और क्रॉसमीडिया होल्डिंग के ख़तरों से अनजान है इसलिए उसने दिखावे के लिए कुछ प्रावधान बनाए हैं. लेकिन ये प्रावधान इतने सतही हैं कि इनके होने न होने से बहुत फ़र्क नहीं पड़ता. सूचना और प्रसारण मंत्रालय का कहना है कि तीसरे चरण में राष्ट्रीय स्तर पर एक कंपनी को कुल चैनलों में से सिर्फ़ पंद्रह फ़ीसदी चैनल ही रखने का अधिकार होगा. यह शर्त पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर के चैनलों पर लागू नहीं होगी. कल्पना की जा सकती है कि भारत जैसे विशाल देश में अगर पंद्रह फ़ीसदी रेडियो प्रसारण पर एक ही रेडियो कंपनी का अधिकार होगा तो वह अपने आप में कितना ताक़तवर हो जाएगी. पहले किसी  कंपनी को एक शहर में एक चैनल से ज्यादा में स्वामित्व रखने का अधिकार नहीं था. लेकिन अब एक कंपनी को एक शहर में एक से ज़्यादा चैनल रखने की अनुमति होगी लेकिन उसे इलाक़े के सभी चैनलों के मालिकाने के चालीस फ़ीसदी से ज़्यादा रखने का अधिकार नहीं होगा. यह फ़ैसला एक तरह से खुले आम एकाधिकार का समर्थन करने वाला है. नई नीति के मुताबिक़ पहले के दस सालों के मुक़ाबले अब पंद्रह साल के लिए लाइसेंस दिए जाएंगे. &lt;br /&gt;देश में जनपक्षीय रेडियो की स्थापना के लिए उसके आर्थिक पक्ष के साथ तकनीकी और सामाजिक पक्ष को जोड़कर देखना भी ज़रूरी है. भारत में मुख्यतया दो तरह से रेडियो प्रसारण होता है. पुराना और परंपरागत तरीक़ा एमएम (एम्प्लीफ़ाइड मॉड्यूलेशन) का है. जिसमें शॉर्ट वेव और मीडियम वेव पर प्रसारण होता है. पहुंच के मामले में यह देश के निन्यानबे फ़ीसदी आबादी और नब्बे फ़ीसदी भूभाग को कवर करता है. जब कि एफएम (फ्रीक्वेंसी मॉड्यूलेशन) फिलहाल चालीस फ़ीसदी आबादी और पच्चीस फ़ीसदी भूभाग को कवर करता है. एफएम रेडियो का संचालन हमारे देश में मुख्यतौर पर दो तरह से हो रहा है पहला है व्यावसायिक एफएम रेडियो चैनलों का प्रसारण और दूसरा कम्युनिटी रेडियो चैनलों का प्रसारण. इन दोनों के बीच मुख्य फ़र्क यही है कि पहले का मक़सद जहां विशुद्ध तौर पर मुनाफ़ा कमाना है वहीं कम्युनिटी रेडियो का मक़सद क्षेत्रीय समुदाय के हितों के अनुरूप काम करना है. लेकिन कम्युनिटी रेडियो को हमारे यहां ज़्यादा अधिकार नहीं हैं. इसके साथ ही इसका दायरा भी एफएम रेडियो की तुलना में सीमित है. एफएम रेडियो की पहुंच आम तौर पर साठ से सौ किलोमीटर के बीच होती है, जबकि कम्युनिटी रेडियो का दायरा एफएम के विपरीत पांच-दस किलोमीटर होता है. &lt;br /&gt;रेडियो प्रसारण के क्षेत्र में हुए तकनीकी विकास का फ़ायदा देश के नागरिकों को मिले इसके लिए सबसे बेहतर स्थिति यही होती कि देश का पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग सिस्टम मजबूत होता लेकिन सरकार ऐसा बिल्कुल नहीं चाहती. इसलिए रेडियो के निजीकरण का कदम उठाया जा रहा है. ऐसे हालात में यह ज़रूरी हो जाता है कि पूंजीवादी लोकतंत्र के हिसाब से ही सही, कुछ नियम-कायदों का पालन किया जाए. बड़े-बड़े पूंजीपतियों को देशभर के शहरों में रेडियो चैनल स्थापित करने की इजाज़त विविधता को तो ख़त्म करेगी ही यह छोटे-छोटे रेडियो चैनलों को भी नहीं पनपने देगी. लाइसेंस की बड़ी क़ीमतों की वजह से इसमें छोटे निवेशकों के लिए कोई जगह नहीं बचेगी. बेहतर यह होता कि सरकार स्थानीय तौर पर लाइसेंस का बंटवारा करती और किसी मीडिया घराने को एक से ज़्यादा चैनल खोलने की इजाज़त नहीं देती. इसका एक ख़तरनाक उदाहरण देश की जनता अख़बारों के अनगिनत क्षेत्रीय संस्करणों के रूप में देख चुकी है जहां बड़ी पूंजी वाले अख़बारों के क्षेत्रीय संस्करण स्थानीय संस्कृति का प्रतिनिधत्व करने वाले कई अख़बारों को निगल चुके हैं. एफएम रेडियो के मामले में सरकार पर इसी नीति को न दोहराने का दबाव होना चाहिए. सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि निजी रेडियो में समाचार प्रसारित करने की इजाज़त दे भी दी जाए तो सरकार समाचारों को सिर्फ़ उत्पाद समझकर उनका धंधा न करवाए. वरना उसके लोकतंत्र का तथाकथित चौथा स्तंभ यहां भी सिर्फ मुनाफ़े का ही हिसाब लगाता दिखेगा. &lt;br /&gt;&lt;span style="font-style:italic;"&gt;(समयांतर के अगस्त अंक में प्रकाशित)&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2900056613410233002-5168270498993201994?l=indiancoffeehouse.blogspot.com' alt='' 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ले रहे हैं. ऐसे हालात में मालिकों के मनमानेपन और पैसे की ताक़त के आगे बचे-खुचे पत्रकार संगठन भी अप्रासंगिक नज़र आ रहे हैं. &lt;br /&gt;भारतीय समाचार माध्यमों के विस्तार और अंधाधुंध व्यवसायीकरण ने कई चुनौतियां खड़ी की हैं. बाज़ार की मार की वजह से ख़बरें सनसनी में बदल गईं. प्राइवेट ट्रीटी, मीडिया नेट, क्रॉस मीडिया ऑनरशिप, पेड न्यूज़ और राडिया कांड जैसी बीमारियों ने इसकी विश्वसनीयता को कम किया. देशभर के अख़बारों और पत्रिकाओं के मालिकों का प्रतिनिधित्व करने वाले आईएनएस ने इन घटनाओं पर कभी एक भी शब्द बोलना उचित नहीं समझा. लेकिन जैसे ही कर्मचारियों को न्यायसंगत वेतन देने की बात आई तो उसने वेज बोर्ड के ख़िलाफ़ बेशर्मी से प्रोपेगेंडा करना शुरू कर दिया. जैसे, पत्रकारों और बाक़ी श्रमिकों को अगर अधिकार मिलने लगेंगे तो इससे भारतीय पत्रकारिता का सत्यानाश हो जाएगा! ऐसा करते हुए आईएनएस भूल गया कि वो भारतीय मीडिया उद्योग के विकास के दावे करते नहीं थकता. फ़िक्की-केपीएमजी (2011) की रिपोर्ट भी कहती है भारतीय मीडिया में हर साल चौदह फ़ीसदी की दर से वृद्धि हो रही है. मीडिया ‘उद्योग’ लगातार मुनाफ़े में चल रहा है. &lt;br /&gt;अख़बारों में छपे आईएनएस के विज्ञापन सौ-प्रतिशत झूठ के अलावा और कुछ नहीं हैं. इकोनोमिक टाइम्स में सोलह जून को प्रकाशित एक विज्ञापन कहता है- वेज बोर्ड.... बाइंग लॉयलिटी ऑफ़ जर्नलिस्ट्स (वेज बोर्ड....पत्रकारों के ईमान की ख़रीद ) इस विज्ञापन में  आगे बताया गया है कि वेज बोर्ड एक अलोकतांत्रिक संस्था है जिसका उपयोग सरकार पत्रकारों को अपने पक्ष में करने के लिए कर रही है. इस विज्ञापन में दावा किया गया है कि सरकार अगर पत्रकारों की तनख़्वाह का निर्धारण करने लगेगी तो वे अपने काम को निष्पक्ष तरीक़े से नहीं कर पाएंगे. ये भी सवाल उठाया गया है कि जब रेडियो, टीवी, इंटरनेट या बाक़ी उद्योगों के लिए वेज बोर्ड की सिफ़ारिशें लागू नहीं की जाती हैं तो सिर्फ़ प्रिट मीडिया के लिए ही इन सिफ़ारिशों को क्यों लागू किया जा रहा हैं ?  इस विज्ञापन का मकसद साफ़ है कि जैसे बाक़ी क्षेत्रों में श्रम कानूनों की अनदेखी की जा रही है वैसे ही समाचार मीडिया में भी की जाए. &lt;br /&gt;उन्नीस सौ छप्पन से ही पत्रकारों के लिए वेजबोर्ड बनता रहा है. तब भी बाक़ी क्षेत्रों में (इक्का-दुक्का उदाहरणों को छोड़कर) वेज बोर्ड कभी बन नही पाया. ज़रूरत इस बात की है कि वेज बोर्ड में सभी तरह के पत्रकारों को शामिल किया जाए, चाहे वे टीवी में हों, रेडियो में हों या वेब में. मीडिया ही नहीं बाक़ी क्षेत्रों में भी श्रम का मूल्य निर्धारित किया जाए इसमें ग़लत क्या है? जब पहला वेज बोर्ड बना तो सरकार का यही तर्क था कि अख़बारों में श्रमिक संगठन मज़बूत नहीं हैं इसलिए उनके पास मोलभाव की क्षमता (बार्गेनिंग पावर) नहीं है इसलिए वेज बोर्ड बनाया गया. नेशनल वेज बोर्ड फ़ॉर जर्नलिस्ट एंड अदर न्यूज पेपर एम्पलॉइज के परिचय में यही सारी बातें अब तक लिखी हुई हैं. आज के हालात को अगर देखा जाए तो श्रमिक अधिकारों के मामले में हालत कई गुना बदतर हो चुके हैं. ऐसे में अगर सरकार पर दबाव नहीं रहेगा तो वो निश्चित तौर पर मालिकों के पक्ष में ही फ़ैसला लेगी. &lt;br /&gt;नब्बे के दशक की शुरुआत में उदारीकरण की नीतियां अपनाने के बाद उद्योगपतियों को हर तरह की छूट मिलती रही है और श्रमिक अधिकारों में लगातार कटौती की जाती है. अख़बारों में भी धीरे-धीरे पत्रकार संगठन ख़त्म होते चले गए. मालिकों ने उन्हें एक तरह से अनैतिक घोषित करने का अभियान चलाया और उसमें कामयाबी हासिल की, परिणामस्वरूप मालिकों पर पत्रकारों का कोई दबाव नहीं रहा. ठेके पर भर्तियां शुरू हुई. हायर एंड फ़ायर सिस्टम लागू हो गया. पत्रकारों को हमेशा असुरक्षा में रखा गया ताक़ि वो नौकरी बचाने में जुटे रहें और मालिकों की मनमानी के ख़िलाफ़ न बोल पाएं. आज बड़े-बड़े महानगरों से लेकर छोटे-छोटे शहरों में काम करने वाले पत्रकार जानते हैं कि उनके काम के घंटे और छुट्टियां तक तय नहीं हैं. अधिकार मांगने पर उन्हें सीधे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है. इस वजह से आम तौर पर पत्रकारिता में लंबे समय तक सिर्फ़ वही लोग टिक पाते हैं जो भयानक तरीक़े से मजबूर हैं या फिर चापलूसी में मज़ा लेने लगे हैं. अच्छे और पढ़े-लिखे लोगों का पत्रकारिता में बचे रहना लगातार मुश्किल होता जा रहा है. &lt;br /&gt;टाइम्स ऑफ़ इंडिया जैसा विशालकाय समूह अपने मुनाफ़े के तमाम दावों के बावजूद अपने कर्मचारियों को सही तनख़्वाह देने के पक्ष में नहीं है. इस अख़बार ने वेज बोर्ड की सिफ़ारिशों के ख़िलाफ़ जून महीने के पहले पख़वाड़े में चार लेख छपवाए. मीडिया रिसर्चर वनीता कोहली खांडेकर के मुताबिक़ दो हज़ार आठ में टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह यानी बैनेट एंड कोलमैन कंपनी लिमिटेड (बीसीसीएल) का सालाना टर्नओवर चार हज़ार दो सौ बयासी करोड़ रुपए था. शेयर मार्केट में लिस्टेड कंपनी न होने की वजह से इसके ताज़ा और वास्तविक आंकड़े पाना थोड़ा मुश्किल है. तब इसका शुद्ध मुनाफ़ा एक हज़ार तीन सौ अठाईस करोड़ रुपए था. अख़बार दावा करता है कि उसका मुनाफ़ा साल दर साल बढ़ रहा है. तो क्या इस मुनाफ़े में वहा काम करने वाले श्रमिकों का कोई हक़ नहीं ? ये अख़बार इससे पहले वेज बोर्ड की सिफ़ारिशें मानता रहा है. लेकिन अब पत्रकार संगठन के प्रभावी न होने से इसने भी मनमानी की छूट ले ली है. ये इस बात की बानगीभर है कि लोकतंत्र का तथाकथित चौथा स्तंभ आज पूरी तरह उद्योग में बदल गया है. इसलिए अकूत मुनाफ़ा कमाने के बाद भी वो श्रम बेचने वालों को इतना भी पैसा नहीं देना चाहता कि वे आसानी से अपना घर चला पाएं.&lt;br /&gt;बीस जून को इकोनोमिक टाइम्स में ही दिए एक विज्ञापन में आइएनएस सवाल उठाता है कि कैन योर न्यूज़ पेपर सर्वाइव इफ़ इट इज फोर्स्ड टू पे अप टू फोर्टी फ़ाइव थाउजेंड पर मंथ टू अ पियन एंड फ़िफ्टी थाउजेंड पर मंथ टू अ ड्राइवर? (जब एक चपरासी को पैंतालीस हज़ार और ड्राइवर को पचास हज़ार सालाना तनख़्वाह देने का दबाव होगा तो क्या आपका अख़बार बच पाएगा?) इस तरह के शीर्षक वाला विज्ञापन चालाकी और धूर्तता का जीता-जागता नमूना है. वेज बोर्ड की सिफ़ारिशें अख़बारों में काम करने वाले पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मचारियों के लिए होती हैं. विज्ञापन में चपरासी और ड्राइवर को लेकर विज्ञापनदाताओं की हिकारत साफ़ देखी जा सकती है. विज्ञापन के नीचे बहुत छोटे अक्षरों में लिखा गया है कि यह शर्त सिर्फ़ एक हज़ार करोड़ सालाना के कारोबार वाले अख़बारों पर ही लागू हो सकती है. फिलहाल सिर्फ़ दो ही विज्ञापनों का जिक्र काफ़ी है लेकिन यह जानना ज़रूरी है कि आईएनएस ने इस तरह के विज्ञापनों की पूरी सीरीज प्रकाशित करवाई है, जो हर तरह से वेज बोर्ड को ग़लत ठहराती है. &lt;br /&gt;आइएनएस के विज्ञापनों में चपरासी और ड्राइवर की जिस संभावित तनख़्वाह की बात कर लोगों की सहानुभूति हासिल करने की कोशिश कर रहा है. उसमें मालिकों की कुटिलता भरी हुई है. वे बड़ी संख्या में इस श्रेणी के कर्मचारियों को आउटसोर्स कर रहे हैं. सारे श्रमिक नियमों को ताक पर रखकर उन्हें ढाई से पांच हज़ार रुपए तक ही दिया जाता है. इस तरह निजीकरण की मार सबसे कमज़ोर व्यक्ति पर ही पड़नी है जो हमेशा मालिकों की आंख की किरकिरी बना रहता है. हर कर्मचारी को जॉब सिक्योरिटी के साथ ही उचित वेतन क्यों नहीं मिलना चाहिए? चपरासी और ड्राइवर की तनख़्वाह पैंतालीस और पचास हज़ार तक होने की ‘आशंका’ व्यक्त की जा रही है, पहली बात तो वो टटपुंजिया कंपनियों पर लागू नहीं होना है. दूसरा एक हज़ार करोड़ रुपए सालाना के टर्नओवर वाली कंपनियों में भी उस ख़ास कर्मचारी को सारी सुविधाएं जोड़कर उतना पैसा मिल सकता है जिसने पूरी उम्र अख़बार में बिता दी हो और वो रिटायरमेंट की उम्र में पहुंच चुका हो. &lt;br /&gt;विज्ञापनों के अलावा मालिकों ने अख़बारों में भी वेजबोर्ड को लेकर इकतरफ़ा ख़बरें प्रचारित करनी शुरू की हैं. दो जून को टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सीईओ रवि धारीवाल ने अपने अख़बार में मीडिया पर निशाना (मजलिंग द मीडिया) नाम से एक लेख लिखा. इसमें वे यही बताने की कोशिश करते हैं कि वेज बोर्ड की सिफ़ारिशें गैर संवैधानिक और लोकतंत्र विरोधी हैं. नौ जून को आईएनएस के अध्यक्ष कुंदन व्यास ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया में फ्यूचर ऑफ़ प्रेस एट स्टेक? (क्या प्रेस का भविष्य दांव पर  है?) शीर्षक से एक लेख लिखा. इसमें उन्होंने वेज बोर्ड को प्रेस के भविष्य के लिए ख़तरनाक करार दिया. इंडिया टुडे ग्रुप के सीईओ आशीष बग्गा ने भी इंडिया टुडे में लिखा, हाव टू किल प्रिंट मीडिया? (प्रिंट मीडिया को  कैसे ख़त्म करें?) नाम से लेख लिखा है. वहीं हिंदुस्तान टाइम्स पंद्रह जून को ख़बर लगाता है वेज बोर्ड आउटडेटेड-एक्सपर्ट (वेज बोर्ड बीते जमाने की चीज है-विशेषज्ञ) इन सारी प्रायोजित विचारों को देखकर एक बार फिर इस बात का स्पष्ट पता चलता है कि निजी मीडिया में मालिक का पक्ष  कितना ताक़तवर होता है. वो पूरी कोशिश कर रहा है कि मजीठिया कमेटी की सिफ़ारिशें लागू न होने पाएं. &lt;br /&gt;आनंद बाज़ार पत्रिका समूह की तरफ़ से पहले ही मजीठिया कमेटी की सिफ़ारिशों को चुनौती देने वाली एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दर्ज की गई है. याचिका में वेज बोर्ड को गैर संवैधानिक और ग़ैर क़ानूनी घोषित करने की मांग की गई है. आईएनएस के आक्रामक प्रचार के सामने पत्रकार संगठनों की कार्रवाई बिल्कुल नगण्य लग रही है. इन हालात में वेज बोर्ड की सिफ़ारिशों का लागू होना आसान नहीं है. पत्रकारों और मालिकों की इस लड़ाई में फिलहाल सरकार तमाशबीन की भूमिका में है. अंदरखाने मालिकों के सांठ-गांठ जारी है लेकिन सार्वजनिक तौर पर पत्रकारों का पक्ष लेने का दिखावा भी जारी है. अगर ऐसा नहीं होता तो मुनाफ़े पर टिके मीडिया उद्योग को लेकर अब तक उसने नियमन की ठोस व्यवस्था कर ली होती. निजी मीडिया घराने नियमन की बात पर भी अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ लेते हुए अब तक बच निकलने में कामयाब रहे हैं. यह सवाल उठाने का वक़्त है कि क्या मीडिया मालिकों की मुनाफ़ा कमाने की आज़ादी अभिव्यक्ति की आज़ादी है या पत्रकार के निर्भीक और निष्पक्ष होकर ख़बर दे पाने की बात अभिव्यक्ति की आज़ादी से जुड़ी है? इस पूरी लड़ाई में पत्रकार सबसे बड़ा पक्षकार है लेकिन उदारीकरण के इस दौर में उसके पास अपनी आवाज़ को दमदार तरीक़े से उठाने के सारे फोरम लगभग ख़त्म हो गए हैं. &lt;br /&gt;नेशनल वेज बोर्ड में श्रमजीवी पत्रकारों के साथ मालिकों का भी बराबर का प्रतिनिधित्व है. बोर्ड के कुल दस सदस्यों में से तीन श्रमजीवी पत्रकार तो तीन मालिकों के प्रतिनिधि हैं. बाक़ी चार स्वतंत्र व्यक्ति होते हैं, जिनकी नियुक्ति सरकार पर निर्भर करती है. बोर्ड के बाक़ी सदस्यों का कहना  है कि रिपोर्ट तैयार करने में मालिकों के प्रतिनिधि भी उनके साथ पूरी तरह शामिल थे लेकिन अंतिम वक़्त पर वे धोखा दे गए. &lt;br /&gt;मजीठिया बोर्ड की सिफ़ारिशों से मालिकों की लॉबी सिर्फ़ इसलिए बौखलाई हुई है कि वो श्रमिकों के पक्ष में न्यायसंगत और तार्किक बातें करती है, जिससे पत्रकारों की आत्मनिर्भरता तुलनात्मक रूप से बढ़ सकती है और वे अपनी जिम्मेदारियों को ज़्यादा बेहतर तरीक़े से निभा सकते हैं. अगर ऐसा हो पाया तो वे मालिकों के मनमानेपन पर सवाल उठाने की हिम्मत भी कर सकते हैं. मालिक यही नहीं चाहते. सरकार पर पत्रकारों के पक्ष में वेज बोर्ड बनाने का आरोप लगाने वाले मालिक इस बात को भूल रहे हैं कि उन्होंने पत्रकारों को गुलाम बनाकर रखा है, उन्हें कोई अधिकार देने की उनकी इच्छा नहीं है. मजीठिया बोर्ड के मुताबिक़ पत्रकारों और ग़ैरपत्रकारों के लिए जो सिफ़ारिश की  है. उसके बाद उनकी बेसिक तनख़्वाह में ढाई से तीन गुना तक की बढ़ोतरी हो सकती है. रिटायर होने की उम्र साठ से बढ़कर पैंसठ हो जाएगी. सरकार इन सिफ़ारिशों को मान लेती है तो इऩ्हें आठ जनवरी दो हज़ार आठ से लागू माना जाएगा. एक ठीक-ठाक संस्थान में काम करने वाले पत्रकार को शुरुआती स्तर पर कम से कम नौ हज़ार और वरिष्ठ होने पर कम से कम पचीस हज़ार रुपए मिलेंगे. इसके साथ मकान का किराया और स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं देने का भी प्रावधान है. देखा जाए तो वेज बोर्ड की  सिफ़ारिशें भी पूरी तरह अख़बार के कर्मचारियों के साथ न्याय नहीं करती. उनमें अभी बहुत कुछ और जोड़े जाने की ज़रूरत है लेकिन अख़बार मालिक दी गई मांगों को भी मानने के लिए तैयार नहीं हैं. &lt;br /&gt;ऐसा नहीं कि सरकार श्रमिक नियमों का सख्ती से पालन कराना चाहती है. उदारीकरण के दौर में श्रम नियमों को उसने किस तरह तिलांजलि दी है ये किसी से छिपा नहीं. ये तो उसकी मज़बूरी है कि भारतीय लोकतंत्र में कुछ समाजवादी रुझान वाली चीज़ें संस्थागत रूप ले चुकी हैं जिन से मुंह मोड़ पाना सरकार के लिए अब भी आसान नहीं है. अख़बारों के पत्रकारों और कर्मचारियों के लिए बना वेज बोर्ड उसी श्रेणी में आता है. ये बोर्ड तब अस्तित्व में आया जब बाक़ी संचार माध्यमों का विकास नहीं हुआ था. सरकार की अगर सदइच्छा होती तो वो वक़्त बदलने के साथ टेलीविजन, रेडियो और वेब के भी सारे पत्रकारों और कर्मचारियों को वेज बोर्ड में शामिल कर लेती या सभी क्षेत्रों के श्रमिकों के लिए वेज बोर्ड बना लेती. मतलब साफ़ है कि अतीत से चली आ रही संस्थागत परंपराओं को पूरी तरह त्यागने में सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं इतना वो भी जानती है. ये कुछ ऐसा  ही है जैसे सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कई कंपनियों को निजी हाथों में सौंपने की पूरी इच्छा के बाद भी जन विरोध की वजह से उन्हें वो अब तक निजी हाथों के हवाले नहीं कर पाई है. पत्रकारों और बाक़ी अख़बारी कर्मचारियों के लिए बने वेज बोर्ड की सिफ़ारिशें जिन उलझनों में फंसी है उससे लगता नहीं है कि ये सिफ़ारिशें आसानी से लागू हो पाएंगी. सिर्फ़ पत्रकारों की एकता ही उद्योगपतियों और सरकार से अपने अधिकार छीन सकती है. इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं है. &lt;br /&gt;फिलहाल पत्रकार संगठनों की हालत देखकर लगता नहीं कि वे कोई बड़ी पहल लेने में सक्षम हैं. राष्ट्रीय स्तर पर आज जितने भी संगठन काम कर रहे हैं वे सिर्फ़ कुछ प्रभावशाली लोगों की निजी संस्थाएं बनकर रह गई हैं. उनके नेता अपनी कुर्सी बचाने के लिए ही सालभर जोड़तोड़ में लगे रहते हैं. श्रमजीवी पत्रकारों के हितों से उन्हें ज़्यादा कुछ लेना-देना नहीं है. ट्रेड यूनियन का नाम सिर्फ़ कुछ सरकारी कमेटियों में पहुंचने और विदेश घूमने का माध्यमभर बनकर रह गया है. श्रमिकों की बात करने वाली कम्युनिस्ट और समाजवादी पार्टियों की भी इस दिशा में कोई पहलकदमी नहीं दिखाई देती. कुछ-एक पार्टियों की पत्रकार संगठनों में प्रभावशाली हिस्सेदारी है भी तो वहां भी पार्टीगत संकीर्णता/दंभ और नौकरशाही ज़्यादा हावी है. हर मीडिया घराने/यूनिट में पत्रकार संगठन की अनिवार्य मौज़ूदगी ही मालिकों के बेलगाम फ़ैसलों पर कुछ रोक लगा सकती है. इसके लिए उनका श्रमिक आंदोलनों के राजनीतिक इतिहास से जागरूक होना भी ज़रूरी है. वरना विकल्पहीनता छाई रहेगी!&lt;br /&gt;(समयांतर के जुलाई अंक में प्रकाशित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2900056613410233002-2991650706324445621?l=indiancoffeehouse.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/feeds/2991650706324445621/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2900056613410233002&amp;postID=2991650706324445621&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/2991650706324445621'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/2991650706324445621'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='पत्रकारों के ख़िलाफ़ मालिकों का जेहाद!'/><author><name>bhupen</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05878017724167078478</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://bp2.blogger.com/_hhZqGrtQ7i4/R1Onhpa7xcI/AAAAAAAAAHY/jf-2bBrz7pI/S220/bhupen+1.color'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2900056613410233002.post-3361484718667760235</id><published>2011-07-05T15:27:00.002+05:30</published><updated>2011-07-05T15:33:14.101+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Hem chandra pandy'/><title type='text'>Pro-people Journalism Not Possible Without Ideology</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-m1OWitkSh24/ThLhMLfh-ZI/AAAAAAAAAQQ/LgZsKnWbzSU/s1600/hhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 132px;" src="http://2.bp.blogspot.com/-m1OWitkSh24/ThLhMLfh-ZI/AAAAAAAAAQQ/LgZsKnWbzSU/s200/hhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5625806483898890642" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;em&gt;Let us today pay our homage to Hem Chandra Pandey who has joined the illustrious ranks of media activists starting from John Reed, Edgar Snow, Jack Belden, Harish Mukherjee, Brahmabandob Upadhyaya to Saroj Dutta and various other anonymous conscientious reporters functioning courageously in distant corners of our country!!!”&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;When Sumanta Bannerjee, noted human rights activist and author of book on Naxal history ‘In the wake of Naxalbari’, commented these words on the first death anniversary of Hem Chandra Pandey, people were able to see Hem in a new light. Sumanta was delivering the inaugural talk at the Hem Chandra Pandey Memorial Lecture series in a packed Gandhi Peace Foundation hall, Delhi.&lt;br /&gt;Sumanta drew through worldly examples to show the relation between Journalism and Activism and established that it is imperative for a journalist to be an activist to take up people’s causes and their side. Sumanta also raised the issue of the slow death of trade unions of journalists. He emphasized that journalist unions have to be strong to practice people oriented journalism. He also called for the setting of 3rd Press Commission to discuss today’s news sphere and formulate new policies accordingly.&lt;br /&gt;A number of young journalists, students, professors, writers, artists, filmmakers, human right activists and political workers were present on the occasion. Such a huge presence of left-democratic forces in a metro like Delhi is generally not a common sight. In the cause of Hem people heard the voice and ideas of septuagenarian writer Sumanta Banerjee who was associated with Statesman and Economic and Political Weekly for four decades. Sumanta Bannerjee has been a part of countless fact finding committees on human rights violations and on this occasion reminded that Delhi and other metro based journalists are not as exploited as much as their counterparts in smaller cities and regions. He stressed that the issues of such journalists should also be raised at larger platforms.&lt;br /&gt;On this occasion well know writer and editor of Hans Rajendra Yadav released a book Vichardhara Wala Patrakar: Hem Chandra Pandey (A Journalist with an Ideology: Hem Chandra Pandey) edited by Bhupen Singh. In his brief speech, Rajendra Yadav saluated Hem’s sacrifice and expressed concern at the deteriorating state of the nation.  He said that there is a continued emergency in the country and any one amongst us could be the next Hem. He also raised the question that Marxist ideology is helpful in the fight against injustice, but why does justice loving Marxists also turn repressive when they come to power?&lt;br /&gt;The book release and lecture by Sumanta was followed by a lively discussion. Arundhati Roy, who has always stood up in the fight for justice, said that along with Hem we should also remember Azad as he was killed by the state to stall the peace talks with the Naxals. She compared the state of Indian nation with Pakistan.  She said that India makes a mockery of weak democracy in Pakistan and their consistent military intervention in government, but questions should be raised if the situations are really better in India?   She decried the government policy of militarization in the interest of corporates. She also objected to the malaise of giving poor people’s land to the corporate in the name of development. Her speech lifted the veil over our democracy which actually is a mechanism of repression.&lt;br /&gt;Poet Manglesh Dabral also advocated for pro people ideology in today’s journalism. He said that a thought-less scenario is being created in the era of liberalization that has enabled the ideology of market to fulfill its interests. He said that it is not possible to create a big resistance without bringing all the small and big struggles together. He also said that no conscientious person can remain neutral.&lt;br /&gt;Journalist and poet Neelabh said that India has become a police state. Along with the journalists he also lambasted those writers who are perennially concerned in creating self pleasing writings. Media analyst Anand Pradhan expressed concern that the meaning of Freedom of Press has been hijacked by media owners as their own freedom and license to do what they want. He said that it is not possible to improve the condition of media without having proper journalists unions and organizations.&lt;br /&gt;Filmmaker Sanjay Kak said that we should also try to strategically use mainstream media when we try to establish and strengthen alternative media.  Novelist and editor of Samayantar Pankaj Bisht remembered the times he spent with Hem and said that he was a committed journalist and we need many more like him. Editor of Teesri Duniya Anand Swaroop Verma said that we need to develop alternate information mechanism parallel to the existing mainstream journalism. He said that the leftover journalist union’s selfish and autocratic tendencies are a big obstacle for pro people journalism. Poet and journalist Pankaj Singh also raised the issues and problems facing those journalists who raise their voice for the common people. He gave examples of the number of corporate crimes plaguing the nation.&lt;br /&gt;Hem’s life partner Babita Upreti and brother Rajiv Pandey were also present on the occasion of his first death anniversary. Hem’s friend from student days and like minded journalists have formed Hem Chandra Pandey Memorial Committee. The large gathering at this lecture organized by the committee was a proof that authorities will have to respond to the question why this voice against injustice was silenced. This gathering at the Gandhi Peace Foundation was not like any other sponsored seminar. People who respect the right of voice to dissent were present in large numbers by their own will. Hem Memorial Committee had appealed that your presence is resistance! And that resistance was strongly felt on the 2nd of July.&lt;br /&gt;(Released by Bhupen Singh on behalf of Hem Chandra Pandey Memorial Committee).&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2900056613410233002-3361484718667760235?l=indiancoffeehouse.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/feeds/3361484718667760235/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2900056613410233002&amp;postID=3361484718667760235&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/3361484718667760235'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/3361484718667760235'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/2011/07/pro-people-journalism-not-possible.html' title='Pro-people Journalism Not Possible Without Ideology'/><author><name>bhupen</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05878017724167078478</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://bp2.blogger.com/_hhZqGrtQ7i4/R1Onhpa7xcI/AAAAAAAAAHY/jf-2bBrz7pI/S220/bhupen+1.color'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-m1OWitkSh24/ThLhMLfh-ZI/AAAAAAAAAQQ/LgZsKnWbzSU/s72-c/hhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2900056613410233002.post-8348454971721214428</id><published>2011-05-15T11:01:00.000+05:30</published><updated>2011-05-15T11:02:13.317+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया'/><title type='text'>द हिंदू का परिवारवाद</title><content type='html'>अंग्रेजी दैनिक द हिंदू पारिवारिक कलह की चपेट में है. अख़बार के मालिक और प्रधान संपादक एन राम ने नए संपादक के तौर पर अपने राष्ट्रीय ब्यूरो प्रमुख सिद्धार्थ वर्दराजन का नाम प्रस्तावित किया है, जो राम के चचेरे भाई एन रवि को बिल्कुल भी कबूल नहीं है. रवि आस लगाए बैठे थे कि राम के बाद वे अख़बार के प्रधान संपादक होंगे. ऊपर से देखने में परिवार को छोड़कर किसी पेशेवर व्यक्ति को संपादक बनाने की पहल अख़बार को ज़्यादा लोकतांत्रिक बनाने वाली नज़र आती है लेकिन तथ्यों का विश्लेषण किया जाए तो इसमें साफ़ तौर पर व्यक्तिगत नियंत्रण बरकरार रखने की नीयत काम कर रही है. यह विवाद भारतीय अख़बारों में परिवारवाद और मालिकों द्वारा संपादक पद हथियाने की बानगीभर है. हिंदी समेत कई भाषाई अख़बार भी इस रोग से ग्रस्त हैं.   &lt;br /&gt;हिंदू को आम तौर पर वामपंथी रुझान का गंभीर अख़बार माना जाता है या यूं कहें कि अख़बार ने बाज़ार में अपनी ऐसी छवि बनाई हुई है. लेकिन ताज़ा विवाद इस बात की पोल खोल देता है कि बाज़ार में मालिक कितना ही अच्छा दिखने की कोशिश क्यों न करे उसका पहला लक्ष्य अपने हित साधना ही है. एन राम का कहना है कि वे अख़बार में परिवार के सदस्यों  को संपादकीय ज़िम्मेदारी देने के पक्षधर नहीं है. इसके बदले संपादक की ज़िम्मेदारी किसी पेशेवर पत्रकार को दी जानी चाहिए. ये फ़ैसला हिंदू के निदेशकों की बैठक में लिया गया. बैठक में मौज़ूद बारह लोगों में से सात ने एन राम का समर्थन किया. अब इस संदर्भ में हिंदू के कर्ताधर्ताओं की असाधारण सभा (एक्ट्राऑर्डिनरी जनरल बॉडी मीटिंग) बीस मई को होनी है. जिसमें बहुमत बना तो परिवार के सभी सदस्य अपनी-अपनी संपादकीय ज़िम्मेदारियां छोड़ देंगे. इनमें एन राम के अलावा एन रवि, निर्मला लक्ष्यमणन, के वेणुगोपाल, मालिनी पार्थसारथी जैसे सभी भाई-बहनों को अपने महत्वपूर्ण संपादकीय पद छोड़ने होंगे. जनरल बॉडी मीटिंग में कस्तुरी रंगा आयंगर परिवार के सभी शेयर होल्डर सदस्य मौज़ूद रहेंगे. &lt;br /&gt;एन रवि और समर्थक एन राम और उनके समर्थकों के ख़िलाफ़ खुलकर सामने आ गए हैं. उनका कहना है कि परिवार की एक सौ बत्तीस साल पुरानी परंपरा को राम बदल नहीं सकते. जबकि राम अख़बार के भविष्य के लिए इसे ज़रूरी बताते हैं. वहीं एन रवि और उनके समर्थक आरोप लगा रहे हैं कि एन राम रिटायरमेंट के बाद भी अख़बार पर अपना नियंत्रण रखने के लिए यह चाल चल रहे हैं. रवि ने हिंदू के स्टाफ़ को भेजे गए एक मेल में राम पर यह भी आरोप लगाया कि उन्होंने टू जी स्पेक्ट्रम मामले में गिरफ़्तार पूर्व दूर संचार मंत्री ए राजा से विज्ञापन लेकर उनका साक्षात्कार छापा था. इसके लिए उन्होंने एक ही दिन छपे साक्षात्कार और विज्ञापन का हवाला दिया है. राम को इस बारे में सफ़ाई देने के लिए सार्वजनिक तौर पर सामने आना पड़ा. उनका कहना है कि वो विज्ञापन उस दिन हिंदू समेत कई और अख़बारों में छपा इसलिए उसे पेड न्यूज़ की श्रेणी में किसी तौर पर नहीं रखा जा सकता है. मुनाफ़े पर टिके अख़बारों के कारोबार पर नज़र रखने वाले आसानी से समझ सकते हैं कि राम जिस तरह बचने की कोशिश कर रहे हैं सच्चाई उतनी सीधी है नहीं. द हिंदू के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स में से ही इस तरह का आरोप सामने आता है तो उसकी सच्चाई को झुठलाना इतना आसान नहीं. &lt;br /&gt;एन राम पूरी उम्र द हिंदू के संपादकीय पदों पर काम करते रहे हैं. पिछले साल मई में पैंसठ साल की उम्र होने पर भी वे वक़्त पर रिटायर्ड नहीं हुए. अब पद छोड़ना उनकी मजबूरी है तो वे परिवार के प्रभावशाली लोगों को चुनौती देने के लिए पेशेवर संपादक का शिगूफ़ा छोड़ रहे हैं. एन रवि का आरोप है कि राम अख़बार में ख़ुद का महिमामंडन कराते रहे हैं. सत्ता के गलियारों में उनके रिश्ते जगज़ाहिर हैं, वरना पद्मभूषण किसी पत्रकार को यूं ही नहीं मिल जाता. उन्होंने मालिकाना इख्तियार दिखाते हुए अपनी बेटी विद्या राम को यूरोप संवाददाता बना रखा है. सभी जानते हैं कि एक आम पत्रकार को इतनी महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी  हासिल करने में उम्र बीत जाती है लेकिन एन राम जैसे मालिक आसानी से ख़ुद संपादक बन जाते हैं और अपने रिश्तेदारों को महत्वपूर्ण संपादकीय पदों पर बिठा देते हैं. अगर एन राम इतने ही ईमानदार हैं तो उन्हें अपनी बेटी को भी संपादकीय पद से बाहर करने की बात करनी चाहिए. प्रधान संपादक बनने के लिए एन रवि की छटपटाहट का समर्थन पत्रकारिता के मूल्यों के हिसाब से किसी हालत में नहीं किया जा सकता. लेकिन दोनों भाईयों की आपसी प्रतिद्वंद्विता के चलते जो सच्चाई सामने आ रही है उससे ज़रूर कुछ सबक लिए जा सकते हैं. &lt;br /&gt;मुख्यधारा के भारतीय मीडिया में मालिक और संपादक के बीच धुंधलाती रेखा पत्रकारीय नैतिकता पर कई सवाल खड़े करती है. आज कई टेलीविजन समाचार चैनलों और अख़बारों के मालिक ख़ुद ही संपादक भी बन बैठे हैं. जो हर हाल में पत्रकारीय उसूलों की अनदेखी कर अपने मुनाफ़े के बारे में पहले सोचते हैं. विडम्बना यही है कि ऐसे मालिक ही पत्रकारिता के नाम पर देशभर में जाने जाते हैं. सीएनएनआईबीएऩ, इंडिया टुडे ग्रुप, एनडीटीवी ग्रुप. टेलीग्राफ़ ग्रुप, दैनिक जागरण और नई दुनिया इस बात के जीते-जागते उदाहरण हैं. इसके अलावा  हाल के दौर में कई मीडिया हाउस कुछ पत्रकारों को अपने शेयरों में हिस्सेदारी दे रहे हैं जिस वजह से वो पत्रकारिता के उसूलों से ज़्यादा फ़िक्र कंपनी के मुनाफ़े की करते हैं. यह प्रवृत्ति तब तक ख़त्म नहीं हो सकती जब तक मालिकाने में हिस्सेदार मुनाफ़ाख़ोरों को पत्रकारिता करने से न रोका जाए.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2900056613410233002-8348454971721214428?l=indiancoffeehouse.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/feeds/8348454971721214428/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2900056613410233002&amp;postID=8348454971721214428&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/8348454971721214428'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/8348454971721214428'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/2011/05/blog-post_15.html' title='द हिंदू का परिवारवाद'/><author><name>bhupen</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05878017724167078478</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://bp2.blogger.com/_hhZqGrtQ7i4/R1Onhpa7xcI/AAAAAAAAAHY/jf-2bBrz7pI/S220/bhupen+1.color'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2900056613410233002.post-698431368483617272</id><published>2011-05-15T10:54:00.000+05:30</published><updated>2011-05-15T10:56:14.557+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साम्प्रदायिकता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेख'/><title type='text'>कैसे ख़त्म होगी साम्प्रदायिकता?</title><content type='html'>साम्प्रदायिकता से कैसे निपटा जाए यह बहस फ़िर गर्म है. कई उतार-चढ़ावों के बाद सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार समिति ने साम्प्रदायिक हिंसा विरोधी विधेयक का मसौदा तैयार कर लिया है. फिलहाल इस पर सरकार का रुख साफ़ नहीं है लेकिन मसौदा समिति के सदस्यों को उम्मीद है कि यह विधेयक ज़रूर पास होगा. अगर यह विधेयक अपने मूल स्वरूप में पास हो जाता है तो इसके आधार पर दंगे वाले इलाक़े के अधिकारी भी सज़ा के हक़दार होंगे. राज्य भी अपनी ज़िम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ पाएगा और दंगा कराने वाले नेताओं पर भी शिकंजा कसा जा सकेगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो हज़ार पांच में पहली बार साम्प्रदायिक हिंसा विरोधी विधेयक का मसौदा तैयार किया गया था. तब इसकी ख़ामियों को लेकर सामाजिक संगठनों ने काफ़ी आलोचना की थी. उसमें राज्य की साम्प्रदायिक भूमिका का ज़िक्र नही था. दंगों के दौरान होने वाली यौन हिंसा को सिर्फ़ यौन अपराध के तौर पर ही देखा गया था. पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों पर भी सवाल उठाने की कोई गुंजाइश नहीं थी. लेकिन नए विधेयक में इन सारे मुद्दों पर विचार किया गया है. इस मसौदे पर दो हज़ार पांच से ही काम हो रहा था लेकिन दो हज़ार दस में नए लोगों को इसकी ज़िम्मेदारी दी गई. राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य हर्ष मंदर और फ़राह नक़वी को इसका संयोजक बनाया गया और गोपाल सुब्रह्मण्यम, माजा दारूवाला, नजम बाज़िरी, पीआई जोस, तीस्ता सीतलवाड़, उषा रानाथन और वृंदा ग्रोवर की सात सदस्यीय मसौदा कमेटी बनायी गई. इस कमेटी ने पुराने मसौदे में अस्सी बदलाव कर उसका कायापलट कर दिया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस विधेयक को पहले के मुक़ाबले ज़्यादा व्यापक बनाया गया है. अब इसमें साम्प्रदायिकता के साथ ही हर तरह की समूहगत हिंसा (सेक्टेरियन वॉयलेंस) को भी जोड़ दिया गया है. इसलिए इसका नाम बदलकर प्रिवेंशन ऑफ़ कम्युनल एंड टारगेटेड वॉयलेंस (एक्सेस टू जस्टिस एंड रेपरेशन) बिल हो गया है. अब इसमें अनुसूचित जाति और जनजातियों के अलावा धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों पर होने वाले हमलों को भी ध्यान में रखा गया है. भाषाई अल्पसंख्यकों को ध्यान में रखने का एक संदर्भ मुंबई में राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस द्वारा बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों को निशाना बनाया जाना है. साम्प्रदायिक और सामूहिक हिंसा में धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र और दूसरी पहचानों के आधार पर की जाने वाली हिंसा को शामिल किया गया है.&lt;br /&gt;इसके लागू होने पर राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर बनी साम्प्रदायिक हिंसा विरोधी संस्था में पीड़ित व्यक्ति न्याय की गुहार लगा सकते हैं. लोगों को हिंसा से बचाने की पूरी ज़िम्मेदारी राज्य की होगी. हिंसा के दायरे में सामाजिक बहिष्कार और जबरन विस्थापन को भी शामिल किया गया है. इस केंद्रीय संस्था मे पीड़ितों के राहत, पुनर्वास और क्षतिपूर्ति के लिए सिफ़ारश करेगी. इसका प्रस्तावित नाम नेशनल अथॉरिटी फ़ॉर कम्युनल हार्मनी, जस्टिस एंड रेपरेशन प्रस्तावित किया गया है. इसके सात सदस्य होंगे. एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष होगा. चार सदस्य महिलाएं होंगी. अथॉरिटी के सात में से चार सदस्य उन समूहों से लिए जाएंगे विधेयक में जिनकी सुरक्षा की बात की गई है. सदस्यों का चयन करने के लिए एक पैनल की सिफ़ारिश की गई है. इसमें प्रधानमंत्री, नेता विपक्ष, गृह मंत्री और राष्ट्रीय पार्टियों के प्रतिनिधि होंगे . &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मसौदा समिति के सदस्यों का कहना है कि अथॉरिटी वर्तमान न्याय प्रणाली की जगह लेने के बजाय सलाहकार की ही भूमिका में रहेगी. जो संघीय ढांचे का पूरा सम्मान करेगी. लेकिन इसके लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से ज़्यादा अधिकारों की वकालत की गई है. क्योंकि गुजरात दंगों के वक़्त गुजरात सरकार ने आयोग की सलाह मानने से इनकार कर दिया था और आयोग इस मामले में कुछ नहीं कर पाया. साम्प्रदायिक हिंसा विरोधी मसौदे के मुताबिक़ हिंसा से निपटने के लिए राज्य को मजबूत करने वाली अवधारणा की बजाय इसमें सरकार की ज़िम्मेदारी तय की गई है. इसके अलावा पीड़ितों और गवाहों की सुरक्षा के लिए कानूनी तौर पर विशेष प्रावधान करने की वकालत की गई है. सरकारी अधिकारियों के साथ ही नेताओं पर भी इस मसौदे में शिकंजा कसने का प्रावधान है. न्याय प्रक्रिया को ज़्यादा पारदर्शी बनाने के लिए हर ट्रायल की वीडियोग्राफ़ी की जाएगी. दंगे में मारे गए व्यक्ति की संबंधित राज्य की सरकार पंद्रह लाख रुपए देगी. हर तीन साल में इसका मूल्यांकन किया जाएगा. फिलहाल इस मसौदे पर विशेषज्ञों और जनता से राय ली जा रही है. इसे राष्ट्रीय सलाहकार समिति की वेबसाइट में डाला जाना है. सभी पक्षों की राय आने के बाद इसे प्रधानमंत्री के पास भेजा जाएगा.&lt;br /&gt;इस मसौदे की पृष्ठभूमि में उन्नीस चौ चौरासी के सिख विरोधी दंगों, दो हज़ार दो के गुजरात दंगों और दो हज़ार आठ के कंधमाल दंगों की प्रकृति को ख़ास तौर पर ध्यान में रखा गया है. मसौदा राष्ट्रीय सलाहकार समिति के बाद अब गेंद सरकार के पाले में जाने के लिए तैयार है. मसौदे का भविष्य सरकार के हाथों में है. अगर इसमें बहुत ज़्यादा फ़ेर-बदल नहीं किए गए तो यह कानून साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने में काफ़ी मददगार साबित हो सकता है. गौरतलब है कि इसका इस्तेमाल पुराने  दंगों के दोषियों पर शिकंजा कसने के लिए भी किया जा सकता है. ऐसे हालात में दंगों की राजनीति करने वाले कांग्रेस और बीजेपी जैसे दल इस मसौदे को लेकर क्या रुख अपनाएंगे यह जल्द ही साफ़ हो जाएगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि इस विधेयक के कानून बन जाने के बाद साम्प्रदायिक हिंसा पर पूरी तरह लगाम लग जाएगी. इसके लिए ज़रूरत इस बात की है कि देश में साम्प्रदायिक हिंसा की मूल जड़ों को पहचाना जाए. शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी असली मुद्दों से ध्यान हटाने वाली अस्मिता की राजनीति को जब तक  हवा दी जाती रहेगी तब तक इस तरह की हिंसा को पूरी तरह रोक पाना संभव नहीं होगा. देश में धर्मनिरपेक्षता की असली अवधारणा से पीछा छुड़ाकर जब तक राज्य के कामों में धर्म का दोहन किया जाता रहेगा तब तक साम्प्रदायिकता को ख़त्म करना खाम ख्य़ाली होगी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2900056613410233002-698431368483617272?l=indiancoffeehouse.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/feeds/698431368483617272/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2900056613410233002&amp;postID=698431368483617272&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/698431368483617272'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/698431368483617272'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='कैसे ख़त्म होगी साम्प्रदायिकता?'/><author><name>bhupen</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05878017724167078478</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://bp2.blogger.com/_hhZqGrtQ7i4/R1Onhpa7xcI/AAAAAAAAAHY/jf-2bBrz7pI/S220/bhupen+1.color'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2900056613410233002.post-2195532354325739435</id><published>2011-04-18T19:07:00.004+05:30</published><updated>2011-04-19T10:55:48.034+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेख'/><title type='text'>उदारवादी लोकतंत्र में अतिवादी तर्क</title><content type='html'>भारतीय लोकतंत्र में कई अतिवादी विचार और आंदोलन सक्रिय हैं. इनकी मौज़ूदगी न होती तो शायद वर्षों से अनसुनी पीड़ित समुदाय की आवाज़ें कभी सुनी नहीं जातीं. इस लिहाज़ से इन अतिवादी तर्कों ने तमाम सीमाओं के बावजूद यथास्थिति को तोड़ने का काम किया है. हाशिए के समुदायों को एक जुबान दी है. ये आंदोलन सत्ताधारी वर्ग और मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों को परेशान करते हैं. लेकिन उदारवादी लोकतंत्र तरह-तरह के राष्ट्रवादी, जातिवादी, धार्मिक और वामपंथी विचारों के कटघरे में खड़ा है. अस्मिता और विकास संबंधी मुद्दे अपने चरमपंथी तर्कों के साथ सामने हैं. जिन्होंने आभासी संतुलन पर चलने वाली व्यवस्था के सामने कई चुनौतियां खड़ी की हैं. इस तरह अतियों की अनदेखी करना अब संभव नहीं रह गया है.  &lt;br /&gt;दक्षिण एशिया के इस भूभाग में कश्मीर और उत्तर पूर्व के राज्य राष्ट्रीयता के आंदोलनों की जद में हैं. आत्मनिर्णय का अधिकार पाने के लिए वे हर रास्ता चुनने पर उतारू हैं. भारतीय राष्ट्र-राज्य के साथ उनका रिश्ता द्वंद्वों से भरा है. मुख्यधारा के मीडिया में अक्सर अलगाववादी आंदोलन के तौर पर उनकी पहचान की जाती है. इसी तरह बहुसंख्यक हिंदू धर्म के भीतर अति दलितवादी, ब्राह्मणवाद के सामने नई चुनौती पेश कर रहे हैं. वे पूरी दुनिया को दलितवाद के चश्मे से देखकर भारतीय राजनीति को अपनी आवाज़ सुनने के लिए मजबूर कर रहे हैं. धार्मिक अल्पसंख्यक अपमान झेलकर प्रतिशोध के रास्ते पर हैं तो बहुसंख्यक कट्टरपंथी भी बम और नफ़रत का नया दर्शन लेकर आए हैं. इसी तरह और भी कई तरह की अतिवादी गतिविधियां देश के अलग-अलग इलाक़ों में चल रही हैं. &lt;br /&gt;इन सभी हलचलों से अलग एक और अतिवादी आंदोलन देश में चल रहा है. वो है बराबरी पर आधारित समाज की बात करने वाला हथियारबंद नक्सली आंदोलन. इस आंदोलन का ऊपर वर्णित सभी आंदोलनों से मूलभूत फ़र्क है. बाक़ी सभी आंदोलन जहां पहचान की भावनात्मक राजनीति पर टिके हैं वहीं यह अतिवामपंथी आंदोलन राजनीतिक-आर्थिक बदलाव के दर्शन के साथ सामने है. अस्मिता या पहचान की राजनीति की सीमा हमेशा यह होती है कि वो अपने समूह के स्वार्थों से ऊपर नहीं सोच पाता. सम्पूर्ण  समाज के विकास और बराबरी के सपने की अनदेखी करता है. लेकिन वामपंथी अतिवाद हमेशा शोषणविहीन समाज की वकालत करता है. बाक़ी कोई भी अतिवादी आंदोलन इतने बृहद परिप्रेक्ष्य और उद्देश्यों के साथ सामने नहीं आता है. सत्ता कई बार इसे आंतकवादी करार देती है. लेकिन इस सवाल की विवेचना ज़रूरी है कि नक्सली अमीरों के तंत्र के लिए आतंक हैं या गरीब जनता के लिए ? हिंसा की वकालत की वजह से इसकी आलोचना होती है. लेकिन बंदूकों की आवाज़ सुनकर सरकारें उनके आधार इलाक़ों में विकास की बात करने लगी हैं. वहां के आदिवासियों की फ़िक्र अचानक उसे सताने लगी है. इस तरह अतिवादी तर्क से कई बार उपेक्षित समुदायों के विकास का मुद्दा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ जाता है. जनता के बजाय हथियारों पर अतिनिर्भरता और अराजकता को इस आंदोलन की कमज़ोरी के तौर पर चिन्हित किया जाता है. &lt;br /&gt;पूंजीवादी लोकतंत्र पर भरोसा करने वाला कोई भी नेता और बुद्धिजीवी इन सभी अतियों का समर्थन नहीं करेगा. लेकिन वर्तमान लोकतंत्र की सीमाओं को पहचानने की कोशिश करने वाले ज़रूर इसकी पड़ताल करेंगे कि आख़िर अतिवादी नज़रिए हमारे समाज में कहां से आए. उनके पीछे कौन-कौन से कारण महत्वपूर्ण हैं. हमारी अर्थनीति ने ऐसे हालात पैदा करने में क्या भूमिका निभाई है. राजनीतिक दलों का व्यवहार इनके लिए कितना जिम्मेदार है. लोकतंत्र के उदारवादी मॉडल में कहां-कहां पर गड़बड़ी हैं. इसलिए इस संदर्भ में कोई राय बनाने से पहले अतियों के तर्क सुनना और उनकी सीमाओं और संभावनाओं पर बात करना जरूरी है. &lt;br /&gt;अतिवादी आंदोलनों की चर्चा करते हुए इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती है कि देश के सभी हिस्सों को विकास का बराबर अधिकार क्यों नहीं मिला ? एक लोकतंत्र के तौर पर भारत का विकास कुछ केंद्रों और वर्गों तक सीमित क्यों है ? ऐसे में कोई इलाक़ा उपेक्षा से तंग आकर अलगाववादी रास्ता अपना ले तो इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है ? वहां के लोग या उनकी उपेक्षा करने वाला सत्ताधारी वर्ग ? यह बात सच है कि राष्ट्रवादी आंदोलनों की सीमाएं छिपी नहीं हैं. भारत से तथाकथित आज़ादी हासिल कर वे किस तरह का राष्ट्र बनना चाहते हैं यह अपने-आप में गहरा सवाल है. इनमें से ज़्यादातर आंदोलनों के अगुवा नए राष्ट्र में उदारवादी लोकतंत्र से भी नीचे गिरकर धार्मिक राष्ट्र बनाने का विचार रखते हैं. आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करने के बावजूद आधुनिक मूल्यों का समर्थक कोई भी व्यक्ति इस प्रतिगामी विचार का समर्थन नहीं कर सकता. इतना ज़रूर है कि इन सभी सीमाओं के बावजूद ये आंदोलन सामुदायिक उपेक्षा की बात उठाने में कामयाब हैं. &lt;br /&gt;ठीक इसी तरह दलित-पिछड़े अगर अपनी आवाज़ उठाते हैं और उनके तर्क जातिवाद के कोढ़ की तरफ़ इशारा करते हैं तो इसमें ग़लत क्या है ? हां, यह सही है कि ब्राह्मणवाद का विकल्प सिर्फ़ एक समूह के स्वार्थ पर टिका संकीर्ण दलितवाद नहीं हो सकता है. लेकिन इतना तय है कि उपेक्षित जातियों का चरमपंथ पूर्वाग्रहों से जुड़ी कई अन्यायपूर्ण बातों को मानने से इनकार करता है. राजनीतिक गोलबंदी नहीं हुई होती तो क्या भारतीय लोकतंत्र हाशिए की उन आवाज़ों को सुनता ? लेकिन सिर्फ़ आरक्षण और कुछ छोटी-मोटी रियायतें पाकर बराबरी हासिल करने की मृगमरीचिका इसकी सीमाओं का इज़हार करती है. आख़िरकार इनकी राजनीति कहीं न कहीं इसी व्यव्सथा में फिट होने की राजनीति में बदल जाती है. अस्मिता की राजनीति पर टिका गुस्सा जोड़-तोड़ की राजनीति करने वाली धूर्तता में बदल जाता है. जातिविहीन समाज कैसे बनेगा यह ख़ुद इसके प्रवक्ताओं की चिंता में नहीं दिखाई देता है. &lt;br /&gt;देश में जिस तरह साम्प्रदायिक राजनीति चली है उसने बड़े पैमाने पर लोगों को  विभाजित करने का काम किया है. इसकी शुरुआत आज़ादी के आंदोलन के दौरान से ही देखी जा सकती है. थोड़ा सा विचार  करने पर साफ़ हो जाता है कि तब भी सत्ता की राजनीति के लिए हिंदू-मुस्लिम का मामला भड़काया गया और आज तक वो मामला बदस्तूर जारी है. राज्य के कामों में धर्मनिरपेक्षता की असली अवधारणा सर्वधर्म वर्जयते को लागू करने की जगह यहां सर्वधर्म समभाव को शगूफा छोड़ा गया. लेकिन पर्दे के पीछे हमेशा बहुसंख्यकवाद हावी रहा. आज भी हिंदू कर्मकांडों को राष्ट्रीय ज़रूरतों की तरह निभाया जाता है. किसी सरकारी समारोह में नारियल तोड़ना, दीप जलाना और सरस्वती पूजा करना इसके ठोस उदाहरण हैं. अलग-अलग राजनीतिक दल साम्प्रदायिक राजनीति करते रहे. वोट हासिल करने के लिए धार्मिक पहचानों का निरंतर दोहन किया गया. इस तरह  बहुसंख्यक साम्प्रदायिक राजनीति ने अल्पसंख्यकों को और ज़्यादा अलगाव में डाल दिया. दिल्ली में सिखों, गुजरात में मुसलमानों और कंधमाल में इसाईयों का ‘लोकतांत्रिक’ संहार देश देख चुका है. इस तरह की घटनाओं से अगर अल्पसंख्यक समुदायों के मन में आक्रोश पनपता है तो दोषी कौन है? क्या हमारे लोकतंत्र के पास उनके घावों पर लगाने के लिए कोई मलहम है ? यह बात सच है कि प्रतिक्रिया पर टिके अल्पसंख्यकों के आक्रोश की सीमा अपने आप में जाहिर है. यह किसी सामाजिक बदलाव की जगह प्रतिशोध की भावना पर टिका होता है. इसलिए इससे सुंदर भविष्य की कोई भी आशा करना बेमानी  है. लेकिन अल्पसंख्यकों का उग्रवाद की दिशा में जाना ज़रूर यह सवाल उठाता है कि देश में सबकुछ बहुत ठीक नहीं चल रहा है. वे बेवजह विध्वंश के रास्ते पर नहीं उतरे हैं. इसकी जड़ें धर्मनिरपेता के ढोंग में छिपी हैं. इसका दूसरा पहलू हाल के वर्षों में हिंदू आतंकवाद के तौर पर भी देखने को मिला है. धार्मिक कट्टरपंथ को राजनीतिक संरक्षण देना कितना ख़तरनाक हो सकता है यह इस बात का जीता जागता नमूना है. जब तक लोकतांत्रिक राजनीति में धर्म को अहमियत दी जाती रहेगी तब तक ऐसे विध्वंशक धार्मिक आतंकवाद से बचना मुश्किल है. इस तरह देखा जाए तो अस्मिता से जुड़े हर अतिवाद की परिणति तर्क को प्राथमिकता देने के बजाय हमेशा उन्माद को बढ़ावा देने में होती है. अस्मिता से जुड़े आंदोलनों में नारीवाद और लैंगिकता से जुड़े कई और आंदोलन भी शामिल हैं. उपेक्षा के शिकार समुदायों की तरफ़ से यहां भी अतिवादी ध्वनियां सुनाई पड़ती हैं. जो बाक़ी अतियों की तरह ही अपना राजनीतिक तर्क सामने लाती हैं. &lt;br /&gt;सभी स्थितियों में एक बात सामान्य है कि पूंजी के खेल पर टिका लोकतंत्र जब समाज में चलने वाली उत्पीड़न की प्रक्रियाओं की अनदेखी करता है तो प्रतिकार के तौर पर अतिवादी आवाज़ें उठनी शुरू हो जाती हैं. जो सत्ता और प्रभुत्व के ख़िलाफ़ एक चुनौती खड़ा करती हैं. उदार लोकतंत्र के खोखलेपन से पर्दा उठाती हैं और अनसुनी आवाज़ों को सुनने के लिए पूरी दुनिया को मजबूर करती हैं. हम धार्मिक तौर पर बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों तरह के आतंकवाद देख चुके हैं. पहचान  की राजनीति यहां अल्संख्यकों के शोषण की कहानी सामने लाती है तो पहले से ही विशेषाधिकार प्राप्त बहुसंख्यकों का चरमपंथ अपने लिए और सुविधाएं चाहता है. वो अपने राष्ट्र में अल्पसंख्यकों के अस्तित्व को स्वीकार करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं होता है. देश में मुसलमानों और हिंदुओं के आतंकवाद की तरफ़ मुड़ने को इस परिप्रेक्ष्य में समझा जा सकता है. दोनों ही तरह का अतिवाद समाज को कभी बेहतर दिशा में नहीं पहुंचा सकता. इनका अंत अनिवार्य शुरू से विध्वंश में ही होता है. कुल मिलाकर इस तरह की घटनाएं धर्म पर टिकी राजनीति के ख़तरों को हमारे सामने रखती हैं. ठीक यही बात कमोबेश पहचान की राजनीति से जुड़े बाक़ी अतिवादी आंदोलनों में भी देखी जा सकती है. अस्मिता की राजनीति के सामने हमेशा एक ऐसा दुश्मन होता है जिसे ख़त्म करना उसके लिए संभव नहीं है. जैसे दलित जन्म के आधार पर पैदा ब्राह्मण को ख़त्म नहीं कर सकते. स्त्रियां, पुरुषों को ख़त्म नहीं कर सकतीं. हिंदू, मुसलमानों को ख़त्म नहीं कर सकते. न ही ये समुदाय तथाकथित दुश्मन को हमेशा के लिए अपने अधीन रख सकते हैं. ऐसा फासीवादी विचार रखने पर बराबरी पर आधारित समाज का सपना देखा ही नहीं जा सकता. इसलिए बदलाव चाहने वालों को हर हाल में उन्हीं हथियारों को इस्तेमाल करना पड़ेगा जो आर्थिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थितियों में बदलाव लाते हैं. &lt;br /&gt;उदारवादी लोकतंत्र पर आंख मूंदकर भरोसा करने वाले बुद्धिजीवी कहते हैं कि हर किसी को अपनी बात कहने का अधिकार है लेकिन उसके लिए अतिवादी रास्ता ठीक नहीं है. इस सिलसिले में यह याद करना ज़रूरी है कि बिना अतिवादी रास्ता अपनाए क्या कभी हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं के कान में जूं रेंगती है? आज़ादी के इतने सालों बाद  भी देश से ग़ैरबराबरी, भ्रष्टाचार, जातिवाद, संम्प्रदायवाद क्यों नहीं मिटा ? इसके लिए हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएं और विकास का मॉडल ज़िम्मेदार नहीं तो और कौन ज़िम्मेदार है ? यहीं से अतियों के अपने तर्क और कुतर्क आकार ग्रहण करते हैं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2900056613410233002-2195532354325739435?l=indiancoffeehouse.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/feeds/2195532354325739435/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2900056613410233002&amp;postID=2195532354325739435&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/2195532354325739435'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/2195532354325739435'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/2011/04/blog-post_18.html' title='उदारवादी लोकतंत्र में अतिवादी तर्क'/><author><name>bhupen</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05878017724167078478</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://bp2.blogger.com/_hhZqGrtQ7i4/R1Onhpa7xcI/AAAAAAAAAHY/jf-2bBrz7pI/S220/bhupen+1.color'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2900056613410233002.post-5253917922610129505</id><published>2011-04-05T16:02:00.005+05:30</published><updated>2011-04-16T18:51:25.260+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शोध पत्र'/><title type='text'>मीडिया रेग्युलेशन से कौन डरता है?</title><content type='html'>देश में आर्थिक उदारीकरण की हवा चलने के बाद बाज़ारवाद बहुत हावी हो गया है. इसने भारतीय मीडिया संगठनों के गुणसूत्रों (डीएनए) को बदल कर रख दिया है.&lt;br /&gt;-हामिद अंसारी, उपराष्ट्रपति, भारत  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश के उपराष्ट्रपति का ये बयान कई मायने में चौंकाने वाला है. ये वक्तव्य पेड न्यूज़ पर राज्य सभा में चल रही बहस के दौरान सामने आया. इससे निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उन्नीस सौ इक्यानबे में अपनाई गई नई आर्थिक नीतियों का असर बड़े पैमाने पर हमारे समाचार माध्यमों पर भी पड़ा है. इस बात को मीडिया स्कॉलर ही नहीं बल्कि सत्ता पक्ष से जुड़े लोग भी मानते हैं. &lt;br /&gt;भारत में मीडिया का सही आंकलन और उसे संयमित करने का कोई ठोस रास्ता हमारे पास नहीं है. पिछले दो दशक में यहां मीडिया का असीम विस्तार हुआ है . जिसने न्यूज़ मीडिया के परिदृश्य को इस तरह बदला है कि अब वो सामाजिक सरोकारों से पीछा छुड़ाता हुआ पूरी तरह मुनाफ़ा कमाने की दौड़ में शामिल है. पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग जैसी इक्का-दुक्का अवधारणाएं सरकारी मनमानी की वजह से बेमानी बन गई हैं. निजी मीडिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में अराजकता की सारी सीमाएं लांघता जा रहा है. कुल मिलाकर आज़ादी के बाद जिस तरह के राजनीतिक और आर्थिक हालात भारत में बनते रहे हमारे समाचार माध्यम भी वैसे ही बदलते रहे.  &lt;br /&gt;मुक्त बाज़ार की दौड़ में शामिल इस महादेश के सामाजिक जीवन में आज बड़ी पूंजी और कॉरपोरेट का हस्तक्षेप हर तरफ़ देखा जा सकता है. ऐसे में मीडिया के नियमन की बहस को कॉरपोरेट्स के पैरोकार किस दिशा में मोड़ेंगे इस पर नज़र रखना ज़रूरी है. वे इस बहस को विषयवस्तु यानी कॉन्टेंट के नियमन तक सीमित करने की कोशिश करते हैं. लेकिन जब तक कॉन्टेंट के साथ मीडिया के मालिकाने और उससे जुड़े कारोबारी हितों के बारे में बात नहीं होगी तब तक कॉरपोरेट मीडिया की असलीयत सामने ऩहीं आ पाएगी.  &lt;br /&gt;बुर्जुआ लोकतंत्र ने दुनिया को फ्री प्रेस की अवधारणा दी. लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कह कर प्रेस का गुणगान किया. इस ख़ूबसूरत शब्द से भ्रमित होने की बजाय ‘फ्री प्रेस’ के निहितार्थों को समझना ज़रूरी है. मीडिया की स्वतंत्रता आख़िर है किसके लिए, ये सवाल कम महत्वपूर्ण नहीं है . जिस तरह बुर्जुआ लोकतंत्र का पहला, दूसरा और तीसरा स्तंभ संरचनात्मक तौर पर अमीरों के पक्ष में झुका रहता है वैसे ही तथाकथित चौथे स्तंभ का हाल भी कुछ अलग नहीं है. वैसे भी विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की जैसी भूमिका पूंजीवादी लोकतंत्र में है, वैसी संवैधानिक भूमिका प्रेस की नहीं है.  प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ सिर्फ़ प्रतीकात्मक तौर पर ही कहा जाता है. इस ‘प्रतीकात्मकता’ की वजह से ही मुख्य धारा का समाचार मीडिया अपने लिए ग़लत तरीक़े से कई छूट हासिल करता रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सनसनी को नैतिक बनाने का धंधा  &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;भारतीय संविधान की धारा 19 (1)(a) अपने हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देती है. हमारे यहां पर प्रेस के लिए अलग से कोई कानून नहीं है. इसी धारा के तहत प्रेस की आज़ादी की भी व्याख्या की गई है.  असहमति की आवाज़ रखने वालों के लिए इस अधिकार को पाना कितना मुश्किल है ये बात किसी से छिपी नहीं है. लेकिन इस संवैधानिक धारा की आड़ में मुनाफ़ाखोर मीडिया घराने ख़ुद को हर-क़ायदे क़ानून से ऊपर रखना चाहते हैं. पत्रकारीय नीतिशास्त्र के ज़्यादातर तर्क पश्चिमी पूंजीवाद की कोख से निकले हैं. भारत और तीसरी दुनिया के परिप्रेक्ष में इनके मायनों पर भी सवाल उठते रहे हैं. मसलन दुनियाभर के पत्रकारों को सिखाया जाता है कि जब कोई कुत्ता इंसान को काटता है तो वो ख़बर नहीं है, लेकिन जब इंसान किसी कुत्ते को काटे तो उसमें ख़बर है. ये उद्धवरण, ख़बर में आम घटना से हटकर कुछ चौंकाने वाले तत्वों की मौज़ूदगी को ज़रूरी बनाता है. इसका चरम ख़बरों में सनसनी को सही ठहराने की कोशिश है. रूढ़ हो चुकी इस उद्धवरण की कई विद्वानों ने आलोचना की है. उनमें से शेल्टन गुनारांटे  और कुंडा दीक्षित  का नाम महत्वपूर्ण हैं. &lt;br /&gt;परंपरागत पत्रकारिता के मुताबिक़ ख़बर में संतुलन (Balance), सहमति (Consensus), निष्पक्षता (Impartiality), वस्तुनिष्ठता (Objectivity) और मूल्य तटस्थता (Value neutrality) जैसे पांच मशहूर तत्वों का होना ज़रूरी है. इसके अलावा न्यूज़ वैल्यू तय करने में समीपता, तात्कालिकता, द्वंद्व, रहस्य, उत्सुकता और नवीनता जैसी मान्यताओं को भी अहमीयत दी जाती है. लेकिन ये नहीं भूला जा सकता कि ख़बर सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों के प्रभाव में ही बनती-बिगड़ती और प्रस्तुत होती है. उसकी कोई निरपेक्ष परिभाषा नहीं होती. ताक़तवर लोगों ने ख़बर बनाने का उपरोक्त फ़ार्मूला इज़ाद किया है. फ़ार्मूला विरोधी लोग इसका विरोध करते हैं. वे ख़बर लिखने की उल्टा पिरामिड शैली (सबसे महत्वपूर्ण घटना पहले फिर क्रम के हिसाब से घटनाओं का ब्यौरा देना) का भी विरोध करते हैं. उनके मुताबिक़ प्रसंग के साथ आने वाली निबंधात्मक और विश्लेषणात्मक ख़बरों को ज़्यादा अहमियत दी जानी चाहिए . &lt;br /&gt;उपरोक्त आलोचना, ख़बरों की नई परिभाषा तलाशने पर ज़ोर देती है. रूढ़ मान्यताओं को तोड़ती है. अगर मीडिया आलोचना के क्षेत्र में तरक्की होती रही तो आने वाले दिनों में ख़बरों को नई परिभाषा सामने आ सकती है. जो निश्चित तौर ख़बरों के बनने और प्रसारित होने की बनी-बनाई व्यवस्था को चुनौती देने वाली होगी. तभी ख़बरों में सनसनी की स्वीकारोक्ति  को भी चुनौती दी जा सकती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सब मालिक की मर्जी क्यों है ?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जिस तरह से समाचार माध्यमों ने फूहड़ता परोसनी शुरू की है. उस पर लगाम लगाने की मांग सामने आती रही है. इस संदर्भ में ये एक महत्वपूर्ण सवाल है कि आख़िर मीडिया की विषयवस्तु कैसे लोगों तक पहुंचती है. अख़बार में कौन सी ख़बर छपेगी, न्यूज़ चैनल में कौन-सा कार्यक्रम दिखेगा ये कैसे तय होता है ? कुछ लोग तर्क देते हैं कि पत्रकारों के लिए कुछ दिशा-निर्देश बना दिए जाएं तो सब ठीक हो जाएगा. ये बात कुछ हद तक सही हो सकती है लेकिन इसी को एकमात्र रास्ता मानना ग़लत है. दरअसल निजी मीडिया का पूरा कारोबार उसके मालिक की मर्जी पर चलता है. उसका सबसे बड़ा मकसद होता है मुनाफ़ा कमाना. भारतीय मीडिया मालिकों को अब ये बात क़बूल करने में कोई शर्म नहीं है कि ख़बर उनके लिए सिर्फ़ एक उत्पाद है, जिसका उन्हें धंधा करना है. टाइम्स ऑफ़ इंडिया इस बात को खुलेआम कबूल करता है.  उनके अख़बारों में संपादकों का पतन और ब्रैंड मैनेजरों का उदय भी इसी की एक तार्किक परिणति है. &lt;br /&gt;पिछले कुछ वर्षों में संपादक और मालिक के बीच की रेखाएं भी धुंधली हुई हैं. कई मालिक संपादक का पद भी हथिया चुके हैं और कई पत्रकार मालिक बन गए हैं. ऐसे में पत्रकार और मालिक के हित निश्चित तौर पर एक-दूसरे से टकराते हैं . इस परिघटना के सामने आने के बाद मालिक-पत्रकार का सीधा हस्तक्षेप समाचार कक्ष में बढ़ गया है. मालिक इस बात को अच्छी तरह जानता है कि अख़बार के ज़्यादा सर्कुलेशन और टेलीविजन चैनल की बढ़ती रेटिंग में ही उसकी क़ामयाबी की कुंजी छिपी है. इसी आधार पर उसे बड़े-बड़े विज्ञापन मिलने हैं. इसलिए वो इस होड़ में आगे रहने के लिए हर तरकीब अपनाता है. जो मालिक ख़ुद संपादक नहीं हैं वे ऐसे संपादकों की नियुक्ति करते हैं जो कंपनी के लिए मुनाफ़ा कमाने में सहायक हों. फिर संपादक अपनी पसंद के पत्रकारों की नियुक्ति करते हैं. इस तरह तथाकथित मुख्यधारा के किसी भी अख़बार या टेलीविजन चैनल में ऐसा संपादक या पत्रकार तलाशना असंभव है जो अपनी मालिक की मर्जी के ख़िलाफ़ काम करता हो. ऐसे में समाचारों के निष्पक्ष होने की कल्पना करना बहुत बड़ी बेवक़ूफ़ी है. &lt;br /&gt;मालिक नाम का जीव भारतीय मीडिया में लगातार ख़तरनाक रूप धारण करता जा रहा है. वो समाचार मीडिया के साथ बाक़ी सभी तरह के मीडिया में भी अपना मालिकाना बढ़ा रहा है. इस तरह अगर एक ही मालिक अगर सभी तरह के मीडिया का मालिकाना रखेगा तो विविधता कम होती जाएगी और गिने-चुने मीडिया संगठन मनमानी करते रहेंगे. छोटी पूंजी और सहकारी तौर पर चलने वाला मीडिया कहीं टिक नहीं पाएगा. इस तरह क्रॉस मीडिया होल्डिंग का रखने पर  एकाधिकार की प्रवृत्ति और मजबूत होती जा रही है . मशहूर मीडिया स्कॉलर मैकचेस्नी के मुताबिक़ मीडिया आधुनिक लोकतंत्रों में आवश्वक रूप से राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक भूमिका निभाता है. इसलिए लोकतंत्र में इस तरह के मीडिया सिस्टम की ज़रूरत होती है जो लोगों को विभिन्न मतों और महत्वपूर्ण विषयों पर चलने वाली अलग-अलग बहसों से परिचित कराए . मैकचेस्नी ये भी कहते  हैं कि अगर मीडिया के कॉन्टेंट को सुधारना है तो उसके मालिकाने, प्रबंधन और नियमन पर खुली बहस करनी पड़ेगी. दूसरे प्रेस कमीशन की रिपोर्ट में क्रॉस मीडिया होल्डिंग और एकाधिकार के ख़िलाफ़ कई सुझाव दिए गए थे लेकिन मालिक लॉबी के दबाव में उन पर कभी कोई क़ानून नहीं बन पाया.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ख़बर बड़ी कि विज्ञापन? &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;एक अख़बार के लिए ख़बर ज़रूरी हैं कि विज्ञापन ?  मीडिया के नाम पर सरकार से तमाम सुविधाएं लेने वाले निजी माध्यम विज्ञापन के लिए कुछ भी करने के लिए क्यों तैयार रहते हैं ? ये बात सही है कि मुक्त बाज़ार में बिना विज्ञापन वाले अख़बार की कल्पना करना आसान नहीं है. लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि विज्ञापनों को अख़बारों में ख़बरों से ज़्यादा अहमियत दी जाने लगे. वर्तमान में अख़बार विज्ञापन छापने की होड़ में सारी पत्रकारीय नैतिकता को किनारे लगाते जा रहे हैं. कई अख़बार तो अपने संवाददाताओं को विज्ञापन लाने के धंधे में जुटाये रखते हैं. इसके अलावा अख़बारों में ख़बरों और विज्ञापनों का भी कोई निश्चित अनुपात नहीं है. &lt;br /&gt;पहले प्रेस आयोग ने अख़बारों में ख़बरों और विज्ञापनों का अधिकतम अनुपात 60-40 तय करने की सिफ़ारिश की थी. लेकिन कानून न होने की वजह से उसे लागू नहीं किया जा सका. सरकार ने पहले प्रेस आयोग की सिफ़ारिशों के मद्देनज़र 1956 में द न्यूज पेपर प्राइज एंड पेज एक्ट  बनाया था. इसका मक़सद अख़बार की पृष्ठ संख्या के हिसाब से उसकी क़ीमत तय करना था. जिसे पुणे के सकाल पेपर्स प्राइवेट लिमिटेड ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. कोर्ट ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उन्नीस सौ साठ में इस एक्ट को ग़लत करार दिया. दासू कृष्णामूर्ति  के अनुसार इस फैसले ने पाठकों के अधिकार की अनदेखी  की और रेवेन्यू के भूखे मालिकों को ख़बर की जगह को विज्ञापन कंपनियों को बेचने का मौक़ा दे दिया. &lt;br /&gt;कुछ मीडिया कंपनियां विज्ञापनों के बदले दूसरी व्यावसायिक कंपनियों में हिस्सेदारी लेती हैं और वादा करती है कि वो इन कंपनियों के ब्रैंड को लोकप्रिय बनाएंगी. मिसाल के तौर पर टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप ने अपनी कंपनी ब्रैंड कैपिटल के माध्यम से सवा सौ से ज़्यादा कंपनियों में हिस्सेदारी ली है और उनके विज्ञापन और प्रचार का कामकाज़ देखती है. ब्रैड कैपिटल का दावा है कि टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह का हिस्सा होने के बावजूद संपादकीय नीतियों पर कोई फर्क नहीं पड़ता है. लेकिन इस बात की असलियत को आसानी से समझा जा सकता है. पहले टाइम्स ऑफ़ इंडिया ये काम प्राइवेट ट्रीटी के नाम से करता था. इसलिए अगर कोई भी अख़बार इस तरह के हथकंडे अपनाता है तो उसके लिए प्राइवेट ट्रीटी शब्द एक तरह से रूढ़ हो चुका है. आज ज़्यादातर बड़े अख़बार प्राइवेट ट्रीटी के खेल में उतरे हुए हैं. इसके अलावा एक ही व्यक्ति या कंपनी के न्यूज़ मीडिया और दूसरे किसी धंधे में भी मालिकाना रखने का अधिकार भी पत्रकारिता की नैतिकता को प्रभावित करता है. मसलन कई मीडिया घराने पत्रकारिता की आड़ में अपने दूसरे धंधों को भी चमकाने की कोशिश करते हैं.  &lt;br /&gt;कई अख़बार विज्ञापनों को खुलेआम ख़बरों की तरह छापते हैं. टाइम्स ऑफ़ इंडिया उनका सिरमौर है. इस अख़बार के साथ हर रोज दिल्ली टाइम्स नाम का एक और अख़बार पाठकों को मुफ्त में मिलता है. जिसमें सिर्फ़ विज्ञापन या फिर पेड न्यूज़ छपती हैं. उसमें ख़बर न होने की स्वीकारोक्ति टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सीईओ रवि धारीवाल खुलेआम करते हैं . चुनावों में पेड न्यूज़ छापने की चर्चा के सामने आने से पहले ही टाइम्स ऑफ़ इंडिया दो हज़ार तीन में ही मीडियानेट नाम से इस तरह की पेड सामग्री छापना शुरू कर चुका था. प्रेस काउंसिल की पेड न्यूज़ वाली रिपोर्ट  में परंजॉय गुहा ठकुराता और के श्रीनिवास रेड्डी ने में इस बात का ज़िक्र किया और इस पर अपनी चिंता ज़ाहिर की है. &lt;br /&gt;आम पाठक समझता है कि दिल्ली टाइम्स भी टाइम्स ऑफ़ इंडिया का हिस्सा है. लेकिन ये सच नहीं है. हैरान करने वाली बात है कि दिल्ली टाइम्स स्वतंत्र अख़बार के तौर पर छापा जाता है. इसका रजिस्ट्रार ऑफ़ न्यूज़पेपर फ़ॉर इंडिया (आरएनआई) में अलग से रजिस्ट्रेशन है. जिसका नंबर DELENG/2003/5765 है. जबकि टाइम्स ऑफ़ इंडिया का रजिस्ट्रेशन नंबर 508/57 है. इनके संपादक भी अलग-अलग हैं, जिन्हें बाज़ार के हिसाब से ज़िम्मेदारी दी गई है. दिल्ली मार्केट के लिए टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संपादक विकास सिंह हैं. जबकि दिल्ली टाइम्स के संपादक अंशुल चतुर्वेदी हैं. दोनों अख़बारों के ये ब्यौरे इतनी छोटे अक्षरों में अख़बारों में दिए जाते हैं कि आम तौर पर इन पर किसी की नज़र नहीं जाती . &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;रेटिंग यानी चुहा दौड़ &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;बाज़ार से संचालित मीडिया की कुछ अंतर्निहित विरूपताएं होती हैं. जिनमें से एक है बाज़ार में टिके रहने की प्रतियोगिता. यही वजह है कि अख़बारों और चैनलों में रेंटिग बढ़ाने की अंतहीन दौड़ लगातार चलती रहती है. गुणवत्ता से ज़्यादा सनसनी को केंद्र में रखा जाने लगता है. चाहे अख़बारों की रेटिंग का मामला हो या टेलीविजन की, इनमें सिर्फ़ विज्ञापन कंपनियों के हितों को ध्यान में रखा जाता है. &lt;br /&gt;मीडिया को लेकर अगर कुछ ठोस नियम बनाए जाएं तो इससे रेटिंग के मायने बदले जा सकते हैं. अब ये सोचने का वक़्त आ गया है कि क्या कुछ अख़बार और चैनल बिना विज्ञापनों के भी संभव हैं? जो सिर्फ़ सब्सक्रिप्शन (ग्राहकों से मिलने वाले पैसे) से चलें. तब अख़बारों और चैनलों की रेटिंग निकाली जाए, तो वो सामाजिक हित में शोध की दृष्टि से निकाली जाए. ऐसा करने पर आंकड़ों का पूरा खेल ही बदल सकता है. रेंटिग को अगर बाज़ार की ताक़तों के हवाले खुला छोड़ा जाता रहा तो आने वाले दिनों में स्थिति और भी बदतर हो सकती है.&lt;br /&gt;बेईमानी का दूसरा नाम टीआरपी&lt;br /&gt;हमारे देश में टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट (टीआरपी) को लेकर काफ़ी विवाद है.  फिर भी ये मुनाफ़े पर टिके टेलीविजन चैनलों की संचालक शक्ति बनी हुई है. टीआरपी का मापन करने वाली संस्था टैम मीडिया रिसर्च लिमिटेड भी क्रॉस होल्डिंग के आरोपों से घिरी रही है. इस कंपनी में एसी नीलसन और आईएमआरबी इंटरनेशनल की पचास-पचास फ़ीसदी की भागीदारी है. आईएमआरबी इंटरनेशनल प्रमुख विज्ञापन कंपनी जे वॉल्टर थॉम्पसन (जेडब्ल्यूटी) की मार्केट रिसर्च विंग है. एसी नीलसन की रिसर्च के भी कई मीडिया चैनल ग्राहक हैं. इस तरह क्रॉस होल्डिंग का मामला यहां भी मौजूद है. जो टीआरपी के आंकड़ों की विश्वसनीयता को संदेहास्पद बनाता है.  &lt;br /&gt;टीआरपी मापने की अवैज्ञानिकता की बात भी कई बार उठी है. इस आलोचना से ध्यान हटाने के लिए दो हज़ार सात में इंडियन सोसायटी ऑफ़ एडवर्टाइजर, इंडियन ब्रॉडकास्ट फ़ाउंडेशन और एडवर्टाइजिंग एजेंसीज ऐसोसिएशन ने ब्राडक्रास्ट ऑडियंस रिसर्स काउंसिल (बार्क) का गठन किया था. मुनाफ़े पर नज़र रखने वाली इन कंपनियों ने टीआरपी मापन के लिए यहां भी आत्मनियमन की अपनी जिद नहीं छोड़ी. आख़िरकार जब बार्क पूरी तरह नाकाम हो गया तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने मई दो हजार दस में फिक्की के महासचिव अमित मित्रा के नेतृत्व में एक कमेटी गठित की थी. इस कमेटी ने जनवरी दो हज़ार ग्यारह में अपनी रिपोर्ट पेश की . इस रिपोर्ट में भी बार्क की बैधता को स्वीकृति दी गई है. रेटिंग एजेंसी, विज्ञापन कंपनी और ब्रॉडकास्टर के बीच क्रॉस होल्डिंग रोकने को कहा गया. इस रिपोर्ट में तीन साल के भीतर सैंपल साइज को आठ हज़ार से बढ़ाकर तीस हज़ार तक करने की सिफ़ारिश भी है. लेकिन इस सवाल पर ज़रा भी विचार नहीं किया गया कि हर हफ्ते टीआरपी निकालना क्यों ज़रूरी है? टीआरपी की घोषणा छह महीने या साल में एक बार जाए तो इससे विज्ञापनदाता संस्थाओं के दबाव को कुछ हद तक कम किया जा सकता है. &lt;br /&gt;टीआरपी के मामले में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय भी बाज़ारू शक्तियों के हाथ की कठपुतली बना हुआ है. टेलीविजन चैनलों की रेटिंग मापने का मक़सद यहां सिर्फ़ विज्ञापन पाने के मक़सद से किया जा रहा है. समाचार माध्यमों को भी मुनाफ़े के इस धंधे के हवाले कर दिया जाना किसी भी हालत में न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता है. सरकारी और निजी हस्तक्षेप से मुक्त एक प्रभावशाली नियामक संस्था का अभाव यहां भी खलने वाला है. &lt;br /&gt;धंधे पर टिका रीडरशिप सर्वे&lt;br /&gt;प्रिंट माध्यमों की हालत भी अराजकता के मामले में इलेक्ट्रोनिक माध्यमों से बहुत अलग नहीं है. अख़बारों की पाठक संख्या बताने के लिए हर साल रीडरशिप सर्वे किए जाते हैं. पहले इंडियन रीडरशिप सर्वे और नेशनल रीडरशिप सर्वे अलग-अलग आंकड़े एकत्र करते थे. लेकिन अब समझौते के बाद सिर्फ़ इंडियन रीडरशिप सर्वे ही बचा रह गया है. इसमें भी एक बड़ा गोरखधंधा है. आम तौर पर अख़बारों की प्रसार संख्या का हिसाब किताब ऑडिट ब्यूरो ऑफ़ सर्कुलेशन रखता है. हर अख़बार अपना सर्कुलेशन ज़्यादा दिखाने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाता है. इससे उसे विज्ञापन तो ज्यादा मिलते ही हैं अख़बार छापने के लिए ज़्यादा न्यूज़ प्रिंट (कागज़) भी रियायती दरों पर हासिल होता है. कई अख़बार तो इस न्यूज़ प्रिंट को बेचने का अवैध धंधा भी करते हैं. &lt;br /&gt;अखबारों की पाठक संख्या बताने के लिए साल में दो बार जो रीडरशिप सर्वे निकलता है उसका मकसद तो विज्ञापनधर्मी है ही. संचालन में भी कई ख़ामियां हैं. इस सर्वे को नेशनल रीडरशिप स्टडीज काउंसिल (एनआरएससी) निकालता है. इसमें इंडियन न्यूज पेपर सोसायटी(आईएनएस) एडवर्टाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (एएएआई) और ऑडिट ब्यूरो ऑफ़ सर्कुलेशन (एबीसी) शामिल हैं. ये तीनों संगठन भी शुद्ध तौर पर मालिकों और मुनाफ़ाखोरों के हैं. इनमें जनता या आम पाठक का प्रतिनिधित्व कोई भी संगठन नहीं करता है. अखबारों के सर्कुलेशन की तरह ही कई बार रीडरशिप सर्वे पर भी आरोप लगते हैं कि ये भी मैनेज्ड होते हैं. अखबार अपने पाठक संख्या ज़्यादा दिखाने के लिए कई हथकंडे अपनाते हैं. मसलन, आपने अपने कस्बे-शहर के कई इलाक़ों में अख़बारों के बड़े-बड़े होर्डिंग्स देखे होंगे. इन होर्डिंग्स को ख़ास मक़सद से लगाया जाता है. बार-बार देखने की वजह से ये दर्शक की स्मृति में बस जाते हैं. जब कभी रीडरशिप सर्वे कराने वाले लोग पाठकों के पास पहुंचते हैं तो पाठक अख़बार पढ़े या न पढ़े उन अख़बारों के नाम सूची में भर देता है जिसको वो रोज-रोज अपने आस-पास देख रहा होता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ब्रॉडकास्ट रेग्यूलेशन बिल का शिगूफ़ा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जनता की तरफ़ से लगातार दबाव पड़ने के बाद सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी बार-बार टेलीविजन चैनलों के नियमन की बात करती हैं. लेकिन दो हज़ार सात में उन्होंने जो ड्राफ्ट तैयार करवाया वो भी मालिकाने की समस्या को संबोधित नहीं करता है. इस ड्राफ्ट में कुछ हद तक क्रॉस मीडिया होल्डिंग पर सवाल उठाए गए हैं. ब्रॉडकास्टर और नेटवर्क ऑपरेटर की क्रॉस होल्डिंग को ख़त्म करने की बात इसमें थी. ये बात इस धंधे पर गिद्ध दृष्टि रखने वालों को अच्छी नहीं लगी. आख़िरकार ये बिल कैबिनेट से पास होने के बाद भी संसद में पेश नहीं हो पाया. &lt;br /&gt;सरकार और मीडिया व्यावसायियों के बीच चूहे बिल्ली का खेल चलता रहता है. सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने  दो हज़ार नौ में मीडिया रेग्यूलेशन के लिए एक थ्री टीयर प्लान पेश किया था. इस प्लान के मुताबिक सबसे पहले चैनल में दिखाए जा रहे कार्यक्रम की जिम्मेदारी खुद चैनल की होनी थी. दूसरे स्तर पर इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स ऐसोशिएशन जैसे संगठन  को चैनलों के कामकाज पर नजर रखनी थी. आखिरी में अगर जरूरी हुआ तो एक ऑटोनॉमस रेग्यूलेटरी बॉडी द्वारा चैनलों पर नजर रखने की बात थी लेकिन मंत्रालय को मीडिया मालिकों का समर्थन नहीं मिला. इस तरह रेग्यूलेशन का ये लचीला विचार भी कभी मूर्त रूप नहीं ले सका.  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नियमन बनाम आत्मनियमन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मीडिया नियमन की बहस का एक पक्ष निजी मीडिया घराने बने हुए हैं तो दूसरी तरफ़ सरकार है. निजी मीडिया संगठन आत्मनियमन से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं. उनका कहना है कि मीडिया के लिए कोई भी नियम- कानून बनाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है. जबकि सरकार बार-बार मीडिया की अराजकता पर लगाम लगाने के लिए कुछ दिखावा करती है. इस हालत में लोकतांत्रिक मूल्यों पर भरोसा रखने वाला एक तबका भी दुविधा की हालत में है. मीडिया के सरकारी नियंत्रण में जाने का डर उसे उन्नीस सौ पिचहत्तर के आपातकाल की याद दिलाता है, तो वो कॉरपोरेट धूर्तता की अनदेखी करने लगता है. इसलिए मुक्त बाज़ार के इस दौर में मीडिया से नैतिकता की मांग करने के लिए पूंजी और सरकार के रिश्तों को समझना ज़रूरी है. &lt;br /&gt;चौतरफ़ा दबाव के बाद टेलीविजन न्यूज़ चैनलों ने मिलकर दो हज़ार आठ में न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एऩबीए) का गठन किया. एनबीए ने आत्मनियमन के लिए न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड्स (डिस्प्यूट्स रिड्रेसल) अथॉरिटी का गठन किया. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जेएस वर्मा को इसका अध्यक्ष बनाया गया. इसके अलावा कुछ बुद्धिजीवियों को भी इसका सदस्य बनाया गया. लेकिन कुछ ही वक्त बाद इस संस्था की असलीयत सबके सामने आ गई. फरहाना अली मामले में सनसनीखेज़ कार्यक्रम दिखाने के लिए इंडिया टीवी की एनबीए ने आलोचना की और उस पर एक लाख रुपए का जुर्माना थोपा. इंडिया टीवी ने बेशर्मी दिखाते हुए अपनी ग़लती क़ुबूल करने से मना कर दिया और ख़ुद को एनबीए से अलग कर दिया . इससे आत्मनियमन की पूरी तरह पोल खुल गई. फ़जीहत होने पर बाद में मनुहार कर इंडिया टीवी को वापस एनबीए में ले लिया गया. अनुशासनात्मक कार्रवाई का असली मुद्दा कहीं ग़ायब हो गया. अपने गठन के बाद दो साल में एनबीए ने सिर्फ़ चार बार टेलीविजन चैनलों की आलोचना की. इनमें से सिर्फ़ एनडीटीवी ने एक बार ग़लती मानते हुए टेलीविजन स्क्रीन के नीचे वाले हिस्से में स्क्रॉल चलाकर इतिश्री समझ ली. एनबीए के बनने से पहले ही टेलीविजन चैनलों (समाचार और मनोरंजन) का इंडियन ब्रॉडकास्टर्स फाउंडेशन अस्तित्व में है. लेकिन उसकी हालत भी एनबीए से बहुत ज़्यादा अलग नहीं है. आत्मनियमन की माला जपना उसका भी प्रिय शगल है.  &lt;br /&gt;एनबीएन अपने उद्देश्यों के बारे में बढ़-चढ़कर बताता है . वो भारतीय लोकतंत्र की महानता और अभिव्यक्ति की आज़ादी की दुहाई देता है. फिर अपने मतलब की बात पर आते हुए घोषणा करता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए ज़रूरी है, मीडिया की विषयवस्तु पर सरकार का कोई नियंत्रण ना हो. इसमें सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की आज़ादी को एक-दूसरे का पक्का दुश्मन बताया गया है. सारी लच्छेदार बातों का मतलब आत्मनियमन की वकालत करने की अलावा और कुछ नहीं है. दिखाने के लिए एनबीए ने पत्रकारों के लिए भी कुछ नैतिक मूल्य तय किए हैं. &lt;br /&gt;वैश्विक अनुभवों से ये बात सामने आ चुकी है कि आत्म नियमन की बात करना कॉरपोरेट बेईमानी के अलावा कुछ नहीं है इसलिए मीडिया के नियमन की बात करते हुए कानूनी बाध्यता का होना ज़रूरी है. इससे भी ज़्यादा ज़रूरी है कि उनका पालन किया जाना. वैसे देशभर के चैनलों की विषयवस्तु पर नज़र रखने के लिए भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मॉनीटरिंग सेंटर है . ये प्रोग्राम कोड, एडवर्टाइजिंग कोड, केबल टेलीविजन नेटवर्क्स रेग्यूलेशन एक्ट (1995) के मुताबिक़ काम करता है. यहां पर सभी चैनलों की मॉनीटरिंग की जाती है. इसके लिए नब्बे दिन तक चैनलों की रिकॉर्डिंग रखी जाती है. उसके बाद वो सामग्री अपने आप ख़त्म हो जाती है. हैरानी की बात है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय के इस विभाग को किसी भी चैनल में मीडिया की नैतिकता के उल्लंघन का कोई उदाहरण क्यों नज़र नहीं आता. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सफ़ेद हाथी का क्या करें?&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कॉरपोरेट दलाल राडिया के टेप सामने आने के बाद कई पत्रकार और मीडिया संगठन बेनकाब हुए. उससे आपत्तिजनक बात करते हुए प्रिंट और टेलीविजन के कई पत्रकार फ़ंसे. लेकिन पत्रकारीय नैतिकता के लिए बनी संस्थाओं पर इससे कोई फ़र्क नहीं पढ़ा. कॉरपोरेट हितों को लेकर बनी संस्था न्यूज़ ब्रॉडकास्टर एसोसिएशन से ज़्यादा उम्मीद न भी करें तो प्रेस काउंसिल जैसी तथाकथित स्वायत्त संस्था भी इसमें कहीं नज़र नहीं आई. इस घटना पर सख़्त कदम उठाना तो दूर उसने कोई आलोचनात्मक टिप्पणी तक नहीं की. इससे ज़ाहिर होता है कि प्रेस काउंसिल सफ़ेद हाथी के अलावा कुछ नहीं है. &lt;br /&gt;प्रेस काउंसिल की निरर्थकता कई बार साबित हुई है. अभी ज़्यादा वक़्त नहीं बीता जब काउंसिल ने पेड न्यूज़ पर प्रंजॉय गुहा ठकुराता और के श्रीनिवास रेड्डी वाली अपने ही दो सदस्यों की रिपोर्ट को दबा दिया था. वजह सिर्फ़ इतनी थी कि इस रिपोर्ट में पेड न्यूज़ छापने वाले अख़बारों का नाम लिया गया था. लेकिन प्रकाशक लॉबी के दबाव में रिपोर्ट को दबाने की कोशिश की गई. आख़िरकार रिपोर्ट से वो हिस्सा हटा दिया गया जिसमें अख़बारों का नाम लिया गया था. ये बात और है कि आउटलुक पत्रिका ने पूरी रिपोर्ट हासिल कर उसे अपनी वेब साइट पर छाप दिया . &lt;br /&gt;वैसे तो प्रेस काउंसिल को स्वायत्तशासी और क़ानूनी संस्था माना जाता है. इसका अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट का कोई पूर्व न्यायाधीश होता है. जिसका चयन राज्यसभा और लोकसभा के अध्यक्ष के साथ निर्वाचित सदस्यों वाली कमेटी करती है. लेकिन इस कमेटी के बाकी सदस्यों का जो प्रतिनिधित्व है, उसमें मीडिया मालिकों का प्रतिनिधित्व ज़्यादा है. इसके संरचनात्मक तौर पर कॉरपोरेट मीडिया के पक्ष में झुके होने की वजह से अक्सर इसकी चिंताएं प्रत्रकारीय नीतिशास्त्र की रक्षा करने की बजाय मालिकों के हितों को सुरक्षित रखना ज़्यादा बन जाता है. यूं तो इसने पत्रकारीय आचारसंहिता को लेकर कई निर्देश जारी किए हैं. लेकिन इसका  कोई असर देखने को नहीं मिलता. मसलन साम्प्रदायिक दंगों के वक़्त भावनाओं को भड़काने वाले अख़बारों पर काउंसिल कोई लगाम नहीं लगा पाती. उसने कभी समाचार कक्ष में विविधता की वकालत नहीं की है. जिससे समाचारों में बहुसंख्यक और प्रभावशाली विचार ही न छाए रहें. &lt;br /&gt;भारत में आज़ादी के बाद से ही मीडिया को संयमित रखने की बात उठती रही है. उन्नीस सौ बावन में मीडिया का जायज़ा लेने के लिए पहले प्रेस आयोग का गठन किया गया था. इस आयोग ने उन्नीस चौवन में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी. पहले प्रेस आयोग ने मीडिया के मालिकाने पर तब भी गंभीरता से विचार किया था और संकेद्रण पर चिंता ज़ाहिर की थी. आयोग ने प्रेस के काम को सामाजिक सेवा के दायरे में रखा था. इस कमीशन ने प्रेस के आकंडों पर नज़र रखने के लिए प्रेस रजिस्ट्रार और वॉच डॉग का काम करने के लिए प्रेस काउंसिल के गठन की भी सिफ़ारिश की थी. पहले आयोग की रिपोर्ट के बाद उन्सीस सौ छप्पन में रजिस्ट्रार ऑफ़ न्यूज़ पेपर सोसायटी का गठन किया गया और उन्सीस सौ पैंसठ में इंडियन प्रेस काउंसिल एक्ट बनाया गया. इस तरह उन्नीस सौ छियासठ में पहली बार भारतीय प्रेस परिद अस्तित्व में आई. इसने उन्नीस सौ छिहत्तर तक काम किया. आपातकाल लगने की वजह से प्रेस काउंसिल को भी भंग कर दिया गया. आपातकाल के बाद उन्नीस सौ अठहत्तर में जनता पार्टी फिर से नया प्रेस काउंसिल एक्ट पास कर अप्रैल उन्नीस सौ उन्यासी में प्रेस काउंसिल को पुनर्जीवित किया. अठहत्तर में ही जनता सरकार ने दूसरे प्रेस आयोग का गठन किया. जिसने उन्नीस सौ बयासी में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी. &lt;br /&gt;दूसरे प्रेस आयोग ने प्रेस काउंसिल को जारी रखने की वकालत की और मीडिया के संकेंद्रण और क्रॉस मीडिया होल्डिंग पर फिर से चिंता जाहिर की. आयोग ने अपनी सिफ़ारिश में ये भी कहा था कि जो अख़बार पत्रकारिता की आचारसंहिता का उल्लंघन करता है उस पर कानूनी कार्रवाई का अधिकार प्रेस काउंसिल के पास हो. एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने इस मांग का समर्थन नहीं किया. मतलब साफ़ है कि ज़्यादातर एडिटर जनता के नहीं बल्कि मालिक के आदमी होते हैं और उसी के लिए प्रतिबद्ध होते हैं. इस संस्था ने अपने कामों से ये बार-बार से साबित किया है. दो हज़ार दस में भी राडिया कांड के सामने आने के बाद एडीटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष राजदीप सरदेसाई ख़ुद आरोपों से घिरे रहे, फिर भी शान से अपने और बाक़ी दाग़ी पत्रकारों के पक्ष में तर्क गढ़ते रहे .  &lt;br /&gt;आर्थिक उदारीकरण के दौर में धीरे-धीरे पत्रकारों के श्रमिक अधिकारों को छीन लिया है. जब तक पत्रकारों की सुरक्षा की गारंटी नहीं होगी तब तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करना बेमानी होगा. वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट  को नए सिरे से लागू कर इस बात का ध्यान रखा जा सकता है. मीडिया कंपनी में प्रबंधन और पत्रकारीय हितों के बीच संतुलन के लिए दोनों प्रेस आयोगों ने पत्रकार संगठनों की ज़रूरत पर बल दिया था. लेकिन इस बात पर पूरी तरह कभी अमल नहीं हो पाया. ज़रूरी है कि पत्रकारों को अश्लील तनख़्वाहों की बजाय उनके श्रमिक अधिकार मिलें. इन सभी बातों पर अमल कर पाना वर्तमान प्रेस काउंसिल के बस की बात नहीं है इसलिए अब नियमन के नए रास्ते तलाशने ज़रूरी हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;वक़्त की मांग है नियमन &lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;जनजीवन में जनसंचार माध्यमों के बढ़ते महत्व और न्यू मीडिया के बढ़ते उभार ने जनहित में संचार के प्रभावी नियमन की ज़रूरत को बढ़ा दिया है . जिस तरह तरह मीडिया की तकनीक और पहुंच में विस्तार हुआ है, उस लिहाज़ से सिर्फ़ इंडियन ब्रॉडकास्ट एक्ट या किसी एक माध्यम को लेकर कानून बनाकर काम नहीं चल सकता. इसके लिए मीडिया के हर रूप पर नज़र रखने वाले किसी आयोग के बारे में सोचा जा सकता है. जो देश में मीडिया के हालात का अध्ययन करे और उसके सही संचालन के लिए निर्देश जारी करे. इस तरह के आयोग के पास पूरे कानूनी अधिकार हों ताकि वो प्रेस काउंसिल की तरह सिर्फ़ कागजी शेर बनकर न रह जाए. &lt;br /&gt;अब आत्मनियमन का फ़रेब करने वालों को कटघरे में खड़ा करने का वक़्त आ गया है. सवाल उठाना लाजिमी है कि मीडिया ख़ुद कटघरे में खड़ा होकर न्यायाधीश कैसे बन सकता है. राडिया कांड में सीएनएन-आईबीएन के मालिक-संपादक राजदीप सरदेसाई, न्यूज एक्स के मालिक-संपादक जहांगीर पोचा, एनडीटीवी की संपादक और मालिकाने में हिस्सेदार बरखा दत्त, टाइम्स नाव की नवीका कुमार, टीवी टुडे ग्रुप से प्रभु चावला, हिंदुस्तान टाइम्स के वीर सांघवी जैसे कई पत्रकारों पर संगीन आरोप हैं. अब ये लोग समाचार माध्यमों के आत्मनियमन की वकालत करें तो इससे बड़ा मज़ाक और क्या हो सकता है. अगर मीडिया संगठन स्वनियमन करना चाहते हैं तो रोका किसने हैं. वे जितना चाहें आत्मनियमन करें. लेकिन असली बात ये है कि वे आत्मनियमन की आड़ में बेईमानी करने की आज़ादी न मांगें. &lt;br /&gt;मीडिया कंवर्जेंस की तरफ़ बढ़ रहे युग में प्रिंट, रेडियो, टेलीविजन, इंटरनेट जैसे सभी माध्यमों के उत्पादन, प्रसारण और वितरण के तरीक़ों पर नए सिरे से विचार हो. केबल, सैटेलाइट या थ्री- जी जैसी आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल और नियमन की बात भी साफ़ हो. इसके साथ समाचार माध्यमों और मनोरंजन माध्यमों के लिए भी अलग-अलग नियम बनाना ज़रूरी है. ऐसा बहुत लंबे वक़्त नहीं चल सकता है कि दोनों माध्यमों को एक ही तराजू पर तोला जाए. समाचार माध्यमों का आंकलन पत्रकारिता के उसूलों के हिसाब से किया जाए और मनोरंजन माध्यमों का आंकलन दूसरी तरीक़े से. अगर मीडिया उद्योग के नाम पर दोनों को एक ही श्रेणी में रखना है तो फिर समाचार माध्यमों को सामाजिक सेवा मानते हुए इन्हें विशेष सेवाएं देनी बंद कर देनी चाहिए. &lt;br /&gt;अब कॉरपोरेट और सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त, कोई स्वायत्तशासी और अधिकार संपन्न आयोग ही मीडिया नियमन की उम्मीद जगा सकता है. ऐसा तभी हो सकता है जब सरकार पर जनता का दबाव हो. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;संदर्भ:&lt;/strong&gt;  &lt;br /&gt;  पांच मार्च दो हज़ार दस को पेड न्यूज़ पर चर्चा के दौरान राज्य सभा में उद्धृत उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का वक्तव्य.&lt;br /&gt;   इंडिया इन बिजनेस, आइटीपी डिविजन, मिनिस्ट्री ऑफ़ एक्सटर्नल अफ़ेयर, गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया.&lt;br /&gt;http://www.indiainbusiness.nic.in/industry-infrastructure/service-sectors/media-entertainment.htm &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  भूपेन सिंह, पत्रकारिता बनाम धंधेबाज़ी, समयांतर, दिल्ली, जनवरी, 2011&lt;br /&gt;  जेरोम बैरोन, फ़्रीडम ऑफ़ द प्रेस फॉर हूम ?  द राइट ऑफ़ एक्सेस टू द मास मीडिया (ब्लूमिंगटन यू. ऑफ़ इंडियन प्रेस, 1973). सी एडविन बेकर की किताब मीडिया, मार्केट एंड डेमोक्रेसी में उद्धृत, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 2002&lt;br /&gt;   केवल जे कुमार, मास कम्युनिकेशन इन इंडिया, जैको पब्लिशिंग हाउस, मुंबई, 2009&lt;br /&gt;  शेल्टल गुनारत्ने : ‘मीडिया सबसर्विएंस एंड डेवलपमेंट जर्नलिज्म’ कम्युकेशन एंड डेवलपमेंट रिव्यू, वोल्यूम. 2, नं. 3 &lt;br /&gt;  कुंडा दीक्षित : डेटलाइन अर्थ: जर्नलिज्म एज इफ़ द प्लैनेट मैटर्ड, इंटर प्रेस सर्विस/ एशिया पैसिफ़िक. &lt;br /&gt;  केवल जे कुमार, मास कम्युनिकेशन इन इंडिया, जैको पब्लिशिंग हाउस, मुंबई, 2009&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  स्टार न्यूज़ कई सालों से अपराध पर सनसनी नाम का एक न्यूज़ कार्यक्रम ही चला रहा है. &lt;br /&gt;   आउटलुक के वार्षिकांक (1 नवंबर 2010)में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सीईओ रवि धारीवाल का बयान&lt;br /&gt;  भूपेन सिंह, पत्रकारिता बनाम धंधेबाज़ी, समयांतर, दिल्ली, जनवरी, 2011&lt;br /&gt;  रॉबिन जैफ्री, इंडियाज न्यूजपेपर रेवोल्यूशन, ऑक्सफ़ोर्ड, 2003&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   रॉबर्ट मैकचेस्नी (1998), मेकिंग मीडिया डेमोक्रेटिक, बोस्टन रिव्यू, अमेरिका. &lt;br /&gt;  द न्यूजपेपर (प्राइज एंड पेज) एक्ट, 1956&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   दासू कृष्णामूर्ति, रीडर्स एंड मीडिया, द हूट http://www.thehoot.org/web/home/story.php?storyid=979&amp;pg=1&amp;mod=1&amp;sectionId=34&amp;sectionname=FOR%20READERS/%20VIEWERS%20%20%20%20%20%20%20%20%20%20&amp;valid=true&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  आउटलुक के वार्षिकांक (1 नवंबर 2010)में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सीईओ रवि धारीवाल का बयान&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  परंजॉय गुहा ठकुराता और के श्रीनिवास रेड्डी की पेड न्यूज़ पर प्रेस काउंसिल के लिए तैयार की गई रिपोर्ट &lt;br /&gt;  टाइम्स ऑफ़ इंडिया और दिल्ली टाइम्स के 11 जनवरी 2011 के दिल्ली संस्करण. &lt;br /&gt;  भूपेन सिंह, मीडिया नियमन के सवाल, समयांतर, सितंबर 2009, दिल्ली&lt;br /&gt;  सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से 10 जनवरी 2011 को जारी प्रेस विज्ञप्ति&lt;br /&gt;   न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन की साइट. http://www.nbanewdelhi.com/images/Upload/Decisions-taken-by-the-NBA.pdf&lt;br /&gt;   एनबीए की वेबसाइट में कोड ऑफ़ एथिक्स एंड ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड्स http://www.nbanewdelhi.com/codeof-ethics-broadcasting-standards.asp&lt;br /&gt;   इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मॉनीटरिंग सेंटर की वेबसाइट http://emmc.gov.in/ShowArticle.aspx?id=MTI=&lt;br /&gt;   http://www.outlookindia.com/article.aspx?266542&lt;br /&gt;  प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में 3 दिसंबर 2010 को दिया गया राजदीप सरदेसाई का भाषण.&lt;br /&gt;   वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट 1956&lt;br /&gt;  कम्पेन फॉर प्रेस एंड ब्रॉडकास्टिंग फ्रीडम, ब्रिटेन, 2001&lt;br /&gt;(समयांतर के मीडिया विशेषांक में प्रकाशित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2900056613410233002-5253917922610129505?l=indiancoffeehouse.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/feeds/5253917922610129505/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2900056613410233002&amp;postID=5253917922610129505&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/5253917922610129505'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/5253917922610129505'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/2011/04/blog-post_05.html' title='मीडिया रेग्युलेशन से कौन डरता है?'/><author><name>bhupen</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05878017724167078478</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://bp2.blogger.com/_hhZqGrtQ7i4/R1Onhpa7xcI/AAAAAAAAAHY/jf-2bBrz7pI/S220/bhupen+1.color'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2900056613410233002.post-235428778483622137</id><published>2011-04-04T11:10:00.003+05:30</published><updated>2011-04-04T11:16:24.290+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शोधपत्र'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राडियाकांड'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडियाटाइजेशन'/><title type='text'>मीडिया चालित राजनीति और राडिया कांड</title><content type='html'>नीरा राडिया कांड ने भारतीय समाचार मीडिया और लोकतंत्र पर कई सवाल खड़े किए हैं. कॉरपोरेट घराने मीडिया का इस्तेमाल कर कैसे राजनीति और समाज को संचालित करते हैं इसकी झलक मिल चुकी है. इस घटना को मीडियाचालन (मीडियाटाइजेशन) की अवधारणा के तहत बेहतर तरीक़े से समझा जा सकता है. पूंजीवादवादी लोकतंत्र के परिणामस्वरूप सामने आए इस मर्ज में कई जटिलताएं हैं. ऊपरी यथार्थ के नीचे यथार्थ की कई और परतें हैं. इसे सिर्फ़ आर्थिक वैश्वीकरण और कॉरपोरेटीकरण जैसी अवधारणाओं के भीतर समेटना थोड़ा मुश्किल है. दरअसल मीडियाचालन हमारे समय की इन अवधारणाओं की उपज ज़रूर है लेकिन इसे समझने के लिए कुछ विशेष सैद्धांतीकरण ज़रूरी हैं. मीडियाचालन में न सिर्फ़ मीडिया के संरचनागत मुद्दों को उठाया जाता है बल्कि उनके प्रभावों को भी समझने की कोशिश की जाती है. इसके बावजूद यह न तो शुद्ध रूप में मीडिया के राजनीतिक अर्थशास्त्र की प्रक्रिया है और न ही सिर्फ़ मीडिया प्रभावों का सांस्कृतिक अध्ययन. (शुल्ज, 2004) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मीडियाकरण और मीडियाचालन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मीडियाकरण (मीडिएशन ) और मीडियाचालन ऐसी प्रक्रियाएं है जिनका संबंध सिर्फ़ राजनीति से ही नहीं है बल्कि इनमें हर तरह के सामाजिक अनुभव शामिल होते हैं. कई बार मीडियाचालन और मीडियाकरण को पर्याय के तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिश की जाती है. लेकिन इन दोनों में फ़र्क होता है. (मेज्ज़ोलेनी और शुल्ज, 1999) मीडिया द्वारा प्रचारित-प्रसारित घटनाओं के आधार पर अक्सर समाज के विचार और व्यवहार आकार ग्रहण करते हैं. यह एक तरह से मीडियाकरण की प्रक्रिया है. मीडियाकृत राजनीति का संबंध उस स्थिति से है जिसमें मीडिया शासित और शासकों के बीच संचार का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत बन जाता है. इस तरह के हालात में लोग राजनीतिक और सामाजिक सूचनाओं के लिए मीडिया पर निर्भर रहते हैं. ठीक इसी तरह राजनीतिज्ञ और शासक भी जनता की राय जानने और उन तक पहुंचने के लिए मीडिया का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे हालत में धीरे-धीरे राजनीतिक किरदारों का सीधा संबंध समाज से कटता जाता है. राजनीतिक संचार सभाओं, रैलियों और आमने-सामने की बातचीत के बजाय मीडिया के माध्यम से होने लगता है. &lt;br /&gt;मीडियाचालन का सबसे पहले इस्तेमाल मीडिया का राजनीतिक संचार पर असर जानने के लिए किया गया. स्वीडिश मीडिया रिसर्चर केन्ट एस्प ने मीडियाचालित राजनीति के बारे में बात की. ऐस्प ने इस अवधारणा का विकास स्वीडिश समाजशास्त्री गुडमुंड हर्नेस के शब्दों से किया. हर्नेस ने मीडिया और राजनीति के संबंधों के फलस्वरूप बनने वाले समाज के लिए मीडिया ट्विस्टेड सोसायटी (मीडिया द्वारा तोड़ा-मरोड़ कर बनाया गया समाज) का इस्तेमाल किया था. (स्ट्रॉमबैक, 2008) &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मीडिया तर्क बनाम राजनीतिक तर्क&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मीडियाचालन को अच्छी तरह समझने के लिए मीडिया तर्क (मीडिया लॉजिक) को समझना जरूरी है. पूंजीवादी लोकतंत्र में मीडिया जब बहुत प्रभावशाली हो जाता है तो वो सबसे ज़्यादा फ़िक्र अपने व्यावसायिक हितों की करता है. सामाजिक सरोकार उसके लिए कोई मायने नहीं रखते. वो रेटिंग और प्रसार बढ़ाने के लिए कई ऊल-जलूल हरकतें करने लगता है. जिससे समाचार मीडिया में सूचना एकत्र करने से लेकर उन्हें प्रस्तुत करने के तरीक़ों में बड़ा बदलाव आ जाता है. (एलथीड और स्नो, 1979)  इस तर्क के तहत लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचने के लिए मीडिया अपने फॉर्मेट में लगातार प्रयोग करता है. भारतीय न्यूज़ चैनलों और अख़बारों के फॉरमेट में हो रहे बदलावों को भी इस संदर्भ में समझा जा सकता है. &lt;br /&gt;मीडिया तर्क लगातार सारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को धीरे-धीरे अपने अधीन करने की तरफ़ बढ़ता है. तब उसका टकराव राजीतिक तर्क से होता है. राजनीतिक तर्क (पॉलिटिकल लॉजिक) में नेता, मंत्री और नौकरशाह जैसे किरदार अहम रोल में होते हैं. वे हमेशा सार्वजनिक तौर पर अपनी सरकार, पार्टी और जनता के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों की बात करते हैं. वे मीडिया को बेलगाम होने की अनुमति नहीं देते बल्कि उसका इस्तेमाल अपना हित साधने में करते हैं. इस तरह पूंजी पर टिके मीडिया तर्क और राजनीतिक तर्क में हमेशा एक तनाव चलता रहता है. हाल के दौर में जिस तरह के मीडिया नियमन को लेकर मीडिया मालिकों और राजनेताओं के बीच आंख-मिचौली का खेल चल रहा है उसके आधार पर इन तर्कों के फ़र्क को समझा जा सकता है. (मेयर 2002)&lt;br /&gt;मीडिया तर्क और राजनीतिक तर्क के आधार पर स्ट्रॉमबैक  (2008) ने मीडिया चालित राजनीति के चार चरण बताए हैं. यह सभी चरण पश्चिमी लोकतंत्रों के आधार पर निर्धारित किए गए हैं. लेकिन अगर इनकी तुलना भारतीय मीडिया से करें तो दोनों जगह की तस्वीरें बहुत हद तक मिलती-जुलती लगेंगी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मीडिया चालित राजनीति के चार चरण&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पहले चरण &lt;/strong&gt;में मास मीडिया सूचना और संचार का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत होता है. यह संचार नागरिकों, राजनीतिक संस्थाओं और राजनीतिक दलों के किरदारों के बीच होता है. इस दशा में राजनीति मीडियाकृत होती है. (स्ट्रॉमबैक, 2008) इस तरह यह बाद में होने वाले मीडियाचालन के लिए ज़रूरी है. यह पाठकों -दर्शकों की अभिवृत्ति, प्रत्यक्षीकरण और मत को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाता है. जब राजनीति पहले पहले चरण के मीडियाचालन में पहुंच जाती है तो मीडिया द्वारा गढ़ा गए यथार्थ का असर लोगों के प्रत्यक्षीकरण पर होने लगता है. जिनका असर  लोगों के मत निर्माण के वक़्त पड़ता है. राजनीति मीडिया चालन के पहले चरण में पहुंची या नहीं इस बात का पता लगाने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि क्या मीडिया शासकों और शासितों के बीच में सूचना और संचार का प्रमुख स्रोत है या नहीं. इस चरण में राजनीतिक दलों के मीडिया को छोड़कर बाक़ी मीडिया पर राजनीतिक तर्क कम होता है लेकिन इतना भी कम नहीं होता कि मीडिया तर्क पूरी तरह हावी हो जाए. इस चरण में हर हाल में मुनाफ़ा कमाने वाला मीडिया तर्क सबसे ज़्यादा आपे में रहता है. &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;दूसरे चरण &lt;/strong&gt;में मीडिया सरकारी और राजनीतिक संस्थाओं से ज़्यादा स्वतंत्र हो जाता है. यहां मीडिया तर्क काम करता शुरू कर देता है. इसमें व्यवसायिक हित ज़्यादा हावी होने लगते हैं. पत्रकारों के पेशेवर होने की दुहाई दी जाने लगती है. राजनीति को लेकर स्वामीभाव रखने के बजाय ज़्यादा यथार्थपरक नज़रिया अपनाना शुरू हो जाता है. ख़बरों के फॉर्मेट में पाठकों-दर्शकों को लुभाने के लिए हर रोज़ कुछ नयापन तलाशने की कोशिश करता है. फिर भी इस चरण में मीडिया तर्क को पूरी छूट नहीं मिल पाती. राज्य के नियम-कानून उसके रास्ते की बाधा बनते रहते हैं. इस तरह यहां मीडिया आधी स्वतंत्रता हासिल कर लेता है. राजनीतिक और सांस्थानिक किरदार इसमें प्रभावशाली होते हैं लेकिन वे मीडिया को नियंत्रण में नहीं रख पाते और मीडिया में अपने हितों को जबरदस्ती नहीं थोप सकते. &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;तीसरे चरण &lt;/strong&gt;में भी मीडिया समाज के विभिन्न वर्गों के बीच सूचना और संचार का प्रमुख स्रोत होता है. मीडिया की आत्मनिर्भरता दूसरे चरण की तुलना में ज़्यादा बढ़ जाती है. इसमें राजनीतिक और सामाजिक किरदारों को मीडिया के अनुसार ढलना पड़ता है. इसमें राजनीतिक तर्क पर मीडिया तर्क हावी  होने लगता है. खीझे हुए राजनीक किरदारों को न्यूज मैनेजमेंट और स्पिन डॉक्टरिंग की मदद लेनी पड़ती है. इसमें राजनीतिक और दूसरे सामाजिक किरदारों के पास मीडिया को अपनाने के अलावा कोई चारा नहीं बचता. इस हालत में मीडिया लॉजिक बहुत ताकतवर हो जाता है. राजनीतिक नीति-निर्माण में भी मीडिया की भूमिका बढ़ जाती है. यहां मीडिया इतना मजबूत हो जाता है कि राजनीतिक-सामाजिक किरदारों के लिए मीडिया की अनदेखी करना मुश्किल हो जाता है. यहीं कहीं एजेंटा सेंटिग और फ्रेमिंग की प्रक्रिया भी चलती है. ये सब मीडिया मालिक अपने फ़ायदे के लिए करते हैं. इस स्थिति के बारे में एथलीड और स्नो (1991) कहते हैं- ऐसा लगता है जैसे सारी संस्थाएं मीडिया संस्थाएं बन गई हों. वे आगे कहते है कि ऐसे हालात में सांगठनिक पत्रकारिता का अंत दिखाई देने लगता है. ख़बरें उत्पाद में बदल जाती हैं और असली ख़बरों से ज़्यादा उनके प्रस्तुतिकरण पर ज़्यादा ध्यान दिया जाने लगता है. इन दबावों की वजह से राजनीतिक और सामाजिक किरदार अपनी बात सामने लाने के लिए न्यूज इवेंट करने लगते हैं. मीडिया में इस तरह सनसनी और सेलिब्रेटीज को ज़्यादा अहमियत मिलने लगती है. &lt;br /&gt;इस चरण में थथार्थ का चित्रण पूरी तरह मीडिया तर्क के आधार पर होने लगता है. इस तरह एक मीडियाकृत यथार्थ का निर्माण होता है, जिसमें यथार्थ ग़ायब हो जाता है. इस तरह यथार्थ से ज़्यादा महत्वपूर्ण मीडियाकृत यथार्थ हो जाता है. क्यों कि लोगों की पहुंच में यही मीडियाकृत यथार्थ होता है इसलिए वे इसी पर अपनी प्रतिक्रिया ज़ाहिर करते हैं. लिपमन (1997) की भाषा में यह छद्म वातारण है तो निम्मो और कॉम्ब (1983) इसे फंतासी की दुनिया कहते हैं. इस चरण में राजनीतिक और सामाजिक किरदार मीडिया की भूमिका से खिन्न रहने लगते हैं. वे कोशिश शुरू करते हैं कि राजनीतिक तर्क मजबूत हो पाए. तस तरह मीडिया और राजनीतिक तर्क के बीच तनाव तेज़ हो जाता है. तीसरे चरण में राजनीतिक किरदार मीडिया को बाहरी तत्व मानते हैं लेकन वे ख़बरों के लिए उसी पर निर्भर रहते हैं. वे चुनाव प्रचार के दौरान, नीतियां बनाते हुए और शासन चलाते हुए जनता की बजाय हमेशा मीडिया का ध्यान रखते हैं. &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;चौथे चरण&lt;/strong&gt; में मीडिया तर्क इतना ताकतवर हो जाता है कि मीडिया अपने फ़ायदे के लिए नैतिकता की हर हद तोड़ने लगता है. ऐसे हालात में कई बार राजनीतिक-सामाजिक किरदार मीडिया तर्क और राजनीतिक तर्क का फ़र्क भी भूल जाते हैं. इस तरह यहां एक तरह से राजनीति, मीडिया लॉजिक का उपनिवेश बन जाती है. राजनीतिक किरदार पूरी तरह मीडिया तर्क के सामने समर्पण कर देते हैं. इस चरण में मीडिया का इस्तेमाल राजनीति को मनमुताबिक ढालने में होने लगता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;राडिया कांड, पेड न्यूज़ और मीडियाचालन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;न्यूज मीडिया को लोकतंत्र को चौथा स्तंभ मानने वालों के लिए यह वक़्त आंख खोलने का है. उन्हें अब समझना पड़ेगा कि लोकतंत्र का तथाकथित वॉचडॉग (पहरेदारी करने वाला) अब लैपडॉग (कॉरपोरेट की गोद में खेलने वाला कुत्ता) बन चुका है. इस तरह हमारे यहां मीडियाचालन की प्रक्रिया अपने पूरे ज़ोर पर है. मीडिया तर्क यहां पूरी तरह अपने काम में जुटा है. &lt;br /&gt;कॉरपोरेट दलाल नीरा राडिया के पत्रकारों, कॉरपोरेट उस्तादों, उद्योगपतियों और नेताओं से बातचीत के टेप सामने आने के बाद ये साफ़ हो गया है कि किस तरह वो मीडिया की मदद से राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश कर रही थी.  राडिया की जनसंपर्क कंपनी वैष्णवी कम्युनिकेशन के ग्राहक टाटा और मुकेश अंबानी जैसे पूंजीपति थे. उसने उनके पक्ष में देश की नीतियों की मोड़ने के लिए पत्रकारों, नौकरशाहों और नेताओं का इस्तेमाल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यह कारपोरेट घरानों द्वारा पेशेवर संवादकर्मियों की आड़ लेकर लोकतंत्र को विरूपित करने का एक अहम उदाहरण है. नीरा राडिया बहुत हद तक कामयाब रही और सरकार पर अपने टाटा और अंबानी जैसे अपने ग्राहकों के पक्ष में माहौल बनाने को लेकर दबाव बना पाई. राडिया ने डीएमके सांसद ए राजा को दूरसंचार मंत्रालय बनाने के लिए कितनी तिकड़म भिड़ाई, टेप में दर्ज बातचीत से यह बात भी सामने आ चुकी है. एनडीटीवी की बरखा दत्त जैसी कई पत्रकारों ने इस काम में उसकी मदद की. फिलहाल एक लाख छिहत्तर हज़ार करोड़ रुपए के टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले में ए राजा सलाखों के पीछे हैं. लेकिन नीरा राडिया और उससे आपत्तिजनक बात करने वाले पत्रकार, नेता और उद्योगपति अब भी बड़े आराम से अपने पुराने धंधों में लगे हुए हैं. अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर वे डैमेज कंट्रोल कर रहे हैं. &lt;br /&gt;इस उदाहरण से कहा जा सकता है कि भारत में भी मीडियाचालन की प्रक्रिया तेज़ी से चल रही है. मुद्गल (2011) कहते हैं कि नीरा राडिया का दायरा आम मीडिया कवरेज को बहुत पीछे छोड़, राजनीतिक नियुक्त, नीति निर्माण और देश के साझे प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन के इर्द-गिर्द अंधाधुंध मिथक पैदा करने की सीमा तक जा पहुंचा है. वे आगे कहते हैं आधुनिक लोकतांत्रिक समाज दिन-प्रतिदिन पहले से ज़्यादा मीडियाचालित होता जा रहा है. राडिया कांड में जिस तरह मीडिया का इस्तेमाल राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करने के लिए किया गया वो इस बात की सिर्फ़ झलक भर है कि हमारा लोकतंत्र कैसे काम करता है. वैश्वीकरण के दौर में कुछ ऐसी ख़ास तरह की स्थतियां बनी हैं जब कॉरपोरेट घराने मीडिया का इस्तेमाल देश के संसाधनों की लूट के लिए कर रहे हैं. इन प्रक्रियाओं के पक्ष में जनमत निर्माण का एक पूरा उद्योग चल रहा है. ऐसे में आम आदमी लगातार हाशिए पर जा रहा है और लोकविमर्श के मंच लगातार ग़ायब होते जा रहे हैं. समाज के लगातार मीडियाकृत होते चले जाने की वजह से जनता ज़्यादा निष्कृय होती जा रही है. सीधे राजनीति के उसका नाता टूट चुका है. वो राजनीति के बारे में सिर्फ़ संचार माध्यमों से जानती है. जो आम तौर पर तोड़-मरोड़ कर पेश की जाती हैं. &lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि राडिया कांड के तौर पर पहली बार हमें राजनीतिक को प्रभावित करने की कोशिश दिखी हो. इससे पहले भी चुनावों के दौरान कई मीडिया घरानों ने नेताओं से उनकी ख़बरें छापने के लिए पैसे मांगे. दो हज़ार नौ में लोकसभा चुनाव के अलावा हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव भी हुए थे. कई नेताओं और राजनीतिक पार्टियों ने इन चुनावों में अख़बारों पर आरोप लगाए थे कि वे पक्ष में ख़बर छापने के लिए पैसे मांग रहे हैं हालांकि इस तरह की ख़बरें पहले भी सामने आ चुकी थी. दो हज़ार सात में हुए उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के दौरान ही मीडिया घरानों ने ख़बरों का सौदा शुरू कर दिया था.  इस घटनाक्रम को हम भारतीय मीडिया के इतिहास में पेड न्यूज़ के नाम से जानते हैं. भारतीय प्रेस परिषद ने इस संदर्भ में एक रिपोर्ट तैयार की. लेकिन मालिक लॉबी के दबाव में उस रिपोर्ट को भी दबा दिया गया. (सिंह, 2010) उपरोक्त उदारणों से समझा जा सकता है कि देश में कॉरपोरेट मीडिया तर्क कितनी मजबूती से काम कर रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सिकुड़ता पब्लिक स्फ़ीयर और विकल्पों की तलाश&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मीडियाचालन की प्रक्रिया समाज और राजनीति को अपने स्वार्थ के हिसाब से मोड़ रही है. पूंजीवादी लोकतंत्र में भी इस बात की ज़रूरत होती है कि शासकों से शासितों तक सूचनाएं पहुंचती रहें और शासितों की सूचनाएं शासकों तक पहुंचती रहें. जनता के बीच विमर्श के लिए भी जगह बची रहे और मीडिया वॉच डॉग की भूमिका में दिखे. दूसरे शब्दों में प्रेस की स्वतंत्रता सिर्फ़ प्रेस के लिए नहीं है बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करना भी इसका काम है. (बेकर, 2007) इस लिहाज़ से लोकवृत (पब्लिक स्फ़ीयर) एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जहां लोग इकट्ठा होकर सामाजिक समस्याओं पर बात कर सकें. जिसका असर राजनीतिक पहलकदमी पर पड़े. यह बाज़ार और सरकार के अलावा एक ऐसी जगह है जहां जनता की अनसुनी आवाज़ों को सुना जाता है. इन जगहों पर हुई बातचीत जनता के बीच फ़ैलती है तो सरकार को उन आवाज़ों को सुनने के लिए मजबूर होना पड़ता है. जर्मन समाजशास्त्री हैबरमास (1989) ने अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी में यूरोपीय समाज के पब्लिक स्फ़ीयर का अध्ययन किया. तब कॉफ़ी हाउस और सैलून जैसी जगहें लोकविमर्श के केंद्र हुआ करते हैं. प्रिंट मीडिया के विकास ने पब्लिक स्फ़ीयर को नए मायने दिए. अख़बारों में भी लोगों की समस्याओं पर विमर्श सामने आने लगा. इस तरह मीडिया में आए बदलावों के साथ पब्लिक स्फ़ीयर भी बदलता गया. &lt;br /&gt;पिछले दो दशकों में भारतीय मीडिया ने ऐतिहासिक बदलाव देखे हैं. आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में मीडिया का जबरदस्त विस्फोट हुआ है. अख़बार, रेडियो, टीवी, इंटरनेट जैसे माध्यम सूचना के सबसे महत्वपूर्ण स्रोत बन चुके हैं. कॉरपोरेट हाथों का खिलौना इस मीडिया से आने वाली सूचनाएं कितनी मीडियाचालित और छद्म हैं इस बात का ज़िक्र हम कर चुके हैं. अगर जनता सचेत होकर यथास्थिति का विरोध नहीं करेगी तो आने वाले दिनों में हालात और भी ख़तरनाक हो सकते हैं. जो भी है- जैसा भी है, हमारा सहा-सहा पब्लिक स्फ़ीयर भी काल के गाल में समा जाएगा. मीडियाकृत और मीडियाचालित सूचनाएं लोगों को समाज और राजनीति को लेकर पूरी तरह निष्क्रिय बना सकती हैं.&lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि मीडियाचालन की अवधारणा के सामने आने से पहले पूंजीवादी लोकतंत्र की राजनीति बहुत दूध की धुली थी. हां, अब उस राजनीति की बेईमानी में तथाकथित मुख्यधारा का मीडिया भी एक संस्थाऩ के तौर पर पूरी तरह भागीदार है. इस स्थिति से उबारने के लिए पूंजीवादी लोकतंत्र में जिस नागरिक समाज की नाम लिया जाता है. उसके कई घटक ख़ुद विश्वसनीयता का संकट झेल रहे हैं. स्वयंसेवी संस्थाओं की फंडिंग का सवाल उनकी ईमानदारी पर सवाल खड़ा कर रहा है. ज्यादातर एनजीओ या तो सरकार से मदद पाते हैं या फिर कॉरपोरेट घरानों से. हां, जनता के संसाधनों पर कब्ज़े के खिलाफ़ चलने वाले जन आंदोलन और उग्र वामपंथी आंदोलन पूरी ईमानदारी के साथ ज़रूर यथास्थिति और मीडियाकृत यथार्थ को चुनौती दे रहे हैं. देखा जाए तो इस तरह से यह काउंटर पब्लिक स्फ़ीयर का भी निर्माण कर रहे हैं. इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि अगर नागरिकों का कोई समूह मजबूत राजनीतिक विचारधारा से संचालित हो रहा हो तो वो मीडिया के प्रभाव में कम आता है. (मैककॉम्ब, 2004) इस तरह के काउंटर पब्लिक स्फ़ीयर समाज बदलाव के नए एजेंडे के साथ सामने आते हैं. जहां विमर्श एक रेखीय होने के बजाय बहुआयामी होता है. जिनमें बुर्जुआ पब्लिक स्फीयर की तरह ख़ास वर्ग, लिंग, अस्मिता का प्रभुत्व नहीं रहता है. इसकी मौजूदगी हमेशा मीडियाचालित राजनीति के वैकल्पिक तर्क को जीवित रखती है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;संदर्भ:&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;एलथीड, डेविड., और रॉवर्ट पी स्नो. 1988. टुवर्ड्स ए थ्योरी ऑफ़ मीडिएशन. इन कम्युनिकेशन ईयर बुक, संपादक-जेम्स ए एंडरसन. 11 एडिशन. न्यूबरी पार्क, सी ए : सेज&lt;br /&gt;एथलीड, डेविड., और रॉवर्ट पी स्नो. 1979. मीडिया लॉजिक, बीवर्ली हिल्स, सी ए : सेज  &lt;br /&gt;एथलीड, डेविड., और रॉवर्ट पी स्नो. 1991. मीडिया वर्ल्ड इन पोस्ट जर्नलिस्म एरा. न्यूयॉर्क. एल्दाइन दा ग्रुएतर.  &lt;br /&gt;बेकर, सी. एडविन. 2007. मीडिया कंसंट्रेशन एंड डेमोक्रेसी: व्हाई ऑनरशिप मैटर्स. न्यूयॉर्क, कैम्ब्रिज यूनीवर्सिटी प्रेस. &lt;br /&gt;हैबरमास, जुर्गेन. 1989. द स्ट्रक्चरल ट्रांसफ़ॉरमेशन ऑफ़ पब्लिक स्फ़ीयर. कैम्ब्रिज: मैशाचुएट्स यूनिवर्सिटी प्रेस. &lt;br /&gt;ह्ज़ारवर्ड, स्टिग. 2004. “फ्रॉम ब्रिक्स टू बाइट्स: मीडियाटाइजेशन ऑफ़ ग्लोबल टॉय इंडस्ट्री.”  यूरोपियन कल्चर एंड मीडिया.&lt;br /&gt;मैज़ोलिन, गियानपिएत्रो और विनफ्राइड शुल्ज़. 1999. “मीडियाटाइजेशन ऑफ़ पालिकिक्स: अ चैलेंज फ़ॉर डेमोक्रेसी?” पालिटिकल कम्युनिकेशन 16(3) &lt;br /&gt;लिपमन, वॉल्टर. 1997. पब्लिक ओपिनियन, न्यूयॉर्क: फ्रीप्रेस (मूल रूप में प्रकाशित. 1922)&lt;br /&gt;मेयर, थॉमस. 2002. मीडिया डेमोक्रेसी: हाव द मीडिया कॉलोनाइज पालिटिक्स. कैम्ब्रिज: पॉलिटी.&lt;br /&gt;मुद्गल, विपुल. 2011. मीडियाचालित समाज में लोकतंत्र. समयांतर (फरवरी) दिल्ली.&lt;br /&gt;निम्मो, डैन और जेम्स ई कॉम्स. 1983. मीडिएटेड पॉलिटिकल रिएलिटी. न्यूयॉर्क. लॉन्गमैन. &lt;br /&gt;शुल्ज, विनफ्रायड. 2004. रिकंस्ट्रक्टिंग मीडियाटाइजेशन एज एन एनालिटिकल कॉनसेप्ट. यूरोपियन जर्नल ऑफ़ कम्युनिकेशन.19(1) : 87-101&lt;br /&gt;स्ट्रामबैक, जेस्पर. 2008. फोर फेजेज ऑफ़ मीडियाटाइजेशन: एन अलानिसिस ऑफ़ द मीडियाटाइजेशन ऑफ़ पालिटिक्स द इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ प्रेस/पॉलिटिक्स. 13(3) 228-246. सेज&lt;br /&gt;सिंह, भूपेन. 2010. पैसे के बदले समाचार और प्रेस परिषद की असमर्थता. समयांतर (अक्टूबर). दिल्ली&lt;br /&gt;(कथादेश के मीडिया विशेषांक में प्रकाशित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2900056613410233002-235428778483622137?l=indiancoffeehouse.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/feeds/235428778483622137/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2900056613410233002&amp;postID=235428778483622137&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/235428778483622137'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/235428778483622137'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/2011/04/blog-post_04.html' title='मीडिया चालित राजनीति और राडिया कांड'/><author><name>bhupen</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05878017724167078478</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://bp2.blogger.com/_hhZqGrtQ7i4/R1Onhpa7xcI/AAAAAAAAAHY/jf-2bBrz7pI/S220/bhupen+1.color'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2900056613410233002.post-1627144253041464160</id><published>2011-04-04T10:41:00.001+05:30</published><updated>2011-04-04T11:00:32.052+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेख'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बीबीसी'/><title type='text'>पवित्र गाय नहीं बीबीसी !</title><content type='html'>ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग सर्विस (बीबीसी) हिंदी प्रसारण के जारी रहने पर कौन लोग ख़ुश हैं?  क्यों ख़ुश हैं ? यह ख़ुशी कितनी जायज़ है? इन बातों को जानने के लिए ज़रूरी है भारतीय मीडिया में बीबीसी के होने के मतलब समझे जाएं. उनकी नीर-क्षीर विवेचना की जाए. ऐसा तभी हो सकता है जब बीबीसी को पवित्र गाय मानने से बचा जाए. &lt;br /&gt;पिछले दिनों बीबीसी का हिंदी प्रसारण काफ़ी चर्चाओं में रहा है. बीबीसी ने पैसे की कमी का बहाना बनाकर छब्बीस मार्च दो हज़ार ग्यारह से हिंदी प्रसारण बंद करने का ऐलान कर दिया. बीबीसी वर्ल्ड ने ब्रिटिश सरकार के विदेश विभाग की तरफ़ से की गई सोलह फ़ीसदी बजट कटौती को इसकी वजह बताया. दुनियाभर के हिंदी श्रोताओं की तरफ़ से इस सिलसिले में काफ़ी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली. श्रोता भावुक होकर बीबीसी को ख़त लिखने लगे. इसे जारी रखने के लिए तरह-तरह से लॉबिंग भी की गई. इंटरनेट की सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अभियान चलाए गए. अरुंधती रॉय विक्रम सेठ, मार्क टुली और रामचंद्र गुहा समेत कई भारतीय बुद्धिजीवियों की तरफ़ से हिंदी प्रसारण को जारी रखने के लिए अपील  की गई. प्रवासी भारतीयों के दबाव में ब्रिटेन की संसद में भी यह मामला उठाया गया. आख़िरकार बीबीसी ने अपने फ़ैसले में हल्का सा बदलाव किया और घोषणा की कि फिलहाल प्रसारण को पूरी तरह बंद नहीं किया जाएगा. बल्कि उसे अब पहले के चार कार्यक्रमों के बजाय सिर्फ़ घंटेभर के एक कार्यक्रम तक सीमित कर दिया जाएगा. अब यह कार्यक्रम दो हज़ार बारह के छब्बीस मार्च तक चलेगा. इस बीच बीबीसी प्रबंधन इसके लिए निजी पूंजी तलाशने की कोशिश करेगा. अगर कामयाबी नहीं मिली तो प्रसारण को पूरी तरह बंद कर दिया जाएगा. &lt;br /&gt;बीबीसी की हिंदी सेवा के बंद होने का समाचार सुनने पर हिंदी समाज की तरफ़ से एक अजीब सी मातमी धुन सुनाई देने लगी थी. लोग सत्तर सालों के अपने अनुभव सुनाने लगे, यह बात भी सामने आई कि बीबीसी ने उनके व्यक्तित्व को बनाने में कितनी मदद की. उन्होंने कैसे बीबीसी सुनकर देश और दुनिया के बारे में जानना  और राय बनाना शुरू किया. नॉस्टेल्जिया से घिरे लोग बीबीसी की महानता के किस्से सुनाते नहीं थक रहे थे. अतीत के इस महिमा मंडन में तथ्य और आलोचनात्मक विवेक पूरी तरह ग़ायब थे. इसमें कोई दो राय नहीं कि बीबीसी ने भारतीय समाज को मत बनाने के मामले में कई तरह से प्रभावित किया है. हिंदी समाज ही क्या, उसने दुनिया के कई हिस्सों में प्रसारण से लोगों के बीच अपनी जगह बनाई है. उन्हें नए अंदाज में सूचनाएं पहुंचाने का काम किया, जो आम तौर पर राष्ट्रीय मीडिया नहीं करता था. इस संदर्भ में यह जानना जरूरी है कि क्या बीबीसी निस्वार्थ होकर दुनियाभर मे अपना प्रसारण चलाता रहा है या उसके पीछे कोई गहरे आर्थिक-राजनीतिक निहितार्थ थे. &lt;br /&gt;विदेश में बीबीसी प्रसारणों को अगर देखा जाए तो वो हमेशा ब्रिटिश साम्राज्यवाद को बढ़ावा देने वाला एक हथियार रहे हैं. भारत में इसकी शुरुआत आज़ादी से पहले मई उन्नीस सौ चालीस में इन्हीं लक्ष्यों की पूर्ति के लिए की गई थी. तब इसकी शुरुआत बीबीसी हिंदुस्तानी के नाम से हुई थी. आज़ादी के बाद देश की तरह ही बीबीसी का हिंदुस्तानी प्रसारण भी विभाजित हो गया. तब बीबीसी हिंदी और उर्दू नाम के दो प्रसारण अस्तित्व में आए. आज़ादी के बाद भले ही बीबीसी अपनी पुरानी वाली भूमिका में न रहा हो लेकिन वो महत्वपूर्ण मुद्दों पर भारतीय जनमत को प्रभावित करता रहा है. इस तरह वो हमेशा सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का एक महत्वपूर्ण  औज़ार रहा है. दुनियाभर के महत्वपूर्ण मुद्दों में उसने ब्रिटिश नज़रिए के मुताबिक़ भारतीय श्रोताओं के बीच भी जनमत बनाने का काम किया. वो चाहे इराक या अफ़गानिस्तान में साम्राज्यवादी घुसपैठ हो या लीबिया पर हमला, दक्षिण एशियाई मामलों में भी वो हर मुद्दे पर साम्राज्यवादी नज़रिए को ही प्रस्तुति करता रहा है. इन सारी आलोचनाओं के बावजूद इसमें कोई शक नहीं कि बीबीसी ने भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में एक ख़ास भूमिका निभाई है. &lt;br /&gt;बीबीसी हिंदी से कभी मशहूर अंग्रेजी उपन्यासकार जॉर्ज ऑरवेल, अभिनेता बलराज साहनी और पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल जैसे लोग भी जुड़े रहे हैं. वर्षों से देश की क़रीब एक करोड़ जनता सुबह साढ़े छह बजे प्रसारित होने वाले बीबीसी के समाचार कार्यक्रम से अपना दिन शुरू करती थी. इसके बाद आठ बजे का समाचार कार्यक्रम भी उसे सूचनाएं देता रहता था. शाम को साढ़े सात बजे का समाचार कार्यक्रम उसके लिए देश-दुनिया के दरवाजे खोलता था. अंत में रात साढ़े दस बजे आने वाला समाचार कार्यक्रम उसको ताज़ी घटनाओं से रू-ब-रू कराता रहा. अब बीबीसी के फ़ैसले के मुताबिक़ सिर्फ़ शाम साढ़े सात बजे से एक घंटे का समाचार कार्यक्रम पेश किया जाएगा. बीबीसी की अहमियत का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है प्रसारण बंद होने की ख़बर पर समाज के बाक़ी हिस्सों के अलावा बिहार में सक्रिय माओवादियों ने भी टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संवाददाता को बताया कि इससे उनके पास से मुख्यधारा के पक्षपाती मीडिया के विकल्प के तौर पर समाचार का एक महत्वपूर्ण श्रोत छिन जाएगा. आम तौर पर कम्यूनिस्ट विरोधी माने जाने वाले समाचार माध्यम के लिए माओवादियों का यह बयान किसी तारीफ़ से कम नहीं है. &lt;br /&gt;आज के दौर में तकनीकी विकास ने समाचार माध्यमों के चरित्र को बदल कर रख दिया है. नए मीडिया के उभार और मीडिया कंवर्जेंस की वजह से पुराने तकनीक पीछे छूटती जा रही है. पूंजीवादी विकास ने नई तकनीक  का इस्तेमाल नए तरीक़े से शुरू किया है. इस मामले में एक बात सच है कि जनसंचार के पुराने माध्यमों की जगह नए माध्यम पूरी तरह नहीं लेते हैं. पुराने माध्यम भी बचे रहते हैं लेकिन उनकी जगह सीमित हो जाती है. ख़ास तौर उन्हें चलाने वाली संस्थाओं की रुचि उन्हें चलाने में कम हो जाती है. बीबीसी भी इस उदाहरण से अगल नहीं है. उसका अंग्रेजी टेलीविजन चैनल बीबीसी वर्ल्ड न्यूज़ पहले से ही भारत में है. हिंदी चैनल आने की सुगबुगाहट बार-बार सुनाई देती रहती है. न्यूज़ वेबसाइट भी उसकी काम कर रही है. ऐसे में एक डूबते माध्यम में बने रहना उसे उचित नहीं लग रहा है. जो शॉर्ट वेव पर बहुत ही पुराने अंदाज में आज भी चल रहा हो. एफ़एम के जमाने में पुराने माध्यम का आकर्षण भले ही जनता में बना रहे, उसे चलाने वालों में अब वो मक़सद नहीं बचा. इसलिए अब बीबीसी इस माध्यम में तभी बचा रहना चाहता है जब उसे इससे कुछ मुनाफ़े की उम्मीद बंधे. दूसरा, भारत में आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया अपनाने के बाद मीडिया का ऐसा विस्फोट हुआ है कि अब बीबीसी का हिंदी प्रसारण पहले की तरह सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को आगे बढ़ाने में नाकाम है. इस काम को करने के लिए बाक़ी माध्यम अब ज़्यादा सक्षम हैं. समाज के जिस वर्ग तक बीबीसी हिंदी का ख़बरें जाती हैं उसके पास न तो ज़्यादा क्रय शक्ति है और न ही वो जनमत निर्माण की नेतृत्वकारी भूमिका में है. ऐसे दौर में बीबीसी के लिए इसे जारी रखना मुनाफ़े का सौदा नहीं है. वैश्वीकृत भारत में जनमत निर्माण करने और अपने देश की नीतियों का प्रचार-प्रसार करने के अब और भी कई माध्यम सामने आ चुके हैं. बीबीसी रेडियो को बंद करने की ये बड़ी बजहें हैं. बीबीसी, हिंदी ही नहीं एक-एक कर कई भाषाओं प्रसारणों को बंद कर रही है. प्रबंधकों का तर्क यही है कि अब वो समाज ख़ुद इतने उन्नत हो गए हैं या उनका अपना मीडिया संम्पन्न हो गया है इसलिए अब वहां बीबीसी की जरूरत नहीं रही. &lt;br /&gt;बीबीसी इसी साल अपने छह और रेडियो प्रसारणों को बंद करने की घोषणा कर चुका है. इसके अलावा पांच भाषाओं में वेबसाइट समेत पूरी तरह से ताला लगाने की ऐलान किया जा चुका है. इनमें नेपाली भाषा का प्रसारण भी शामिल है. पड़ोसी देश नेपाली सामाजिक संगठन इन पंक्तियों के लिखे जाने तक प्रसारण को जारी रखने के लिए ब्रिटिश सरकार से अनुरोध कर रहे थे. बीबीसी के ऐलान के दायरे में सत्तर साल से चल रहे सर्बियाई और लेटिन अमेरिकी प्रसारण भी शामिल हैं. इनके अलावा अफ़्रीका के पुर्तगाली और कैरेबियाई देशों के अंग्रेजी प्रसारण भी बंद करने की घोषणा की है. इन सभी सेवाओं की शुरुआत भी ब्रिटिश एजेंडे को लागू करने के लिए की गई थी. यह बात जग जाहिर है कि लेटिन अमेरिकी सेवा की शुरुआत नाजी प्रचार को रोकने के लिए की गई थी. बीबीसी ने जिस भी देश में अपने रेडियो प्रसारण शुरू किए थे उसके पीछे उसके साम्राज्यवादी हित हमेशा प्रमुख रहे हैं. आज भी ब्रिटिश सरकार अपने पुराने उपनिवेशों के बारे में बहुत बदली राय नहीं रखती है. बीबीसी हिंदी सेवा को बंद करने के सिलसिले में ब्रिटिश संसद में चली बहस पर भी नज़र डालें तो वहां सांसद हिंदी सेवा को चलाए जाने के पक्ष में बीबीसी प्रबंधकों को यही तर्क देते हैं कि भले ही भारत में मीडिया का असीमित विकास हुआ हो लेकिन आज भी वहां के गरीब राज्यों में ब्रिटेन का सीधा संवाद कायम करने में बीबीसी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है इसलिए उसे बंद नहीं किया जाना चाहिए. सांसद एडवर्ड ली का कहना है कि बीबीसी भारत और ब्रिटेन के रिश्तों को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. &lt;br /&gt;बीबीसी को जीवनदान मिलने की वजह से बीबीसी हिंदी सुनने वाले ज़्यादातर लोगों में ख़ुशी की लहर है. लेकिन वे इस बात की अनदेखी कर रहे हैं कि बीबीसी ने अतीत में किस तरह की नीतियों को बढ़ावा दिया. बाहरी तौर पर उसकी ख़बरों में जो निष्पक्षता नज़र आती है वो किस तरह निर्मित होती है.  बीबीसी ने भारत के दूर-दराज के इलाक़ों में अपनी जो पहुंच बनाई है और लोगों तक जिस तरह से सूचनाएं पहुंचाई है और विश्वसनीयता हासिल की है उसका अपना आलोचनात्मक महत्व है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ऐसा सिर्फ़ बीबीसी ही कर सकता है. सवाल उठाने का वक़्त है कि शहर केंद्रित भारतीय कॉरपोरेट मीडिया से जनता  के मुद्दों को उठाने और ग्रामीण जनता को केंद्र में रखने की अपेक्षा तो की नहीं जा सकती लेकिन ऐसा क्यों नहीं है कि भारत में पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग को ज़्यादा स्वतंत्र और मजबूत किया जाए. उसे जनता के बीच विश्वसनीयता दिलाने की कोशिश की जाए. ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि ऑल इंडिया रेडियो सिर्फ़ सरकारी भौंपू न लगे और दूरदर्शन सरकार का जनसंपर्क विभाग न लगे. इसके लिए बीबीसी को लेकर चल रहे रुदन के बीच हमारे समाज में प्रसारण माध्यमों की राजनीति पर बात की जाए. कोई भी माध्यम राजनीति से परे नहीं है. समाचार माध्यमों को ज़्यादा ज़िम्मेदार बनाने के लिए उस राजनीति को समझा जाए, जिससे मीडिया संचालकों पर दबाव बनाया जा सके. ऐसा तभी होगा जब सभी माध्यमों के अंतर्रविरोधों को गहराई से समझने की कोशिश की जाए. मिथकों और रूढ़ियुक्तियों से बाहर निकालकर मीडिया को सही परिप्रेक्ष्य में सामने  रखा जाएगा.&lt;br /&gt;बीबीसी किसी भी लिहाज़ से दूध का धुला संगठन नहीं है. उसने एक सुनियोजित रणनीति के तहत पहले हिंदी प्रसारण में काम करने वाले कर्मचारियों को लंदन से भारत भेजना शुरू किया फ़िर प्रसारण बंद करने की घोषणा कर दी. कर्मचारियों में अपने रोजगार को लेकर आशंका बनी हुई है. इससे ज़ाहिर होता है कि इस संगठन में कर्मचारी अधिकारों की किस तरह अनदेखी की जा रही है. यह बात सही है कि भारतीय मीडिया में काम करने वाले मीडियाकर्मी कई बार बीबीसी में काम करने की बेहतर स्थितियों की दुहाई देते हैं लेकिन हाल में जिस तरह से बीबीसी कर्मचारियों के साथ व्यवहार हुआ है उससे ज़ाहिर होता है कि वहां श्रम अधिकारों की कैसे अनदेखी की जाती है. बीबीसी अगर अपना हिंदी प्रसारण बंद करता है तो उसे अपने सभी कर्मचारियों के लिए रोजगार की वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए. वहां काम करने वाले सभी पत्रकार-मजदूरों के साथ एकता दिखाते हुए कहा जा सकता है कि बीबीसी अगर देश छोड़कर चली भी जाए तो दुनिया नहीं डूबने वाली है, आवाज़ अपने पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग को सही करने के लिए क्यों न उठाई जाए ? &lt;br /&gt;बीबीसी पूरी दुनिया में पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग का एक महत्वपूर्ण नमूना रहा है बीबीसी रेडियो की शुरुआत पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्काटिंग के विचार के तरह उन्नीस सौ सत्ताईस में हुई थी. तब इसे लाइसेंस फ़ीस देकर ही सुना जा सकता था लेकिन उन्नीस सौ इकहत्तर में रेडियो से लाइसेंस फ़ीस हटा दी गई. अब इसका संचालन टेलीविजन लाइसेंस फ़ीस और बीबीसी की व्यावसायिक सेवाओं से हुई आमदनी से होता है. यानी ब्रिटेन का कोई भी दर्शक अगर टेलीविजन देखेगा तो उसे लाइसेंस फीस देनी होती है, चाहे वो बीबीसी चैनल देखे या न देखे. वैश्वीकरण के दौर में बीबीसी अब अपनी आय के लिए कई नए तरीक़े अपना रहा है. बीबीसी वर्ल्डवाइड लिमिटेड नाम की उसकी व्यावसायिक शाखा बीबीसी के लिए पैसे जुटाने का काम करती है. अभी बीबीसी का काम दो तरह से चलता है एक तो लाइसेंस फीस और दूसरा वर्ल्ड वाइड लिमिटेड के माध्यम से. बीबीसी के कई देशों में चैनल चलते हैं जिनका मक़सद शुद्ध तौर मुनाफ़ा कमाने के अलावा ब्रिटिश नीतियों को प्रचारित करना है.  &lt;br /&gt;ब्रिटिश पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग सिस्टम की आंख मूंद  कर तारीफ़ करने वाले लोगों को झटका लग सकता है कि बीबीसी भी लोक कल्याण की बजाय मुनाफ़े का कारोबार करता है. बीबीसी की व्यावसायिक शाखा बीबीसी वर्ल्डवाइड लिमिटेड दुनिया के कई देशों में एक मल्टीनेशनल कंपनी के तौर पर काम कर रही है. हमारे यहां भी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप की बाज़ारू पत्रिका फेमिना और फ़िल्मफ़ेयर में भी उसकी पचास-पचास फ़ीसदी की हिस्सेदारी है. इसके अलावा वो अंबानी  ग्रुप के बिग एफ़एम रेडियो में भी कंटेट का साझीदार है, जिसके तहत बीबीसी मिनट्स नाम से चटपटी सामग्री परोसी जाती है. मिड डे (जागरण समूह) के एफ़एम रेडियो वन में भी बीबीसी का हिस्सा है. फिलहाल भारत में एफ़एम रेडियो में बीस फ़ीसदी तक विदेशी निवेश की इज़ाजत है. रेडियो समाचार में निजी निवेश की अनुमति नहीं है, इसलिए अभी इसमें व्यावसायिकता नहीं बढ़ी है, लेकिन सरकार पर निजी निवेश को अनुमति देने के लिए तमाम तरह के देसी और विदेशी संगठन दबाव डाल रहे हैं. भारत में रेडियो पर समाचार प्रसारित करने का अधिकार सिर्फ़ आकाशवाणी को है इसलिए बीबीसी हिंदी का प्रसारण ओमान (शॉर्ट वेव पर) और नेपाल (मीडियम वेव) के ट्रांसमीटरों से होता है. &lt;br /&gt;ऊपर बताया जा चुका है कि बीबीसी मनोरंजन के भारतीय बाज़ार में उतर कर मुनाफ़ा कमा रहा है. ऐसे में साबित होता है पैसे की कमी सिर्फ़ एक बहाना है असली वजह कुछ और है. जिसकी जटिलता को भावुक टिप्पणियों के ज़रिए नहीं समझा जा सकता है. &lt;br /&gt;(समयांतर के अप्रैल अंक में प्रकाशित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2900056613410233002-1627144253041464160?l=indiancoffeehouse.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/feeds/1627144253041464160/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2900056613410233002&amp;postID=1627144253041464160&amp;isPopup=true' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/1627144253041464160'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/1627144253041464160'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='पवित्र गाय नहीं बीबीसी !'/><author><name>bhupen</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05878017724167078478</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://bp2.blogger.com/_hhZqGrtQ7i4/R1Onhpa7xcI/AAAAAAAAAHY/jf-2bBrz7pI/S220/bhupen+1.color'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2900056613410233002.post-5184607751263285629</id><published>2011-02-02T15:30:00.001+05:30</published><updated>2011-02-02T15:34:03.661+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेख'/><title type='text'>2010 : कॉरपोरेट मीडिया के बेनकाब होने का साल</title><content type='html'>दो हज़ार दस का साल भारतीय समाचार मीडिया के चरित्र को समझने के लिहाज़ से काफ़ी महत्वपूर्ण रहा. पहली बार जनता के सामने ये बात खुल कर आ पाई कि कॉरपोरेट घराने, मीडिया के इस्तेमाल से किस तरह सत्ता का सौदा करते हैं और उसे अपने हित में इस्तेमाल करते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो इस बात की पोल खुल गई कि बड़ी पूंजी, मीडिया और राजनीतिज्ञों का गठजोड़, किस तरह उदारीकरण, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र जैसे ख़ूबसूरत शब्दों की आड़ में झूठ, फ़रेब और बेईमानी का साम्राज्य चलाता हैं. &lt;br /&gt;दो हज़ार नौ में लोकसभा चुनाव के अलावा हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव भी हुए थे. इन चुनावों में कई अख़बारों पर आरोप लगा कि वे पार्टियों और उम्मीदवारों के पक्ष में ख़बर छापने के लिए पैसे मांग रहे हैं. हालांकि इस तरह की ख़बरें पहले हुए कुछ चुनावों में भी सामने आ चुकी थी. 2007 में हुए उत्तराखंड विधानसभा चुनाव के दौरान भी मीडिया घरानों ने ख़बरों का सौदा शुरू कर दिया था. टाइम्स ऑफ़ इंडिया, मीडियानेट और प्राइवेट ट्रीटी के माध्यम से क़रीब दो दशक पहले ही ख़बरें बेचने का सांस्थानिक तरीक़ा तलाश चुका था. लेकिन दो हज़ार नौ की घटना के बाद पेड न्यूज़ चर्चा में आ गया. लखनऊ से सांसद का चुनाव लड़ रहे भाजपा नेता लाल जी टंडन ने दक्षिणपंथी रुझान वाले दैनिक जागरण की तरफ़ से पैसा मांगने पर याद दिलाया कि उन्होंने जागरण के लिए क्या नहीं किया, फिर भी वो पक्ष में ख़बर छापने के लिए पैसे मांग रहा है. चौतरफ़ा चर्चा होने के बाद प्रेस काउंसिल ने पेड न्यूज़ के मामले में अपनी पहल पर दो सदस्यीय जांच कमेटी का गठन किया. दो हज़ार दस में इस  कमेटी ने काउंसिल को अपनी रिपोर्ट सौंप दी लेकिन प्रेस परिषद ने कॉरपोरेट लॉबी के दबाव में पूरी रिपोर्ट को सामने नहीं आने दिया. पूरी रिपोर्ट में उन अख़बारों का नाम लिया गया था जिन्होंने पक्ष में ख़बर छापने के बदले पैसे लिए थे.  भले ही प्रेस परीषद ने आधिकारिक तौर पर पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की लेकिन आउटलुक पत्रिका ने अपनी वेबसाइट में पूरी रिपोर्ट प्रकाशित कर दी. उसके बाद समयांतर पत्रिका ने भी इसके महत्वपूर्ण अंशों को हिंदी में अनुवाद कर प्रकाशित किया. &lt;br /&gt;पेड न्यूज़ (ख़बरों का सौदा) की घटना सामने आने के बाद एक बार फिर ये साफ़ हो गया कि भारतीय लोकतंत्र में किस तरह धंधेबाज़ मीडिया भ्रष्ट नेताओं के हाथ का खिलौना है. लेकिन हैरानी की बात ये है कि इस प्रसंग में न तो मीडिया घरानों पर लगाम कसने के लिए अब तक कोई  कार्रवाई हो पाई है और न ही ऐसे नेताओं को कटघरे में खड़ा किया गया है, जिन्होंने अपने पक्ष में ख़बर छापने के लिए अख़बारों को पैसे दिए. इस पूरे मामले में अख़बारों के काम को सिर्फ़ एक विचलन के तौर पर देखा गया. इसमें ना तो पूरी तरह मुनाफ़ाखोरी में बदलती पत्रकारिता पर कोई सवाल उठाया गया और न ही पूंजी पर टिकी चुनाव व्यवस्था की पोल खोली गई. हैरानी की बात ये है कि जिन नेताओं ने पक्ष में ख़बर छापने के लिए अख़बारों को पैसे दिए उन्हें किसी पीड़ित की तरफ़ पेश किया गया. इस पूरी घटना से एक बात साफ़ हो गई कि मुनाफ़ाखोरी पर टिका कॉरपोरेट मीडिया पैसे वाले राजनीतिज्ञों के साथ मिलकर सत्ता की सौदेबाज़ी करता है. इस घटनाक्रम में प्रेस परिषद जैसी संस्था के बारे में भी ये साफ़ हो गया कि उसकी संरचना और उसका काम कॉरपोरेट  हितों के अनुरूप ही  है. कॉरपोरेट, पेड न्यूज़ और लोकतंत्र के रिश्तों को परिभाषित करते हुए इस साल पत्रकार दिलीप मंडल ने मीडिया का अंडवरवर्ल्ड नाम से एक किताब भी लिखी है, जो कॉरपोरेट मीडिया के चेहरे से नकाब उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.  &lt;br /&gt;साल के आख़िर में 176 हज़ार करोड़ रुपए के टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले के उजागर होने के बाद कॉरपोरेट, मीडिया और राजनीतिज्ञों के गठजोड़ की पोल पूरी तरह खुल गई. कॉरपोरेट दलाल नीरा राडिया के साथ बातचीत के टेप सामने आऩे के बाद ये साफ़ हो गया कि टाटा और अंबानी जैसे बड़े व्यावसायिक घराने किस तरह मीडिया का इस्तेमाल करते हैं और देश की सरकार बनाने में भी भूमिका निभाते हैं. इस घटना से एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई कि इस देश में तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया का मतलब कॉरपोरेट मीडिया है, मुनाफ़ा कमाना जिसका पहला लक्ष्य है. ज़्यादातर चर्चाओं में इस पूरी घटना को इस तरह पेश करने की कोशिश की जा रही है कि ये कॉरपोरेट, मीडिया और राजनीतिज्ञों के गठजोड़ का मामला है. लेकिन इस संदर्भ में ध्यान देने वाली बात ये है कि मीडिया और लोकतंत्र का अस्तित्व कॉरपोरेट से अलग नहीं रह गया है. जिस तरह हमारा मुख्यधारा का मीडिया कॉरपोरेट मीडिया में बदल चुका है उसी तरह हमारा लोकतंत्र भी पूरी तरह कॉरपोरेट लोकतंत्र में तब्दील हो चुका है. इस लिहाज से  देखा जाए तो कॉरपोरेट हितों के हिसाब से ही हमारा मीडिया भी चल रहा है और हमारा लोकतंत्र भी चल रहा है. अभी जो घटनाएं दिखाई दे रही हैं वो सिर्फ़ झांकी भर है, पूरा खेल काफी गंभीर है. उम्मीद की जानी चाहिए कि आगे इस कांड में और भी तथ्य सामने आएंगे. &lt;br /&gt;ये बात सही है कि राडिया कांड कॉरपोरेट घरानों के आपसी विवाद के चलते ही सामने आ पाया. लेकिन इसी बहाने अब लोग पर्दे के पीछे चलने वाले कॉरपोरेट खेल को समझने लगे हैं. इस लिहाज़ से ये साल कॉरपोरेट मीडिया की छवि के दरकने का साल भी है. एनडीटीवी और द हिंदू जैसे गंभीर और तथाकथित जनपक्षीय माने जाने वाले टीवी चैनलों और अख़बारों की असलीयत भी पूरी तरह जनता के सामने आ चुकी है. प्रणव रॉय ने एनडीटीवी का साम्राज्य बनाने के लिए कितने कुकृत्य किए हैं इस पर से भी पर्दा उठने लगे है. प्रणव रॉय़ का इतिहास इस मामले में कॉरपोरेट अपराधों और साजिशों की तरफ़ इशारा करने वाला है. इस सिलसिले में द संडे गार्डियन में ख़बर छपते  ही मीडिया के हलकों में खलबली मच गई. इसी तरह हिंदू जैसे अख़बार ने भले ही पेड न्यूज़ को लेकर संपादकीय और पी. साईनाथ के कई लेख छापे हों लेकिन नीरा राडिया केस में इस ग्रुप के ही बिजनेस लाइन के संपादक और नीरा राडिया की बातचीत का टेप भी सामने आ चुका है. एक टेप में तो द हिंदू के संपादक एन राम का भी जिक्र है. इसलिए मुनाफ़ाखोरी पर टिका मीडिया कितना ही न्यायसंगत और प्रगतिशील क्यों न दिखाई दे उससे बहुत ज़्यादा उम्मीदें पालना ठीक नहीं. उदाहण के लिए द हिंदू ने इस इस बार मीडिया क्रिटिक सेवंती नैनन का राडिया कांड पर लिखा कॉलम अख़बार में छापने से मना कर दिया. इन सब बातों से पता चलता है कि कॉरपोरेट मीडिया की असलीयत क्या है. इसलिए अब ज़रूरी हो गया है कि मीडिया में नैतिकता की बात जोर-शोर से उठाई जाए और पत्रकारिता को  सिर्फ़ पूंजीपतियों के हवाले गिरवी रखने का विरोध किया जाए. इस बारे में ठोस नियम-क़ायदों की मांग हर हाल में की जानी चाहिए. अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब कॉरपोरेट लूट-खसोट की आज़ादी से बिल्कुल नहीं होना चाहिए. &lt;br /&gt;अंतरराष्ट्रीय मीडिया की घटनाओं को देखें तो ये साल विकिलीक्स और जूलियन अंसाज का साल है. जूलियन अंसाज ने अपने साथियों के साथ वो काम कर दिखाया है जिसे करने में कॉरपोरेट मीडिया मुनाफ़ा ना मिलने की हालत में अक्सर बच के निकलता रहा है. अंसाज ने जिस तरह से अपनी वेबसाइट विकिलीक्स में सत्ता से जुड़े लोगों की जनविरोधी करतूतों से दुनियाभर को जागरूक किया है. विकिलीक्स ने पर्दाफ़ाश किया है कि अमेरिका ने अपनी ज़िद की ख़ातिर इराक और अफ़गानिस्तान पर किस कदर सितम ढाए थे. इस बात से बौखलाया अमेरिका अंसाज के पीछे पड़ गया है. यही वजह है कि ऑस्ट्रेलियाई नागरिक असांज को ब्रिटेन में गिरफ़्तार किया गया है. उस पर अमेरिकी खुफ़िया एजेंसी के दबाव में दो महिलाओं ने स्वीडन में बलात्कार का केस दर्ज किया है. इस घटना ने एक बार फिर मीडिया में तकनीकी विकास की वजह से आ रही नई स्थितियों  को हमारे सामने रखा है. ये बात सही है कि अभी इंटरनेट या न्यू मीडिया तक सभी वर्गों की पहुंच संभव नहीं हो पाई है. लेकिन विकिलीक्स के जो  काम किया है उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती. हाल के दौर मे जिस तरह से कई नए ब्लॉग और साइट्स हमारे सामने आए हैं उससे भी पता चलता है कि इस मीडिया पर फिलहाल ज़्यादा लोकतांत्रिक जगह मौजूद है. ऐसा नहीं है कि ये माध्यम पूरी तरह से कॉरपोरेट हस्तक्षेप से मुक्त है लेकिन असांज जैसे गुरिल्ला पत्रकारिता के कुछ उदारहणों के लिए ये ज़्यादा बेहतर जगह मुहैया करा रहा है.   &lt;br /&gt;इधर, हमारे देश में  भी हालात ऐसे बन रहे हैं कि जो भी पत्रकार असहमति की आवाज़ उठाएगा, कॉरपोरेट लोकतंत्र के लिए चुनौती खड़ा करेगा वो मारा जाएगा.  कुल मिलाकर जैसा हमारा समाज है, वैसा ही मीडिया है. यही वजह  है कि जब शासक वर्ग देश के विकास की तस्वीर दिखाता है तो कॉरपोरेट मीडिया उसके सुर में सुर मिलाकर राष्ट्रीय गौरव के गीत गाने लगता है. तब भारत को दुनिया में एक सुपर पावर की तरह देखने और ग्रोथ रेट के हिसाब से देश का विकास मापने का चलन स्थापित हो जाता है. जो भी इस विकास की पोल खोलता है वो ना तो कॉरपोरेट लोकतंत्र के काम का होता है ना ही मीडिया के. यही वजह है कि जब इस साल आंध्र प्रदेश पुलिस ने वामपंथी पत्रकार हेमचंद्र पांडे की सीपीआई (माओवादी) के प्रवक्ता आज़ाद के हत्या साथ फर्जी मुठभेड़ में हत्या की तो कॉरपोरेट मीडिया को इसमें कोई ख़बर नज़र नहीं आई. पुलिसिया फीडबैक पर काम करते हुए वो इस बात में ज़्यादा उलझा रहा कि हेम चंद्र पांडे का माओवादी पार्टी से कोई संबंध तो नहीं था. उसने इस विवेक का इस्तेमाल करने की ज़रूरत नहीं समझी कि हेम चंद्र पांडे अगर माओवादी भी थे तो क्या पुलिस को उन्हें फर्जी मुठभेड़ में मारने का अधिकार मिल जाता है ?  अच्छी बात ये है कि देशभर के जनवादी पत्रकारों ने हेम की हत्या का विरोध किया और पत्रकारों की अंतरराष्ट्रीय बिरादरी ने भी इस हत्याकांड की निंदा की. लेकिन पैसे के बल पर बड़े पत्रकार बने किसी भी कॉरपोरेट एजेंट ने इस घटना पर  जुबान नहीं खोली, नई दुनिया के संपादक आलोक मेहता की तरह अगर किसी ने जुबान खोली भी तो उसने हेम को पत्रकार मानने से ही इनकार कर दिया. इस तरह के पत्रकार जब अपने बंद एसी कमरों से बाहर जनता के बीच आते हैं तो उन्हें जनता का आक्रोश झेलना पड़ता है. आलोक मेहता के साथ भी हिंदी पत्रिका हंस के सालाना जलसे में यही हुआ. समारोह में मौजूद युवाओं ने उनके ख़िलाफ़ नारेबाज़ी की. कुल इसी तरह का हाल प्रेस क्लब में हुई एक मीटिंग में राजदीप सरदेसाई का भी था. जब राडिया कांड में दलाल पत्रकारों को सही साबित करने वाली उनकी मनमानी व्य़ाख्याओं के ख़िलाफ़ पत्रकारों ने कड़ा विरोध दर्ज किया. &lt;br /&gt;ख़ुफिया एंजेंसियां और कॉरपोरेट हमेशा कुछ पत्रकारों को ख़बरें प्लांट करने के लिए इस्तेमाल करते हैं. बरखा, वीर सांघवी और प्रभु चावला वाला केस सामने आने से पहले इस साल एनडीटीवी की नीता शर्मा का मामला चर्चा में आया. नीता शर्मा को इस साल सर्वश्रेष्ठ समाचार रिपोर्टर का पुरस्कार मिला. द हिंदू  के पत्रकार सिद्धार्थ वर्दराजन ने इस पुरस्कार के ख़िलाफ़ जूरी के सदस्य विनोद मेहता को ख़त लिखा. इसके बाद नीता शर्मा के ख़िलाफ़ पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग सामने आया. नीता ने कभी हिंदुस्तान टाइम्स में रहते हुए कश्मीर टाइम्स के दिल्ली संवाददाता इफ्तिख़ार गिलानी को पुलिस के कहने पर आतंकवादी ठहरा दिया था. जिसके परिणामस्वरूप गिलानी को काफी समय जेम में भी बिताना पड़ा. वहीं उन्होंने निर्दोष होने के बावजूद प्रताड़ना झेलने वाले अपने पअनुभवों पर एक किताब भी लिखी. गौरतलब है कि कुछ इसी तरह की इकतरफ़ा ख़बरें आजकल टाइम्स ऑफ़ इंडिया की राखी चक्रवर्ती भी दे ऱही है. कॉरपोरेट, पुलिस और सरकार के ऐसे एजेंट पत्रकारों की संख्या अकेले दिल्ली में ही सैंकड़ों में है. जहां आम श्रमजीवी पत्रकार को अपनी नौकरी गंवाने का डर रहता है. वहीं ऐसे पत्रकारों को लाखों-करोड़ों रुपए  की अश्लील तनख्वाह मिलती है और पुरस्कार अलग से मिलते हैं. पिछले दरवाज़े से आने वाले पैसे को कोई हिसाब यहां नहीं है. आम लोगों को ये जानकार हैरानी हो सकती है कि सीएनबीसी चैनल के एक संपादक ने इस साल छह करोड़ रुपए का वैध टैक्स चुकाया है. &lt;br /&gt;दो हज़ार दस में दिल्ली से निकलने वाले बिजनेस स्टैंडर्ड में काम करने वाली पत्रकार निरुपमा की उसके घर कोडरमा (झारखंड) में हुई मौत ने भी मीडिया और हमारे समाज पर कई सवाल खड़े किए. इस घटना के बाद उसके मां-बाप पर ही हत्या के आरोप लगे. निरूपमा अपने अपनी मर्जी से अंतर्जातीय विवाह करना चाहती थी लेकिन उसके परिवार को ये मंजूर नहीं  था. इस तरह सामंती समाज की जकड़न तोड़ रही एक लड़की की आवाज़ को हमेशा के लिए शांत कर दिया. इस मामले को स्थानीय मीडिया ने जिस तरह से उठाया उससे पता चला कि हमारे मीडिया में जातीय गोलबंदी भी किस हद तक फ़ैली हुई है. दिल्ली के कुछ पत्रकार भी इस मामले में जातीय गोलबंदी करते देखे गए. इस बात को ध्यान में रखते हुए न्यूज़ रूम विविधता का सवाल एक बार फिर महत्वपूर्ण हो जाता है. जिसमें दलित, आदिवासियों के साथ ही हर सामाजिक तबके लोगों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके. &lt;br /&gt;इस साल एक ख़ास बात और हुई कि राडिया कांड में बरखा दत्ता, वीर सांघवी, प्रभु चावला, राजदीप सरदेसाई, एमके वेणु जैसे कई स्वनामधन्य पत्रकारों का नाम आने के बाद उनके पक्ष में भी माहौल बनाने की कोशिशें चल रही है. हेमचंद्रपांडे के पत्रकार होने ना होने पर जिस तरह कॉरपोरेट मीडिया ने सवाल उठाए वैसे कोई इस बात पर सवाल नहीं उठा रहा है कि राजदीप सरदेसाई पत्रकार हैं या नहीं ? अगर पत्रकार है तो वो शख़्स अपनी कंपनी का मालिक कैसे हो सकता है. क्या मालिक और पत्रकार के हित आपस में नहीं टकराते? यही सवाल अपनी कंपनी में मालिकाना हक़ रखने वाले प्रणव रॉय और बरखा दत्त जैसे लोगों से भी पूछा जा सकता है. &lt;br /&gt;अंत में दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स की भी थोड़ी-सी चर्चा करना ज़रूरी है. इस दौरान भी धंधेबाज़ मीडिया के ख़ूब वारे-न्यारे हुए. जिनको आर्थिक फ़ायदे नहीं मिले वो आयोजन की अव्यवस्थाओं के बारे में लिखता रहा. लेकिन जैसे ही गेम शुरू हुए, विज्ञापनों का फ्लो बढ़ा नकारात्मक ख़बरें आनी बंद हो गईं. अब कॉमनवैल्थ खेलों के दौरान हुए भ्रष्टाचार को राडिया कांड ने पूरी तरह ढक दिया है. हो सकता है कि आने वाले दिनों में कोई प्रायोजित बड़ी घटना हो जाए और स्पेक्ट्रम घोटाला और राडिया कांड कभी पृष्ठभूमि में चला जाए. लेकिन इस सब के बावज़ूद इतना तय है कि अब बोतल से बाहर निकले जिन्न को फिर से बंद करना इतना आसान  भी नहीं होगा. लोगों के पास कॉरपोरेट मीडिया की हक़ीक़त समझाने वाले कई उदाहरण सामने आ चुके हैं. इस बात का ज़रूर ध्यान रखना होगा कि कॉरपोरेट मीडिया जिस तरह एजेंडा सेट करता है, वो बीच में ही कहीं  एजेंडा ना बदल दे.  &lt;br /&gt;(समकालीन जनमत के जनवरी अंक में प्रकाशित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2900056613410233002-5184607751263285629?l=indiancoffeehouse.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/feeds/5184607751263285629/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2900056613410233002&amp;postID=5184607751263285629&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/5184607751263285629'/><link 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धुंधलाती रेखा</title><content type='html'>प्रणव रॉय, राजदीप सरदेसाई, बरखा दत्त, अरुण पुरी, रजत शर्मा, राघव बहल, चंदन मित्रा, एमजे अकबर, अवीक सरकार, एन राम, जहांगीर पोचा और राजीव शुक्ला का परिचय क्या हैं? ये पत्रकार हैं या व्यवसायी? बहुत सारे लोगों को ये सवाल बेमानी लग सकता है. लेकिन भारतीय मीडिया में नैतिकता का संकट जहां पहुंचा है, उसकी पड़ताल के लिए इन सवालों का जवाब तलाशना बहुत ज़रूरी हो गया है. इस लिहाज़ से पत्रकारीय मूल्यों और धंधे के बीच के अंतर्विरोधों का ज़िक्र करना भी ज़रूरी है. &lt;br /&gt;जो लोग न्यूज़ मीडिया को वॉच डॉग, समाज का प्रहरी या लोकतंत्र का चौथा स्तंभ जैसा कुछ मानते हैं, वे अपेक्षा करते हैं कि मीडिया सामाजिक सरोकारों से जुड़ा काम करेगा. वे नहीं मानते कि ख़बर सिर्फ़ एक उत्पाद है, जिसका धंधा किया जाना है. टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप उन्नीस सौ नब्बे के दशक में समीर जैन के प्रभाव में आने के बाद से ही इस बात को सामाजिक स्वीकृति दिलाने के प्रोपेगैंडा में जुटा है कि ख़बरें बिक्री की वस्तु के अलावा और कुछ नही हैं. इसलिए इस अख़बार में संपादक की बजाय ब्रैंड मैनेजर हावी होते जा रहे हैं, जो तय करते हैं कि अख़बार में वहीं  ख़बर छपेगी जो उनकी नज़र में बिकाऊ हो.  &lt;br /&gt;एक पत्रकार से हम लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्ष में खड़ा होने की अपेक्षा करते हैं. पत्रकार का धंधेबाज़ बन जाना इस पेशे की नैतिकता पर सवाल खड़ा करता है. व्यवसायी हमेशा पूंजी और मुनाफ़े की दौड़ में शामिल होता है. पत्रकार अगर व्यवसायी बनेगा तो निश्चित तौर पर व्यवसायी और पत्रकार के हित आपस में टकराएंगे. पत्रकारीय हितों को मुनाफ़े के हित बाधित करेंगे. यहां पर पत्रकारिता का इस्तेमाल मुनाफ़ा कमाने के लिए होने लगेगा इस बात में कोई शक नहीं. &lt;br /&gt;पेड न्यूज़ और नीरा राडिया परिघटना के सामने आने के बाद ये बात साबित हो गई है कि हमारे यहां पत्रकारिता, धंधेबाज़ी का पर्याय बनती जा रही है. इस संकट का मूल कारण जहां मीडिया का धंधेबाज़ बनना है, वहीं धंधेबाज़ मीडिया ने कई पत्रकारों को भी दलालों में बदल दिया है. ऐसी मीडिया कंपनियों में उच्च पदों पर काम करने वाले पत्रकारों को बड़ी-बड़ी अश्लील तनख़्वाहों के साथ कंपनी के शेयर का एक  हिस्सा भी दिया जाता है. ज़ाहिर है कि ऐसा करके उसे कंपनी को मुनाफ़े में लाने के लिए पत्रकारिता करने का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दबाव बनाया जाता है. पत्रकारिता और धंधे के बीच की लाइन के धुंधला होने से वामपंथी रुझान के माने जाने वाले कई तीस मार खां पत्रकार भी इस खेल में शामिल होकर धन्य हो रहे हैं. अब ये सवाल उठाने का वक़्त आ गया है कि कुछ साल पहले तक के सामान्य पत्रकार आख़िर करोड़पति-अरबपति कैसे बने हैं. नेताओं से संपत्ति की घोषणा करने और उसके स्रोत बताने की मांग करने वालों को अब ऐसे लोगों से भी सवाल पूछना पड़ेगा कि वे अपनी संपत्ति का व्यौरा दें. &lt;br /&gt;आज अगर मीडिया के पतन की गाथा को समझना है तो उसके लिए इसके ऑनरशिप पैटर्न यानी मालिकाने की असलियत को समझना ज़रूरी होगा. अब ये बात किसी से छिपी नहीं है कि किसी भी मीडिया हाउस से कैसी ख़बरें बाहर निकलेंगी उसके लिए सबसे ज़्यादा प्रभावी उसका मालिक ही होता है. वहां काम करने वाले पत्रकार अगर मालिक की मंशा के ख़िलाफ़ एक भी ख़बर सामने लाएंगे तो अगले पल ही उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा. आर्थिक उदारीकरण के दौर में शातिर लोग जानते हैं कि सीधे दलाली करने में कई मुश्किलें आ सकती हैं. इसलिए अगर कोई भी धंधा चमकाना है तो मीडिया के मालिकाने में अपना हिस्सा रखना ज़रूरी है. अंबानी बंधुओं ने कई मीडिया घरानों में ऐसे ही अपना पैसा नहीं लगया है!&lt;br /&gt;अब असली बात पर अगर आएं तो प्रणव रॉय अगर एनडीटीवी के मालिक हैं तो क्या एक पत्रकार के तौर पर उनके आर्थिक हित मालिक प्रणव रॉय से नहीं टकराते. यहीं बात सीएनएन-आईबीएन के मालिक राजदीप सरदेसाई, एनडीटीवी के मालिकाने में हिस्सेदार बरखा दत्त, टीवी 18 के मालिक राघव बहल, इंडिया टीवी के मालिक रजत शर्मा, पायनियर के मालिक चंदन मित्रा, न्यूज़ 24 के मालिक राजीव शुक्ला, द संडे गार्डियन के मालिक एमजे अकबर, आनंद बाज़ार पत्रिका, टेलीग्राफ़ और स्टार न्यूज़ के मालिक अवीक सरकार, द हिंदू के मालिक एन राम और इंडिया टुडे ग्रुप के मालिक अरुण पुरी के संदर्भ में भी पूछी जानी चाहिए. (इस मामले में अवीक सरकार और एऩ राम अपवाद हैं, आनंद बाज़ार पत्रिका समहू और द हिंदू समूह जिनको पारिवारिक विरासत में मिला, लेकिन सवाल यहां भी जस का तस है कि कोई एक ही व्यक्ति पत्रकार और मालिक क्यों रहे?). इन लोगों ने पत्रकारिता से मालिक बनने का सफ़र क्यों और कैसे तय किया है इस पूरे गोरखधंधे से अगर पर्दा हट जाए तो राडिया कांड से मिलता-जुलता एक और कांड सामने आ सकता है. मालिक-पत्रकारों की श्रेणी में सबसे ज़्यादा चौंकाने वाला नाम है न्यूज़ एक्स के मालिक जहांगीर पोचा का. कभी लंदन में पोचा की गहरी मित्र रही नीरा  राडिया ही उसके कर्मचारियों की तनख़्वाह दिया करती थी. राडिया और पोचा के बीच बातचीत के टेप सामने आने के बाद ये बात ज़ाहिर हो चुकी है. इस बात का भी पता चल चुका है कि बिजनेस वर्ल्ड का संपादक रहने के दौरान पोचा ने राडिया के क्लाइंट रतन टाटा की तारीफ़ में कई ख़बरें प्रकाशित की थीं.&lt;br /&gt;अब तक कई ऐसी बातें  सामने आ भी चुकी हैं. जो पत्रकार से मीडिया मुगल बने ऐसे लोगों के भयानक अतीत की तरफ़ इशारा करने वाली है. द संडे गार्डियन में प्रणव रॉय के बारे में छपी खबरें इस बात का ज्वलंत प्रमाण हैं. पत्रकारिता की आड़ में कैसे-कैसे खेल हो रहे हैं, इसे समझने के लिए ये जानना भी दिलचस्प होगा कि पिछले एक-दो दशक में कई पत्रकार, मालिक बन चुके हैं और कई मालिक पत्रकार की खाल ओढ़े अवतरित हो रहे हैं. इस पूरे घालमेल का मक़सद दोनों हाथों से मलाई बटोरने के अलावा और कुछ नहीं है. इस सिलसिले में नई दुनिया के मालिक अभय छजलानी का पत्रकारिता के हिस्से का पद्मश्री हड़प लेना एक मज़ेदार उदाहरण हो सकता है. पत्रकारों और मालिकों के एक-दूसरे के क्षेत्र में इतनी आसानी से छलांग लगाने की वजह से भारतीय पत्रकारिता बेईमानी और झूठ-फ़रेब का पर्याय बनती जा रही है. इस सब के बावजूद पत्रकारों का एक बड़ा हिस्सा है. जो श्रम बेचकर सम्मान अर्जित करने पर भरोसा करता है, सरोकारों की पत्रकारिता करता है.  जिसे मीडिया के दलाली में बदलने का गुस्सा है. अच्छी बात है कि ऐसे लोगों का गुस्सा फूटकर अब सामने आने लगा है. भले ही मालिक बने पत्रकार अपनी कंपनियों में पत्रकारों को उनके अधिकार न दे रहे हों, पत्रकार संगठनों को पनपने न दे रहे हों, इस बात के ख़िलाफ़ आम पत्रकारों की एकता की सुगबुगाहट एक बार फिर शुरू हो चुकी हैं.  &lt;br /&gt;पिछले दिनों प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में राजदीप सरदेसाई बरखा के कामों को सही साबित करने की  कोशिश कर रहे थे तो उनके ख़िलाफ़ आम पत्रकारों का गुस्सा फूट पड़ा. राजदीप का कहना था कि हो सकता है कुछ पत्रकार बरखा की प्रसिद्धि से जलने की वजह से भी उसके ख़िलाफ़ बोल रहे हों. उन्हें  इस बात का करारा जवाब उसी मीटिंग में मौजूद पत्रकार पूर्णिमा जोशी ने बहुत अच्छी तरह दिया. बीच-बीच में राजदीप की हूटिंग सुनकर उनकी पत्नी और सीएनएऩ-आईबीएन की एंकर सागरिका घोष को भयानक कष्ट हो रहा था. आम पत्रकारों का गुस्सा उनके लिए अशिष्ट था. इन पंक्तियों के लेखक के पीछे बैठी वे बोलती रही कि बातचीत में कोई सोफिस्टिकेशन तो होना ही चाहिए. राजदीप और सागरिका को उस दिन पता चला कि स्टूडियो में कैमरे के सामने मनमाने प्रवचन देने और जनता के सामने बोलने में कितना फ़र्क होता है. बाद में दिन की घटना से परेशान सागरिका ने ट्वीटर पर लिखा कि आम आदमी पत्रकार और सेलीब्रिटी पत्रकारों के बीच एक वर्गयुद्ध छिड़ चुका है. ज़ाहिर है कि इसमें आम आदमी पत्रकार का ज़िक्र हिकारत के तौर पर था. यहां यह याद दिलाना ज़रूरी है कि राजदीप ख़ुद नीरा राडिया से आपत्तिजनक बात करते हुए पकड़े गए हैं. लेकिन अब तब वे बड़ी शान से पत्रकारिता की आड़ में मालिकों की संस्था एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष बने हुए हैं. &lt;br /&gt;मीडिया की नैतिकता में आ रही गिरावट को अगर रोकना है तो एक छोटा सा कदम ये हो सकता है कि धंधेबाज़ों को धंधेबाज़ों के तौर पर ही पहचाना जाए. अख़बारों और न्यूज़ चैनलों का धंधा करने वालों के लिए भी कड़े नियम बनाए जाएं ताकि वे पत्रकारिता का इस्तेमाल अपने दूसरे धंधों को चमकाने में ना कर सकें. इस लिहाज़ से क्रॉस मीडिया होल्डिंग और क्रॉस बिजनेस होल्डिंग पर लगाम लगाना ज़रूरी है, यानी ऐसा ना होने पाए कि एक व्यक्ति फिल्म बनाए और अपने समाचार माध्यम में उसका प्रचार भी करे या कोई धन्ना सेठ अपने दो नंबर के धंधों को चलाने और सत्ता की दलाली के लिए मीडिया का मालिक बनकर उसका मनमाना उपयोग करे. प्राइवेट ट्रीटीज ( मीडिया कंपनी दूसरी व्यावसायिक कंपनी में हिस्सेदारी के बदले उसका मुफ़्त में प्रचार करे) का मामला भी मीडिया की नैतिकता के ख़िलाफ़ है. इस मामले में मालिकों की मुनाफ़ाखोरी के मुक़ाबले श्रमजीवी पत्रकारों की एकता इस गतिरोध को तोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. ईमानदार पत्रकारों की सामाजिक- आर्थिक न्याय के आंदोलनों में हिस्सेदारी ही हमारे सामने एक नए मीडिया परिदृश्य की रचना कर सकती है. &lt;br /&gt;(समयांतर के जनवरी अंक में प्रकाशित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2900056613410233002-6680910650989624736?l=indiancoffeehouse.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/feeds/6680910650989624736/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2900056613410233002&amp;postID=6680910650989624736&amp;isPopup=true' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/6680910650989624736'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/6680910650989624736'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='पत्रकारिता और धंधेबाज़ी के बीच धुंधलाती रेखा'/><author><name>bhupen</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05878017724167078478</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://bp2.blogger.com/_hhZqGrtQ7i4/R1Onhpa7xcI/AAAAAAAAAHY/jf-2bBrz7pI/S220/bhupen+1.color'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2900056613410233002.post-5779160615259968314</id><published>2010-12-13T18:30:00.002+05:30</published><updated>2010-12-13T18:39:53.847+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेख'/><title type='text'>इंसाफ़ की दुकान</title><content type='html'>राखी सावंत फिर चर्चा में है. इस बार इमेजिन टीवी पर प्रसारित होने वाला उसका शो राखी का इंसाफ़ विवादों के केंद्र में है. इस शो में हिस्सेदारी कर रहे झांसी के लक्ष्मण प्रसाद को राखी ने इस तरह जलील किया कि अपमान और अवसाद की वजह से उसने आत्महत्या कर ली. इस घटना के बाद राखी और उसके शो के बारे में तरह-तरह की चर्चाएं हैं. सूचना और प्रसारण मंत्रालय का कहना है कि इस शो में अश्लील भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है, नतीजतन इसके प्रसारण का वक़्त बदलकर रात नौ बजे के बदले ग्यारह बजे कर दिया गया, ताकि बच्चे इस शो को न देख पाएं. लेकिन इस घटना के मूल कारणों पर कोई भी सवाल उठाने का काम नहीं कर रहा है. एक इंसान को बेवजह मौत की तरफ़ धकेलने वाले इंसाफ़ पर हमारी सरकारें चुप्पी साधे हुए हैं. &lt;br /&gt;भारतीय लोकतंत्र में न्याय हासिल करना कितना आसान है ये बात किसी से छिपी नहीं है! राखी का ये कार्यक्रम न्याय के उसी पाखंड की उपज है. एक तरह से राखी का इंसाफ़ वर्तमान न्याय प्रणाली की पोल खोलने वाला भी है, ये न्याय की पूरी अवधारणा को एक मज़ाक में बदल देता है. चैनल दावा करता है कि वो लोगों के पारिवारिक झगड़ों को सुलझाएगा. यानी, न्याय के लिए अब लोकतांत्रिक संस्थाओं के पास जाने की ज़रूरत नहीं, राखी सावंत जैसी जज नए न्याय सिद्धांतों के साथ अवतरित हो चुकी है ! न्याय दिलाने का दावा करने वाले इस तरह के रियलिटी शो लगातार न्यायपालिका की जगह लेने की कोशिश कर रहे हैं. इसके मूल में टेलीविजन चैनलों की मुनाफ़ा कमाने की होड़ के अलावा और कुछ नहीं है. ज़ाहिर होता है कि हमारे समाज में न्याय पाने के अधिकार की खिल्ली उड़ाई जा रही है.&lt;br /&gt;इस साल सोलह अक्टूबर को राखी का इंसाफ़ शुरू हुआ था. शुरुआत से ही एक जज के तौर पर राखी की फूहड़ता अपने चरम पर थी. कहा गया कि बिना किसी क़ानूनी झंझट में पड़े राखी इसमें अपने दिल से न्याय करेगी. इस शो में पारिवारिक झगड़े सुलझाने में जुटी राखी ने झांसी के लक्ष्मण को नामर्द बोलकर उसे प्रताड़ित किया. शो में मौजूद दर्शकों ने भी उसका मज़ाक बनाया, जिसे वो बर्दाश्त नहीं कर पाया और उसने आत्महत्या कर ली. इतनी बड़ी घटना के बाद भी एनडीटीवी अपने इस शो को जारी रखे हुए हैं. शो की आलोचना के बाद बड़े-बड़े दिग्गज इसके पक्ष में कूद पड़े हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर वे दुनियाभर के बेहूदा तर्क दे रहे हैं. इस तरह कॉरपोरेट मीडिया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहाने अराजकता की सारी हदें पार करता जा रहा है. राखी का इंसाफ़ जैसे रियलिटी शो भी इसी का एक उदाहरण हैं. गौरतलब है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रतता हमेशा सामाजिक वर्गों के हिसाब से परिभाषित होती रही है. वैसे भी, इसकी कोई निरपेक्ष परिभाषा नहीं है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को हमेशा समय और स्थान की सापेक्षता के संदर्भ में ही समझा जा सकता है. हाल के दौर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा झंडा पूंजीवादी मीडिया घराने ही उठा रहे हैं. मीडिया के नियमन की जब भी बात उठती है तो वे अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ लेने लगते हैं. मीडिया एथिक्स को ठेंगा दिखाकर वे हमेशा कॉरपोरेट हितों को पूरा करने में जुटे रहते हैं. इस तरह मुनाफ़ा कमाने की होड़ में एक बेहद ख़ूबसूरत विचार को उन्होंने बेहूदगी में बदल दिया है. &lt;br /&gt;राखी का इंसाफ़ की आलोचनाओं बाद एनडीटीवी इस पर एक टॉक शो करवाता है. दलाली के आरोपों से घिरी बरखा दत्त उसमें ज़्यादातर ऐसे वक़्ताओं को बुलाती है जिनकी पक्षधरता साफ़ दिखाई देती है. शो में मौजूद ज़्यादातर लोग इसे मॉरल पुलिसिंग से जोड़कर देखते हैं. इस तरह प्रणय रॉय की हिस्सेदारी वाली एक कंपनी राखी का इंसाफ़ दिखा रही है तो दूसरी तरफ़ उनका समाचार चैनल उस टॉक शो के पक्ष में माहौल बनाने का काम कर रहा है. (पिछले साल दिसंबर में एनडीटीवी इमेजिन को टर्नर ब्रॉडकास्टिंग सिस्टम को बेच दिया गया था लेकिन अब भी क़रीब आठ फ़ीसदी शेयर एनडीटीवी के पास बचे हैं.) इससे भारत में मीडिया क्रॉस होल्डिंग को लेकर किसी ठोस क़ानून का न होना भी सामने आता है. जिसका फ़ायदा उठाकर एक ही कंपनी समाचार चैनल भी चला रही है और मनोरंजन चैनल भी. इसके अलावा बाक़ी कई धंधों में भी समाचार चैनल चलाने वाली कंपनियों की हिस्सेदारी रहती है, जो स्वाभाविक तौर पर सहयोगी कंपनियों के पक्ष में माहौल बनाने का काम करती हैं. &lt;br /&gt;मुख्यधारा के मीडिया में राखी सावंत पहले से आइटम गर्ल के नाम से कुख्यात है. यानी, बाज़ारू मीडिया ने एक महिला की गरिमा को यहां पर एक सेक्स आइटम यानी वस्तु में बदल दिया है. राखी को भी इस पर कोई आपत्ति नहीं है, क्यों कि उसकी रोजी-रोटी इसी से चलती है लेकिन एक सभ्य समाज में इस तरह की शब्दावली की स्वीकृति भी हमारे लोकतंत्र पर कई सवाल खड़े करती है. हमारी न्याय प्रणाली में ऐसा कोई रास्ता नहीं है जो इस तरह की बेहूदगी के प्रसार को रोक पाए. बाज़ार के इस पूरे खेल में राखी जैसे महिलाओं को एक सनसनी के तौर पर मीडिया इस्तेमाल करता है और अपना धंधा चमकाता है. राखी की  इसी छवि को अब एनडीटीवी इमेजिन इस्तेमाल कर रहा है  और न्याय को फ़ूहड़ता और सनसनी का पर्याय बनाने में तुला हुआ है. &lt;br /&gt;गौरतलब है कि सबसे पहले स्टार प्लस पर किरण की कचहरी नाम से पूर्व आइपीएस अफ़सर किरण बेदी से न्याय कराया था. साफ़ है कि स्टार प्लस का भी न्याय दिलाने में कोई भरासा नहीं था. अपने कार्यक्रम की रेटिंग बढ़ाना और मुनाफ़ा कमाना ही उसका भी मुख्य लक्ष्य था. इसके लिए उसने तेज तर्रार मानी जाने वाली देश की पहली महिला आईपीएस अफ़सर की छवि को भुनाने की कोशिश की. बाज़ार में न्याय की अवधारणा के साथ इस तरह की छेड़छाड़ अब राखी का इंसाफ़ तक पहुंची है. &lt;br /&gt;(समकालीन जनमत के दिसंबर अंक में प्रकाशित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/2900056613410233002-5779160615259968314?l=indiancoffeehouse.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/feeds/5779160615259968314/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=2900056613410233002&amp;postID=5779160615259968314&amp;isPopup=true' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/5779160615259968314'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/2900056613410233002/posts/default/5779160615259968314'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://indiancoffeehouse.blogspot.com/2010/12/blog-post_13.html' title='इंसाफ़ की दुकान'/><author><name>bhupen</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05878017724167078478</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='27' src='http://bp2.blogger.com/_hhZqGrtQ7i4/R1Onhpa7xcI/AAAAAAAAAHY/jf-2bBrz7pI/S220/bhupen+1.color'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-2900056613410233002.post-2478332078694961085</id><published>2010-12-13T18:28:00.001+05:30</published><updated>2010-12-13T18:32:44.951+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेख'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बरखा दत्त'/><title type='text'>मुनाफ़ाखोरों और सत्ता के दलालों का मीडिया</title><content type='html'>पत्रकारों और नेताओं के साथ कॉरपोरेट दलाल नीरा राडिया की बाचतीत के टेप सामने आने के बाद कई सफ़ेदपोशों के चेहरे से नकाब उतर गए हैं. ये बातचीत मई-जुलाई दो हज़ार नौ की है जब केंद्र में यूपीए के मनमोहन सिंह दूसरी बार सरकार बनाने की क़वायद में जुटे थे. इन टेपों की ट्रांसक्रिप्ट्स से ज़ाहिर होता है कि किस तरह कॉरपोरेट घराने और राजनेता, मीडिया के साथ मिलकर सत्ता का सौदा कर रहे थे. राडिया की फोन रिकॉर्डिंग को वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले में याचिका दर्ज करते हुए सुप्रीम कोर्ट में जमा किया है. हैरत की बात ये है कि ओपन और आउटलुक पत्रिका को छोड़कर मुख्यधारा के किसी भी समाचार संगठन ने इस ख़बर को नहीं उठाया. दूसरे शब्दों में इतनी बड़ी ख़बर को जान-बूझकर दबाने का काम किया. &lt;br /&gt;इस घटना से पद्मश्री बरखा दत्त की भी पोल खुल गई है. नीरा राडिया के साथ उसकी बातचीत के टेप सामने आने के बाद साफ़ हो गया है कि ए राजा को मंत्री बनाने के लिए बरखा दत्त ने किस तरह राजनीतिक लॉबीइंग की थी. स्पेक्ट्रम घोटाले में विवादों से घिरने की वजह से राजा को तो संचार मंत्री के पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा लेकिन बरखा अब भी शान से एनडीटीवी में ख़बरें बांच रही है. ये घटना समाचार मीडिया और राजनीतिज्ञों के घृणित गठजोड़ की एक बानगी भर है. इससे समझा जा सकता है कि पैसे के खेल में ताक़तवर लोग मीडिया का सहारा लेकर किस तरह जनता को बेवकूफ़ बनाते हैं. सारी हक़ीक़त सामने आ जाए तो हमाम में और कितने नंगे हैं, ये भी साफ़-साफ़ दिखने लगेगा. &lt;br /&gt;क़रीब एक दशक पहले बरखा दत्त ने कारगिल युद्ध के दौरान घटनास्थल से रिपोर्टिंग कर शोहरत कमाई थी. तब उसे इस तरह स्थापित किया गया कि जैसे उसने पत्रकारिता में कोई अभूतपूर्व उदाहरण पेश किया हो. जबकि हक़ीक़त ये थी कि वो राष्ट्रवाद से नहाई एक एम्बेडेड जर्नलिस्ट की तरह सेना के साथ कारगिल पहुंची थी. युद्ध की विभीषिका और निरर्थकता को बताने की बजाय उसने युद्धोन्माद भड़काने वाले दृश्य टेलीविजन स्क्रीन पर परोसे थे. उसकी इस बात को लेकर भी आलोचना होती रही है कि युद्ध के दौरान कैमरा लाइट ऑन करने की वजह से दूसरे पक्ष के सैनिकों ने भारतीय सैनिकों को लक्षित कर बमबारी शुरू कर दी थी जिस वजह से कई सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी. &lt;br /&gt;कारगिल से रिपोर्टिंग करने की वजह से बरखा रातों-रात मशहूर हो गई. पाकिस्तान विरोध की धुरी पर खड़ी भारतीय युद्ध पत्रकारिता को एक नया नाम मिला. उसकी कंपनी एनडीटीवी ने भी उसे स्थापित करने में अपनी पूरी ताक़त लगा दी. फिर, बरखा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. उसे पत्रकारिता के नाम पर देश-विदेश के कई पुरस्कार मिल चुके हैं. सत्ता की राजनीति करने वाली बड़ी-बड़ी हस्तियों से उसकी नज़दीकी बढ़ती गई. कभी दूरदर्शन पर छोटा-सा कार्यक्रम बनाने वाले प्रणय रॉय की कंपनी नई दिल्ली टेलीविजन (एनडीटीवी) को क़ामयाबियों की सीढ़ियां चढ़ाने में उसके इन संपर्कों का इस्तेमाल नहीं हुआ होगा ये कहना आसान नहीं है. गौरतलब है कि बरखा दत्त इस चैनल में ग्रुप एडिटर होने के साथ ही शेयर के एक बड़े हिस्से की मालकिन भी हैं. &lt;br /&gt;एक दौर में गंभीर पत्रकारिता का ब्रैंड बनने की कोशिश करने वाले एनडीटीवी की असलियत भी अब जग ज़ाहिर हो चुकी है. इस चैनल में ज़्यादातर ख़बरों का मतलब क्रिकेट और घटिया मुंबइया फिल्में हैं. एनडीटीवी ने मुनाफ़ा खोरी की दौड़ में आगे बढ़ते हुए सस्ते मनोरंजन के चैनल भी शुरू किए हैं. राखी सावंत जैसी फूहड़ और बेहूदा औरत का इस्तेमाल एनडीटीवी लगातार अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए कर रहा है. लोग भूले नहीं हैं कि हाल ही में एनडीटीवी इमेजिन के एक रियलिटी शो में राखी की अपमानजनक टिप्पणी की वजह से एक शख़्स ने ख़ुदकुशी कर ली थी. पत्रकारिता से मनोरंजन उद्योग में उतरे प्रणय रॉय को तब भी कोई शर्म नहीं आई. बेशर्मी जब इतनी बढ़ जाए तो फिर बरखा के कुकर्मों का भी उन पर क्या असर पड़ना है ! माना, बरखा एनडीटीवी से बाहर भी हो जाती है तो उसके लिए नया टेलीविजन साम्राज्य खड़ा करना कितना मुश्किल होगा ? राजदीप सरदेसाई इस काम को पहले ही अंजाम दे चुके हैं. &lt;br /&gt;जब ये तथाकथित बड़े पत्रकार सत्ता की चासनी में इस तरह मुंह मारते रहते हैं तो इनके लिए नाम और दाम कमाना कितना कठिन हो सकता है ? क्या देश की कैबिनेट में मंत्री बनाने में अहम भूमिका निभाने वाला पत्रकार अपने लिए एक भारत रत्न या राज्य सभा की सीट नहीं जुटा सकता ? गौरतलब है कि बरखा पहले से ही पद्मश्री हालिस कर देश का गौरव बढ़ा रही है. इस संदर्भ में कुछ वक़्त पहले राज्य सभा की सीट पाने के लिए कुछ चर्चित पत्रकार जिस तरह लॉबिइंग करते दिख रहे थे. वे और कोई नहीं बरखा के ही पेशेवर अग्रज हैं. &lt;br /&gt;अब ज़रा बरखा की सहेली नीरा राडिया के बारे में 
